सोमवार, 13 दिसंबर 2021

भारत स्काउट एवं गाइड

 

भार स्काउट एवं गाइड की पूरी जानकारी Scout and Guide full detail in Hindi

इस लेख आप भारत स्काउट एवं गाइड की पूरी जानकारी Scout and Guide full detail in Hindi पढ़ सकते हैं। जिसमें हमने स्काउट एण्ड गाइड की प्रार्थना, झंडा गीत, इतिहास, उद्देश्य, नियम, ध्वज, कैसे जुड़ें, करियर के विषय में पढ़ेंगे।

भारत स्काउट एवं गाइड की पूरी जानकारी Scout and Guide full detail in Hindi

Contents [show]

भारत स्काउट एवं गाइड प्रार्थना

दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना .
हमारे ध्यान में आओ ,प्रभु आँखों में बस जाओ,
अँधेरे दिल में आकर के ,परम ज्योति जगा देना.
बहा दो प्रेम की गंगा,दिलो में प्रेम का सागर,
हमे आपस में मिलजुलकर प्रभु रहना सिखा देना.
हमारा कर्म हो सेवा,हमारा धर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा व सेवकचर बना देना.
वतन के वास्ते जीना,वतन के वास्ते मरना,
वतन पर जां फ़िदा करना प्रभु हमको सिखा देना.
दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना.

(प्रार्थना में लगने वाला समय – 90 सेकण्ड)
प्रार्थना के रचियता – श्री वीर देव वीर

स्काउट एवं गाइड झंडा गीत

भारत स्काउट गाइड झंडा ऊँचा सदा रहेगा,
ऊँचा सदा रहेगा झंडा ऊँचा सदा रहेगा.
नीला रंग गगन सा विस्तृत भात्र भाव फैलाता,
त्रिदल कमल नित तीन प्रतिज्ञाओं की याद दिलाता.
और चक्र कहता है प्रतिपल आगे कदम बढेगा,
ऊँचा सदा रहेगा झंडा ऊँचा सदा रहेगा.
भारत स्काउट गाइड झंडा ऊँचा सदा रहेगा.

(झंडा गीत में लगने वाला समय – 45 सेकण्ड)
भारत स्काउट एवं गाइड झंडा गीत के रचियता -श्री दयाशंकर भट्ट

भारत स्काउट एवं गाइड का इतिहास History of Scout and Guide

क्या आपको पता है स्काउट एवं गाइड आंदोलन वर्ष 1908 में ब्रिटेन में सर बेडेन पॉवेल द्वारा आरम्भ किया गया? धीरे-धीरे यह आंदोलन हर एक सुसंगठित राष्ट्र में फैलने लगा, जिसमे भारत भी शामिल था। 

भारत स्काउट एवं गाइड की शुरुआत वर्ष 1909 में हुई, तथा आगे चलकर भारत वर्ष 1938 में स्काउट आंदोलन के विश्व संगठन का सदस्य भी बना। वर्ष 1911 में भारत में गाइडिंग की शुरुआत हुई, तथा 1928 में स्थापित गर्ल गाइड्स तथा गर्ल स्काउट्स के विश्व संगठन में भारत ने एक संस्थापक सदस्य की भूमिका निभाई। 

भारतवासियों के लिए स्काउटिंग की शुरूआत न्यायाधीश विवियन बोस, पंडित मदन मोहन मालवीय, पंडित हृदयनाथ कुंजरू, गिरिजा शंकर बाजपेई, एनी बेसेंट तथा जॉर्ज अरुंडाले के प्रयासों से वर्ष 1913 में हुई। 

भारत में ‘भारत स्काउट एवं गाइड (बी.एस.जी.)’ राष्ट्रीय स्काउटिंग एवं गाइडिंग संगठन है। इसकी स्थापना 7 नवम्बर, 1950 को स्वतंत्र भारत में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा मंगल दास पकवासा के द्वारा की गई।

इसमें ब्रिटिश भारत में मौजूद सभी स्काउट एवं गाइड संगठनों को सम्मिलित किया गया। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। इसके एक वर्ष पश्चात् 15 अगस्त, 1951 को आल इंडिया गर्ल गाइड्स एसोसिएशन को भी भारत स्काउट्स एंड गाइड्स संगठन में शामिल कर लिया गया।

विश्व स्काउट संगठन में वर्ष 1947 से 1949 तक अपने अहम योगदान के लिए विवियन बोस जी को विशेष तौर पर याद किया जाता है। वर्ष 1969 में विश्व स्काउटिंग में अद्वितीय सेवा के लिए श्रीमती लक्ष्मी मजूमदार को विश्व स्काउटिंग द्वारा ‘ब्रॉन्ज़-वोल्फ’ सम्मान से सम्मानित किया गया था।

भारत स्काउट एवं गाइड क्या है? What is Scout and Guide in Hindi?

स्काउट्स एवं गाइड्स एक स्वयंसेवी, गैर-राजनीतिक, शैक्षिक आंदोलन है, जो हर एक नव जवान को मानवता की सेवा करने का मौका प्रदान करता है, बिना किसी भी तरह के रंग, मूल अथवा जाति भेद के।

भारत स्काउट एवं गाइड अपने लक्ष्यों, सिद्धांतों एवं विधियों के आधार पर कार्य करताज है, जिन्हें इसके संस्थापक लार्ड बेडेन पॉवेल द्वारा 1907 में बनाया गया था।

भारत स्काउट एवं गाइड का उद्देश्य Aim of Scout and Guide in Hindi

स्काउट एवं गाइड का उद्देश्य नवयुवकों की पूर्ण शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक क्षमताओं का विकास करना है, जिससे कि वे एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी क्षमताओं के द्वारा स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर योगदान कर सकें।

भारत स्काउट एवं गाइड निम्न कुछ प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है –

  1. ईश्वर के प्रति कर्तव्य:- आध्यात्मिक नियमों का पालन करना, अपने धर्म के प्रति निष्ठावान रहना तथा अपने ईश्वर द्वारा प्रदत्त कर्तव्यों एवं ज़िम्मेदारियों को स्वीकार करना।
  2. अन्य लोगों के प्रति कर्तव्य:- अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठावान रहते हुए, स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति, समझ एवं आपसी सहयोग की प्रोत्साहित करना।
  3. स्वयं के प्रति कर्तव्य:- स्वयं के विकास की ज़िम्मेदारी को निभाना।

स्काउट एवं गाइड की विधियां Methods

भारत स्काउट एवं गाइड पद्धति प्रगतिशील स्वयं शिक्षा प्रणाली है, यद्यपि –

  • यह एक वचन तथा कानून भी है।
  • यह कर के सीखने में विश्वास रखता है।
  • किसी वयस्क के नेतृत्व में छोटे समूहों की सदस्यता।
  • प्रतिभागियों की रूचि के अनुसार विभिन्न प्रगतिशील एवं प्रेरणादायक कार्यक्रमों का आयोजन।

स्काउट एवं गाइड के नियम Laws of Scout and Guide

भारत स्काउट एवं गाइड के कुछ मुख्य कानून व नियम –

  • स्काउट / गाइड विश्वसनीय होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड वफादार होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड सबका/सबकी मित्र ओर प्रत्येक दुसरे स्काउट /गाइड का/की भाई/बहिन होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड विनम्र होता/होती है।
  • स्काउट/ गाइड पशु पक्षीयो का मित्र ओर प्रकृति – प्रेमी होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड अनुशासनशील होता/होती है ओर सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करने में सहायता करता / करती है ।
  • स्काउट/ गाइड साहसी होता/होती है ।
  • स्काउट/गाइड मितव्ययी होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड मन,वचन,और कर्म से शुद्ध होता/होती है ।

भारत स्काउट एवं गाइड मोटो(सिद्धांत): “बी प्रिपेयर्ड (तैयार रहो)”

भारत स्काउट एवं गाइड के वचन

“अपने सम्मान को साक्षी बनाकर, मैं यह वचन देता हूँ कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूंगा,
अपने ईश्वर तथा राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाने में,
अन्य व्यक्तियों की सहायता करने में तथा,
स्काउट नियमों का पालन करने में।”

भारत स्काउट एवं गाइड का ध्वज Flag of Scout and Guide

स्काउट के ध्वज में प्रतीक के रूप में चक्र है जिसमे 24 तीलियाँ है। इसे अशोक चक्र कहा जाता है, क्योंकि यह चक्र सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है। ध्वज के पार्श्व पर भगवा तथा हरा रंग होता है।

आमतौर पर “स्काउट्स एंड गाइड्स” शब्द में बालक तथा बालिकाओं दोनों को ही सम्मिलित किया जाता है। इसके अलावा इन्हें ” कब्स एंड बुलबुल” तथा ” रोवर्स एंड रेंजर्स” भी कहा जाता है। 

स्काउट एवं गाइड से कैसे जुड़ें? How Join Scouts and Guides?

स्काउट एवं गाइड ज्वाइन करने के लिए निम्न दो तरीके हैं-

  • अगर आप किसी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, तो आपको अपने विद्यालय के ऑफिस में सीधे जाकर उनसे कहना होगा कि आप भारत स्काउट एवं गाइड ज्वाइन करने के इच्छुक हैं तथा इसमें आपको शामिल किया जाये।
  • और अगर आप किसी विद्यालय में नही हैं, तो इसे ज्वाइन करने के लिए स्काउट्स के रेलवे डिवीज़न में जाकर उन्हें इस बारे में सूचित करना होगा। जिसके बाद वो आपको इसमें शामिल करने पर विचार- विमर्श तथा वार्ता करेंगे।
  • इसके अलावा एक सबसे अहम बात जो आपको पता होनी चाहिए कि आप भारत स्काउट एवं गाइड क्यों ज्वाइन करने के इच्छुक हैं? तथा हर वर्ष के अंत तक वे ऐसे कौन- कौन से लक्ष्य होंगे, जिन्हें आप हर हाल में पूरा करना चाहते हैं, एकल रूप से, तथा एक समूह के तौर पर??

