सोमवार, 6 दिसंबर 2021

भूगोल

 भूगोल (Geography) वह शास्त्र है जिसके द्वारा पृथ्वी के ऊपरी स्वरुप और उसके प्राकृतिक विभागों (जैसे पहाड़, महादेश, देश, नगर, नदी, समुद्र, झील, डमरुमध्य, उपत्यका, अधित्यका, वन आदि) का ज्ञान होता है। [1]प्राकृतिक विज्ञानों के निष्कर्षों के बीच कार्य-कारण संबंध स्थापित करते हुए पृथ्वीतल की विभिन्नताओं का मानवीय दृष्टिकोण से अध्ययन ही भूगोल का सार तत्व है। पृथ्वी की सतह पर जो स्थान विशेष हैं उनकी समताओं तथा विषमताओं का कारण और उनका स्पष्टीकरण भूगोल का निजी क्षेत्र है। भूगोल शब्द दो शब्दों भू यानि पृथ्वी और गोल से मिलकर बना है।

पृथ्वी का मानचित्र

भूगोल एक ओर अन्य श्रृंखलाबद्ध विज्ञानों से प्राप्त ज्ञान का उपयोग उस सीमा तक करता है जहाँ तक वह घटनाओं और विश्लेषणों की समीक्षा तथा उनके संबंधों के यथासंभव समुचित समन्वय करने में सहायक होता है। दूसरी ओर अन्य विज्ञानों से प्राप्त जिस ज्ञान का उपयोग भूगोल करता है, उसमें अनेक व्युत्पत्तिक धारणाएँ एवं निर्धारित वर्गीकरण होते हैं। यदि ये धारणाएँ और वर्गीकरण भौगोलिक उद्देश्यों के लिये उपयोगी न हों, तो भूगोल को निजी व्युत्पत्तिक धारणाएँ तथा वर्गीकरण की प्रणाली विकसित करनी होती है। अत: भूगोल मानवीय ज्ञान की वृद्धि में तीन प्रकार से सहायक होता है:

  • (१) विज्ञानों से प्राप्त तथ्यों का विवेचन करके मानवीय वासस्थान के रूप में पृथ्वी का अध्ययन करता है।
  • (२) अन्य विज्ञानों के द्वारा विकसित धारणाओं में अंतर्निहित तथ्य की परीक्षा का अवसर देता है, क्योंकि भूगोल उन धारणाओं का स्थान विशेष पर प्रयोग कर सकता है।
  • (३) यह सार्वजनिक अथवा निजी नीतियों के निर्धारण में अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि प्रदान करता है, जिसके आधार पर समस्याओं का स्पष्टीकरण सुविधाजनक हो तो है।

सर्वप्रथम प्राचीन यूनानी विद्वान इरैटोस्थनिज़ ने भूगोल को धरातल के एक विशिष्टविज्ञान के रूप में मान्यता दी। इसके बाद हिरोडोटस तथा रोमन विद्वान स्ट्रैबो तथा क्लाडियस टॉलमी ने भूगोल को सुनिइतिहासश्चित स्वरुप प्रदान किया। इस प्रकार भूगोल में 'कहाँ' 'कैसे 'कब' 'क्यों' व 'कितनें' प्रश्नों की उचित व्याख्या की जाती हैं। Geography भूगोल शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-भू+गोल। यहाँ भू शब्द का तात्पर्य पृथ्वी और गोल शब्द का तात्पर्य उसके गोल आकार से है।

बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर की खोज i

 के.के. मुहम्मद: वो शख्स जिसने बाबरी मस्जिद के नीचे दबे राम मंदिर को ढूंढा...

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अयोध्या में राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर 1990 में पहली बार पूरे देश में बहस ने जोर पकड़ा था। 


इसके पहले 1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या में होने वाली खुदाई में हिस्सा लेने के लिए मुझे भी भेजा गया। प्रो बी.बी. लाल की अगुवाई में अयोध्या में खुदाई करने वाली आर्कियोलॉजिस्ट टीम में दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी के 12 छात्रों में से एक मैं भी था। उस समय के उत्खनन में हमें मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। हमें हैरानी थी कि किसी ने इसे कभी पूरी तरह खोदकर देखने की जरूरत नहीं समझी। ऐसी खुदाइयों में हमें इतिहास के साथ-साथ एक पेशेवर नजरिया बनाए रखने की भी जरूरत होती है। खुदाई के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।


1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के ठीक पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, बल्कि कुल 14 स्तंभों को हमने करीब से देखा। उस दौरान भी वहां पर कड़ी पुलिस सिक्योरिटी हुआ करती थी और मस्जिद में प्रवेश मना था। लेकिन खुदाई और रिसर्च से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। खुदाई के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। यह समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था कि बाबर के सिपहसलार मीर बाकी ने कभी यहां रहे विशाल मंदिर को तुड़वाकर उसके टुकड़ों से ही बाबरी मस्जिद बनवाई रही होगी। खुदाई से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष को मैंने खुद देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, लेकिन तब तक विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन बढ़ चुका था। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए उदारवादी मुसलमान तैयार थे, लेकिन इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी।


बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने से विश्व हिंदू परिषद के पास कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना पैदा होती। ऐसी स्थिति में इतिहास और पुरातात्विक खोजबीन समस्या सुलझाने में मददगार हो सकते थे। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ेगा कि कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मुसलमानों को उकसाया वो किसी हाल में मस्जिद पर अपना दावा न छोड़ें। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जे.एन.यू. के एस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। यहां तक कि उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ तक कह डाला। उनका साथ देने के लिए आर.एस. शर्मा, अनवर अली, डी.एन. झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब जैसे ढेरों वामपंथी इतिहासकार भी सामने आ गए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आर.एस. शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में भाग लिया। मतलब साफ है कि ये वामपंथी इतिहासकार समस्या सुलझाने के बजाय आग में घी डालने में जुटे थे।


बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष प्रो. इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक परिषद के सरकारी दफ्तर में करने का तत्कालीन सदस्य सचिव और इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने कड़ा विरोध भी किया। लेकिन प्रो. इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस का माहौल पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाली मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को मजबूर कर दिया कि वो अपने विचार त्याग दें। वरना आज भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी मानती है कि अयोध्या के धार्मिक महत्व को देखते हुए अगर मुस्लिम अपने पैर पीछे खींच लें तो देश के इतिहास में यह मील का पत्थर होगा। इससे आगे के लिए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की एक बड़ी वजह खत्म हो जाएगी। दोनों समुदायों के बीच आपसी अविश्वास भी खत्म होगा। लेकिन #कॉमरेड_इतिहासकारों ने यह होने नहीं दिया।


इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदू या मुस्लिम कट्टरपंथ से ज्यादा वामपंथी विचार देश के लिए खतरा हैं। सेकुलर नजरिए से समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण एक बड़ी भूल साबित हुई। राष्ट्र को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, यह अंदाजा अभी लोगों को नहीं है। इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) में समस्या का समाधान चाहने वाले कई लोग थे, लेकिन इरफान हबीब के सामने वो कुछ नहीं कर सके। इरफान हबीब ने आरएसएस की तुलना आईएस जैसे आतंकवादी संगठन से की थी। आई.सी.एच.आर. के ज्यादातर सदस्य उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन विरोध में बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् भी गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद पड़े मलबे में जो सबसे महत्वपूर्ण अवशेष मिला था वो था-विष्णु हरिशिला पटल। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।


1992 में डॉ. वाई.डी. शर्मा और डॉ. के.एन. श्रीवास्तव के सर्वे में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुषाण जमाने (ईसा से 100-300 साल पहले) की मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के आदेश से हुई खुदाई में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया चबूतरा मिला था। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन में मिली थी। यूपी में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े कुल 263 पुरातात्विक अवशेष मिले हुए। खुदाई से मिली इन तमाम सबूतों के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुई है। सीधे तौर पर कहें तो बाबरी मस्जिद इस मंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर बनाई गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी यही फैसला सुनाया था।


