शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

मध्य एशिया मध्य एशिया का जल संभर इलाका A द्रोणी

 तारीफ द्रोणी या तारिम बेसिन मध्य एशिया में स्थित एक विशाल बंद जलसंभर इलाका है जिसका क्षेत्रफल ९०६,५०० वर्ग किमी है (यानि सम्पूर्ण भारत का लगभग एक-चौथाई क्षेत्रफल)।[1] वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में तारिम द्रोणी चीनी जनवादी गणराज्य द्वारा नियंत्रित श़िंजियांग उइग़ुर स्वराजित प्रदेश नाम के राज्य में स्थित है। तारिम द्रोणी की उत्तरी सीमा तियाँ शान पर्वत श्रंखला है और दक्षिणी सीमा कुनलुन पर्वत श्रंखला है। कुनलुन पर्वत श्रंखला तारिम द्रोणी के इलाक़े को दक्षिण में स्थित तिब्बत के पठार से विभाजित करती है। द्रोणी या जलसंभर उस भौगोलिक क्षेत्र को कहते हैं जहाँ वर्षा अथवा पिघलती बर्फ़ का पानी नदियों, नेहरों और नालों से बह कर एक ही स्थान पर एकत्रित हो जाता है। भारत में यमुना का जलसंभर वह क्षेत्र है जहाँ यमुना नदी में विलय हो जाने वाले सारे नदी नाले फैले हुए है और जिसके अंत से केवल यमुना नदी ही निकास करती है। बंद जलसंभर ऐसा जलसंभर होता है जिसमें वर्षा अथवा पिघलती बर्फ़ का पानी एकत्रित हो कर किसी नदी के ज़रिये समुद्र या महासागर में बहने की बजाय किसी सरोवर, दलदली क्षेत्र या शुष्क क्षेत्र में जाकर वहीँ रुक जाता है। अंग्रेज़ी में "द्रोणी" को "बेसिन" (basin), "जलसंभर" को "वॉटरशॅड" (watershed) या "कैचमेंट" (catchment) और बंद जलसंभर को "एनडोरहेइक बेसिन" (endorheic basin) कहा जाता है। तारिम द्रोणी का अधिकतर क्षेत्र रेगिस्तानी है और हलकी आबादी वाला है। यहाँ ज़्यादातर लोग उइग़ुर और अन्य तुर्की जातियों के हैं। इस क्षेत्र का उत्तर भारत और पाकिस्तान के साथ गहरा ऐतिहासिक और आनुवंशिकी (यानि जॅनॅटिक) सम्बन्ध है। यहाँ पर पाई गई लगभग सारी प्राचीन लिखाई खरोष्ठी लिपि में है, बोले जाने वाली प्राचीन भाषाएँ तुषारी भाषाएँ थीं जो भाषावैज्ञानिक दृष्टि से हिन्द-आर्य भाषाओं की बहनें मानी जाती हैं और जितने भी प्राचीन शव मिले हैं उनमें हर पुरुष का आनुवंशिकी पितृवंश समूह आर१ए१ए है जो उत्तर भारत के ३०-५०% पुरुषों में भी पाया जाता है, लेकिन पूर्वी एशिया की चीनी, जापानी और कोरियाई आबादियों में और पश्चिमी एशिया की अरब आबादियों में लगभग अनुपस्थित है।

तारिम द्रोणी

बुधवार, 17 अगस्त 2022

प्राचीन भारत के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन)

 प्राचीन भारत के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) 

Important Types Of Ancient Pottery


®मृदभांड


मृदा से निर्मित बर्तन ( मृदभांड ) पुरातात्विक स्रोतों की जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं। ताम्र काल में निर्मित पीले गेरू रंग के मृदभांड (OCP), हड़प्पा काल के काले व लाल मृदभांड (BRW), उत्तर वैदिक काल के चित्रित धूसर मृदभांड (PGW) तथा उत्तरी काले मृदभांड (NBPW) से मौर्यकाल की पहचान की जाती है। मृदभांड देश के विभिन्न स्थलों से प्राप्त हुए हैं, जो भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को जानने व समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।पुरातत्व में मिट्टी के बर्तनों के विश्लेषण को लागू करके पुरातत्व संस्कृति का अध्ययन किया जाता है, क्योंकि मिट्टी के बर्तन टिकाऊ होते हैं और पुरातात्विक स्थलों पर लंबे समय तक बचे रहते हैं जबकि अन्य वस्तुएं सड़ जाती हैं या नष्ट हो जाती हैं।


प्राचीन भारत के मृदभांड की सूची


®हड़प्पा युग = काला और लाल बर्तन


®प्रारंभिक वैदिक काल = गेरू रंग के बर्तन (OCP)


®उत्तर वैदिक काल = चित्रित ग्रे वेयर (PGW)


®पूर्वमौर्य युग= नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW)


®मौर्य युग  = NBPW


®परवर्ती मौर्य = काल लाल मृदभांड


®गुप्त काल = लाल मृदभांड


1 - ब्लैक एंड रेड वेयर कल्चर (BRW)


हड़प्पा युग के मिट्टी के बर्तनों को मोटे तौर पर दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है – सादे मिट्टी के बर्तन और चित्रित मिट्टी के बर्तन। चित्रित मिट्टी के बर्तनों की विशेषता दो सतही रंग हैं: आंतरिक और बाहरी रिम पर काला और बाहरी पर लाल। इसमें पृष्ठभूमि को चित्रित करने के लिए लाल रंग का उपयोग किया गया था और लाल रंग की पृष्ठभूमि पर डिजाइन और आंकड़े बनाने के लिए चमकदार काले रंग का उपयोग किया गया था।

ब्लैक एंड रेड वेयर कल्चर (बीआरडब्ल्यू) उत्तरी और मध्य भारतीय उपमहाद्वीप की एक उत्तर कांस्य युग और प्रारंभिक लौह युग पुरातात्विक संस्कृति है।