भारत स्काउट एवं गाइड सर्टिफिकेट आपके करियर में क्या भूमिका निभा सकते हैं? How can scout and guide certificate help you with your career?

भारत स्काउट एवं गाइड में राष्ट्रपति तथा राज्य पुरस्कार सर्टिफिकेट से सीधे तौर पर जॉब की प्राप्ति नही हो सकती। परंतु ये सर्टिफिकेट आपके बायोडाटा के साथ संलग्न होने पर आपके जॉब पाने की सम्भावना को, बिना सर्टिफिकेट वाले लोगों से, कहीं अधिक बढ़ा देते हैं।

इंटरव्यू के वक़्त स्काउट गाइड प्रशिक्षण में मिले अनुभव आपको अपने प्रतिद्वंदियों से हमेशा दो कदम आगे रखते हैं। इसके अलावा भारतीय रेलवे में जॉब के लिए स्काउट्स/गाइड्स आरक्षण का भी प्रावधान है।

कुल मिलाकर आपको अपनी स्काउट/गाइड में मिले उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए। ये अनुभव प्रत्यक्ष रूप में तो न सही, परंतु अप्रत्यक्ष रूप में आपके आगामी जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल द्वारा हस्ताक्षरित तथा स्टाम्पड सर्टिफिकेट बहुत अधिक महत्ता रखते हैं।

आशा करते हैं आपको भारत स्काउट एवं गाइड की पूरी जानकारी Scout and Guide full detail in Hindi आपको पसंद आई होगी।

24 thoughts on “भारत स्काउट एवं गाइड की पूरी जानकारी Scout and Guide full detail in Hindi”

  1. Dear sir/madam i am a rastrapati scout and completed my PG Degree. is any option for any job in Scout and Guide?
    Please guide me.

    Reply

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स्काउट बाल चार

 स्काउटिंग (Scouting) या बालचरी एक आन्दोलन है जिसमें बच्चों से बड़ो तक के उच्च् कोटि की नैतिकता व योग्यता का विकास किया जाता है। स्काउटिंग आन्दोलन के जनक राबर्ट स्टिफैंस स्मिथ बैडन पावेल थे। भारत स्काउटिंग 1913 में ऐनी बेसेन्ट द्वारा प्रारम्भ करायी थी। अब भारत स्काउट व गाइड संस्था है।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

सेना पर कुछ जरूरी किताबें

 भारतीय सेना पर लिखी किताबें कम नजर आती हैं। अभी हाल में जब शेखुलर भावनाएं “उरी” नाम की फिल्म के “हाइपर नेशनलिज्म” से आहत हो गयीं तो मुझे दो किताबों की याद आई। पहली किताब है “मिशन ओवरसीज” जिसे सुशांत सिंह ने लिखा है। सुशांत सेना में करीब दो दशक तक काम कर चुके हैं और उसके बाद वो इंडियन एक्सप्रेस में सैन्य मुद्दों पर लिखते रहे हैं। इस वजह से उनकी सेना और लिखने की शैली, दोनों के मिले जुले अनुभव से ये किताब निकलती है।


मिशन ओवरसीज सुनने पर ऐसा लगता है कि ये हाल के मयन्मार या कश्मीर के सर्जिकल स्ट्राइक की बात करती होगी, लेकिन ऐसा है नहीं। ये जिन तीन अभियानों की बात करती है वो जरा पुराने हैं। पहला तो श्रीलंका में सेना भेजने और भारी नुकसान उठाने वाला मिशन पवन है। राजनैतिक मूर्खताओं की वजह से इसमें कई सैनिकों की मृत्यु हुई थी। इसे पड़ोसी देश में दूसरों का हस्तक्षेप न होने देने और श्रीलंका के टुकड़े होने से बचाए जाने के नाम पर सही ठहराया जाता है।


ऑपरेशन कैक्टस और ऑपरेशन खुखरी में भारतीय सेना को बड़ी कामयाबियां मिली थी। भारतीय सेना की ऐसी जीतों के बारे में मुख्य धारा की मीडिया में चर्चा क्यों नहीं होती, या आम लोगों को इनका नाम क्यों याद नहीं, ये सोचने लायक बात है। करीब 200 पन्नों की इस किताब को छोटी सी किताब कहा जा सकता है।


दूसरी किताब “इंडियाज मोस्ट फियरलेस” शिव अरूर और राहुल सिंह ने लिखी है। शिव अरूर एक दशक से सैन्य मुद्दों पर काम करते रहे हैं और फ़िलहाल इंडिया टुडे टेलेविज़न में काम करते हैं। राहुल सिंह हिंदुस्तान टाइम्स के हैं और वो भी सेना से जुड़े मुद्दों पर लिखते हैं। इनकी किताब ऐसे सैनिकों की कहानियां हैं, जिन्होंने विकट परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय दिया है। इस किताब के सभी पात्र जीवित नहीं हैं, कुछ वीरगति को प्राप्त हो गए।


इसकी चौदह कहानियों में से एक कश्मीर के सर्जिकल स्ट्राइक की कहानी भी है। हजारों लोगों को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित निकालने वाले नौसैनिक की एक कहानी है और एक कहानी ऐसे वायुसैनिक की है जिनके जहाज में आग लग गयी थी। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि ये किताब सिर्फ थल-सेना के कारनामों पर है। सैनिक कौन से हथियार इस्तेमाल करते हैं, आपस में कैसे बर्ताव करते हैं, इनका भी थोड़ा बहुत जिक्र आ जाता है। इसलिए समझ में आता है कि ये सचमुच सैनिकों से बात करके लिखी गयी किताब है। 


सेना के हाल के कारनामे मेरे लिए कोई प्रिय विषय नहीं होता। जब ये किताबें आईं तो मेरा ख़याल था कि इन्हें पढ़ने के लिए हम समय निकालेंगे क्या? किताबें रोचक अंदाज में लिखी गयी हैं शायद इसलिए हम इन्हें पूरा पढ़ पाए। ऐसी किताबों के बारे में “बड़े लोग” बात भी नहीं करते इसलिय मेरे जैसे “अनाम रिव्युअर” की नैतिक जिम्मेदारी है कि इनके बारे में बताया जाए। युवाओं की सेना में काफी रूचि होती है, उन्हें ये किताबें जरूर पसंद आएँगी।

✍🏻आनन्द कुमार


कुछ समय पूर्व यशार्क पांडेय द्वारा लिखित लेखमाला


राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिष्ठान और निदान: 


एक सज्जन ने पूछा, 'अच्छा तो आप लेखक हैं... किस विषय पर लिखते हैं?' मैंने कहा 'मैं तो रक्षा और विज्ञान पर लिखता हूँ.' साहब माथा खजुआने लगे. कहने लगे 'विज्ञान तो ठीक है लेकिन रक्षा (defence) तो बड़ा अजीब सा विषय हैं. आप इस पर कैसे लिख लेते हैं?' तो मैंने उन्हें स्पेशल फ़ोर्स पर लिखे अपने कुछ लेख पढ़ाये, कुछ फेसबुक पोस्ट और पुस्तक समीक्षाएं दिखायीं. उन्हें बड़ा मजा आया. फिर मैंने उनसे कहा कि 7 दिसम्बर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस होता है. आप "Armed Forces Flag Day Fund" में कुछ दान कीजिये. साहब ने प्रसन्न होकर ऑनलाइन पेमेंट किया. मुझे प्रसन्नता है कि मेरे लिखने और कहने से भारत के एक नागरिक ने पूर्व सैनिकों और उनके परिवार के लिए दान किया.  


मैं कोई विशेषज्ञ नहीं. तीन वर्ष पहले तक सशस्त्र सेनाओं के बारे में बेसिक जानकारी ही रखता था. बचपन में यही समझ आया था कि एक सैनिक की नौकरी मेरे लिए सर्वोत्तम है. कारगिल युद्ध के समय फंड में अपने जेब खर्च से शायद 10 रूपये दिए थे. माता-पिता ने अधिक दिए थे. तब हम मैगज़ीन से टाइगर हिल विजय और अनेक फोटो काट कर कोलाज पोस्टर बनाया करते थे. फिर चौदह साल बाद जब कन्हैया कुमार ने आर्मी को गाली दी तब मुझे यही समझ में आया कि इस देश में सामरिक संस्कृति का विकास नहीं हुआ. यहाँ जागरूकता की भारी कमी है. तब मैंने राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा सम्बन्धी विषयों का स्वतः अध्ययन प्रारंभ किया. मेरे पास कोई डिग्री नहीं, कोई शिक्षक नहीं. मेरा रोल मॉडल बीएसफ का वह जवान है जो 50 डिग्री सेल्सिअस पर भी तैनात रहता है. मेरा आदर्श वह ऑफिसर है जो -55 डिग्री पर भी सियाचिन पर भारत के सामरिक हितों की रक्षा करता है. 


यह कहना बहुत आसान है कि अमेरिका अपने सैनिकों को बहुत सम्मान देता है और उनके लिए हवाई यात्रा में भी घोषणा की जाती है कि फलाने वॉर वेटेरेन आज हमारे साथ उड़ान पर हैं. 


जय हिन्द. जय हिन्द की सेना. 


राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिष्ठान और निदान...