अयोध्या में हुई खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक मजिस्ट्रेट भी इस पूरी खुदाई की निगरानी कर रहा था। जाहिर है इसके नतीजों पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है? ज्यादा हैरानी तब हुई जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका बड़ा कारण यह था कि खुदाई के दौरान जिन इतिहासकारों को शामिल किया गया था वो दरअसल निष्पक्ष न होकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे थे। इनमें से 3-4 को ही आर्कियोलॉजी की तकनीकी बातें पता थीं। सबसे बड़ी बात कि ये लोग नहीं चाहते थे कि अयोध्या का ये मसला कभी भी हल हो। शायद इसलिए क्योंकि वो चाहते हैं कि भारत के हिंदू और मुसलमान हमेशा ऐसे ही आपस में उलझे रहें।


(लेखक के.के. मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक रह चुके हैं। यह लेख उनकी किताब #मैं_भारतीय_हूं का एक संपादित हिस्सा है)

मंगलवार, 30 नवंबर 2021

सोम राजा के सिंघासन का रहस्य

 सोम सम्राट का सिंहासन: ब्रह्माँड के रहस्य 

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सोम जब यजमान के दुर्य (घर) में पधारते हैं, तब उन सोम राजा को किस प्रकार से सिंहासन पर लाया जाता है, हम इस रोचक घटना पर विस्तृत चर्चा करेंगे। किंतु पहले इंद्र, अहल्या और गौतम ऋषि की बहुचर्चित कथा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखलें। 

   बात यह है कि हम कई बार बता चुके हैं कि तीन संसार हैं...! पहला ब्रह्माँड, जिसको आधिदैविक कहते हैं। दूसरा पृथ्वी ,जो आधिभौतिक है। और तीसरा पिंड (मनुष्य) ।इन तीनों का आपस में सामन्जस्य है। आकाशीय पात्रों का पृथ्वीय रूपांतर है। और मनुष्य तो ब्रह्मांड की इकाई है ही। हू-ब-हू। तो इंद्र और अहल्या की जो कथा पुराणों में प्रचलित है। वह आकाशीय घटना की नकल मात्र है जिसका संदर्भ जार (व्यभिचार) से है। जबकि ब्रह्माँड की असली घटना मात्र वैज्ञानिक है। 

   तो ऋषि और वैज्ञानिक ब्राह्मणों की शोध को पहले देख लेते हैं। क्योंकि सोम प्रकरण में इन्द्र की अभ्यर्थना भी की जाना है। मंत्र में आव्हान किया जाता है -"इन्द्रागच्छ "।इन्द्र यज्ञ के देवता हैं। हरिव आगच्छ। मेघाततिर्थेर्मेष वृषणशस्य मेघे। हरिवाहन इन्द्र के अश्व हैं। कहते हैं हरिवाहन आइये। मेघ, इन्द्र के घोडे़ (गायत्री आदि सातों छंद, ) गौर पशु को मारने वाले तथा अहल्या के जार इंद्र आइये। 

        सोम घर में लाना है। चूंकि वह सम्राट है,अतःउसको लाने के लिए 4 लोग सिंहासन लेकर जाते हैं। राजा को तो दो ही लोग उठाते हैं किंतु यह तो सम्राट हैं न..! तो सर्व प्रथम तो इस ऋतसदनी (आसंदी) को मंत्र बोलकर स्पर्श किया जाता है। फिर उस पर भी मृग चर्म बिछाया जाता है। फिर मंत्रों सहित कहा जाता है -हे सोम तुम गयस्फान (गृह वर्धक हो। प्रत्तरण (आपत्ति निवारक) हो। सुवीर (अच्छी संतान देने वाले) अवीरहा (पुत्रादि के घातक) न बनकर यजमान की यज्ञशाला में पधारें। 'गुहा वै दुर्या 'घर में विराजें। 

    इन्द्र जार क्या है। यह वैज्ञानिक ब्रह्माँडीय घटना है, जो प्रतिदिन घटित होती है। अहल्या जार प्रतिदिन प्रातः सूर्योदय के पूर्व होता है...! कैसे -घटना मुग्धकारी है। वैसी नहीं है जो प्रचलित है। दिन का नियमन करने वाली रात्रि 'अहर्यमयति 'इस व्युत्पत्ति से 'अहर्या 'कहलाती है।और अहल्या ही परोछ रूप से अहल्या कहलाती है। 

   क्योकि देवता परोक्षप्रिय हैं। सूर्य के इन्द्रोधाता भगः पूषा :मित्रोऽथवरुणोऽर्यमा इत्यादि 12 प्राणों में इन्द्र भी अत्युत्तम प्राण है। इन्द्र (सूर्य )के निकलने के पूर्व) अहल्या जीर्ण शीर्ण हो जाती है रात, ही दिन की स्वतंत्रता छीनती है। प्रातः काल, में दो घड़ी रहते ही सूर्य अर्थात् इन्द्र की सत्ता स्थापित हो जाती है। तड़का उगे (पौ फटते) ही आसमान में सफेदी चमकने लगती है। उसी समय गोतम, अहल्या का पति भाग जाता है। 

   गो, पृथ्वी का नाम है। तम अंधकार का नाम है। जहां इन्द्र आया कि पृथ्वी का तम दूर हुआ। चूंकि इंद्र ही अहल्या को जीर्ण शीर्ण करता है, अतः "अहल्या जीरयति "--इस व्युत्पत्ति से उस सौर प्राण को, इन्द्र को अहल्या का जार कहा जाता है। अर्थात उदय होते ही सूर्य की सहस्त्र रश्मियां संसार में फैल जातीं हैं -ये ही इन्द्र के सहत्र भग हैं। 

मित्रो, हमारी कथा का उद्देश्य सनातन विज्ञान को समाज के सामने लाना है। वैदिक ज्ञान से विहीन उन भोले भाले मुंहजोरों को यह भी बताना है कि वे अपनी निम्नस्तरीय सोच और गतिविधियों से देश का अनिष्ट न करें। किंतु आप जो मित्र पढ़ रहे हैं, क्या आपकी तंई इतना ही पर्याप्त है। आगे हम और आप क्या कुछ कर सकते हैं यह सोचना भी आवश्यक है। 

जीव के अति सूक्ष्म विज्ञान का चित्रण भरा पडा़ है। मैं इतना भर तो कह ही सकता हूँ कि यज्ञ विज्ञान ज्ञान की पराकाष्ठा है। ऋषियों की खोज और ब्राह्मणों के प्रयोगों ने आत्मा और परमात्मा का जो संबंध जोडा़, है वह तो ज्ञान का शिखर है। बस इसको इस तरीके से इतना सा ही समझ लें कि आज के मिशन "यान"ऋषियों की हजारों वर्ष पहले की गई शोध की मामूली सी नकल भर है। यान को ग्रह पर भेजने की तुलना में मात्र अनुभूति (आत्मा) को शून्य में परमात्मा  (?) से मिलाने के विज्ञान की कल्पना ही कितनी सुखद है। 

✍🏻रमेश तिवारी


भगवान_विष्णु_और_वृन्दा 


पद्मपुराण (उत्तर खं. अ. २) वर्णित 'कार्तिक माहात्म्य' मे तथा देवी भागवत (९/१६वे अ. से ३५वे अ. तक) मे वृन्दा या तुलसी का भगवान विष्णु द्वारा पतिव्रत धर्म भंग किया जाना और उसके पति जलंधर या शंखचूड का मारा जाना लिखा है। कई महाशय उक्त कथा को भी आक्षेप रुप से पेश करते है, अत: विष्णु- चरित्र की विशुद्धता प्रकट करने के लिये इसी कथा पर विचार करना उचित समझते है।


 जो भगवान कृष्ण के अंश से उत्पन्न होनेवाला सुदामा नाम का गोप था, वही समयान्तर मे श्री राधाजी के शाप से दानव वंश मे जन्म धारण करके 'शंखचूड' नाम से विख्यात हुआ, वह अपने समय मे तीन लोक मे अद्वितीय वीर था।           

(देवीभागवत)


 एक बार वह जलन्धर कामान्ध होकर जहाँ श्री पार्वतीजी विराजमान थी वहाँ पहुँचा। इसने माया से दश भुजाएँ, पाँच मुख, तीन नेत्र, मस्तक पर जटाजूट आदि सब कुछ शंकर भगवान  के समान बनाए और बैल पर सवार होकर आसुरी माया से शिव महाराज के तुल्य बन गया। पार्वतीजी दूर से इसे शिव भगवान जानकर प्रत्युत्थान देने के लिये सखियों के बीच से उठ खडी हुई। जब इस दानवराज ने पार्वती के रुप लावण्य को देखा तो यह स्खलित एवं शिथिल अंग हो गया। [पार्वतीजी तत्काल अन्तर्ध्यान हो गई और विष्णु भगवानजी से मिलने पर परामर्श किया कि- ]  

