गुरुवार, 23 सितंबर 2021

ईश्वर तुम्हारे पापो क़ो क्षमा करें

 🌹🌹कर्मों की सजा🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

       

एक भिखारी रोज एक दरवाजे पर जाता और भीख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदी_गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, 


कभी_कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें,एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर दे मारा,


 भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वह भिखारी के पीछे चलने लगा,भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जलील करता गालियाँ देता ,


 पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, अब अंधेरा हो चला था, भिखारी अपने घर लौट रहा था, सेठ भी उसके पीछे था, भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी, जो भिखारी की पत्नी थी, जैसे ही उसने अपने पति को देखा उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी, उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी, उसे देखते ही बुढिया बोली बस इतना ही और कुछ नही, और ये आपका सर कहा फूट गया ?


भिखारी बोला, हाँ बस इतना ही किसी ने कुछ नही दिया सबने गालिया दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सर फूट गया, भिखारी ने फिर कहा सब अपने ही पापों का परिणाम हैं, 


याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे, क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया, याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी, बुढिया की ऑखों में ऑसू आ गये और उसने कहा हाँ, कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे, कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जलील करते थे ।


कैसे हम उसे कभी_कभी मार और धकेल देते थे, अब बुढिया ने कहा हाँ सब याद है मुझे, कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था, जब भी वहाँ रोटिया मांगता मैंने बस उसे गालियाँ दी, एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया,और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे,


 मैं नही, आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी,फिर भिखारी ने कहा, पर मैं किसी को बद्दुआ नही देता, चाहे मेरे साथ कितनी भी ज्यादती क्यूँ ना हो जाए, मेरे लब पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता की ,


कोई और इतने बुरे दिन देखे, मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूं, क्यूकि उनको मालूम ही नही, वो क्या पाप कर रहें है, जो सीधा ईश्वर देख रहा हैं, जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते, इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती हैं ।


सेठ चुपके_चुपके सब सुन रहा था, उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी, बुढे_बुढिया ने आधी रोटी को दोनो मिलकर खाया, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गयें,


अगले दिन, वहाँ भिखारी भीख मांगने सेठ कर यहाँ गया, सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी, उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, माफ करना बाबा, गलती हो गयी, भिखारी ने कहा, ईश्वर तुम्हारा भला करे, और वो वहाँ से चला गया,सेठ को एक बात समझ आ गयी थी, इंसान तो बस दुआ_बद्दुआ देते है पर पूरी वो ईश्वर वो जादूगर कर्मो के हिसाब से करता हैं.।


#इस #जन्म में ना मिले #परभव में #मिलता है,,,,

अपने #अपने #कर्मों का फल #सबको #मिलता है,,,,

हो सके तो बस अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास ।।

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व / डॉओमप्रकाश पांडे

(लेखक अंतरिक्ष विज्ञानी हैं)


श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो शरीर को जीवात्मा को मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। मन कहाँ से आता है? कहा गया है चंद्रमा मनस: लीयते यानी मन चंद्रमा से आता है। यह भी कहा है कि चंद्रमा मनसो जात: यानी मन ही चंद्रमा का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है या फिर पागलपन चढ़ता है तो उसे अंग्रेजी में ल्यूनैटिक कहते हैं। ल्यूनार का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है। इसलिए हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं।

चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं। वह अन्न जब हम खाते हैं, उससे रस बनता है। रस से अशिक्त यानी रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। वीर्य से ओज बनता है। ओज से मन बनता है। इस प्रकार चंद्रमा से मन बनता है। इसलिए कहा गया कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। मन जब जाएगा तो उसकी यात्रा चंद्रमा तक की होगी। दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अ_ाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह 28 दिन की यात्रा होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।