मिट्टी के बर्तनों का उपयोग तीन मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता था:

सादे मिट्टी के बर्तनों का उपयोग घरेलू उद्देश्यों के लिए किया जाता था, मुख्य रूप से अनाज और पानी के भंडारण के लिए।

आम तौर पर आधे इंच से भी कम आकार के छोटे जहाजों का उपयोग सजावटी उद्देश्यों के लिए किया जाता था।

कुछ मिट्टी के बर्तनों को छिद्रित किया गया था – तल में एक बड़ा छेद और किनारों पर छोटे छेद। हो सकता है कि इनका इस्तेमाल शराब को छानने के लिए किया गया हो।


2 - गेरू रंग के बर्तनों की संस्कृति (OCP)


गेरू रंगीन मिट्टी के बर्तनों की संस्कृति (ओसीपी) भारत-गंगा के मैदान की दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व कांस्य युग संस्कृति (लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व) है, जो पूर्वी पंजाब से पूर्वोत्तर राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली हुई थी।

OCP जार, भंडारण जार, कटोरे और बेसिन के रूप में इस्तेमाल होता था।

यह ओसीपी संस्कृति परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के उत्तरार्ध के लगभग समकालीन थी और हो सकता है कि प्रारंभिक वैदिक संस्कृति के साथ भी कुछ जुड़ाव हो।

OCP स्थलों पर तांबे की आकृतियों और वस्तुओं के उत्पादन का प्रमाण मिलता है इसलिए इसे “कॉपर होर्ड कल्चर” के रूप में भी जाना जाता है।

यह एक ग्रामीण संस्कृति है और इसमें चावल, जौ और फलियां की खेती के प्रमाण हैं।

उनके पास मवेशी, भेड़, बकरी, सूअर, घोड़े और कुत्तों के पशुचारण का प्रमाण भी वे तांबे और टेराकोटा के गहनों का इस्तेमाल करते थे।

जानवरों की मूर्तियाँ भी मिली हैं।


3 - चित्रित ग्रे वेयर (PGW)


पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) संस्कृति पश्चिमी गंगा के मैदान और घग्गर-हकरा घाटी की लौह युग की संस्कृति है, जो लगभग 1200 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक चली थी।

चित्रित ग्रे वेयर साइट कृषि और पशुचारण के विकास को प्रकट करते हैं। वे भारत के उत्तरी भाग में बड़े पैमाने पर जनसंख्या वृद्धि दर्शाते हैं।

उत्तर भारत में लौह युग पेंटेड ग्रे वेयर कल्चर के साथ जुड़ा हुआ था, और दक्षिण भारत में यह मेगालिथिक दफन टीले से जुड़ा था।

पेंटेड ग्रे वेयर कल्चरल फेज के बाद नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर कल्चर (NBPW) आता है, जो महाजनपद और मौर्य काल से जुड़ा है।


4 - उत्तरी काला पॉलिश वेयर (NBPW)


मौर्य काल के मिट्टी के बर्तनों को आमतौर पर नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) कहा जाता है।

नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर भारतीय उपमहाद्वीप की एक शहरी लौह युग की संस्कृति थी।

इसका समय अवधि 700-200 ईसा पूर्व तक तथा पेंटेड ग्रे वेयर कल्चर और ब्लैक एंड रेड वेयर कल्चर के बाद का है ।

यह वैदिक काल के अंत में लगभग 700 ईसा पूर्व से विकसित हुआ था, और 500-300 ईसा पूर्व में चरम पर था।

काले रंग और अत्यधिक चमकदार फिनिश इसकी विशेषता थी और आमतौर पर इसे लक्जरी वस्तुओं के रूप में उपयोग किया जाता था।

इसे अक्सर मिट्टी के बर्तनों के उच्चतम स्तर के रूप में जाना जाता है।


5 - लाल पॉलिश्ड वेयर (गुजरात)


रेड पॉलिश्ड वेयर (RPW) गुजरात में विशेष रूप से काठियावाड़ क्षेत्र में बड़ी मात्रा में पाया जाता है। आमतौर पर, इसमें खाना पकाने के बर्तन जैसे घरेलू रूप होते हैं, और यह लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है।

रेड पॉलिश्ड वेयर अक्सर नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBP) से जुड़ा होता है।


प्राचीन भारतीय मिट्टी के बर्तनों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य:-


®मिट्टी के बर्तनों का सबसे पहला प्रमाण मेहरगढ़ के नवपाषाण स्थल में मिला है, जो अब पाकिस्तान में स्थित है।


®प्राचीन काल से सबसे प्रसिद्ध मिट्टी के बर्तन पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) मिट्टी के बर्तन हैं, जो आमतौर पर भूरे रंग के होते हैं और वैदिक काल (1000-600 ईसा पूर्व) से संबंधित थे।


®देश के कुछ हिस्सों में लाल और काले मिट्टी के बर्तनों के प्रमाण मिलते हैं जो 1500-300 ईसा पूर्व के हैं। ये पश्चिम बंगाल के बड़े हिस्से में पाए गए।


®एक अन्य प्रकार के प्राचीन मिट्टी के बर्तन उत्तरी ब्लैक पॉलिश्ड वेयर थे, जो दो चरणों में बनाया गया था: पहला 700-400 ईसा पूर्व में और अगला 400-100 ईसा पूर्व के दौरान।


®ये चरण आंशिक रूप से मौर्य काल के साथ मेल खाते थे। इसके अलावा, भारत के दक्षिणी हिस्सों में, हम रूले मिट्टी के बर्तनों के अवशेष पाते हैं जो 200-100 ईसा पूर्व के हो सकते हैं।