(शिव पुुराण युद्ध खंड)


जब तक इस दुष्ट की धर्मपत्नी का सतीत्व नष्ट न होगा तब तक यह न मरेगा, इस दानव को यह वरदान मिला। (देवी भागवत)


[सो विष्णु भगवान संसार भर की स्त्रियों का सतीत्व बचाने के अभिप्राय से] शंखचूड का रुप बनाकर तुलसी के पास गये। 

(देवी भागवत) इत्यादि-


'पद्मपुराण' मे इस आख्यायिका का जो कथानक अंकित किया है, वह भौतिक-विज्ञान से सम्बन्ध रखता है। तुलसी नामक प्रसिद्ध औषधि त्रिदोषजन्य अनेक ज्वारो एवं मलेरिया के किटाणुओं को समूल नष्ट कर देती है। प्राचीन ऋषियों ने 'ऋतम्भरा' प्रज्ञा द्वारा इस रहस्य की संगोपांग गवेषणा की थी, इसलिये हमारी दैनन्दीनी दिनचर्या मे तुलसी के सेवन का पर्याप्त उपयोग पाया जाता है।


भगवान विष्णु और तुलसी की कथा का आधिभौतिक अर्थ यह है कि, जल को धारण करनेवाला बादल ही 'जलन्धर' है और उस बादल मे सर्वात्मभाव से रहनेवाली 'विद्युत-शक्ति ' ही वृन्दा है। साध्वी स्त्री का सर्वस्व जिस प्रकार उसका एकमात्र पति ही होता है, इसी प्रकार मेघान्तवर्ती विद्युत का भी अनन्य आश्रय बादल ही है। वह मेघ क्षण क्षण मे नये नये रुप बदलकर आकाश मे विचरता है। कई बार तो यह  'कुन्द-इन्दु-सम-धवल-देह-द्युति' बनकर एवं बीच बीच मे नीलकण्ठ सी छटा दिखाता हुआ-'भव भव विभव पराभव कारिणी! विश्वमोहिनी, स्ववशविहारिणी'- प्रकृतिरुप पार्वती देवी को भी विमुग्ध कर डालने को उद्यत होता है। सूर्य-चन्द्रादि, ग्रह, नक्षत्र, तारे, सितारे अपनी अपनी कान्ति रुप कान्ताओं को इस घनघमण्ड के प्रतिरोध मानों व्याकुलित सी देख पाते है। यह जलन्धर दैवी-सम्पदा रुप प्राणीमात्र के जीवन आधार जलो को आत्मसात कर के मानो सबके जीवन को मुठ्ठी मे ले लेता है।अतएव वे सब विचलित हो उठते है। परन्तु मेघवर्ती विद्युत की प्रवाह धारा जब तक अविछिन्न रुप प्रवाहित होती है, तब तक वाष्पभूत जलन्धर का एक कण भी पृथ्वी पर नही टपक सकता।अतएव पार्वती रुप प्रकृति के परामर्श से व्यापनशील वायुरुप विष्णु तरलता से प्रवाहित होता हुआ मेघान्तवर्ती विद्युतरुप वृन्दा का सर्वतोभावेन सस्पर्शन करता है, बस! इस वायु के संसर्ग से ज्योही मेघान्तवर्ती विद्युत मे स्पन्दन-क्रिया का संचार हुआ कि वाष्पभूत जलसंघ सिमट-सिमट कर कणश: पृथ्वी पर गिर जाता है।


वायु का प्रत्येक प्रवाह वर्षा का कारण होता हो सो बात नही है। एक खास प्रकार की मानसून नामक हवा वृष्टिकारक होती है। सो उक्त रुपक मे भी वायु रुप विष्णु जलन्धर का वेश बदलकर ही वृन्दा के निकट पहुँचता है, तभी वह विदीर्ण होकर पृथ्वी पर गिरता है। अर्थात, वायु का स्वाभाविक रुप बरसात का कारक नही, यह भाव उक्त रुपक मे बडी चातुरी से अभिव्यक्त किया है। अस्तु, वही मेघान्तवर्ती विद्युत शक्ति(जिसे न्यायशास्त्र मे- भौमादिव्यौदर्याकरजभेदात्।- के अनुसार 'दिव्य अग्नि' के नाम से स्मरण किया है।) जलकणो से संमिश्रित होकर 'अद्भ्य: पृथ्वी, पृथ्वीभ्य औषधय:' सिद्धांत के अनुसार तुलसी नामक पौधे के रुप मे उत्पन्न होती है अर्थात-तुलसी के अन्दर जो अालौकिक शक्ति विद्यमान है, वह परम्परा से मेघान्तवर्ती दिव्य अग्नि के प्रवाह से ही इसमे आई है। इस गूढ़ रहस्य को अभिव्यक्त करने के लिये श्री वेदव्यासजी ने वृन्दा का सती होकर जन्मान्तर मे तुलसी वृक्ष के रुप मे उत्पन्न होना दिखाया है। वृन्दा ने विष्णु भगवान को जडीभूत हो जाने का शाप दिया था, सो शालिग्राम शिला मानो व्यापक वायु का ही जडीभूत पिण्ड है।जैसे अग्नि के साथ वायु का स्वाभाविक सम्बन्ध है और वायु के झोंको से अग्नि की अगण्य सी चिन्गारी भी उत्तरोत्तर अभिवृद्ध हो जाती है, इसीप्रकार तुलसीदल मे जो परम्परागत दिव्य अग्नि है, वह वायुसंघातभूत शालिग्राम शिला के संसर्ग से और भी उन्नत गुण हो जाती है, यही इस कथा का आशय है।


तुलसीदल को दातों से कुचलना, दांतो को शीघ्र गिरा देता है और नेत्रज्योति को भी हानि पहुँचाता है, अतएव सुवर्णकणो से अभिव्याप्त गण्डकी नदी के पाषाण(शालिग्राम) के जल से इसे संमिश्रित किया जाता है और घिसे हुये चन्दन आदि विशुद्ध काष्ठिक द्रव्यों के मेल से इसे पान किया जाता है। इस तरह यह अछिन्न दल बिना किसी कष्ट के गले के नीचे उतर जाता है और अनुपान के संयोग से इसकी वैद्युती शक्ति सुरक्षित रहती है।धार्मिक परिभाषा मे इसे 'चरणामृत' कहते है और इसके पीने से-'अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्'-के अनुसार अकालमृत्यु की निवृत्ति और समस्त व्याधियों का विनाश माना जाता है।

✍🏻तपसे शूद्रम


शास्त्रों के मिथ्या अनुवाद द्वारा दुष्प्रचार-

कई बार लोग किशोरी मोहन गांगुली के महाभारत अनुवाद को उद्धृत कर कुछ बातें कहते हैं-

१-युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कर्ण को सूतपुत्र होने के कारण अपमानित किया गया था।

२-राजा रन्तिदेव के यहाँ यज्ञ के लिए प्रतिदिन २००० गायें मारी जाती थीं।

इसी प्रकार भगवान् राम के मांसाहार का वर्णन कई लोग करते हैं। अभी मुरारी बापू ने बलराम जी के दिन रात शराब पीने का निराधार वर्णन आरम्भ किया है। 

ये सभी भारतीय संस्कृति की यथासम्भव निन्दा के लिए झूठे प्रचार हैं।

१-युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कर्ण को निमन्त्रण तथा आगमन का बहुत सम्मान सहित भीष्म पितामह के साथ वर्णन है-

धृतराष्ट्रश्च भीष्मश्च विदुरश्च महामतिः॥५॥

दुर्योधनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते।

गान्धारराजः सुबलः शकुनिश्च महाबलः॥६॥

अचलो वृषकश्चैव कर्णश्थ रथिनां वरः।

तथा शल्यश्च बलवान् वाह्लिकश्च महाबलः॥७॥

(महाभारत, सभा पर्व, अध्याय ३४)

क्या कर्ण को रथियों में सर्वश्रेष्ठ कहना उसका अपमान है? राजा के रूप में निमन्त्रण ही पूर्ण सम्मान है।