चंद्रमा सोम का कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहते हैं। सोम सबसे अधिक चावल में होता है। धान हमेशा पानी में डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए चावल के आटे का पिंड बनाते हैं। तिल और जौ भी इसमें मिलाते हैं। इसमें पानी मिलाते हैं, घी भी मिलाते हैं। इसलिए इसमें और भी अधिक सोमत्व आ जाता है। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुआ स्थान है, वह शुक्र का होता है। शुक्र से ही हम जन्म लेते हैं और हम शुक्र ही हैं, इसलिए वहाँ कुश रखा जाता है। कुश ऊर्जा का कुचालक होता है। श्राद्ध करने वाला इस कुश रखे हाथों से इस पिंड को लेकर सूंघता है। चूंकि उसका और उसके पितर का शुक्र जुड़ा होता है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव से उसे आकाश की ओर देख कर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर फिर से ऊर्जावान हो जाते हैं और वे 28 दिन की यात्रा करते हैं। इस प्रकार चंद्रमा के तेरह महीनों में श्येन पक्षी की गति से वह चंद्रमा तक पहुँचता है। यह पूरा एक वर्ष हो जाता है। इसके प्रतीक के रूप में हम तेरहवीं करते हैं। गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं। इसलिए हर 28वें दिन पिंडदान किया जाता है। उसके बाद हमारा कोई अधिकार नहीं। चंद्रमा में जाते ही मन का विखंडन हो जाएगा।


पिंडदान कराते समय पंडित लोग केवल तीन ही पितरों को याद करवाते हैं। वास्तव में सात पितरों को स्मरण करना चाहिए। हर चीज सात हैं। सात ही रस हैं, सात ही धातुएं हैं, सूर्य की किरणें भी सात हैं। इसीलिए सात जन्मों की बात कही गई है। पितर भी सात हैं। सहो मात्रा 56 होती हैं। कैसे? इसे समझें। व्यक्ति, उसका पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध पितामह, अतिवृद्ध पितामह और सबसे बड़े वृद्धातिवृद्ध पितामह, ये सात पीढियां होती हैं। इनमें से वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश, अतिवृद्ध पितामह का तीन अंश, वृद्ध पितामह का छह अंश, प्रपितामह का दस अंश, पितामह का पंद्रह अंश और पिता का इक्कीस अंश व्यक्ति को मिलता है। इसमें उसका स्वयं का अर्जित 28 अंश मिला दिया जाए तो 56 सहो मात्रा हो जाती है। जैसे ही हमें पुत्र होता है, वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश उसे चला जाता है और उनकी मुक्ति हो जाती है। इससे अतिवृद्ध पितामह अब वृद्धातिवृद्ध पितामह हो जाएगा। पुत्र के पैदा होते ही सातवें पीढ़ी का एक व्यक्ति मुक्त हो गया। इसीलिए सात पीढिय़ों के संबंधों की बात होती है।


अब यह समझें कि 15 दिनों का पितृपक्ष हम क्यों मनाते हैं। यह तो हमने जान लिया है कि पितरों का संबंध चंद्रमा से है। चंद्रमा की पृथिवी से दूरी 385000 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, उस समय पंद्रह दिनों तक चंद्रमा पृथिवी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 381000 कि.मी. पर ही रहता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथिवी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति यानी विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है। आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसे आज केनिस माइनर और केनिस मेजर के नाम से पहचाना जाता है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसे ही हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो।

इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है। आज समाज के कई वर्ग श्राद्ध के इस वैज्ञानिक पक्ष को न जानने के कारण इसे ठीक से नहीं करते। कुछ लोग तीन दिन में और कुछ लोग चार दिन में ही सारी प्रक्रियाएं पूरी कर डालते हैं। यह न केवल अशास्त्रीय है, बल्कि हमारे पितरों के लिए अपमानजनक भी है। जिन पितरों के कारण हमारा अस्तित्व है, उनके निर्विघ्न परलोक यात्रा की हम व्यवस्था न करें, यह हमारी कृतघ्नता ही कहलाएगी।


पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द पा रक्षणे धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।

(वार्ताधारित)

✍🏻साभार भारतीय धरोहर

सोमवार, 20 सितंबर 2021

रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹

 🏹1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।

2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।

3:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।

4:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।

5:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।

6:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।

7:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।


8:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।

9:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।

10:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।

11:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।

12:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।

13:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।

14:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।


15:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।

16:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।


17:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।

18:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।

19:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।


श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?