UK Telegraph में एक आलेख पढ़ा। जाने माने रक्षा विशेषज्ञ कर्नल (रि०) अजय शुक्ला ने शेयर किया था। ब्रिटिश स्पेशल फ़ोर्स के अधिकारी ने लिखा है और उस लेख में कहा गया की फ्रांस की आतंकवाद निरोधक सुरक्षा एजेंसी (RAID) काफी उन्नत है, दक्ष है और इस बार दुर्भाग्य ही था की ऐसी घटना हो गई। आतंकवाद चूंकि छद्म युद्ध है इसलिए इससे लड़ने के लिए मजबूत खुफिया तंत्र सबसे कारगर हथियार है। गुप्त रूप से सूचनाएं 2 मोर्चों से जुटाई जाती हैं: Internal intelligence और external intelligence. Intelligence और investigation (अन्वेषण) में अंतर होता है। घटना के बाद की कवायद investigation कहलाती है जबकि घटना होनेे के पहले की सूचना एकत्र करना intelligence का काम होता है। हमारे देश में आतंकी हमले नाकाम करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी IB की है। माना जाता है की भारत की Intelligence Bureau (IB) विश्व की सबसे पुरानी और 5 सबसे बेहतरीन clandestine agencies (गुप्तचर एजेंसी) में से एक है जिसका कार्यक्षेत्र internal (अंदरुनी) intelligence और प्रतिरोधक यानि counter intelligence है। External intelligence यानि दूसरे देशों में जाकर गुप्त रूप से जानकारी इकट्ठा करना RAW का काम है। 


अब सवाल ये उठता है कि हम फ्रांस में हुये आतंकी हमले से क्या सबक ले सकते हैं। इसके लिये कई पहलुओं पर विचार करना जरुरी है। कुछ ढांचागत खामियां भी हैं; कनिष्क विमान हादसा, 1993, करगिल, IC 814, संसद पर हमला, 26/11 सहित तमाम बम विस्फोट की घटनाएं भी इतिहास में दर्ज हैं; सामाजिक कारण भी फन उठाये पूर्ववत खड़े हैं; राजनीतिक इच्छाशक्ति भी हमेशा से कठघरे में रही है। इतिहास में बहुत कुछ हुआ और बहुत कुछ नहीं भी हुआ। आज के परिप्रेक्ष्य में गुप्तचर व्यवस्था की ढांचागत कमजोरी उसकी hierarchy (पदक्रम) पर भी सवाल उठाती हैं। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) कौन से कारगर और नीतिगत फैसले लेती है या Joint Intelligence Committee (JIC) का क्या उत्तरदायित्व है कुछ बताया नहीं जाता। ध्यान दीजियेगा जनता को नीतियां जानने का अधिकार है किसी ऑपरेशन के दौरान modus operandi भले न बताया जाये। अमरीका की CIA वहां की संसद में उत्तरदायी होती है जबकि हमारे यहाँ IB, RAW किसी भी एजेंसी का गठन वैधानिक रूप से नहीं हुआ सिर्फ शासनादेश से बना दी गयीं। इसका मतलब ये है की ये संविधान में कहीं नहीं हैं और लोकतंत्र के प्रतीक संसद के प्रति इनका कोई उत्तरदायित्व निर्धारित नहीं किया गया है। आ० अटल जी के समय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) का पद सृजित किया गया था। ब्रजेश मिश्र से अब तक 3 विदेश सेवा के और डोभाल साहब को मिला कर 2 पुलिस सेवा के अधिकारी इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) गठित की गई थी मई 1998 में जिसके मातहत National Security Advisory Board सलाहकार के रूप में काम करता है जिसमे कई विशेषज्ञ होते हैं। कहा जाता है की गुप्तचर एजेंसियां NSA को रिपोर्ट करती हैं और NSA प्रधानमंत्री को। दरअसल ये सब चीज़ें आपस में इतनी गड्डमड्ड हैं की ये समझ में नहीं आता की आखिर में उत्तरदायी कौन होगा। ये सारी जानकारी आपको किसी भी आधिकारिक सरकारी स्रोत से नहीं मिलेंगी। किसी भी किताब में प्रामाणिक तौर पर लिखा हुआ नहीं मिलेगा। UPA सरकार में राज्यों से इनपुट लेने और एजेंसीयों में सामंजस्य बनाने के लिए आनन फानन में MAC (Multi Agency Center) बनाने की बात चली थी। बाद में साइबर इंटेलिजेंस के लिए जानकारी जुटाने के लिए National Intelligence Grid (NatGrid) को गृह मंत्रालय के एक दफ्तर के तौर पर बना दिया गया जैसे इंदिरा गांधी ने कैबिनेट सचिवालय से जोड़ कर RAW को बनाया था। अमरीका की NSA/CSS की तर्ज पर NTRO का गठन किया गया जो साइबर इंटेलिजेंस का काम कर सके। यही नहीं आतंकी घटनाओं की जांच के लिए अलग से एजेंसी बनाई गयी जिसको आप NIA के रूप में जानते हैं। ये तो उस व्यवस्था है अंग मात्र हैं जो पान की दूकानों की भांति खोल दिये गए हैं। अब इसे चलाएगा कौन इनकी विश्वसनीयता इस पर निर्भर करती है। गौरतलब है की गुप्तचर एजेंसियां आपसी भरोसे और सहयोग के उपक्रम पर काम करती हैं। इनका आपस में कोई वैधानिक या संरचनात्मक सामंजस्य (structural coordination) नहीं है। कई बार तो ये भी कहा गया की एक एजेंसी के पास स्वतंत्र रूप से सूचना थी जिसने दूसरे को नहीं बताया। 


इन चीज़ों के अलावा आपको ये भी सोचना पड़ेगा की 'जनता' जिसके उपर आतंक की सबसे ज्यादा मार पड़ती है वो कितनी जागरूक है। किसी परिस्थिति में क्या करना बेहतर है ये हमारे लोग बिल्कुल नहीं जानते। पहले दुश्मन सुदूर कश्मीर और असम में था फिर महानगर बम्बई आया और अब तो बनारस भी दहल चुका है। विज्ञान के शहर बेंगलुरु से युवा ISIS की तरफ उन्मुख हैं। पहले दुश्मन छुप कर बम फोड़ता था अब घर में घुस कर आपके चेहरे पर चिल्लाता है और गोली मार देता है। कर्नल (रि०) पी.के. गौतम ने 2004 में अपनी किताब (National Security A Primer) में स्कूल कॉलेज की शिक्षा में राष्ट्रीय सुरक्षा को शामिल करने की महत्ता को रेखांकित किया है। पाकिस्तान और सऊदी अरब में बच्चों की पढ़ाई में चरमपंथ का ज़हर कैसे घोला जाता है ये सर्वविदित है। हम अपने बच्चों को और युवाओं को आने वाले खतरे का ज्ञान क्यों न कराएं? बेहद सड़ चुकी शिक्षा प्रणाली को इसका इंजेक्शन भी दिया जाना जरूरी है। राष्ट्रवाद की अवधारणा को हम भारतवासी 1857 के बाद से अभी तक पचा नहीं पाये हैं। जब विकास को जनांदोलन बनाने की कवायद की जा सकती है तो राष्ट्रीय सुरक्षा को क्यों नहीं? यदि शिक्षा प्राप्त करने से व्यक्ति विसंगतियों से मुक्त हो सकता है तो आत्मरक्षण क्यों नहीं कर सकता? इन बातों पर विचार इसलिए जरुरी है साहब क्योंकि counter intelligence एक मनोवैज्ञानिक खेल है और कहा गया है की human intelligence is the best form of intelligence. फ्रांस में वहां के नागरिकों में ही सांप छिपे थे जिनके सहयोग से ISIS ने कारस्तानी को अंजाम दिया। यदि आपके बच्चे और देश के नागरिक अपनी शिक्षा में राष्ट्रीय सुरक्षा भी पढ़ेंगे तो किसी बहकावे में कभी नहीं आयेंगे और शासन तन्त्र के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ेंगे। आपको पता है फ्रांस में आपातकाल क्यों लगाया गया? इसलिये ताकि शासन तन्त्र बिना किसी रोक टोक के साँपों को खोज निकाले और कुचल दे। फ्रांस को पता है की उसके नागरिक इसमें उसका साथ देंगे भले ही वो मीडिया का अंग हों या पुलिस का।

.....शेष अगले पोस्ट में

✍🏻यशार्क पाण्डेय

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

मुरुगन Vs अफ्रीकन मुरुंगु


पूर्वी अफ्रीका खास कर केन्या, तंजानिया, जिम्बाब्वे, सूडान, उगांडा, इथियोपिया आदि में एक बहुत ही     भगवान है मने उनके क्रियेटर, प्रोटेक्टर, पालनकर्ता आदि सब। और उनका नाम क्या है मालूम है? तो उनका नाम है ‘मुरुंगु (Murungu)’! इंटरेस्टिंग न ! इन्हें मुलुंगु (Mulungu) भी कहते।

. इससे पहले भी बता चुके कि ‘जहाँ कहीं भी पहाड़ी (Hillock) होगा, भगवान मुरुगन वहाँ जरूर मिलेंगे!’ और यहाँ भी भगवान मुरुंगु पहाड़ी में ही मिलते हैं। इन्हें पहाड़ का देवता बोलते हैं जो सबकी निगरानी करता है व रखवाली। है न इंटरेस्टिंग।


पूर्वी अफ्रीका के करीब 25 ऐसे एथनिक ग्रुप्स हैं जिनके भगवान मुरुंगु है जो पहाड़ पर विराजमान होते हैं। जिसमें से किकियू(Kikiyu) ट्राइब प्रमुख है। भगवान मुरुंगु के नाम से यहां के लोग अपना सरनेम मुरुंगु/मुरुकु लगाते हैं। लगभग पूरे पूर्वी अफ्रीका में मिलेंगे ये सरनेम।


एक मान्यता के अनुसार Gikiyu जो आदि पुरूष हैं यहाँ के वे भगवान मुरुंगु के साथ साक्षात थे। Gikuyu को भगवान मुरुंगु ‘माउंट केन्या’ ले के आये। यहीं वो एक स्त्री का भी निर्माण किये जिनका नाम था ‘मुम्बी(Mumbi)’ .. और मुम्बी के साथ इनका विवाह कराये।

अब मुम्बी बड़ा इंटरेस्टिंग नाम हो गया न?! (मुंबा देवी) .. तो Gikuyu और Mumbi अफ्रीका के लिए आदिपुरुष व आदिनारी हुए। इन्हीं से आगे वंश बढ़ा। भगवान मुरुंगु माउंट केन्या से दोनों को आशीर्वाद देते कि “हे पुत्र पुत्री! जाओ इस जमीन में राज करो और भावी पीढ़ी का निर्माण.. आज से ये तुम्हारा हुआ!”