उसके बाद विस्तार से वर्णन है कि युधिष्ठिर ने सभी निमन्त्रित लोगों को नमस्कार किया तथा नकुल द्वारा उनको अच्छे भवनों में ठहराया।

२-रन्तिदेव पर दैनिक गोहत्या का आक्षेप-

महाभारत, द्रोण पर्व, अध्याय ६७-

सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमतिथिर्वसेत्।

आलभ्यन्त तदा गावः सहस्राण्येकविंशतिः॥१४॥

= जो भी अतिथि संकृति पुत्र रन्तिदेव के यहाँ रात में आता था, उसे २१,००० गौ छू कर दान करते थे।

कोई भी २१,००० गौ एक बार क्या, जीवन भर में नहीं खा सकता है। यहां गो शब्द सम्पत्ति की माप भी है। मुद्राओं के नाम बदलते रहे हैं। उनका स्थायी नाम था-गो, धेनु। किसी को एक लाख गाय दी जायेगी तो वह उनको रख नहीं पायेगा, न देख भाल कर सकता है। यहाँ गो बड़ी मुद्रा (स्वर्ण), धेनु छोटी मुद्रा (रजत), निष्क सबसे छोटी मुद्रा है। निष्क से पंजाबी में निक्का, या धातु नाम निकेल हुआ है। निष्क मिलना अच्छा है, अतः नीक का अर्थ अच्छा है।

अन्नं वै गौः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/९/८/३ आदि)

इन्द्र मूर्ति १० धेनु में खरीदने का उल्लेख है-

क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः। (ऋक, ४/२४/१०)

२१००० गो या स्वर्ण मुद्रा देने के बाद उनको अच्छा भोजन कराते थे-

तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्ट मणिकुण्डलाः।

सूपं भूयिष्ठमश्नीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा॥

वहाँ कुण्डल, मणि पहने रसोइये पुकार पुकार कर कहते थे-आप लोग खूब दाल भात खाइये। आज का भोजन पहले जैसा नहीँ है, उससे अच्छा है।

यही वर्णन शान्ति पर्व (६७/१२७-१२८) में भी है।

अनुशासन पर्व (११५/६३-६७) में बहुत से राजाओं की सूची है जिन्होंने तथा कई अन्य महान् राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था। इनमें रन्तिदेव का भी नाम है-

श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च।

रैवते रन्तिदेवेन वसुना, सृञ्जयेन च॥६३॥

एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च।

दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा॥६४॥

विरूपश्वेन निमिना जनकेन च धीमता।

ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह॥६५॥

इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च।

अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना॥६६॥

हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च।

एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम॥६७॥

श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव , वसु, सृञ्जय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्व, निमि, बुद्धिमान जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत-इन सबने तथा अन्य राजाओं ने कभी मांस नहीँ खाया था।

३-भगवान् राम आदि कई राजाओं का ऊपर उल्लेख है कि उन लोगों ने जीवन में कभी मांस नहीं खाया।

४-यज्ञ में उपरिचर वसु ने पशु बलि का समर्थन किया था जिस पर ऋषियों ने उनको शाप दिया था।

महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय ३३७-

देवानां तु मतं ज्ञात्वा वसुना पक्षसंश्रयात्॥१३॥

छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा।

कुपितास्ते ततः सर्वे मुनयः सूर्यवर्चसः॥१४॥

ऊचुर्वसुं विमानस्थं देवपक्षार्थविदिनम्।

सुरपक्षो गृहीतस्ते यस्मात् तस्माद दिवः पत॥१५॥

अद्यप्रभृति ते याजन्नाकाशे विहता गतिः।

अस्मच्छापाभिघातेन महीं भित्वा प्रवेक्ष्यसि॥१६॥

यहां अज का अर्थ बीजी पुरुष कहा गया है, जिसकी यज्ञ द्वारा उपासना होती है।

यज्ञ में पशु का आलभन करते हैं-उसका पीठ, कन्धा आदि छूते है। इसे शमिता कहते हैं, अर्थात् शान्त करने वाला। शान्त करने के लिए हत्या नहीँ की जाती है। पर इसका अर्थ किया जाता है कि पशु का कन्धा आदि छू कर देखते हैं कि कहाँ से उसका मांस काटना अच्छा होगा। आजकल भी घुड़सवारी सिखाई जाती है कि घोड़े पर चढ़ने के पहले उसकी गर्दन तथा कन्धा थपथपाना चाहिए। इससे वह प्रसन्न हो कर अच्छी तरह दौड़ता है। बच्चों की भी प्रशंसा के लिए उनकी पीठ थपथपाते हैं, यद्यपि वे भाषा भी समझ सकते हैं। यही आलभन है। शिष्य भी पहले गुरु को जा कर नमस्कार करता है तो गुरु उसके कन्धे पर हाथ रख कर आलभन करते हैं। यदि आलभन द्वारा उसकी हत्या करेंगे तो शिक्षा कौन लेगा? गुरु को भी फांसी होगी। हर अवसर पर यदि कोई पैर छूकर नमस्कार करे तो उसकी पीठ पर ही हाथ रख कर ही आशीर्वाद दिया जाता है।

५-बलराम जी का मदिरा पान-ऐसा वर्णन करने वाले से अधिक मूर्ख मिलना सम्भव नहीं है। किसी भी विद्या या खेल में अच्छा होने के लिए पूरे जीवन साधना करनी पड़ती है। बलराम जी अपने समय के सर्वश्रेष्ठ पहलवान तथा गदा युद्ध के विशेषज्ञ थे। दुर्योधन उनके पास ही गदा युद्ध की विशेष शिक्षा लेने गया था। पहलवान होने के लिए दैनिक कम से कम ५ घण्टे व्यायाम तथा सादा पौष्टिक भोजन करना पड़ता है। यदि मद्य पान द्वारा ही मल्ल होने की बात सिखायेंगे तो भारत में कभी अच्छे खिलाड़ी नहीँ हो सकते जो ओलम्पिक में जीत सकें। बलराम जी वारुणी लेते थे जो कठोर व्यायाम के लिए आवश्यक है। अष्टाङ्ग हृदय सूत्र (७/४२)- श्वेतसुरा सा च श्वेत पुनर्नवादि मूलयुक्तेन शालिपिष्टेन क्रियते। गुणाः लघुस्तीक्ष्णा हृद्या शूल- कास-वमि -श्वास-विबन्ध- आध्मान- पीनसघ्नी। सुश्रुत संहिता, उत्तर (४२/१०२)-वात शूल शमनी।

शरीर की कोशिकाओं में टूट फूट होती है। उनके पुनर्निर्माण के लिए जो ओषधि है उसे पुनर्नवा कहते हैं। इसके अतिरिक्त शरीर गर्म होने के बाद अचानक जल या भोजन लेने पर कास या वात हो जाता है। ठीक आराम नहीँ होने पर शूल तथा वायु विकार होता है। इन कष्टों को दूर करने के लिए पुनर्नवा आदि मूलों को धान के चूर्ण के साथ मिलाकर जो ओषधि बनती है, उसे वारुणी कहा गया है।

✍🏻अरुण उपाध्याय

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

भारतीय इतिहास क़ो नकारने की कोशिश

 भारत में 3990 जातियों के पास अलग अलग समय में अलग अलग हिस्से में राज्य रहे हैं।

जिन्हें इतिहास नहीं पता, केवल ईसाई पैम्फलेट पता है।

उनकी बात का कोई वजन नहीं है।


ऐतिहासिक तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर भारत में इन मुख्य जातियों के पास  अलग-अलग समय अलग-अलग इलाकों में राज्य थे:- केवट, कैवर्त,नाई ,कुर्मी, अहीर ,आभीर, गूजर ,जाट,थारू,खर, संथाल ,बैगा, गोंड,मिजो, माईती,सेन, पाल, भर, वोक्कालिगा, पटेल, वल्लाल, गौड़ा, नायडू, रेड्डी, खंडाइत, खत्री, भील ,खरवार, उरांव,मुंडा,कोल, नगा, खासी,ब्राह्मण ,कायस्थ,भूमिहार, मराठा,  चंद्रवंशी क्षत्रिय, सूर्य वंशी क्षत्रिय ,हूण,शक, कुषाण,पुलिंद,आंध्र, कदंब, काकतीय, परिहार ,चोल,चालुक्य, यादव, पाण्ड्य, सिख, सातवाहन, लोहार, सुनार,तोमर, प्रतिहार, , गुहिलोत,कलचुरि, भोज, परमार, मीणा, पड़िहार, राष्ट्रकूट, चौहान, डोभवाल,गोठवाल, महर, महार, खोड़ा, भाट, खेतपाल, देस पाल, गहड़वाल, सोलंकी, चंदेल, भट्ट,कट्ठी,डाबी, डोडा, सेंगर, बड़ गूजर, दाहिया, बैस,दाहिमा, बल्हारा, राठौर,अग्रवाल,आदि आदि।इनकी अनेक अनेक शाखाएँ अलग अलग नाम से प्रसिद्ध हुई।