नहीं तो जानिये-

1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,

2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,

3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,

4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,

5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |

6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,

7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,

8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,

9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,

10- अनरण्य से पृथु हुए,

11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,

12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,

13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,

14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,

15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,

16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,

17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,

18- भरत के पुत्र असित हुए,

19- असित के पुत्र सगर हुए,

20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,

21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,

22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,

23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |

24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |

25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,

26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,

27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,

28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,

29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,

30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,

31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,

32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,

33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,

34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,

35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,

36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,

37- अज के पुत्र दशरथ हुए,

38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |

इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ |

सतसंग पाठ E / 200921

 **राधास्वामी!  /  20-09-2021- आज शाम सतसंग में पढा जाने वाला दूसरा पाठ:-                                                                             

 बिरहन सुरत सोच मन भारी ।

कस जागे घट प्रीति करारी ॥१ ॥                                      

दृढ़ परतीत हिये बिच आवे ।

दर्शन कर गुरु चरन समावे ॥२ ॥                                       

चरनन माहिं रहे लौलीना ।

शब्द अमी रस निस दिन पीना ॥३ ॥                             

सतसँग नित हित चित से करती ।

राधास्वामी २ हिये बिच धरती ॥४ ॥                                               

 जब तब संशय रोग सतावे ।

 तड़प तड़प ब्याकुल हो जावे ॥५ ॥।                             


 नित नित बिनती करूँ बनाई ।

 हे राधास्वामी तुम होवो सहाई ॥६ ॥                                                            


 उमँग सहित तुम आरत  धारूँ ।

 करम भरम तज तन मन वारूँ ॥ ७ ॥                                                                                       

 दया मेहर परशादी चाहूँ ।

 चरन सरन में दृढ़ कर धाऊँ ॥ ८ ॥                                         

हुए प्रसन्न राधास्वामी दयाला ।

दया करी काटा जंजाला ॥ ९ ॥                                चरन

सरन दे लिया अपनाई ।

 मन और सूरत गगन चढ़ाई ॥१० ॥                          

सहसकँवल होय त्रिकुटी आई ।

 सुन्न के परे गुफा दरसाई ॥११ ॥                                

सत्तपुरुष के चरन निहारे ।

अलख अगम के हो गई पारे ॥१२ ॥                                     

वहाँ से चली अधर को प्यारी ।

राधास्वामी दरश निहारी ॥१३ ॥                                                                                          

 अब क्या भाग सराहूँ अपना ।

 राधास्वामी २ निस दिन जपना ॥१४ ॥                                                                                    

अब आरत यह हो गई पूरी।

सुरत हुई निज चरनन धूरी।।१५।।


(प्रेमबानी-1-शब्द-23-पृ.सं.165,166,167)


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शनिवार, 18 सितंबर 2021

समंदर के नीचे जल

 एक पोस्ट में ईरानी मरुस्थल के नीचे बिछी सँसार की सबसे बड़ी कनात नहरों के जाल के बारे में लिखा और उस अभियांत्रिकी को बधाई दी। 


तो कुछ लोगों को यह लगा कि मैं उनकी उस समय की अभियांत्रिकी की तुलना में आर्यावर्त को 'हीन' मान रहा हूँ। ऐसा नहीं है मित्रों, मैं किसी शत्रु की भी अच्छी बात की प्रशंसा कर देता हूँ, वे तो फिर भी अपने थे। 


आइये उस काल के बारे में 'अपनी' बात बताते हैं। 


उन नहरों के बनने का काल तीन हजार वर्ष पूर्व का है, तो हमारे यहाँ 'चार हजार' वर्ष पूर्व ही गुजरात का 'लोथल' बंदरगाह (समुद्री पत्तन) के लिए समूचे विश्व में प्रसिद्ध था और विश्व का सर्वाधिक व्यापार इसी पत्तन से होता था। लोथल नगर की सड़कें तथा घर इस निपुणता से बनाए गए थे कि उनके समक्ष हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की व्यवस्था भी पीछे थी। हालाँकि ये दोनों नगरीय सभ्यताएं भी तब भारत की ही थीं। 