तब से प्रत्येक वर्ष भगवान मुरुंगु को माउंट केन्या में जरूर पूजा जाता है व याद किया जाता है।


लेकिन जैसा कि मालूम है कि हलेलुइया कहाँ नहीं पहुँच गए हैं.. आज यहाँ की आबादी का 70% हिस्सा हलेलुइया बन चुका है। … अब बड़े इंटरेस्टिंग की बात है कि यहाँ भी जीसस को मुरुंगु के विभिन्न रूपों में दर्शाया जाता है और बोला जाता कि जीसस ही मुरुंगु है जैसा कि दक्षिण भारत में जीसस बाबा भगवान मुरुगन का भेष धर चुके हैं।


और एक इंटरेस्टिंग बात! जिस तरह से माउंट अरारात, माउंट फूजी, और श्रीलंका का एडम पीक एडम के नाम हो गया .. ‘रामसेतु’ एडम ब्रीज हो गया वैसे ही माउंट केन्या ‘ माउंट एडम’! हो गया.. च्या माइला रे!! .. बोला जाता कि आदम बाबा इसी पहाड़ी पे अपना कदम रखे थे और अफ्रीका में जीवन की शुरुआत किये थे। ताले झोपड़ी के।.. कनवर्टेड लोग तो मानने भी लगे।

लेकिन जो ओरिजनल लोग हैं वे अब भी भगवान मुरुंगु को ही पूजा करते हैं।

✍🏻गंगा महतो, खोपोली से


कार्त्तिकेय

१. सुब्रह्मण्य-

सम्पूर्ण विश्व ही ब्रह्म है। चेतन रूप में पुरुष है। अव्यक्त स्रोत के ४ भाग में १ ही भाग जगत् रूप में बना। १ भाग पुरुष है तथा ४ भाग का मूल स्रोत बड़ा होने के कारण पूरुष है। निर्मित विश्व के अलग अलग पिण्ड विराट् (प्रकाशित, दृश्य) विश्व हैं, उनका अधिष्ठान (स्रोत पदार्थ क्षेत्र, आकर्षण बलों द्वारा उसकी स्थिति) बडा होने से पूरुष है।

ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाँश्च॒ पूरु॑षः। 

पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृत॑न्दि॒वि॥३॥

ततो॒ वि॒राड॑जायत वि॒राजो॒‍ऽअधि॒पूरु॑षः। 

स जा॒तो ऽअत्य॑रिच्यत प॒श्चाद् भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥५॥

(पुरुष सूक्त, वाज.यजु, ३१/३,५)

इसमें अलग अलग रचनायें विभिन्न स्तरों पर कणों का समूह या गण है। अतः प्रत्यक्ष विश्व के हर रूप को गणपत्यथर्वशीर्ष में गणेश या गणपति कहा है। 

ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। --- त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि॥१॥ त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मा असि॥४॥ (गणपत्यथर्वशीर्ष)

अलग अलग कण ब्रह्म रूप हैं। वे जब स्वेद से मिले हुए दीखते हैं, तो वे सुब्रह्म हो जाते हैं। स्वेद का अर्थ पिण्ड से निकलता जल विन्दु है, जैसे मनुष्य शरीर से पसीना निकलता है। कण बहुत निकट होने से उनके बीच का अन्तर नहीं दीखता है और वे मिले हुए लगते हैं। यह सुब्रह्म है। आकाश में एक दिशा में दीखते हुए तारा गणों को हम काल्पनिक रेखा से मिला कर देखते हैं तो वह नक्षत्र आकार रूप में दीखते हैं, जैसे-मेष (भेड़), वृष (बैल) आदि। सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखने पर परमाणु भी खाली है, अणुओं के समूह के बीच भी जगह खाली है। पर उनके बीच का खाली स्थान बहुत छोटा होने के कारण मिला हुआ लगता है। कम्प्यूटर के प्रिण्टर से भी विन्दुओं का समूह प्रिण्ट होता है। वह रेखा सेबना अक्षर दीखता है। यह सुब्रह्म रूप विश्व या ब्रह्म ही सुब्रह्मण्य है। 

ॐ ब्रह्म ह वा इदमग्र आसीत् स्वयं त्वेकमेव तदैक्षत महद्वै यक्षं तदेकमेवास्मि हन्ताहं मदेव मन्मात्रं द्वितीयं देवं निर्मम इति। तदभ्यश्राम्यदभ्यतपत् समतपत् तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्र्यमाजायत तेनानन्दत्। तमब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति। तद्यदब्रवीत् महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति तस्मात् सुवेदोऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेद इत्याचक्षते । परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षद्विषः॥ (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/१)

२. स्कन्द रूप-

सृष्टि का मूल बहुत विरल शून्य-प्राय रस था। उसे परम व्योम भी कहा है, या सृष्टि का प्रथम रूप आकाश महाभूत था।

रसो वै सः (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)

ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम॥३४॥

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्॥३९॥

सहस्राक्षरा परमे व्योमन्॥४१॥ (अस्य वामीय सूक्त, ऋक्, १/१६४)

तस्माद् वा एतस्माद् आत्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद् वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽ अन्नम्। अन्नात् पुरुषः। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/१/३)

व्योम से ५ स्तर की अग्नि हुई। अग्नि का सामान्य लौकिक अर्थ आग है, जो ताप का घना रूप है। पदार्थ कणों का भी घना रूप अग्नि है। गुरुत्व आकर्णण तथा अन्य बलों (सुपर्ण रूप में ऋषि अङ्ग) के कारण बहुत बड़े बादल जैसी रचनायें बनीं, जिनको द्रप्स (अंग्रेजी में drops) कहा गया। यह पिण्ड रूप में ब्रह्माण्ड (ब्रह्म का एक अण्डाकार कण, galaxy) बने। ब्रह्माण्डों का समूह प्रथम अग्नि हुआ। यह मूल रस रूप समुद्र से अलग (स्कन्न) हुआ, अतः इसे स्कन्द कहा गया। द्रप्स के कारण रस समुद्र तरंग जैसा (सलिल) हुआ, उसमें द्रप्स का आकार सरिर् (शरीर) हुआ। ब्रह्माण्ड के द्रप्स में कणों का विस्तार अप् (जल जैसा) समुद्र हुआ। उनमें द्वितीय स्तर की अग्नि होने से उनकी गति या कम्पन हुआ। कम्पन या शब्द सहित अप् को अम्भ कहते हैं। उसका ताराओं के बीच का शान्त क्षेत्र साम्भ (साम्ब) सदाशिव है (शिव = शान्त)। द्वितीय अग्नि रूप में तारा स्कन्न या अलग हुए। तारा के गुरुत्व क्षेत्र का घना पदार्थ केन्द्रीय तारा तृतीय स्कन्द या अग्नि है। तारा क्षेत्र में ग्रह पिण्डों का निर्माण चतुर्थ अग्नि और स्कन्न हुआ। उसके भीतर ठोस चट्टानी ग्रह जैसे पृथ्वी पञ्चम अग्नि अलग या स्कन्न हुआ। 

आपो ह वाऽइदमग्रे सलिलमेवास। (शतपथ ब्राह्मण, ११/१/६/१) 

विभ्राजमानः सरिरस्य मध्य उप प्र याहि दिव्यानि धाम ।(वा. यजु. १५/५२)

आपो वै सरिरम्। (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/२/१८) 

इमे वै लोकाः सरिरम् । (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/२/३४, ८/६/३/२१) 

आापो वा अम्बयः । (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, १२/२)

अयं वै लोकोऽम्भांसि (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१८/१)

अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः । (ऐतरेय उपनिषद्, १/१/२)

इन्द्रः (शून्य में फैला तेज) पञ्च क्षितीनाम् (ऋक्, १/७/९)

अमी ये पञ्चोक्षणो मध्ये तस्थुर्महो दिवः (ऋक्, १/१०५/१)-कुछ लोग इसका अर्थ ५ तारा ग्रह करते हैं। यह ५ स्तर के दृश्य पिण्डों का केन्द्र या स्रोत कर्त्ता ब्रह्म का निर्देश करता है।

यस्य विश्वानि हस्तयोः पञ्च क्षितीनां वसु (ऋक्, १/१७६/३)

पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः (कठोपनिषद्, १/३/१)

एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूपो इन्द्राय विष्णे समकारि सोमः (ऋक्, ६/४१/३)

अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद् द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तु विष्मान् (ऋक्, ७/८७/६)

द्रप्सश्चस्कन्द प्रथमाँ अनु द्यूनिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः॥ (ऋक्, १०/१७/११, वाज. यजु, १३/५)

यस्ते द्रप्सः स्कन्दति॥१२॥ (ऋक्, १०/१७/१२)

३. कुमार सर्ग-

वेद में मनुष्य के ७ पुरुष तक पिण्ड सम्बन्ध की तरह सृष्टि के ७ लोक और ७ सर्ग कहे गये हैं। इनको अग्नि की जिह्वा भी कहा है जिससे ७ प्राण, ७ लोक, ७ अर्चि, ७ समिधा, ७ होम, ७ गुहाशय आदि हैं। 

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। 

स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्तजिह्वाः॥(मुण्डक उपनिषद्, १/२/४)

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्, सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः।

सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त॥ (मुण्डक उपनिषद्, २/१/८)