अंग्रेजी प्रभाव में इतिहासकारों ने बिलकुल उलटा इतिहास लिखा है जिसका प्रचार वोट लोलुप नेता कर रहे हैं। एक उदाहरण देखिये - गत 10,000 वर्षों में यादव कभी भी कम प्रभावशाली नहीं रहे हैं।  महाभारत के समय 5 मुख्य यादवगण थे तथा कौरव, पाण्डव दोनों पक्ष उनकी सहायता मांग रहे थे। यादव नेता भगवान् कृष्ण के वंशज होने का भी गर्व करते हैं किन्तु राजनीति तथा अन्य लाभ के लिए दलित बन जाते हैं। अभी गांवों में सबसे शक्तिशाली वर्ग यादवों का ही है जिनके पास अधिकांश कृषि भूमि है। अन्य दलित जातियां भी अपने शक्तिशाली पूर्वजों तथा राजाओं पर गर्व करते हैं किन्तु आरक्षण के लिए दलित बन जाते हैं। 


कुछ समूह अफ्रीका से खान मजदूर बन कर आये थे जिनको अंग्रेजों ने यहाँ बसाया, यहाँ से भी गिरमिटिया मजदूर अन्य देशों में बसाए गये। गुलाम या दास प्रथा कभी नहीं थी, उसे अंग्रेजो ने थोपा। 


19वीं सदी ईसवी के आरंभ में भारत में लगभग 600 छोटी बड़ी रियासतें थी जिनमें से 12 रियासतों में ब्राह्मण का और 260  में क्षत्रिय कही जाने वाली विभिन्न जातियों का राज्य था। शेष में से तीन सौ से अधिक रियासतों में तथाकथित पिछड़ी जातियों का और वनवासियों का राज्य था। दिल्ली पंजाब में सिखों जाटों गुर्जरों के राज्य थे। उत्तर प्रदेश ,बिहार और मध्य प्रदेश में जगह-जगह कुर्मियों, अहीरों, तेलियों, नाइयों तथा अन्य पिछड़ी जातियों की रियासतें थी। मराठों का राज्य तो था ही। गुजरात में पटेलों का आधिपत्य था।


625 रियासतों के विवरण तो अंग्रेजों ने स्वयं छापे हैं। सरल सन्दर्भ के लिए देखें मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी भोपाल से छपी हमारी पुस्तक 'भारत, हजार वर्षो की पराधीनता:एक औपनिवेशिक भ्रमजाल'


साथ ही साहित्य संगम, नया 100 लूकरगंज प्रयाग से छपी 'कभी भी पराधीन नहीं रहा है भारत' का परिशिष्ट।

✍🏻रामेश्वर मिश्रा पंकज


18वी शताब्दी तक गोंड जनजाति के पास भोपाल का राज था जिसकी अंतिम रानी कमलापति थी। 


यानि 18वीं शताब्दी तक देश में आदिवासी समाज में गिने जाने वाली जातियों से राजा-रानी होते थे। फिर इसके बाद अंग्रेजों का राज आ गया। 


तो इन जनजातियों को ब्राह्मणवाद ने गुलाम कब बनाया पं नेहरू के राज में? 


आप इतिहास खोद कर देखिए इस देश में शायद ही कोई जाति-जनजाति ऐसी नहीं मिलेगी जिसके पास अपने राजा न हो। राजस्थान में मीणा समाज के किले राजा सब रहे हैं। 


प्रजापति समाज के पास राजा दक्ष प्रजापति से लेकर

कमलापति से लेकर रानी आहिल्यबाई होल्कर तक

भारतीय समाज में तो इन जातियों को नेतृत्व करने का मौका मिलता रहा है। 


हां ईसाई बनते ही ये पीटर पॉल बन जाते हैं, और पाकिस्तान में अदिवासी समाज कितना अपना वजूद को बनाए रख पाया है ये रिसर्च का विषय है


रानी कमलापति भोपाल की अंतिम रानी थी जिनकी प्रजा में ब्राह्मण-राजपूत सब रहे ही होंगे

लेकिन गोंड जाति आदिवासी है जिन्हे हिन्दू हीन मानते हैं

कोई लॉजिक है इस बात का???

✍🏻अविनाश त्रिपाठी


"माना कि हम अंग्रेज़ों के दुश्मन थे लेकिन ऐसा क्या गुनाह किया था हमारे पुरखों ने कि जब 15 अगस्त 1947 को भारत को आज़ादी मिली तो हमें क्यों आज़ाद नहीं किया गया? जी हां, अंग्रेज़ों के काले क़ानून (क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871) से मुक्ति मिली तो पूरे पांच वर्ष सोलह दिन बाद 31 अगस्त 1952 को जब अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते (मानव को एक प्रजाति मानने के बजाय अलग-अलग प्रजाति की अवधारणा ख़ारिज किए जाने के कारण) क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट समाप्त कर दिया गया.

बता दें कि पाकिस्तान में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1948 में ही बेअसर कर दिया गया था. जबकि भारत सरकार ने 31 अगस्त 1952 को मजबूरी में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट समाप्त ज़रूर किया किन्तु बड़ी युक्तिपूर्वक इसके स्थान पर हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट लागू कर दिया इसका अर्थ यह हुआ कि जो ब्रिटिश विद्रोही समुदाय 1952 तक जन्मजात अपराधी माने जाते थे, वे अब आदतन अपराधी माने जाने लगे."


ये उद्गार विमुक्त जन अधिकार संगठन के एक कार्यकर्ता का है।


हमने से शायद बहुत कम होंगे जो "विमुक्त" शब्द से परिचित होंगे... और संभवतः क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 के बारे में भी।

यहाँ ज्यादा हम डिटेल में नहीं बताएंगे, आप स्वयं इसका अध्ययन करिये।


देश आजाद हो गया 1947 में ही... लेकिन क्या आज़ाद हुए हम ?? 

इससे सम्बंधित आप सैकड़ों आर्टिकल पढ़े होंगे.. और उन आर्टिकलों के अपने रिफ्रेंसेस भी हैं .. और इस आज़ादी की कड़ी में जो सबसे ज्यादा बात होती है वो इन्हीं विमुक्त याने पूर्व क्रिमिनल ट्राइब्स की बात होती है..!! विमुक्त माने क्या ?? किस चीज से विमुक्त ??

तो विमुक्त वे जो अंग्रेजों के शासन काल के दौरान जन्मजात क्रिमिनल याने अपराधी थे वे अब विमुक्त हैं... इनके साथ ऐसे सलूक किये गए कि कोई ठिकाना नहीं। आज़ाद भारत होने के पाँच साल बाद तक भी इन्हें क्रिमिनल ही समझते रहे... और जब इस एक्ट को निरस्त किया गया तो इन्हें 'विमुक्त' नाम धरा दिया गया.. याने क्रिमिनल से विमुक्त। लेकिन ये विमुक्त क्रिमिनल का ही पर्याय बन के रह गया।


31 अगस्त 1952 को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को निरस्त किया। उसके स्थान पर 1959 में एक नया कानून "आदतन अपराधी कानून" के नाम से जोड़ दिया गया। मतलब आज़ाद भारत में विमुक्त के साथ साथ आदतन अपराधी का लेवल रह ही गया।

अंग्रेजों के वक़्त करीबन 500 जातियां/जनजातियां इस एक्ट के अंतर्गत थी.. और 1952 में निरस्त के बाद इन्हें अनुसूचित जाति/जनजाति में शामिल होना था लेकिन ये अब तक भी अधिकांशतः नहीं हुए हैं।

"आदतन अपराधी कानून" को हटाने के लिए अब भी विरोध प्रदर्शन होते हैं। क्योंकि इसमें वही शामिल होते हैं जो अंग्रेजों के वक़्त भी थे।


अब यहाँ सबसे इंपोर्टेंट बात बता रहे... इसको जरा ध्यान से पढ़िये

"आपराधिक जनजाति अधिनियम,1871 से पीड़ित उन जनजातियों पर इस कानून के खौफ का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे प्रभावित जनजातियाँ 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाती हैं क्योंकि 31 अगस्त, 1952 को ही इस अधिनियम को निरस्त किया गया था|"


अब आप क्या बोलेंगे ??