लोथल में मार्ग एक दूसरे को समकोण पर काटते थे तथा उनकी दिशा ऐसी बनाई गई थी कि सुबह शाम सागरीय हवाओं के चलने से ही वे स्वयमेव स्वच्छ हो जाते थे। उनको बनाने में हवाओं की दिशा की गणना उस समय की श्रेष्ठ अभियांत्रिकी का उदाहरण थीं। मोहल्ले के मार्गों की चौड़ाई भी लगभग चालीस फीट तक की थी। 


सबसे मुख्य बात तो यह थी कि मोहल्लों में घरों के प्रवेश द्वार मार्गों पर नहीं खुलते थे, बल्कि पार्श्व में बनी गलियों में खुलते थे। यह व्यवस्था संभवतः इसलिए बनाई गई थी कि मुख्य मार्गों पर भारी वाहनों (हाथगाड़ी या घोडागाड़ी) की दौड़ा-दौड़ी हुआ करती थी क्योंकि यह एक अतिव्यस्त व्यापारिक नगर था। 


सो यदि घरों के द्वार मुख्यमार्ग पर खुलते तो किसी के अचानक से सड़क पर आकर वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त होने की सम्भावना थी। विशेषतः छोटे बच्चों के लिए। अब सोचिये कि आज के चार हजार वर्ष पूर्व ही नगर बनाते समय भी इतनी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा गया तो उस सभ्यता की अभियांत्रिकी कैसी होगी। 


अच्छा, कनात नहरों के निर्माणकाल के आसपास की ही चर्चा किया जाय, तो तीन हजार वर्ष पूर्व गुजरात में ही एक ऋषि थे 'महर्षि कणाद'। हालाँकि उनका मूल नाम तो कश्यप था लेकिन सूक्ष्म कणों पर उनके वैज्ञानिक अनुसंधानों के कारण ही उनका नाम कणाद प्रचलित हुआ। 


'जॉन डाल्टन' ने अभी हाल में अणु-परमाणु की खोज की कोई दो ढाई सौ वर्ष पूर्व, परन्तु कणाद ऋषि ने तीन हजार वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि, "धरती की प्रत्येक वस्तु अणुओं से बनी है।" महर्षि कणाद ने परमाणु के संबंध में विस्तार से लिखा है। भौतिक जगत की उत्पत्ति सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण परमाणुओं के संघनन से होती है- इस सिद्धांत के जनक महर्षि कणाद थे। यह बात बाद में आधुनिक युग के अणु विज्ञानी जॉन डाल्टन ने भी मानी।


सबकुछ भारत से चोरी करके ले जाया गया और उनको अपने नाम से छाप दिया गया है।

 

महर्षि कणाद ने ही अपने ग्रन्थ 'वैशेषिक दर्शन' में 'न्यूटन' से पूर्व ही गति के तीन नियम बताए थे। 


"वेगः निमित्तविशेषात कर्मणो जायते। 

वेगः निमित्तापेक्षात कर्मणो जायते नियतदिक क्रियाप्रबन्धहेतु। 

वेगः संयोगविशेषविरोधी॥ "


अर्थात्‌ वेग या मोशन (motion) पांचों द्रव्यों पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्पन्न होता है।


केवल पश्चिम में ही सेव पेड़ से धरती पर नहीं गिरते थे, हमारे यहाँ भी धरती पर ही गिरते थे।


आज से 2600 वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड का विश्लेषण परमाणु विज्ञान की दृष्टि से सर्वप्रथम एक शास्त्र के रूप में सूत्रबद्ध ढंग से महर्षि कणाद ने अपने 'वैशेषिक दर्शन' में प्रतिपादित किया था। कुछ मामलों में महर्षि कणाद का प्रतिपादन आज के विज्ञान से भी आगे है।


यह थी हमारे यहाँ की बौद्धिक क्षमता। चिकित्सा में चरक एवं सुश्रुत। क्या यह सब ज्ञान बिना उचित यंत्रों या उपकरणों के आविष्कार के ही आ गया होगा?


तथापि, कणाद ऋषि के शाकाहारी होने की सीमा भी देखिये कि वे केवल जमीन पर गिरे हुए फल या चावल के दाने चुन कर लाते थे और उससे अपना पेट भरते थे। उनका मानना था कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है और यूँ उनके फलों को तोड़ कर खाने से उन्हें कष्ट होगा। 

✍🏻इं. प्रदीप शुक्ला 

 "जय हिन्द..!!"