®अधिकांश साक्ष्य पुडुचेरी के पास अरिकामेडु से मिले हैं।

हड़प्पा सभ्यता के दौरान लाल और काले मिट्टी के बर्तन प्रसिद्ध थे।


®सिंधु घाटी सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों को मोटे तौर पर दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है – सादा मिट्टी के बर्तन और चित्रित मिट्टी के बर्तन। चित्रित मिट्टी के बर्तनों को लाल और काली मिट्टी के बर्तनों के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि इसमें पृष्ठभूमि को चित्रित करने के लिए लाल रंग का उपयोग किया गया था और लाल रंग की पृष्ठभूमि पर डिजाइन और आंकड़े बनाने के लिए चमकदार काले रंग का उपयोग किया गया था। पेड़, पक्षी, जानवरों की आकृतियाँ और ज्यामितीय पैटर्न चित्रों के आवर्ती विषय थे।


®मौर्य काल के मिट्टी के बर्तनों को आमतौर पर नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) कहा जाता है। उन्हें काले रंग और अत्यधिक चमकदार फिनिश की विशेषता थी और आमतौर पर उन्हें लक्जरी वस्तुओं के रूप में उपयोग किया जाता था।


Rahul Ahir

रविवार, 7 अगस्त 2022

गोमुखीलक्षणम्



सनातन परम्परा में प्रयुक्त सभी वस्तु आदि के शास्त्रीय स्वरूप निर्धारित हैं। सभी सम्प्रदायों में जप का विधान है। जपार्थ माला को गोमुखी के अन्दर रखना अनिवार्य है। शान्त्यर्थ जप के समय गोमुखी से तर्जनी को बाहर करके मणिबन्धपर्यन्त हाथ को अन्दर रखने का विधान है।


प्रकृत में #गोमुखी के शास्त्रीय लक्षण पर विचार किया जाता है। #गोमुखी_माने_गौ_के_मुख_जैसा_वस्त्र ।


"वस्त्रेणाच्छाद य च करं दक्षिणं यः सoदा जपेत्

तस्य स्यात्सफलं जाप्यं तद्धीनमफलं

अत एव जपार्थ सा गोमुखी ध्रियते जनै: स्मृतम् ।।

(आ.सू. वृद्धमनु)


 गोमुखी से अतिरिक्त आधुनिक झोली में मणिबन्धपर्यन्त दायें हाथ को ढँकना सम्भव नहीं है।


गोमुखादौ ततो मालां गोपयेन्मातृजारवत् कौशेयं रक्तवर्णं च पीतवस्त्रं सुरेश्वरि ।। 

अथ कार्पासवस्त्रेण यन्त्रतो गोपयेत्सुधीः वाससाऽऽच्छादयेन मालां सर्वमन्त्रे महेश्वरि ।।

न कुर्यात्कृष्णवर णं तु न कुर्याद्वहुवर्णकम्।

न कुर्याद्रोमजं वस्त्रमुक्तवस्त रेणगोपयेत्।।"


(#कृत्यसारसमुच्चय) 


सूती वस्त्र का गोमुखादि कौशेय, रक्त अथवा पीत वर्ण का हो। काला, हरा, नीला, बहुरङ्गी या रोमज न हो।


पुन: इसके विशेष मान भी हैं👇👇


"चतुर्विंशाङ्गुलमितं पट्टवस्त्रादिसम भवम् 

निर्मायाष्टाङ लिमखं ग्रीवायांषड्दशाङ्गुलम् ।

ज्ञेयं गोमुखयन्त्रञ्च सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ।

तन्मुखे स्थापयेन्मालां ग्रीवामध्यगते करे

प्रजपेद्विधिना गुह्यं वर्णमालाधिकं प्रिये ।

निधाय गोमुखे मालां गोपयेन्मातृजारवत्


(#मुण्डमालातन्त्र)


२४ अङ्गुल परिमित पट्टवस्त्रादि से निर्माण करे, जिसमें ८ अङ्गुल का मुख और १६ अङ्गुल की ग्रीवा हो । गोमुखवस्त्र के मुख से माला को प्रवेश कराये और ग्रीवा के अभ्यन्तर में हाथ को रखकर गोपनीयता से यथाविधि जप करे ।


इसी प्रकार के अनेक आगमप्रमाण हैं। आधुनिक झोली की शास्त्रीयता उपलब्ध नहीं होती है प्रचुरमात्रा में कुछ गोविरोधियों ने किसी भारतीय पन्थविशेष में प्रवेश कर अतिशय भक्ति का अभिनय दिखाकर पवित्र #गोमुखी के बदले अवैध *#झोली का दुष्प्रचार कर दिया और दुर्भाग्य से यहीं के बड़े-बड़े धर्मोपदेशकों ने भी चित्र-विचित्र उस अशास्त्रीय वस्त्र को स्वीकार कर लिया।


शास्त्र का नाम लेकर चलनेवाले महाशय यदि गोमुखी के बदले आधुनिक झोली ही रखना चाहते हैं तो वे अवश्य ही इस #झोली की #शास्त्रीयता #प्रदर्शित #करें। किमधिकम्.....?