क्योंकि इनकी संख्या कम नहीं है... मुसलमानों के संख्या के बराबर हैं ये। इनको आप लेशन सिखाएंगे ?? इनको आज़ादी का इतिहास पढ़ाएंगे ?? आप तंज कसेंगे कि हम अपने बच्चों को कौन सा तारीख बताएंगे आज़ादी का ?? 31 अगस्त या 15 अगस्त ?? नहीं नहीं मिम्स बनाओ न आप जम के बनाओ, बनाओगे न ??

इंडियन मेन लैंड में पाँचवी शेड्यूल को ले के आंदोलन होते रहते हैं.. अभी तो बहुत ही तीव्र हो रहा है.. हमारे ही झारखंड और छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में ऐसे भीड़ में कितने जन आगे आये और बोले कि हम नहीं मनाएंगे आज़ादी का जश्न, हम नहीं मानते कि हम 15 अगस्त को आज़ाद हुए .. कोई झंडा नहीं फहरेगा स्कूल में.. डॉट डॉट डॉट.. बाकायदा कहीं-कहीं मास्टरों को पीट दिया गया था। तब ये तंज कसने वाले प्राणी सब किधर थे ?? इनका साफ कहना है कि जिस दिन पाँचवीं अनुसूची लागू होगी उसी दिन हम स्वतंत्र होंगे। और ये जो बोलते हैं न वही आज आज़ादी को ले के तंज कसते नजर आ रहे हैं क्योंकि इनका निशाना कंगना थोड़े न है, निशाना तो मोदिया है। सिंपल।


जब विमुक्त जनजातियां 31 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाती है और एक स्वतंत्रता दिवस अभियो लाइन में है तो किसी के स्वतंत्रता का वर्ष बताने पे तिलमिला क्यों रहे हो ??? उनके भी अपने रेफ्रेंस हैं और पॉइंट्स हैं। उन पॉइंट्स पे बात करो न।

बाकी अपनी-अपनी पिपहरी बजाते रहो।

✍🏻गंगवा, खोपोली से।

बुधवार, 10 नवंबर 2021

हर गोविन्द खुराना

 पुण्यतिथि पर विशेष


पेड़ के नीचे पढ़ाई करने वाले एक छोटे से गांव के लड़के से नोबेल विजेता बनने तक हरगोविंद खुराना का सफर संघर्ष और जिजीविषा की दास्तान है. उनका नाम उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में शामिल है जिन्होंने बायोटेक्नॉलॉजी की बुनियाद रखने में अहम भूमिका निभाई थी.


हरगोविंद खुराना का जन्म नौ जनवरी, 1922 को रायपुर नाम के गांव में हुआ था जो अब पाकिस्तान के मुल्तान जिले का हिस्सा है. एक बहन और चार भाइयों में हरगोविंद सबसे छोटे थे. 1943 में उन्होंने लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और 1945 में यहीं से पोस्टग्रेजुएशन. 1948 में उन्होंने पीएचडी पूरी की. इसके बाद उन्हें भारत सरकार ने स्कॉलरशिप दी और वे आगे की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन स्थित लिवरपूल यूनिवर्सिटी चले गए.


1952 में नौकरी की एक पेशकश उन्हें कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया ले गई. यहीं हरगोविंद खुराना ने जीव विज्ञान में वह काम शुरू किया जिसके लिए बाद में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला. यहां वे 1959 तक रहे औऱ बताया जाता है कि उन्हें अपना काम करने के लिए पूरी आजादी मिली.


1960 में हरगोविंद खुराना अमेरिका आ गए. यहां वे विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी के साथ जुड़े. 1966 में उन्हें अमेरिकी नागरिकता मिल गई. इसके दो ही साल बाद रॉबर्ट डब्ल्यू हॉली और मार्शल डब्ल्यू नीरेनबर्ग के साथ उन्हें संयुक्त रूप से चिकित्सा का नोबेल दिया गया. यह पुरस्कार उन्हें जेनेटिक कोड और प्रोटीन संश्लेषण में इसकी भूमिका की व्याख्या के लिए दिया गया.


डॉ. हरगोविंद खुराना की एक और अहम खोज थी पहले कृत्रिम जीन का निर्माण. यह उपलब्धि उन्होंने 1972 में हासिल की. चार साल बाद ही उन्होंने ऐलान किया कि उन्होंने इस कृत्रिम जीन को एक कोशिका के भीतर रखने में कामयाबी हासिल की है. इस तरह देखें तो हरगोविंद खुराना की बायोटेक्नॉलॉजी की बुनियाद रखने में भी अहम भूमिका रही.


नोबेल पुरस्कार के बाद अमेरिका ने उन्हें नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंस की सदस्यता प्रदान की. यह सम्मान केवल विशिष्ट अमेरिकी वैज्ञानिकों को ही दिया जाता है. डॉ खुराना ने अमेरिका में अध्ययन, अध्यापन और शोध कार्य जारी रखा. देश-विदेश के तमान छात्रों ने उनके सानिध्य में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. नौ नवंबर 2011 को इस महान वैज्ञानिक ने अमेरिका के मैसाचूसेट्स में आखिरी सांस ली.


आपको शत् शत् नमन 🙏

मंगलवार, 9 नवंबर 2021

जूनागढ़ का भारत में विलय

 आज ही जूनागढ़ का भारत में हुआ विलय, पाकिस्तान भागकर पछताए थे रियासत के नवाब


जब बंटवारे के बाद जब सरदार वल्लभ भाई पटेल  500 से ज्यादा रियासतों का विलय कर रहे थे. तब जूनागढ़  के नवाब पाकिस्तान  में विलय के आमादा था. लेकिन उनके राज्य में हिंदू  आबादी ज्यादा थी, जो चाहती थी कि जूनागढ़ का विलय भारत में हो. जूनागढ़ के नवाब ने कई चालें चलीं. हर चाल उलटी पड़ी.  बाद में वो जिन्ना  से एक समझौता करके पाकिस्तान भाग गया. हालांकि कुछ ही सालों बाद पाकिस्तान में उसकी स्थिति खराब हो गई.  अब उसके वंशज वहां खराब हालात में रह रहे हैं.

जूनागढ़ के इन नवाब का नाम था नवाब मोहम्मत महाबत खानजी तृतीय रसूल खानजी. पाकिस्तान में अब नवाब के परिवारवालों को गुजारे के लिए महीने का जो पैसा मिलता है, वो चपरासी के वेतन से भी कम होता है.


जूनागढ़ के बारे में कहा जाता है कि वो आजादी से पहले हैदराबाद के बाद सबसे समृद्ध राज्य था


हालांकि नवाब के परिवार के लोग पाकिस्तानी मीडिया में ये बताने की कोशिश करते हैं कि पाकिस्तान के लिए उन्होंने कितनी बड़ी कुर्बानी दी लेकिन इस मुल्क ने उन्हें हाशिए पर फेंक दिया. हालांकि वो अब भी जूनागढ़ के भारत में विलय के मामले को विवादास्पद बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं लेकिन अब किसी की दिलचस्पी इसमें बची नहीं है.


लाचार नवाब के बेटे ने क्या कहा


पाकिस्तान के कराची शहर में नवाब महाबत खान के जो तीसरे वंशज रह रहे हैं, उनका नाम है नवाब मुहम्मद जहांगीर खान. कुछ समय पहले उन्होंने पाकिस्तान में कहा कि अगर उन्हें पता होता कि पाकिस्तान जाने के बाद उनका मान सम्मान खत्म हो जाएगा तो वे कभी भारत छा़ेड़कर नहीं आते.

पाकिस्तान से प्रकाशित एक अखबार को दिए इंटरव्यू में नवाब मुहम्मद जहांगीर ने नाराजगी जाहिर की कि आजादी के बाद बंटवारे के समय मोहम्मद अली जिन्ना के साथ हुए समझौते के तहत ही उनका परिवार पाकिस्तान आया था.