आकाश में अव्यक्त विश्व से एक के बाद एक क्रमशः ७ लोक होते हैं। इनमें ५ मण्डल अर्थात् प्रायः गोल पिण्ड हैं-स्वयम्भू मण्डल (अनन्त आकाश), परमेष्ठी (सबसे बड़ी ईंट, आकाशगंगा), सौर मण्डल, चान्द्र मण्डल (चन्द्र कक्षा का गोल), भू मण्डल (पृथ्वी ग्रह), जिनको ५ अग्नि कहा गया है (५ बार घनीकरण)। इनमें सूर्य-चन्द्र-पृथ्वी का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। यह प्रभाव मिला जुला है, अतः इसको ३ नाचिकेत (चिकेत = अलग अलग) या शिव के ३ नेत्र हैं-

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके, गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे।

छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः॥ (कठोपनिषद्, १/३/१)

इनमें ७ लोक हैं-सत्य, तपः (दृश्य जगत्), जनः (आकाशगंगा), महः (ब्रह्माण्ड की सर्पाकार भुजा में सूर्य केन्द्रित गोल, मोटाई बराबर व्यास), स्वः (सौर मण्डल), भुवः (ग्रह कक्षा), भू (पृथ्वी)। इनके तत्त्वों के अनुसार अग्नि के ७ रूप या विवर्त्त हैं-

१. ब्रह्माग्नि (स्वयम्भू-अग्निर्वै ब्रह्मा-शतपथ ब्राह्मण, ३/२/२/७, षड्विंश ब्राह्मण, १/१)

२. देवाग्नि (सौर)-तद् वा एनं एतद अग्रे देवानां अजनयत, तस्माद् अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, २/२/४/२)

३. अन्नाद अग्नि-इयं (पृथिवी) वा अन्नादी (कौषीतकि ब्राह्मण, २७/५) 

४. सम्वत्सराग्नि-सम्वत्सरो वै यज्ञः प्रजापतिः (शतपथ ब्राह्मण, १/२/५/१२) सम्वत्सरः (सौर मण्डल के क्षेत्र) वै देवानां जन्म (शतपथ ब्राह्मण, ८/७/३/२)

५. कुमाराग्नि-तानि इमानि भूतानि च, भूतानां च पतिः, सम्वत्सरे उषसि रेतो असञ्चत्। सम्वत्सरे कुमारो अजायत। सो अरोदीत्, तस्मात् रुद्रः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/३/८-१०)

६. चित्राग्निः (विविध रूप)-अग्निर्वै रुद्रः, आपो वै सर्वः, ओषधय वै पशुपतिः, वायुर्वा उग्रः, विद्युत् वा अशनिः, तानि एतानि अष्टौ अग्नि रूपाणि। कुमारो नवमः। --- सो अयं कुमारो रूपानि अनुप्राविशत्। तस्य चितस्य (चिति, रूप) नाम करोति। चित्र नामानं करोति...सर्वाणिहि चित्राणि अग्निः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/३) चित्राणि साकं दिवि रोचनानि (अथर्व, १९/७/१) चित्रं देवानां उद् अगाद् अनीकं (ऋक्, १/११५/१, अथर्व, १३/२/३५, वाजसनेयि, ७/४२)

७. पाशुकाग्निः-जीव सृष्टि-स यो अयं कुमारो रूपाणि अनुप्रविष्ट आसीत्, तं अन्वैच्छत।... स एतान् पञ्च पशून् अपश्यत्-पुरुषं, अश्वं, गां, अविं अजम्। यद् अपश्यत्, तस्मात् एते पशवः। .. इमे वा अग्निः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/४/१-४)॥

पुराण में ९ सृष्टि चक्रों के अनुसार ९ सर्ग तथा उनके ९ कालमान हैं। इनमें अन्तिम को कुमार सर्ग कहा है (विष्णु पुराण, १/५/१९-२५)-

३ प्राकृत सर्ग-१. महत्, २. तन्मात्रा, ३. वैकारिक। 

५ वैकृत सर्ग-४. मुख्य, ५. तिर्यक्, ६. ऊर्ध्व (देव सर्ग), ७. अर्वाक् (मनुष्य), ८. अनुग्रह।

एक प्राकृत-वैकृत- ९-कुमार सर्ग।

यहां प्राकृत सर्ग को ३ भाग में विभक्त करने से ९ सर्ग हुए। भागवत पुराण (अध्याय ३/१०) में अव्यक्त को मिला कर १० सर्ग कहे हैं।  

९ प्रकार के कालमान हैं-

ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यं च गौरवम्। 

सौरं सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव॥ (सूर्य सिद्धान्त, १४/१) 

बड़े मान से आरम्भ कर इनका क्रम है-ब्राह्म, प्राजापत्य, दिव्य, गुरु, चान्द्र, सौर, सावन, नाक्षत्र। 

ब्राह्म-दृश्य जगत् की सीमा। प्राजापत्य-ब्रह्माण्ड का अक्ष भ्रमण। दिव्य-सौर मण्डल की नक्षत्र कक्षा। गुरु-गुरु ग्रह की कक्षा। चान्द्र-चन्द्र परिक्रमा के बराबर दिन। सौर-सूर्य का प्रत्यक्ष भ्रमण, १० अंश काल १ दिन, आदि। सावन-पृथ्वी का अक्ष-भ्रमण तथा १ दिन की सौर गति का योग। नाक्षत्र-पृथ्वी का अक्ष-भ्रमण।

४. षण्मुख-

मुख के अर्थ हैं-स्रोत, दिशा, आयाम आदि।

ब्रह्मा के ४, शिव के ५ तथा कार्त्तिकेय के ६ मुख हैं। 

यह १० आयाम के विश्व के आयाम रूप हैं-०-विन्दु, १-रेखा, २-पृष्ठ या सतह, ३-आयतन, आयु। ४- पदार्थ (चतुर्मुख ब्रह्मा)-पदार्थ रूप विश्व का स्रष्टा। आइन्स्टाईन के सापेक्षवाद में इसे प्रथम ३ आयामों के विश्व की वक्रता माना गया है। ५-काल (पञ्चमुखी शिव)-वृद्धि, क्षय, संहार आदि। ६-पुरुष, इससे चयन या चिति। ७ ऋषि। ८-नाग या वृत्र। ९ -नन्द या रन्ध्र।१०-रस या आनन्द।

कालात् स्रवन्ति भूतानि कालाद् वृद्धिं प्रयान्ति च।

काले चास्तं नियच्छन्ति कालो मूर्त्तिरमूर्त्तिमान्॥

(मैत्रायणी आरण्यक, ६/१४)

पुरुष एव षष्टमहः (कौषीतकि ब्राह्मण, २३/४) तद्यत् पञ्च चितीश्चिनोत्येताभिरेवैनं तत्तनूभिश्चिनोति यच्चिनोति तस्माच्चितयः। (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/२/१७), चित्वा चित्यं हन्वोः पूरुषस्य (अथर्व, १०/२/८)

सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणाः (मुण्डक उप, २/१/८)

सीमा में घेरने वाला वृत्र-वृत्रो ह वा इदं सर्वं वृत्वा शिष्ये---- तस्माद् वृत्रो नाम। (शतपथ ब्राह्मण, १/१/३/४)

नवम तत्त्व से नयी सृष्टि-नवो नवो भवति जायमानः अह्ना केतु रूपं मामेत्याम्। (ऋक्, १०/८५/१९)

रस या आनन्द से सृष्टि-यद्वै तत् सुकृतं रसो वै सः। रसं ह्येवाय लब्ध्वा आनन्दी भवति। (तैत्तिरीय उपनिषद्, २/७/२)

पुरुष विष्णु द्वारा चिति होने के क्रम में सभी पिण्ड मूल अप् से निकले जिनको स्कन्द कहा है। अतः विष्णु रूप या अवतार होने से उनके ६ मुख हैं।

५. देव सेनापति-

तारकामय संग्राम (Star wars) में देवों के सेनापति थे। आकाश में सूर्य केन्द्र से पञ्चम मंगल को कार्त्तिकेय रूप माना गया है। उसके बाद अवान्तर ग्रहों को देवसेना कहा गया है। मनुष्य रूप में पृथ्वी के देव भाग के ३ लोकों के अधिपति को इन्द्र कहते थे। १४ मुख्य इन्द्र थे, पुरुवंशी नहुष आदि भी इन्द्र पद पर कुछ दिन रहे थे। कार्त्तिकेय काल में पृथ्वी के उत्तर ध्रुव की दिशा अभिजित् नक्षत्र से दूर हट रही थी जिसे अभिजित् का पतन कहा गया है। तब इन्द्र ने कार्त्तिकेय से कहा कि वह ब्रह्मा से सलाह कर वर्ष आरम्भ का पुनः निर्धारण करें। यह महाभारत, शान्ति पर्व अध्याय ३४८-३४९ में वर्णित सप्तम ब्रह्मा अपान्तरतमा थे जो वाणी-हिरण्यगर्भ के पुत्र थे और गौतमी तट पर रहते थे। उसके बाद अभिजित् के बदले धनिष्ठा नक्षत्र से वर्ष आरम्भ हुआ। उस समय (प्रायः १५,८०० ईपू) धनिष्ठा से वर्षा आरम्भ होती थी। यह एक कारण हो सकता है कि संवत्सर को वर्ष भी कहा गया। यह वेदाङ्ग ज्योतिष की पद्धति है और उस समय माघ मास से वर्ष आरम्भ की पद्धति चल रही है। उसके पहले भी माघ मास से वर्ष आरम्भ होता था, किन्तु अभिजित् नक्षत्र से।

गर्ग संहिता (७/४०/३५) के अनुसार अपान्तरतमा ने हरिण द्वीप (मृगव्याध-मगाडास्कर) में तप किया था, अतः गरुड़ वहां गये तो उनके पंख गिर गये। ब्रह्मवैवर्त पुराण (१/२२/१८) के अनुसार भी समुद्र पार (अपान्तरतम देश) में तप करने से उनका नाम अपान्तरतमा हुआ। महाभारत शान्ति पर्व (३४९/३९-६६) में अपान्तरतमा को वाणी-हिरण्यगर्भ का पुत्र कहा है। इनके अवतार रूप में पराशर पुत्र व्यास हुए।

अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा। 

इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता॥८॥

तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्युतम्। 

कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय॥९॥

धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः। 

रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत्॥१०॥ 

(महाभारत, वन पर्व, २३०/८-१०)

माघशुक्ल प्रपन्नस्य पौषकृष्ण समापिनः। 

युगस्य पञ्चवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते॥५॥

स्वराक्रमेते सोमार्कौ यदा साकं सवासवौ। 

स्यात्तदादि युगं माघः तपः शुक्लोऽयनं ह्युदक्॥६॥

प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक्। 

सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघश्रवणयोः सदा॥७॥

(ऋग् ज्योतिष, ३२, ५,६, याजुष ज्योतिष, ५-७)

कार्त्तिकेय ने ६ शक्ति-पीठ बनाये थे जिनको उनकी ६ माता कहते थे। इसी प्रकार बाद में शंकराचार्य तथा गोरखनाथ ने ४-४ पीठ बनाये। कार्त्तिकेय के पीठों के नाम और स्थान हैं-१. दुला-ओड़िशा तथा बंगाल, २. वर्षयन्ती-असम, ३. चुपुणीका-पंजाब, कश्मीर (चोपड़ा उपाधि), ४. मेघयन्ती-गुजरात राजस्थान-यहां मेघ कम हैं पर मेघानी, मेघवाल उपाधि बहुत हैं। ५. अभ्रयन्ती-महाराष्ट्र, आन्ध्र (अभ्यंकर), ६. नितत्नि-तमिलनाडु, कर्णाटक। अतः ओड़िशा में कोणार्क के निकट बहुत से दुला देवी के मन्दिर हैं। दुलाल = दुला का लाल कार्त्तिकेय। 

अत्र जुहोति अग्नये स्वाहा, कृत्तिकाभ्यः स्वाहा, अम्बायै स्वाहा, दुलायै स्वाहा, नितत्न्यै स्वाहा, अभ्रयन्त्यै स्वाहा, मेघयन्त्यै स्वाहा, चुपुणीकायै स्वाहेति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१/४/१-९)

क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) पर आक्रमण के लिए कार्त्तिकेय ने जल-स्थल सेना का गठन किया तथा पहले शक्ति (मिसाइल) से प्रहार कर क्रौञ्च पर्वत को विदीर्ण किया था। अतः उनको क्रौञ्च दारण कहते हैं। उनकी सेना जल-स्थल-वायु में चल सकती थी अतः उसे मयूर कहा गया। उसके संगठन के लिए संक्षिप्त लिपि (शॉर्ट हैण्ड) की आवश्यकता थी अतः कार्त्तिकेय ने ब्राह्मी लिपि के स्पर्श वर्गों के प्रथम ४ अक्षर समान कर तमिल लिपि बनायी। वैज्ञानिक लेखन के लिए पूर्ण गाथा लिपि चलती रही। इस क्रम में संस्कृत के २,००० धातुओं में ५० के अर्थ बदल गये। मयूर सेना के सैनिकों के वंशज आज भी प्रशान्त महासागर में माओरी नाम से फैले हुए हैं। भाषा विज्ञान का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि हवाई द्वीप से न्यूजीलैण्ड तथा आस्ट्रेलिया तक माओरी लोगों की एक ही भाषा है, यद्यपि बीच में १५,००० किलोमीटर समुद्र है। यह कार्त्तिकेय के सैन्य संगठन का जीवित प्रमाण है।

✍🏻अरुण उपाध्याय

दो विदेशी पहाड़

 तमिल में एक कहावत समर्पित है भगवान मुरुगन को कि 'जहाँ कहीं भी पहाड़ी (hillock) होगा वहाँ मुरुगन अवश्य मिलेंगे'!


चलिये अभी फिलहाल भारत के बाहर दो प हाड़ी पे ले के चलते हैं...


पहला ईरान के कुम (Qum) की पहाड़ी में ..

नाम जरा देखिये 'कुम' !

इस पहाड़ी के टॉप पे स्थित है हज़रत अल-ख़िदर (Al-Khidr) का मस्ज़िद। जरा अटपटी बात ये कि ये मस्जिद 3,000 साल पुराना है। मने कि इस्लाम के दुगुने टाइम पुराना। वैसे भी इस्लाम के जन्म के सौ साल बाद ही ईरान में इस्लाम का प्रवेश हुआ था। तो इस पहाड़ी पे अल-ख़िदर को समर्पित एक मस्जिद हैं। ( अब इस अल-ख़िदर का किस्सा बड़ा इंटरेस्टिंग है.. जब सब सम्मिलित होंगे तो बड़ा पोस्ट बनेगा 😊)

तो कुम पहाड़ी में कुमारन याने मुरुगन का वास है।


इसी तरह और एक पहाड़ी है। कहाँ ? तो इस्राइल में। डेड सी मने मृत सागर के मरुस्थल में।

गूगल में सर्च भी करिये 'The Caves of Qumran' ! मने कुमरन की गुफाएं। .. बड़ा इंटरेस्टिंग नाम है न 'कुमरन' ? हमारे जितने भी सिद्ध साधु संत हुए हैं उनका ध्यान,समाधि का स्थल कोई गुफा ही रहा है। और यहाँ प्राकृतिक के साथ साथ मेन मेड गुफाएं भी हैं। और ये पहाड़ी में ही है। कोई जादे बड़का पहाड़ नहीं है। .. इनका भी ईसा पूर्व का इतिहास है।


मने ..

कुम(qum) = कुमरन(qumran)= कुमारन = मुरुगन !

😊


शकरकंद .. मने स्वीट पोटैटो ! 


जैसा कि कल हम बताये रहे कि भगवान मुरुगन जंगल को जलाते हैं व उसे कृषि मैदान में परिवर्तित करते हैं.. फिर उसमें सबसे पहले शकरकंद उगाते हैं।... वल्ली से विवाह करते हैं जो कृषि और विशेष कर शकरकंद व लताओं की देवी होती है।

इससे भी पहले ये बताये रहे कि श्रीलंका कुमार द्वीप भी कहलाता है।.. और मुरुगन का नाम स्कंद,कार्तिकेय के अलावा 'कुमार' या 'कुमारन' भी होता है।


चलिये एक मस्त जगह ले के चलता हूँ.. न्यूज़ीलैंड !!

यहाँ मालूम है शकरकंद को क्या कहा जाता है ?

तो शकरकंद को यहाँ 'कुमार (Kumara)' कहा जाता है। इंटरेस्टिंग न ? .. और ये शकरकंद यहाँ तीन चार वैरायटी में मिलती है.. मने लाल,पीला, सफेद आदि।.. और ये न्यूजीलैंड का सबसे प्रिय व फेमस सब्जी हैं।

बताया जाता कि ये सब्जी दक्षिण अमेरिकी देश विशेष कर पेरू से यहाँ आया। .. और पेरू,मेक्सिको का संबंध तमिलनाडु ,श्रीलंका से तो जानते ही होंगे। रावण का ससुराल व मय का देश याने पाताल लोक। .. अब यहाँ(श्रीलंका) से पेरू शकरकंद का जाना कोई आश्चर्य न होगा।

पेरू से शकरकंद ईस्टर आइलैंड गया फिर वहाँ से न्यूजीलैंड!


कड़ी याद रखते रहियेगा। 😊

(बाकी शकरकंद का न्यूट्रिशंस वैल्यू जरूर देखियेगा)


भगवान मुरुगन के तीन चार नामों की चर्चा हम चुके हैं। दो तीन और नाम भी जोड़ देते हैं इसमें..

Murugan, Kumar, Kumaran, Kartikey, Kandhan, Velan, Kathir,Kathirvelan.


दो तीन बातें जरा पहले ही जोड़ लेते हैं ..


जहाँ कृषि होती है वहाँ एक संस्कृति अपने आप पनपती है। उत्तम कृषि याने उत्तम संस्कृति और सभ्यता। एक उत्तम संस्कृति तो एक उत्तम जीवन शैली और उत्तम ज्ञान का उद्भव। और जहाँ ये सब कुछ का समावेश हो वहाँ अपने को बचाने की कला का भी विकास होना स्वाभाविक।


भारत कृषि प्रधान देश है। सभी मौसम चक्र हैं यहाँ। तो निश्चित ही यहाँ कृषि के साथ-साथ उत्तम सभ्यताओं का विकास होना लाजमी है।कोई आश्चर्य की बात नहीं। और यहीं से संस्कृति का विकास हुआ। और जब उत्तम संस्कृति हो तो बाहरियों का आकर्षण का केंद्र होना स्वाभाविक है जो अब तक भी बना हुआ है।


इससे पहले बहुत बार बहुत जगह इस बात की चर्चा हो चुकी है कि रामायण और महाभारत युद्ध के बाद जो हारे हुए सैनिक थे वे कहाँ गए ? सभी मत एक समान है कि वे पश्चिम की ओर कूच कर गए। और विशेष कर ईरान के आगे पश्चिम की ओर।

अपन युद्ध को क्या बोलते है ?

'समर' ! यही न ? तो दो बड़े 'महासमर' हुए .. एक रामायण का महासमर और दूसरा महाभारत का 'महासमर'! और जो 'समर' को छोड़ गए मने हार गए वे 'समरछोड़' हुए।

एक देखिये जरा ..

Samar = Sumar = Sumer = Sumerian !