-साभार

भगवान विष्णु के १६ नामों का स्मरण समय

 

प्रस्तुति -/रेणु दत्ता / आशा सिन्हा


*औषधे चिंतयते विष्णुं ,*

*भोजन च जनार्दनम |*

*शयने पद्मनाभं च*

*विवाहे च प्रजापतिं ||*


*युद्धे चक्रधरं देवं*

*प्रवासे च त्रिविक्रमं |*

*नारायणं तनु त्यागे*

*श्रीधरं प्रिय संगमे ||*


*दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं*

*संकटे मधुसूदनम् |*

*कानने नारसिंहं च*

*पावके जलशायिनाम ||*


*जल मध्ये वराहं च*

*पर्वते रघुनन्दनम् |*

*गमने वामनं चैव*

*सर्व कार्येषु माधवम् |*


*षोडश एतानि नामानि*

*प्रातरुत्थाय य: पठेत ।*

*सर्व पाप विनिर्मुक्ते,*

*विष्णुलोके महियते ।।*


(१) औषधि लेते समय - विष्णु ;

(२) भोजन के समय - जनार्दन ;

(३) शयन करते समय - पद्मनाभ :

(४) विवाह के समय - प्रजापति ;

(५) युद्ध के समय - चक्रधर ; 

(६) यात्रा के समय - त्रिविक्रम ;

(७) शरीर त्यागते समय - नारायण; 

(८) पत्नी के साथ - श्रीधर ;

(९) नींद में बुरे स्वप्न आते समय - गोविंद ;

(१०) संकट के समय - मधुसूदन ;

(११) जंगल में संकट के समय - नृसिंह ;

(१२) अग्नि के संकट के समय - जलाशयी ;

(१३) जल में संकट के समय - वाराह ;

(१४) पहाड़ पर संकट के समय - रघुनंदन;

(१५) गमन करते समय - वामन; 

(१६) अन्य सभी शेष कार्य करते समय - माधव


*हरे राम् हरे राम् राम् राम् हरे हरे*

*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*

*ॐ विष्णवै नमः *

गुरुवार, 9 जून 2022

लिच्छवी । शाक्य-गौतम क्षत्रिय वंश

 #क्षत्रियों में एक वंश पाया जाता है #लिच्छवी । शाक्य-गौतमों के बाद शायद यही क्षत्रियों का सबसे प्राचीन वंश है या यूं कह लीजिए दोनों एक ही वंश की दो भिन्न शाखाएं हैं। 

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       वैसाली गणराज्य के निर्माता होने के कारण क्षत्रियों के इस वंश को इतिहास में वैस/बैस नाम से भी जाना जाता है।


        नेपाल के अंशुवर्मन और सम्राट हर्षवर्धन वैस जैसी अनेकों विभूतियां इसी महान लिच्छवी कुल की देन हैं ।इन्हीं अनगिनत विभूतियों में से एक अमर शहीद राजा राव रामबख्श सिंह जी का आज बलिदान दिवस है। 

       लिच्छवी कुल-गौरव राजा राव रामबख्श सिंह डौंडियाखेड़ा रियासत के राजा थे 1857 में जब स्वतंत्रता का बिगुल बजा ।तो अवध-पूर्वांचल के सभी राजाओं/जमीदारों की भांति रणोन्मत्त राजा राव रामबख्श सिंह भी संग्राम में कूद पड़े। 

         हमारे यहाँ एक लोकश्रुति है कि यदि सकुशल जीवन जीना चाहते हैं। तो भूरे रंग की आंख वाले ठाकुर से कभी नहीं उलझना चाहिए ।कहते हैं कि ऐसी आंखों वाला ठाकुर शेर की मानिंद अत्यधिक रौद्र स्वभाव का होता है ।कब झपट्टा मारकर आपके जीवन का अंत कर दें कुछ पता नहीं चलता। 

       ब्रिटिश हुकूमत को नाकों चने चबवा देने वाले भूरी आंखों के राजा राव रामबख्श सिंह ने अपने रणकौशल से बताया कि कोई लोकश्रुति यूँ ही अकारण नहीं बन जाती।

        रायबरेली के राजा राणा बेनीमाधव सिंह वैस और डौंडियाखेड़ा के राजा राव रामबख्श सिंह वैस के नेतृत्व में लिच्छवियों ने कानपुर-लखनऊ मार्ग में ब्रिटिश सेनापतियों को कई युद्धों में पराजित किया ।

      इसके बाद राजा राव रामबख्श सिंह ने दिलेश्वर मंदिर के पीछे छिपे जनरल डिलाफ़स सहित 12 अंग्रेजों को जिंदा जला दिया।बौखलाई ब्रिटिश सेना ने जनरल हैवलॉक के नेतृत्व में जून 1857 और नवम्बर 1858 में उनके किले पर दो-दो बार तोपों से आक्रमण किया।

       तोपों के अनवरत प्रहार से राजा राव रामबख्श सिंह का किला तो नेस्ताबूत हो गया ।लेकिन हैवलॉक ये देखकर हैरान था कि रामबख्श सिंह चमत्कारिक रूप से किले से सुरक्षित निकल सेमरी पहुंच गए ।

      क्रोधोन्मत्त ब्रिटिश सेना सेमरी की ओर बढ़ गई। जहां उसे जामिनपुर, सिरियापुर, बजौरा के त्रिकोणीय क्षेत्र में लिच्छवियों की भयंकर मोर्चाबंदी का सामना करना पड़ा। 

     आधुनिक हथियारों एवं तोपों से युक्त ब्रिटिश सेना बेहद कठिन एवं लंबे चले इस युद्ध में संसाधनहीन लिच्छवियों को पराजित करने में तो सफल हो गई ।

     किंतु राजा राव रामबख्श सिंह एकबार फिर चमत्कारिक रूप से निकल बनारस पहुंच गए और वहां सन्यासी का वेश धारण कर पुनः सेना संगठित करने लगे ।

      लेकिन इस देश का दुर्भाग्य कि चिरकाल से ही इस देश के लोगों से ही इस देश को दो स्वर मिले, कानपुर कैंट में अंग्रेजो को रसद पहुंचाने वाले चंदन लाल खत्री ने अक्टूबर में 1859 में राजा राव रामबख्श सिंह की अंग्रेजों से मुखबिरी कर दी ।