जूनागढ़ उस समय हैदराबाद के बाद दूसरे नंबर का सबसे धनवान राज्य था. नवाब अपनी संपत्ति जूनागढ़ में छोड़कर पाकिस्तान चले आए थे. यहां तक कि उन्होंने जूनागढ़ की संपत्ति के बदले में पाकिस्तान में संपत्ति भी नहीं मांगी, तब भी पाकिस्तान में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया.


आजादी से पहले जूनागढ़ के नवाब का पूरा कुनबा


अब किसी गिनती में नहीं है परिवार 

अब नवाब के परिवार का हाल ये है कि मौजूदा पाकिस्तान सरकार उन्हें अन्य राज परिवारों के समान न तो मान-सम्मान देती है और ना ही किसी गिनती में गिनती है. खटास इस बात की भी है कि अपने जिस वजीर के उकसावे में आकर वो पाकिस्तान से भागे, उस वजीर भुट्टो का परिवार पाकिस्तान का मुख्य राजनीतिक परिवार बन गया.


जिन्ना ने दिखाए थे सपने


जूनागढ़ में नवाब मुहम्मद महाबत खान और दीवान शाह नवाज भुट्टो की मंशा हिन्दू बहुसंख्यक आबादी के बावजूद पाकिस्तान में विलय की थी. मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान में विलय के लिए बड़े बड़े सपने दिखाए थे.


जिन्ना ने वादा किया और फिर भूल गए


जिन्ना पेपर्स के अनुसार जूनागढ़ के दीवान और जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता शाह नवाज ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को 19 अगस्त को पत्र लिखा, हम जूनागढ़ के पाकिस्तान में जाने के लिए औपचारिक स्वीकृति का इंतजार कर रहे हैं. खुशी होगी कि अगर आप इसे जल्दी से जल्दी अमलीजामा पहना सकें (पृष्ठ 548). इस मामले में देरी होते देख उन्होंने चार सितंबर को जिन्ना को फिर दिल्ली में उनके वादे को याद दिलाते हुए पत्र लिखा कि पाकिस्तान नहीं चाहेगा कि जूनागढ़ उससे छिटके

.

पाक ने कर दी थी घोषणा


जिन्ना ने जवाब दिया, कल हम कैबिनेट मीटिंग में इस बारे में विचार विमर्श करेंगे. तय नीति बनाएंगे. पाकिस्तान ने आठ सिंतबर को पाकिस्तान-जूनागढ़ समझौते की घोषणा की, जिसमें ये कहा गया था कि जूनागढ़ के शासक पाकिस्तान में विलय को तैयार हैं.

नेहरू ने विरोध करते हुए 12 सितंबर को लियाकत अली खान को पत्र लिखा. उन्होंने कहा कि चूंकि जूनागढ़ की 80 फीसदी आबादी हिंदू है. इस बारे में रायशुमारी में उनकी राय नहीं ली गई. लिहाजा ये मामला जूनागढ़ के लोगों की सहमति के बगैर नहीं उठाया जा सकता. भारत सरकार जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय को सहमति नहीं देगी. विलय का कोई संवैधानिक आधार नहीं बनता. ये मामला जूनागढ़ और भारत के बीच बनता है.


तब भारतीय फौजें तुरंत जूनागढ़ पहुंचीं


इसके बाद भी 15 सितंबर 1947 को जूनागढ़ ने पाकिस्तान के साथ विलय को औपचारिक तौर पर स्वीकार कर लिया.  इसके बाद भारतीय फौजों की वहां रवानगी शुरू हुई. भुट्टो की समझ में आ गया कि खतरा है. उन्होंने 16 सितंबर को लियाकत से मदद मांगते हुए कहा, कम से कम हमें ये तो बताइए कि आप हमें किस तरह की मदद दे रहे हैं.हमें किस तरह से कार्रवाई करनी चाहिए.


माउंटबेटन का जवाब


एचवी हडसन की किताब 'द ग्रेट डिवाइड' के अनुसार, गर्वनर जनरल माउंटबेटन ने किंग को रिपोर्ट दी. उन्होंने लिखा, जूनागढ़ के मामले पर विचार के लिए शाम को एक कैबिनेट मीटिंग में विचार किया जाएगा. हालांकि सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र जवाब है. जिन्ना ने भारतीय फौजों की हलचल की शिकायत माउंटबेटन से की. माउंटबेटन ने जो जवाब दिया, उसका सार यही था कि पाकिस्तान जो कर रहा है, वो भारत सरकार के साथ उसके समझौते का उल्लंघन है.


जूनागढ़ की जनता की राय


जूनागढ़ की 80 आबादी के इस विलय पर जो रायशुमारी हुई थी, उसमें 80 फीसदी जनता भारत के साथ जाने को तैयार थी. पाकिस्तान निरुत्तर हो गया. 25 सितंबर को जूनागढ़ मुक्त करा लिया गया. पुस्तक "सरदार लेटर्स" के अनुसार, बंबई में उस दिन स्वतंत्र जूनागढ़ की अस्थाई सरकार गठित की गई. वीपी मेनन की पुस्तक "इंटीग्रेशन आफ इंडिया इनस्टेड" के अनुसार, हालात और दबाव के आगे भुट्टो टूटते जा रहे थे. पाकिस्तान की ओर से कोई खास पहल होती नहीं दिख रही थी.


09 नवंबर को भारतीय फौजों का कब्जा


09 नवंबर को भारतीय फौजें जूनागढ़ में प्रवेश कर गईं और उन्हें जूनागढ़ पर कब्जा कर लिया. इस तरह जूनागढ़ आजाद हो गया. हालांकि, पुख्ता मुहर 20 फरवरी 1948 को लगी, जब वहां भारत सरकार ने जनमत संग्रह कराया. कुल 2,01, 457 वोटरों में 1,90,870 ने वोट डाले. पाकिस्तान के पक्ष में केवल 91 वोट पड़े. फिर 20 जनवरी 1949 को औपचारिक तौर पर जूनागढ़ का सौराष्ट्र और भारत में विलय हो गया.

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

रानी चेनम्मा का जन्म औऱ संघर्ष



रानी चेन्नम्मा की  वीरता 💐  । 


स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में दक्षिण भारत  कर्नाटक में वही स्थान कित्तूर की रानी  चेन्नम्मा ने लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेजों की सत्ता को सशस्त्र चुनौती दी थी और अंग्रेजों की सेना को उनके सामने दो बार मुंह की खानी पड़ी थी। रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों खासकर कर्नाटक में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष के पहले ही रानी चेनम्मा ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। हालांकि उन्हें युद्ध में कामयाबी नहीं मिली और उन्हें कैद कर लिया गया। अंग्रेजों के कैद में ही रानी चेनम्मा का निधन हो गया।

चेन्नम्मा का अर्थ होता है सुंदर कन्या। इस सुंदर बालिका का जन्म 1778 ई. में दक्षिण के काकातीय राजवंश में हुआ था। पिता धूलप्पा और माता पद्मावती ने उसका पालन-पोषण राजकुल के पुत्रों की भांति किया। उसे संस्कृत भाषा, कन्नड़ भाषा, मराठी भाषा और उर्दू भाषा के साथ-साथ घुड़सवारी, अस्त्र शस्त्र चलाने और युद्ध-कला की भी शिक्षा दी गई।

चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ हुआ। कित्तूर उन दिनों मैसूर के उत्तर में एक छोटा स्वतंत्र राज्य था। परन्तु यह बड़ा संपन्न था। यहां हीरे-जवाहरात के बाजार लगा करते थे और दूर-दूर के व्यापारी आया करते थे। चेन्नम्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर उसकी जल्दी मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद राजा मल्लसर्ज भी चल बसे। तब उनकी बड़ी रानी रुद्रम्मा का पुत्र शिवलिंग रुद्रसर्ज गद्दी पर बैठा और चेन्नम्मा के सहयोग से राजकाज चलाने लगा। शिवलिंग के भी कोई संतान नहीं थी। इसलिए उसने अपने एक संबंधी गुरुलिंग को गोद लिया और वसीयत लिख दी कि राज्य का काम चेन्नम्मा देखेगी। शिवलिंग की भी जल्दी मृत्यु हो गई।