याने 

समर = सुमर = सुमेर = सुमेरियन ।

याने जो यहाँ से समर के मैदान से भागे वे 'सुमेर' के मैदान में जा बसे। यूफ्रेट्स और टिगरिस नदी के बीचों बीच। और सुमेरियन सभ्यता सिंधु और रामायण,महाभारत कालीन से ही जोड़ के देखते।

और यहाँ भी इन्होंने वही कुछ डेवलप किया जो इसने अपने पुराने भूमि को छोड़ते वक़्त सीखा था और जीया था।


चलिये ये सब बाद में अपने आप जुड़ जाएंगे।


अब आते हैं मुद्दे पे।

अब्राहमिक रिलीजन में कितने प्रोफेट्स हुए हैं ? कुरान जवाब देता है कि एक लाख चौबीस हजार.. 1,24,000 प्रोफेट्स बोले तो मैसेंजर ऑफ गॉड बोले तो अल्लाह के दूत।

इन एक लाख चौबीस हजार प्रोफेट्स में मालूम है कौन प्रोफेट इमोर्टल है बोले तो अमर ?? बहुतों को मालूम नहीं। यहाँ तक कि बहुत से जोल्हेलुइया को भी नहीं मालूम। इनमें से एक प्रोफेट अमर है। और उनका नाम है "अल-ख़िदर" (Al-Khidr)! मने कि हज़रत अल-ख़िदर (खिद्र)!

Khidr का अरेबिक में मतलब होता है 'हरा' बोले तो 'ग्रीन'!  और ये 'हरे मानुष' या 'ग्रीन मेन' के नाम से जाने जाते हैं। इन्होंने कोई 'हरा पेय' पीया था जिसके चलते ये अमर हो गए। ये एग्जेक्टली थे कहाँ के ये कुरान भी ठीक से नहीं बताता और न अब्राहमिक रिलिजनों के अन्य किताब। कुरान इस बात का जरूर जिक्र करता है (सूरा-18, आयात 65-82, अल-कहफ़(Al-Kahf)) में जिसमें हजरत मूसा बोले तो Moses (मोसेस, मोजेज) ग्रीन मेन बोले तो अल-ख़िदर से मिलते हैं। और जहाँ ये मिलते हैं वो दो समुद्रों(Two Sea) का मिलन स्थान होता है। और ये जगह कौन सी है कहाँ है ये कोई अब्राहमिक किताब नहीं बताता है। अमेजिन न ?!!


चलिये इसी में आगे जोड़ते है..

एक बार गॉड मूसा से पूछते है कि 'बताओ मूसा इस पृथ्वी में सबसे ज्यादा ज्ञानवान कौन है?'

तो मूसा धपाक से जवाब देता है 'मेरे अलावा और कौन प्रभु? मैं ही हूँ!' .. ऐसा वो इसलिए बोलता है कि जब खुद गॉड उनसे मुखातिब होते हैं और बात करते हैं तो भला उनसे ज्यादा और कौन ज्ञानवान और बुद्धिमान हो सकता है! सो अपना नाम ही बतला देता है।.. तो गॉड बोलते है 'ये तुम्हारा अहम है और भूल भी! तुमसे भी ज्ञानवान आदमी है इस जगत में .. और तुम्हें उनसे बहुत कुछ सीखने की जरूरत भी है!'

तब मूसा कहता है "प्रभु! अगर ऐसा कोई है तो मैं उनसे जरूर मिलना चाहूँगा और उनसे ज्ञान भी प्राप्त करना चाहूंगा!"

तब गॉड मूसा को एक मछली पे सवार करते हैं और रवाना करते हैं और बोलते हैं कि ये मछली दो सागरों के मिलन स्थान के एक टापू पे रुकेगी और वो ज्ञानवान पुरूष तुमको वहीं मिलेंगे। .. मूसा उस स्थान पे आते हैं और अल-ख़िदर से मिलते हैं। चूंकि मूसा जरा घमंडी और अहम टाइप का इंसान होता है तो अल-ख़िदर कहते हैं कि "तुम मेरे शिष्य बनने लाइक नही हो.. तुममें धैर्य और संयम नहीं है.. जब तक इसपे काबू नहीं करोगे तब तक मैं तुम्हें कुछ ज्ञान नहीं दे सकता.. ज्ञान प्राप्त करने के लिए इनपे काबू होना आवश्यक है!"

तो मूसा कहता है "नहीं गुरुवर! मैं यहाँ इतनी दूर आपसे ज्ञान प्राप्त करने आया हूँ.. मैं आपको वचन देता हूँ कि मैं धैर्य और संयम दोनों को काबू में रखूँगा!"

तब अल-ख़िदर कहते हैं "ठीक है! .. फिलहाल तुम मेरे साथ रहो.. लेकिन मैं क्या करता हूँ,क्यों करता हूँ,किसलिये करता हूँ ये कभी मेरे से पूछना मत.. ये तुम्हारी धैर्य और संयम की परीक्षा होगी!"

तब मूसा सहमत होता है और आगे बात चलती है.. मूसा और अल-ख़िदर के बीच तीन बड़े वाक्या होते हैं जिसे सभी अब्राहमिक वाले बड़े चांव के साथ सुनाते हैं जिसे आप गूगल और यूट्यूब में भी सुन सकते हैं।

फिलहाल इतना काफी है हजरत मूसा और अल-ख़िदर के साथ हुए मुलाकात का किस्सा!


अब आते हैं मेन पॉइंट पे।

जैसा कि पहले ही बता चुके कि भगवान मुरुगन जंगल को जलाकर कृषि मैदान बनाते हैं और कृषि की शुरुआत करते हैं। सबसे पहले शकरकंद और विभिन्न प्रकार के मिलेट्स उपजाते हैं। .. विवाह वल्ली माता या कुमारी माता या कार्तिकेयनी माता से करते हैं। जो भगवान मुरुगन की ही रचना होती है। इनका हर जगह कलर 'हरा' ही देखे हैं और कृषि की प्रतीक होती है।

मुरुगन स्वामी का नाम Kathir (कदिर), Kathirvelan(कदिरवेलन) और कंदन (Kandhan) भी है।

Kathir = का मतलब होता है मिलेट्स।

और चूंकि इसकी खेती स्वयं मुरुगन करते हैं तो इनका नाम कदिर या कदिरवेलन भी होता है। शकरकंद की खेती करते हैं तो शकरकंद भी Kumara या कुमरा कहलाता है और इससे भी मुरुगन का नाम होता है। न्यूजीलैंड में जो शकरकंद का उदाहरण दिया था वो यही था।

श्रीलंका में एक स्थान है 'Kathirkamam'! और यहाँ मंदिर भी है भगवान मुरुगन को समर्पित जो खेती के टाइम से ही है।

Kathir का मतलब होता है मिलेट्स 

और Kamam का मतलब होता है गांव।

याने जिस जगह Kathir की खेती पहले पहल हुई वो गांव कहलाया कदिरकामम!

अब इसमें इंटरेस्टिंग बात क्या है कि इस कदिरकामम के मुरुगन मंदिर से मात्र 300 मीटर की दूरी पे एक मस्जिद है। मालूम है वो मस्जिद किसकी है सो ? वो मस्जिद है हज़रत अल-ख़िदर की। वेरी इंटरेस्टिंग न !!!!

और ये वही जगह होता है जहाँ मूसा अल-ख़िदर से मिलते हैं और ज्ञान प्राप्त करते हैं और ज्ञान प्राप्त करने के बाद 'तोराह' की रचना करते हैं।

दो समुद्रों के मिलन स्थान का जिक्र न तोराह करता है और न कुरान। जबकि ये वो स्थान हैं जहाँ अरब सागर और बंगाल की खाड़ी मिलती है। और ये वो स्थान हैं जहाँ पहले-पहल खेती की शुरुआत हुई। और माता पच्चीअम्मा जो हमेशा ही हरे रंग में ही दिखाई देती वो मुरुगन की ही कृति थी।

अब आगे की बात..

ईरान के 'कुम' शहर के अल-ख़िदर के मस्जिद की बात बता चुका हूं.. ये 3,000 साल पुराना है.. मने इस्लाम से डेढ़ हजार साल पहले। इसी प्रकार इजराइल के 'कुमरन' गुफाओं के बारे में भी बता चुका।

इसके अलावे उज्बेकिस्तान के समरकंद में अल-ख़िदर का मस्जिद है। अब समरकंद नाम भी देखिये।

समर .. मतलब ऊपर ही बता चुके और 'कंद' या 'कंदन' मने मुरुगन!! और अल-ख़िदर का कनेक्शन भगवान मुरुगन से देख ही रहे हैं।

इसके अलावे अल-ख़िदर का मस्जिद इराक के मोसुल शहर में भी है जिसको कि ISIS वालों ने ढाह दिया है। और एक मस्जिद तुर्की के समंडग में भी है।


हदीस अल-ख़िदर के बारे में कहता है कि अल-ख़िदर नाम इनका इसलिए पड़ा कि इन्होंने एक बेजान बंजर भूमि को हरियाली में तब्दील कर दिया सब्जियों को उगा कर। (Al-Khidr was so called because he sat over a barren white land, it turned with Vegetation!)

मने इधर भी इस बात की पुष्टि होती है कि ये कृषि के प्रतीक थे। और वो जिस चीज की खेती की बात कर रहे हैं वो Kathir याने मिलेट्स की बात कर रहे जिसके चलते इनका नाम अपभ्रंश हो के कदिर से ख़िदर हो गया।


अल-ख़िदर हमेशा हरे वस्त्रों में ही दिखाई देंगे व एक मछली पे सवार हुए। ये मछली किस चीज का प्रतीक है ? क्यों ये मछली पे सवार हुए दिखाई देते हैं?? शायद कोई जोल्हेलुइया बता पाए!!.. चलिये बताते है.. कदिरकामम जो जगह है श्रीलंका में वो फिशिंग के लिए भी जाना जाता है। और कृषि के साथ-साथ फिशिंग की भी शुरुआत हुई। और ये मछली उसी कृषि की ही प्रतीक है।.. माता मीनाक्षी का मतलब इसी से है .. मीन मने मछली।


जैसा कि बता चुके कि माता वल्ली वीनस मने शुक्र से संबंध रखती है और इनका कलर हरा है। और दक्षिण में शुक्रवार का दिन माता वल्ली और मुरुगन स्वामी को ही समर्पित रहता है और ये दिन बहुत ही पवित्र माना जाता है।

अब समझ में आ रहा कि जोल्हेलुइया जो खुद को मूसा की औलाद याने मुसलमान कहते हैं का फेवरेट कलर ग्रीन याने हरा क्यों है और पवित्र दिन शुक्रवार क्यों!?..