     इस विश्वासघात के कारण एक बार फिर युद्ध झेडने की तैयारी कर रहे राजा राव रामबख्श सिंह अपने सहयोगियों शिवरतन सिंह, चंद्रिका बख्श सिंह, जगमोहन सिंह, लाख सिंह, रामप्रसाद सिंह, यदुनाथ सिंह, बिहारी सिंह, राम सिंह, छेदी सिंह जैसे अपने तमाम साथियों समेत गिरफ्तार कर काशी से रायबरैली ले आये गए ।

      जहां 28 दिसम्बर 1859 के दिन सभी को फांसी दे दी गई। राजा राव रामबख्श सिंह ने फांसी के फंदे पर भी अंग्रेजों को हैरान किया ।

      उन्हें लगातार तीन बार फांसी दी गई ।लेकिन हर बार फांसी का फंदा टूट जाता ।जैसे वो अंग्रेजो के हाथों मरने को ही तैयार न थे ।फिर स्वयं अपने हाथों से ही फांसी का फंदा बनाया और इस देश पर कुर्बान हो गए।

     हम क्षत्रिय हैं ।इतिहास गवाह है कि हमारे लिए सर्वदा प्राणों का मोह त्याज्य रहा। हमें अफसोस है तो बस इसका कि सबाल्टर्न हिस्ट्री के नाम पर क्रिएट की गई वृंदावन लाल वर्मा की कपोल-कल्पना जिस झलकारी बाई का कभी कोई अस्तित्व ही नहीं रहा ।

      वोटों के लिए उसे इस देश के प्रधानमंत्री तक याद करते हैं। लेकिन जिन बलिदानियों ने इस देश पर अपना जीवन होम कर दिया। आज उनका कोई नाम लेवा तक नहीं ।

     क्योंकि हम ठाकुरों का कोई वोटबैंक नहीं ।इसलिए हमारी कुर्बानी भी आज बिल्कुल मायने नहीं रखती ।वो भी तब जब पूरी दुनिया में हमारे राजनेता/कवि डींगें मारते हों कि हमने दुनिया को पहला गणतंत्र दिया ।

     लेकिन सत्य ये है कि हम अपने देश में ही उस गणतंत्र के निर्माताओं को आदर देना तो छोड़िए ।उन्हें उनके बलिदान दिवस पर भी स्मरण नहीं करते। 

      राजा राव रामबख्श सिंह के बलिदान को इस देश की सरकारों ने भले ही कभी न याद किया हो ।लेकिन 2013 में जैसे ही एक साधु शोभन सरकार ने राजा राव रामबख्श सिंह के किले में लाखों टन सोना होने का दावा किया ।

      पूरा सरकारी तंत्र उनके किले की खुदाई के लिए पहुंच गया और उनका किला जो पहले ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था ।सोना पाने के लोभ में सरकारों ने उसका भी उत्खनन कर किले को पूरी तरह से खंडहर में तब्दील कर दिया।

      तब से लेकर आज तक न उनके किले की कोई सुधि ली गई और न ही अमर शहीद राजा राव रामबख्श सिंह की। समझ नहीं आता कितने बलिदानों से इस देश का पेट भरेगा ।क्षत्रियों ने सब तो कुर्बान कर दिया अपना,खैर...


#अमर_शहीद_राजा_राव_रामबख्श सिंह जी को #बलिदान दिवस पर नमन...नमो बुद्धाय🙏💐


#लिच्छवी #वैसाली #वैस #राजा_राव_रामबख्श_सिंह


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तस्वीर- राजा साहब के डौंडियाखेड़ा किले में बने मंदिर की है।


#राजन्य_क्रॉनिकल्स_टीम

मंगलवार, 7 जून 2022

भारत की जल संस्कृति-5

 


जलविज्ञान के आविष्कर्ता ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ और उनके जलचिकित्सा मंत्र


लेखक:- डॉ. मोहन चन्द तिवारी

विश्व की प्राचीनतम सभ्यता वैदिक सभ्यता का उद्भव व विकास सिन्धु-सरस्वती और गंगा-यमुना की नदी-घाटियों में हुआ. इसी लिए इस संस्कृति को ‘नदीमातृक संस्कृति’ के रूप में जाना जाता है.ऋग्वेद के मंत्रों में यह प्रार्थना की गई है कि ये मातृतुल्य नदियां लोगों को मधु और घृत के समान पुष्टिवर्धक जल प्रदान करें-


“सरस्वती सरयुः सिन्धुरुर्मिभिर्महो

महीरवसाना यन्तु वक्षणीः.

देवीरापो मातरः सूदमित्न्वो

घृत्वत्पयो मधुमन्नो अर्चत..”

            – ऋ.,10.64.9


वैदिक कालीन भारतजनों ने ही सरस्वती नदी के तटों पर यज्ञ करते हुए इस ब्रह्म देश को सर्वप्रथम ‘भारत’ नाम प्रदान किया था जैसा कि ऋग्वेद के इस मन्त्र से स्पष्ट है-


“विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्.”

                          -ऋग्वेद,3.53.12


सरस्वती नदी के तटों पर रची बसी भारत जनों की इस सभ्यता को सारस्वत सभ्यता और वहां की नदीमातृक संस्कृति को ‘भारती’ के रूप में पहचान देने वाली भी यदि कोई नदी है तो वह सरस्वती नदी ही है जिसका ऐतिहासिक प्रमाण ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में स्वयं मिल जाता है-


“सरस्वती साधयन्ती धियं न

इलादेवी भारती विश्वतूर्तिः.”

           – ऋग्वेद‚2.3.8


भारत के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से वेदों के मंत्रद्रष्टा ऋषियों में ‘सिन्धुद्वीप’ सबसे पहले जलविज्ञान के आविष्कारक ऋषि हुए हैं.ऐतिहासिक दृष्टि से ‘सिन्धुद्वीप ऋषि की पहचान भारत वंशी इक्ष्वाकुवंश के 47वीं पीढ़ी में हुए सूर्यवंशी राजा अम्बरीष के पुत्र के रूप में की जा सकती है-

ऋग्वेद का एक सूक्त‚ अथर्ववेद के तीन सूक्त‚ यजुर्वेद के15 मंत्रों और सामवेद के चार मंत्रों का ऋषित्व ‘सिन्धुद्वीप’ को प्राप्त है. सिन्धुद्वीप ऋषि के इन सभी सूक्तों और मंत्रों की विशेषता है कि इनके देवता ‘आपो देवता’ हैं.