अंग्रेजों की नीति डाक्ट्रिन आफ लैप्स के तहत दत्तक पुत्रों को राज करने का अधिकार नहीं था। ऐसी स्थिति आने पर अंग्रेज उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लेते थे। कुमार के अनुसार रानी चेनम्मा और अंग्रेजों के बीच हुए युद्ध में इस नीति की अहम भूमिका थी। 1857 के आंदोलन में भी इस नीति की प्रमुख भूमिका थी और अंग्रेजों की इस नीति सहित विभिन्न नीतियों का विरोध करते हुए कई रजवाड़ों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। डाक्ट्रिन आफ लैप्स के अलावा रानी चेनम्मा का अंग्रेजों की कर नीति को लेकर भी विरोध था और उन्होंने उसे मुखर आवाज दी। रानी चेनम्मा पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने अनावश्यक हस्तक्षेप और कर संग्रह प्रणाली को लेकर अंग्रेजों का विरोध किया।

अंग्रेजों की नजर इस छोटे परन्तु संपन्न राज्य कित्तूर पर बहुत दिन से लगी थी। अवसर मिलते ही उन्होंने गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और वे राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। रानी चेन्नम्मा ने सन् 1824 में (सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम से भी 33 वर्ष पूर्व) उन्होने हड़प नीति (डॉक्ट्रिन आफ लेप्स) के विरुद्ध अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किया था।

आधा राज्य देने का लालच देकर उन्होंने राज्य के कुछ देशद्रोहियों को भी अपनी ओर मिला लिया। पर रानी चेन्नम्मा ने स्पष्ट उत्तर दिया कि उत्तराधिकारी का मामला हमारा अपना मामला है, अंग्रेजों का इससे कोई लेना-देना नहीं। साथ ही उसने अपनी जनता से कहा कि जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूंद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता। रानी का उत्तर पाकर धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने 500 सिपाहियों के साथ कित्तूर का किला घेर लिया। 23 सितंबर, 1824 का दिन था। किले के फाटक बंद थे। थैकरे ने बस कुछ मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। इतने में अकस्मात किले के फाटक खुले और दो हजार देशभक्तों की अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा मर्दाने वेश में अंग्रेजों की सेना पर टूट पड़ी। थैकरे भाग गया। दो देशद्रोही को रानी चेन्नम्मा ने तलवार के घाट उतार दिया। अंग्रेजों ने मद्रास और मुंबई से कुमुक मंगा कर 3 दिसंबर, 1824 को फिर कित्तूर का किला घेर डाला। परन्तु उन्हें कित्तूर के देशभक्तों के सामने फिर पीछे हटना पड़ा। दो दिन बाद वे फिर शक्तिसंचय करके आ धमके। छोटे से राज्य के लोग काफी बलिदान कर चुके थे। चेन्नम्मा के नेतृत्व में उन्होंने विदेशियों का फिर सामना किया, पर इस बार वे टिक नहीं सके। रानी चेन्नम्मा को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। उनके अनेक सहयोगियों को फांसी दे दी। कित्तूर की मनमानी लूट हुई। 02 फरवरी 1829 ई. को जेल के अंदर ही इस वीरांगना रानी चेन्नम्मा का देहांत हो गया।

भले ही रानी चिन्नम्मा अंग्रेजों को परास्त ना कर पायी हो लेकिन मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम और अपनी वीरता के कारण अंग्रेज उनके विश्वास को अडिग नहीं कर पाए। स्त्री के साहस की मिसाल रानी चिन्नम्मा भले ही इतिहास के पन्नों में समा गई हों लेकिन उनका जीवन और साहस उन्हें उन विजित राजाओं से कहीं ऊपर रखता है जो आत्मसम्मान और गुलामी की कीमत पर अपनी साख और राज्य को बचाकर रखते हैं। ✍️ 🚩

✍🏻करंजे के यस


झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र होते ही एक सवाल दिमाग में आता है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था उस ज़माने में तो ! इनमे से कोई भी 5-7 किलो से कम वजन का नहीं होता | इतने भारी हथियारों के साथ दिन भर लड़ने के लिए stamina भी चाहिए और training भी |


रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध में भाग लेने का जिक्र आता है | इन सब ने ये हथियार चलाने सीखे कैसे ? घुड़सवारी भी कोई महीने भर में सीख लेने की चीज़ नहीं है | उसमे भी दो चार साल की practice चाहिए | ढेर सारी खुली जगह भी चाहिए इन सब की training के लिए | Battle formation या व्यूह भी पता होना चाहिए युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाना पड़ता है या बरसों युद्ध में भाग ले कर ही सीखा जा सकता है |


अभी का इतिहास हमें बताता है की पुराने ज़माने में लड़कियों को शिक्षा तो दी ही नहीं जाती थी | उनके गुरुकुल भी नहीं होते थे ! फिर ये सारी महिलाएं युद्ध लड़ना सीख कैसे गईं ? ब्राम्हणों के मन्त्र – बल से हुआ था या कोई और तरीका था सिखाने का ?


लड़कियों की शिक्षा तो नहीं होती थी न ? लड़कियों के गुरुकुल भी नहीं ही होते थे ?


आम तौर पर आपको दल हित चिन्तक और एक आयातित विचारधारा के प्रवर्तक ये बताएँगे कि भारत में स्त्री शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं था | लड़कियों को कहने के लिए तो दुर्गा-काली कहा जाता था लेकिन उन्हें हथियार चलाना नहीं सिखाया जाता था | अगर आप रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देंगे तो वो कहेंगे वो तो रानी थी | जब आप बताएँगे कि उन्होंने कुछ ही दिनों में 5000 स्त्री सैनिक कैसे जमा कर लिए थे तो वो कोई और कुतर्क गढ़ेंगे |


ऐसा करते समय वो एक बुरी सी चीज़ भूल जाते हैं | भारत श्रुति की परम्पराओं से चलता है | अब किताबें लिखने के बदले अगर लोगों ने उसे पूरा का पूरा याद ही कर रखा हो तो उसे मिटाना संभव नहीं होता | हर याद कर चुके व्यक्ति की हत्या कर डालेंगे तभी वो पूरी तरह ख़त्म होगा | एक भी अगर बचा रह गया तो वो किसी ना किसी को सिखा देने में कामयाब हो जायेगा | गुरुकुलों और अखाड़ों की परम्पराओं को तोड़ने के लिए हर घृणित षडयंत्र रचने के वाबजूद गोर साहब और उनके ये भूरे गुलाम नाकाम ही रहे |


इन तथाकथित दल हित चिंतकों और आयातित विचारधारा वाले प्रख्यात कहे जाने वाले नारीवादियों ने बड़े प्यार से जिनका नाम मनु-स्मृति इरानी रखा है उन्होंने कुछ दिन पहले एक फोटो लगाने का अभियान और चला दिया | उन्होंने हस्तशिल्प और हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए हथकरघा से निर्मित साड़ी में अपनी तस्वीर डाल दी | सोशल मीडिया पर ये एक मुहीम की तरह जब शुरू हुआ तो कई महिलाओं ने इसमें शिरकत की | इसी कड़ी में चेन्नई के लॉयला कॉलेज की एक शिक्षिका ऐश्वर्या मानिवान्नन ने तस्वीर के बदले अपना विडियो डाला | वो सिलम्वम नाम से जाने जाने वाली लाठी चलाने की कला में भी अभ्यस्त हैं | उनका विडियो वायरल हो चला है |


याद दिलाते चलें, कि इस दौर में भारत में रानी चेनम्मा, k के विरुद्ध लड़ रही थी | इसी दौर में रानी अबक्का पुर्तगालियों के खिलाफ लड़ रही थी | इसके बाद रानी लक्ष्मीबाई की पांच हज़ार महिलाओं की सैन्य टुकड़ी थी | बाकी तथाकथित नारीवादियों के हिसाब से हिन्दुओं में नारी को पैर की जूती और पश्चिम में आजादी की अवधारणा भी समझिये | काहे कि परसेप्शन (perception) और रियलिटी (reality) का फर्क तो हैएये है |

ये सारे पन्ने हमारी किताबों से गायब हो गए हैं | शुक्र है की रानी चेनम्मा और रानी लक्ष्मीबाई ज्यादा पुराने समय की नहीं हैं | लोक कथाओं ने इन्हें भारत के कल्पित इतिहास में विलुप्त होने से बचा लिया |

✍🏻आनन्द कुमार