ये अमरता का सिद्धांत आपको भारत के बाहर कहीं नहीं मिलेगा.. लेकिन एक लाख चौबीस हजार नबियों में एक अमर नबी यही अल-ख़िदर है। .. अमृत पीने वाले अमर हो गए और ये कोई हरा-पेय पीये जिससे कि ये अमर हो गए। अमेजिन न!!

✍🏻संघी गंगवा, खोपोली से।

सोमवार, 6 दिसंबर 2021

भूगोल

 भूगोल (Geography) वह शास्त्र है जिसके द्वारा पृथ्वी के ऊपरी स्वरुप और उसके प्राकृतिक विभागों (जैसे पहाड़, महादेश, देश, नगर, नदी, समुद्र, झील, डमरुमध्य, उपत्यका, अधित्यका, वन आदि) का ज्ञान होता है। [1]प्राकृतिक विज्ञानों के निष्कर्षों के बीच कार्य-कारण संबंध स्थापित करते हुए पृथ्वीतल की विभिन्नताओं का मानवीय दृष्टिकोण से अध्ययन ही भूगोल का सार तत्व है। पृथ्वी की सतह पर जो स्थान विशेष हैं उनकी समताओं तथा विषमताओं का कारण और उनका स्पष्टीकरण भूगोल का निजी क्षेत्र है। भूगोल शब्द दो शब्दों भू यानि पृथ्वी और गोल से मिलकर बना है।

पृथ्वी का मानचित्र

भूगोल एक ओर अन्य श्रृंखलाबद्ध विज्ञानों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग उस सीमा तक करता है जहाँ तक वह घटनाओं और विश्लेषणों की समीक्षा तथा उनके संबंधों के यथासंभव समुचित समन्वय करने में सहायक होता है। दूसरी ओर अन्य विज्ञानों से प्राप्त जिस ज्ञान का उपयोग भूगोल करता है, उसमें अनेक व्युत्पत्तिक धारणाएँ एवं निर्धारित वर्गीकरण होते हैं। यदि ये धारणाएँ और वर्गीकरण भौगोलिक उद्देश्यों के लिये उपयोगी न हों, तो भूगोल को निजी व्युत्पत्तिक धारणाएँ तथा वर्गीकरण की प्रणाली विकसित करनी होती है। अत: भूगोल मानवीय ज्ञान की वृद्धि में तीन प्रकार से सहायक होता है:

  • (१) विज्ञानों से प्राप्त तथ्यों का विवेचन करके मानवीय वासस्थान के रूप में पृथ्वी का अध्ययन करता है।
  • (२) अन्य विज्ञानों के द्वारा विकसित धारणाओं में अंतर्निहित तथ्य की परीक्षा का अवसर देता है, क्योंकि भूगोल उन धारणाओं का स्थान विशेष पर प्रयोग कर सकता है।
  • (३) यह सार्वजनिक अथवा निजी नीतियों के निर्धारण में अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि प्रदान करता है, जिसके आधार पर समस्याओं का स्पष्टीकरण सुविधाजनक हो तो है।

सर्वप्रथम प्राचीन यूनानी विद्वान इरैटोस्थनिज़ ने भूगोल को धरातल के एक विशिष्टविज्ञान के रूप में मान्यता दी। इसके बाद हिरोडोटस तथा रोमन विद्वान स्ट्रैबो तथा क्लाडियस टॉलमी ने भूगोल को सुनिइतिहासश्चित स्वरुप प्रदान किया। इस प्रकार भूगोल में 'कहाँ' 'कैसे 'कब' 'क्यों' व 'कितनें' प्रश्नों की उचित व्याख्या की जाती हैं। Geography भूगोल शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-भू+गोल। यहाँ भू शब्द का तात्पर्य पृथ्वी और गोल शब्द का तात्पर्य उसके गोल आकार से है।

बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर की खोज i

 के.के. मुहम्मद: वो शख्स जिसने बाबरी मस्जिद के नीचे दबे राम मंदिर को ढूंढा...

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अयोध्या में राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर 1990 में पहली बार पूरे देश में बहस ने जोर पकड़ा था। 


इसके पहले 1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या में होने वाली खुदाई में हिस्सा लेने के लिए मुझे भी भेजा गया। प्रो बी.बी. लाल की अगुवाई में अयोध्या में खुदाई करने वाली आर्कियोलॉजिस्ट टीम में दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी के 12 छात्रों में से एक मैं भी था। उस समय के उत्खनन में हमें मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। हमें हैरानी थी कि किसी ने इसे कभी पूरी तरह खोदकर देखने की जरूरत नहीं समझी। ऐसी खुदाइयों में हमें इतिहास के साथ-साथ एक पेशेवर नजरिया बनाए रखने की भी जरूरत होती है। खुदाई के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।


1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के ठीक पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, बल्कि कुल 14 स्तंभों को हमने करीब से देखा। उस दौरान भी वहां पर कड़ी पुलिस सिक्योरिटी हुआ करती थी और मस्जिद में प्रवेश मना था। लेकिन खुदाई और रिसर्च से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। खुदाई के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। यह समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था कि बाबर के सिपहसलार मीर बाकी ने कभी यहां रहे विशाल मंदिर को तुड़वाकर उसके टुकड़ों से ही बाबरी मस्जिद बनवाई रही होगी। खुदाई से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष को मैंने खुद देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, लेकिन तब तक विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन बढ़ चुका था। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए उदारवादी मुसलमान तैयार थे, लेकिन इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।


बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने से विश्व हिंदू परिषद के पास कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना पैदा होती। ऐसी स्थिति में इतिहास और पुरातात्विक खोजबीन समस्या सुलझाने में मददगार हो सकते थे। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ेगा कि कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मुसलमानों को उकसाया वो किसी हाल में मस्जिद पर अपना दावा न छोड़ें। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जे.एन.यू. के एस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। यहां तक कि उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ तक कह डाला। उनका साथ देने के लिए आर.एस. शर्मा, अनवर अली, डी.एन. झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब जैसे ढेरों वामपंथी इतिहासकार भी सामने आ गए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आर.एस. शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में भाग लिया। मतलब साफ है कि ये वामपंथी इतिहासकार समस्या सुलझाने के बजाय आग में घी डालने में जुटे थे।


बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष प्रो. इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक परिषद के सरकारी दफ्तर में करने का तत्कालीन सदस्य सचिव और इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने कड़ा विरोध भी किया। लेकिन प्रो. इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस का माहौल पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाली मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को मजबूर कर दिया कि वो अपने विचार त्याग दें। वरना आज भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी मानती है कि अयोध्या के धार्मिक महत्व को देखते हुए अगर मुस्लिम अपने पैर पीछे खींच लें तो देश के इतिहास में यह मील का पत्थर होगा। इससे आगे के लिए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की एक बड़ी वजह खत्म हो जाएगी। दोनों समुदायों के बीच आपसी अविश्वास भी खत्म होगा। लेकिन #कॉमरेड_इतिहासकारों ने यह होने नहीं दिया।


इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदू या मुस्लिम कट्टरपंथ से ज्यादा वामपंथी विचार देश के लिए खतरा हैं। सेकुलर नजरिए से समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण एक बड़ी भूल साबित हुई। राष्ट्र को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, यह अंदाजा अभी लोगों को नहीं है। इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) में समस्या का समाधान चाहने वाले कई लोग थे, लेकिन इरफान हबीब के सामने वो कुछ नहीं कर सके। इरफान हबीब ने आरएसएस की तुलना आईएस जैसे आतंकवादी संगठन से की थी। आई.सी.एच.आर. के ज्यादातर सदस्य उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन विरोध में बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् भी गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद पड़े मलबे में जो सबसे महत्वपूर्ण अवशेष मिला था वो था-विष्णु हरिशिला पटल। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।


1992 में डॉ. वाई.डी. शर्मा और डॉ. के.एन. श्रीवास्तव के सर्वे में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुषाण जमाने (ईसा से 100-300 साल पहले) की मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के आदेश से हुई खुदाई में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया चबूतरा मिला था। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन में मिली थी। यूपी में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े कुल 263 पुरातात्विक अवशेष मिले हुए। खुदाई से मिली इन तमाम सबूतों के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुई है। सीधे तौर पर कहें तो बाबरी मस्जिद इस मंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर बनाई गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी यही फैसला सुनाया था।


अयोध्या में हुई खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक मजिस्ट्रेट भी इस पूरी खुदाई की निगरानी कर रहा था। जाहिर है इसके नतीजों पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है? ज्यादा हैरानी तब हुई जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका बड़ा कारण यह था कि खुदाई के दौरान जिन इतिहासकारों को शामिल किया गया था वो दरअसल निष्पक्ष न होकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे थे। इनमें से 3-4 को ही आर्कियोलॉजी की तकनीकी बातें पता थीं। सबसे बड़ी बात कि ये लोग नहीं चाहते थे कि अयोध्या का ये मसला कभी भी हल हो। शायद इसलिए क्योंकि वो चाहते हैं कि भारत के हिंदू और मुसलमान हमेशा ऐसे ही आपस में उलझे रहें।


(लेखक के.के. मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक रह चुके हैं। यह लेख उनकी किताब #मैं_भारतीय_हूं का एक संपादित हिस्सा है)