जल विज्ञान की दृष्टि से ‘सिन्धुद्वीप’ ही वे सर्वप्रथम भारतीय चिन्तक थे जिन्होंने जल के प्रकृति वैज्ञानिक‚ सृष्टि वैज्ञानिक‚ मानसून वैज्ञानिक‚कृषि वैज्ञानिक‚ दुर्ग वैज्ञानिक तथा ओषधि वैज्ञानिक महत्त्व को वैदिक संहिताओं के काल में ही उजागर कर दिया था. प्राकृतिक जलचक्र अर्थात् ‘नैचुरल सिस्टम ऑफ हाइड्रोलौजी’ जैसे आधुनिक जल विज्ञान की अवधारणा का भी सर्वप्रथम आविष्कार सिन्धुद्वीप ऋषि ने ही किया था.


बहुत कम लोग जानते कि आज ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव की आराधना का जो मंत्र प्रचलित है वस्तुतः वह सिन्धुद्वीप ऋषि का ही जलदेवता विषयक मंत्र है जिसमें प्रार्थना की गई है कि जिस जल को हम प्रतिदिन पीते हैं वह शुद्ध हो‚स्वास्थ्य रक्षक हो और कल्याणकारी हो-


“शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये.

शं योरभि स्रवन्तु नः. -ऋग्वेद‚10.9.4

जल चाहे सूखाग्रस्त प्रांत रेगिस्तान का हो या सिन्धु नदी का‚ समुद्रों‚ सरोवरों‚ कूपों तथा घड़ों में विद्यमान सभी प्रकार के जलों के शुद्ध होने की कामना जलवैज्ञानिक ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ ने अपने ‘आपो देवता’ सूक्त में की है –


“शं न आपो धन्वन्या३:शमुशन्त्वनूप्याः.

शं नः खनित्रिमा आपः शमु याः कुम्भ

आभृताः शिवा नः सन्तु वार्षिकीः..”

                      – अथर्व.‚1.6.4


अर्थात् सूखाग्रस्त प्रांतों का जल हमारे लिए कल्याणकारी हो. जलमय देशों का जल हमें सुख प्रदान करे.भूमि से खोद कर निकाला गया कुएं नौलों आदि का जल हमारे लिए सुखकारी हो. पात्र में रखा हुआ जल हमें शान्ति प्रदान करे और वर्षा से प्राप्त जल हमारे जीवन में सुख शान्ति की वृष्टि करने वाला बने.


जल का निवास पृथ्वी पर है. अन्तरिक्ष में भी जल व्याप्त है. समुद्र, जल का आधार है तथा समुद्र से ही जल, वाष्प बन कर वर्षा के रूप में धरती पर आता है.अथर्ववेद में कहा गया है कि जल ही परमौषधि है. जल रोगों को दूर करता है.जल सब बीमारियों का नाश करता है.इसलिये, यह तुम्हें भी,सभी कठिन बीमारियों से दूर रखे-


“आपो इद्धा उ भेषजोरापो अभीव चातनीः.

आपः सर्वस्य भषजोस्तान्तु कृण्वन्तु भेषजम्॥”

-अथर्ववेद,3.7.5

वेद’ मानव जाति के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं. इनकी भाषा भी बहुत पुरातन होने के कारण दुर्बोध है.वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने ‘जल’ की दिव्य उत्पत्ति के विज्ञान को किस तरह आत्मसात किया और उसके मन्त्रों का अपने दैनिक जीवन के किन-किन कार्यों में ‘विनियोग’ किया, यह जाने बिना हमारा भारत की जल संस्कृति से सम्बंधित ज्ञान अपूर्ण ही रहेगा.अतः यहां जन सामान्य की जानकारी हेतु वेदों से संकलित जल-सम्बंधी कुछ मन्त्र दिए जा रहे हैं जिन्हें ‘आपो देवता-सूक्त’ के नाम से भी जाना जाता है.

भारत में जल और वनस्पतियों को अभिमंत्रित करके रोग शान्ति की परंपरा भी हजारों वर्षों से चली आई है. इस दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद के जल चिकित्सा से सम्बन्धित ये ‘अपांभेषज’ मंत्र भारतीय जलविज्ञान और आरोग्यशास्त्र की अमूल्य धरोहर हैं.

ऋग्वेद के दसवें मंडल के नौवें सूक्त में ‘सिन्धुद्वीप’ ऋषि के ‘अपांभेषज’ के नाम से प्रसिद्ध ‘जल चिकित्सा’ से सम्बन्धित आरोग्य और आयुष्य प्रदान करने वाले ऐसे नौ मंत्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं.सिन्धुद्वीप ने चन्द्रमा की रश्मियों से संशोधित जल और सूर्य की रश्मियों से वाष्पीभूत जल को ‘भेषज’ अर्थात् ओषधि तुल्य माना है.वैदिक पद्धति से विनियोग सहित यदि इन मन्त्रों का विधिवत उच्चारण करते हुए जल को अभिमंत्रित किया जाए तो उससे अनेक प्रकार के दुस्साध्य रोग भी शांत हो सकते हैं.

भारत में जल और वनस्पतियों को अभिमंत्रित करके रोग शान्ति की परंपरा भी हजारों वर्षों से चली आई है. इस दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद के जल चिकित्सा से सम्बन्धित ये ‘अपांभेषज’ मंत्र भारतीय जलविज्ञान और आरोग्यशास्त्र की अमूल्य धरोहर हैं. ऋग्वेद के ‘अपांभेषज’ नामक नौ  मंत्र हिंदी भावार्थ सहित इस प्रकार हैं-


1. “आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन.

महे रणाय चक्षसे..” -ऋग्वेद,10.9.1

-हे आपः! (जलदेवता) आप प्राणीमात्र को सुख देने वाले हैं. सुखोपभोग एवं संसार में रमण करते हुए,हमें उत्तम दृष्टि की प्राप्ति हेतु पुष्ट करें.


2.”यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेहः नः.

उशतीरिव मातरः..” -ऋग्वेद,10.9.2

-हे जलदेवता! आपका स्नेह उमड़ता ही रहता है, ऐसी माताओं की भाँति, आप अपने सबसे अधिक कल्याणप्रद रस (आनन्द) में हमें भी सम्मिलित करें.


3.”तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ.

आपो जनयथा च नः..” -ऋग्वेद,10.9.3

-हे जल के दिव्य प्रवाह! अन्न आदि उत्पन्न कर प्राणीमात्र का पोषण करने वाले आपो देवता! हम आपका सान्निध्य पाना चाहते हैं. हमारी अधिकतम वृद्धि हो.

4.“शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये.

शं योरभि स्रवन्तु नः. -ऋग्वेद‚10.9.4

-हे दिव्यगुणों से युक्त आपः (जल) हमारे लिए हर प्रकार से कल्याणकारी और हर्षकारक  हों. वह दिव्य जल हमारी आकांक्षाओं की पूर्ति करके हमें आरोग्य प्रदान करे.


5.”ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्.

अपो याचामि भेषजम्..” -ऋग्वेद,10.9.5

-हे व्याधि निवारक दिव्य गुणों से युक्त जल देवता! हम आपका आवाहन करते हैं. हम औषधि रूप दिव्य जल से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें सुख-समृद्धि प्रदान करे.


6.“अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा.

अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. -ऋग्वेद,10.9.6

– हे दिव्य ‘आपः’! (जल देवता!) ‘सोम’ यानी चन्द्रमा ने हमें बताया है कि आप हमारे लिए हर प्रकार से औषधीय गुणों से युक्त हैं.उसमें कल्याणकारी अग्नि भी विद्यमान रहती है.


7.”आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम.

ज्योक्च सूर्यं दृशे॥” -ऋग्वेद,10.9.7

-हे जल देवता आपः! मैं आपकी कृपा से दीर्घकाल तक सूर्य को देखता रहूं अर्थात् दीर्घ आयु प्राप्त करुं. आप मेरे शरीर के लिए आरोग्यवर्धक दिव्य औषधियाँ प्रदान करते रहो.

8.इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि.

यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्॥”

-ऋग्वेद,10.9.8

-हे ‘आपः’! (जल देवता!) मुझ में जो कुछ दुष्कर्म हैं, मैंने जो द्रोह, विश्वासघात किया है या मैंने जो अपशब्द कहे हैं या मैंने जो झूठ बोला है,उन सबको जल बहा ले जाए.


9. “आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि.

      पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा॥”

                           -ऋग्वेद,10.9.9


आज हमने जल में प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान कर लिया है. इस प्रकार जल में प्रवेश करके हम रस से आप्लावित (आनन्दित) हो गए हैं. हे पयस्वान्! हे अग्निदेव! आप हमें वर्चस्वी बनाएँ. हम आपका स्वागत करते हैं.

✍🏻मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित आलेख

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

बिहार में कैसे बसे अम्बष्ठ कायस्थ्य

 अंबष्ट बिहार में आकर कैसे बसे?

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 भारत पर आक्रमण के पूर्व सिकंदर ने सीमावर्ती राजा आंबि को सूचित किया की या तो वह समर्पण करे या युद्ध। निज स्वार्थ में आम्बि ने समर्पण करना तय किया, लेकिन उसके बहादुर सत्रपों को यह स्वीकार नहीं हुआ। उन बहादुर सत्रपों में पोरू के बारे में आप सब जानते हैं। मगर आम्बि के अंबष्ट सत्रप के युद्ध की कहानी आपमें से अधिकतर लोग नहीं जानते हैं। उन्होंने भी पोरू की तरह समर्पण स्वीकार नहीं किया। 

 सिकन्दर के साथ अंबष्ट बड़े बहादुरी से लड़ कर भी पराज़ित हुए। पर इस युद्ध में सिकन्दर घायल हो गया था। क्षुब्ध हो उसने अंबाष्टों को आमूल नाश करने का आदेश अपनी सेना को दिया। संकट के इस विकराल घड़ी में जाति ने हथियार छोड़ आस पास के जन जीवन में विलुप्त होने का निश्चय किया। चेनब नदी के मुहाने से वह महाकाल यानि उज्जैन की ओर रवाना हो गए। 


अंबष्ट-सिकंदर युद्ध को दो महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने नज़दीक से देखा था। एक था सिकंदर का निज इतिहासकार, डीयोदोरस। दूसरा सिकंदर के युद्ध के तरीक़े को समझने के लिए छद्मवेश में उसकी सेना में छिपा चंद्रगुप्त, जिसने घनानंद को सत्ता से हटाने के बाद बहादुर अंबाष्टों को अपनी राजधानी में बसनें के लिए आमंत्रित किया।


चंद्रगुप्त के आमंत्रण पर वह मगध गए नदी के किनारे किनारे वाले रास्ते से। राजगृह के १०० कोस के अंदर फैले गाँव में चंद्रगुप्त ने उन्हें बसाया।उनका ख़ासघर इन गाँव के नाम पर पड़ा। 


मगध क्षेत्र में अम्बस्थों का  उपनाम/खासघर और मूल गांव निम्नानुसार है:


1. कोचगवें-- कोचगवां/कोचगांव

2.  डेढ़गवें-- डेढ़गवां

3. हरगवें-- हरगवां

4.  तेतरवें-- तेतरवां

5.  परबतिआर--परबती, ब्लाक काशीचक, जिला नवादा, बिहार

6.  मलदहिआर-- मलदह

7.  घोरसवें-- घोरसवां

8.  निमीआर-- निमी

9.  दत्तकुलिआर--  कुल

10. नन्दकुलिआर-- ननन्द कुल

11. गिरियार-- गिरियक/प्राचीन नाम गिरिया

12. मैजोरवार-- मैजरा

13. राजगृहार--राजगृह/राजगीर

14.  बिरनवें--बिरनवां, ब्लाक चंडी,जिला नालन्दा बिहार

15.  समैयार--समै

16.  मंजौरवार/मंजरवार--मंजौर

17.  मलतियार-- मलती

18.  बरदिहार-- बागी बरडिहा

19.  लोहरवें-- लोहरवां

20.  बडगवें-- बडगवा

21.  ओन्दवार-- ओन्दा

22. लोहरे-- ल़ोहरपुरा

23. मंजरवें-- मंजरवां

24. संदवार-- संदवा

25. जमुआर-- जमुआवां, ब्लाक वज़ीरगंज जिला गया बिहार

26. कसरे-- गांव कसर, ब्लाक अरियारी, जिला शेखपुरा बिहार

27. बरगवें-- बरगवां

28. गोरौरिआर/गौरियार-- गोरौर

29. कतरवार-- कतरपुर

30. पुरिआर-- पुरी

31. कटरिआर/कटरियार-- कटारी

32. कत्रीआर/कत्रीयार-- कत्री

33. बिलवार-- बिलारी

34. बरहरिआर-- बरहरि 

35. पचवरे-- पचवारा

36. बिशोखिआर-- बिजोखरि

37. बरिआर-- बरिआ कलान/खुर्द

38. चंडगवें-- चंडी

39.  बेढनवें-- बेढ़ना

40.  रुखीआर-- रुखी/पंचरुखी/कोशी रुखी

41. ओदन्तिआर (ओखन्डिआर?)-- ओदन्तपुरी (बिहारशरीफ)

42.  कुमारपटने-- कुम्हरार, पटना

43.  प्रभुपटने-- नौजरघाट, पटना सिटी

44.  नागपटने-- नागला,फतुहा

45.  करपटने-- पटना सैटेलाइट गांव

46.  पानपटने-- पटना सैटेलाइट गांव

47.  नेपटने-- पटना सैटेलाइट गांव


नवादा जिले में पडने वाले अन्य मूल गांव और उपनाम/खासघर

48. पचगवें-- पचगांव

49. बिसियत-- बिसियैत 

50. नरहटिआर-- नरहट

51. गेहिलवार-- गेहलौर

52. अत्रियार/त्रियार-- अत्रि 

53. मनवंश रतनमन--सौर(?)

54. सनोखरे/सोनखरे-- सनोखरा

55. कथोटवार-- कथोकारी


पटना (P) और अम्बा-कुटुम्बा (A) मध्य अम्बस्थों का मूल गांव और उपनाम/खासघर

56. मंदीलवार-- मंदील

57. भरथुआर-- भरथुआ

58. दराद-- दरार

59. सकरदिहार-- सकरडीह 

60.  महथा-- महथा

61. इंतहार/इतेहयार/ईतेहवार--इतवां (Itwan) हसपुरा


कुटुम्बा तहसील औरंगाबाद जिला अन्तर्गत सोन नदी के किनारे और उसके पास अम्बस्थ का मूल गांव और उपनाम/खासघर

62. धुंधुआर-- धुंधुआ

63. कसौटिआर--कसौटी तथा

64. जयपुरियार-- जयपुर


गया शहर के सैटेलाइट गांव जो अम्बस्थों का मूल गांव और उपनाम/खासघर

65. सनौटिआर-- सनौट/सोनौट

66. काकन्दवार-- चाकन्द

67. गयावर-- गया का सैटेलाइट गांव

68. गयादत्त-- गया का सैटेलाइट गांव

69. गयासेन-- गया का सैटेलाइट गांव

70. गजरे गयासेन-- गया का सैटेलाइट गांव


गया (चाकन्द-मानपुर) तथा अम्बा-कुटुम्बा (औरंगाबाद) के मध्य गांव जो अम्बस्थों का मूल गांव और उपनाम/खासघर

71. परैवार/परैयार-- परैया-खुर्द

72. कस्तुआर/कस्थुआर-- कस्ठा


पुराना गया जिला के अन्तर्गत पडने वाले मूलगांव तथा उपनाम/खासघर

73. त्रियार/तेरियार आदि-- अत्रि, गया जिला

74. दफ्थुआर/दफ्थुआर-- दब्थु (दफ्थु) हुलासगंज जहानाबाद 


अन्य खासघर का नाम जिससे इंगित होने वाले मूल गांव की पहचान अभी तक नहीं हो सकी है


01.  बेदसेन 

02. डुमरवें/डुमरसेन (डुमरे), ब्लॉक बिहारशरीफ, नालन्दा

03. बरतिआर, 

04. चारगवें

05. चखैआर/चखैयार, 

06. जरुहार

07. जमैयार,

08. जोरीहार, 

09. बेदसेन

10.  सरिआर, मूलगांव सरे, ब्लाक अस्थवां जिला नालन्दा

11. नहसेन,

12. लखैयार

13. रियार 

14. गजरे सेन, 

15. गजरे पानसेन, 

16. जेवार--जिआर (Jiar) ब्लॉक अस्थवां (नालन्दा)

17. शंखेरमन/संखेरमन, Manshankhre

18ए.शाण्डिल्यवार