पछमता - सिंधुघाटी के निवासियों के रिश्‍ते का गांव


सिंघुघाटी सभ्‍यता के निवासियों ने जिस भूमि से अपने लिए बहुत से संसाधन जुटाए, उस मेवाड़ क्षेत्र के पछमता गांव के टीलों की खुदाई में हाल ही कई चौंकाने वाले तथ्‍य उजागर हुए हैं। यहां जनार्दनराय नागर राजस्‍थान विद्यापीठ विश्‍व विद्यालय, केनेसा स्‍टेट यूनिवरसिटी अमेरिका तथा डेकन कॉलेज, पुणे के साझे में इन दिनों उत्‍खनन कार्य चल रहा है और हाल ही जो प्रमाण मिले हैं, वे जाहिर करते हैं कि वे करीब पांच हजार साल पुरानी भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति की झलक लिए हैं। पछमता राजसमंद जिले का गांव है और बनास नदी के प्रवाह क्षेत्र में गिलूंड के पास ही बसा है। इसको आहाड़ और बनास सभ्‍यता का हिस्‍सा माना जाता है और इसके करीब 110 गांवों मे से एक हैं। सचमुच प्राचीनतम गांवों की शृंखला का मेवाड़ बडा क्षेत्र रहा है। बनास को वर्णासा के रूप में पुराणों और स्‍मृतियों में संदर्भित किया गया है। आयुर्वेद के प्राचीनतम ग्रंथों में इस नदी के जल के स्‍वाद और गुणधर्म की चर्चा की गई है। मैंने 'मेवाड़ का प्रारम्भिक इतिहास' में इस संबंध में चर्चा की है।


इस क्षेत्र को खेती के लिहाज से विकसित किया गया था। यह किसानों की बहुलता वाला गांव था। खेती को जीवन का आवश्‍यक अंग मानकर इस क्षेत्र को उत्‍पाद के लिए चुना गया था। उनके पास अपने कार्यों को अंजाम देने के लिए कांसा और जस्‍ता के औजार थे। हमें याद रखना चाहिए कि दुनिया को जस्‍ता देने का श्रेय मेवाड़ काे ही है। ये प्रमाण इस बात को पुष्‍ट कर रहे हैं कि करीब 2500 साल पहले सिंधु घाटी सभ्‍यता के निवासी कांसा और जस्‍ता प्राप्‍त करने के लिए यहां आते थे। यहां से सुरक्षा के लिहाज से बनाया गया परकोटा भी सामने आया है। मिट्टी के बर्तनों का निर्माण काली और लाल मृदा से तैयार किए जाते थे जिन पर खडिया से चित्रकारी की जाती थी। चूल्‍हों का निर्माण भी लाल मिट्टी से किया जाता था और उनको धूप में सेका जाता था। महिलाओं को चूडियां तब भी पसंद थी और खास बात ये कि वे विशेष आभूषण की तरह विशेष अवसरों के लिए बनाई गई थी... कई जानकारियां हैं जाे अभी सामने आएंगी और समय-समय पर राजस्‍थान विद्यापीठ से जुड़े, मित्रवर डाॅ. ललित पांडे बताएंगे। मेरे लिए यह खुशी का विषय है कि पछमता की पुरा सम्‍पदा के संबंध में कुछ सालों पहले मैंने अपनी किताब में खुलासा किया था।


मूषाओं के मकान - आश्‍चर्य का हेतु


दस साल पहले जब मैं 'समरांगण सूत्रधार' ग्रंथ पर काम कर रहा था तो उसमें भवन में मूषाओं के प्रयोग के संबंध में कई निर्देश थे और मैं 'मक्षिका स्‍थाने मक्षिकाम्' की तरह की मूल शब्‍द का ही प्रयोग करके एक बार तो आगे से आगे अर्थ करता चला गया। बाद में जो अर्थ होना चाहिए था, वह पुनर्स्‍थापित किया किंतु उदयपुर जिले के जावर में तो मूषाअों [Retorts] के प्रयोग को देखकर फिर कोई नया अर्थ सामने आ गया। जरूर भोजराज के समय, 10वीं सदी तक जावर जैसा प्रयोग लुप्‍त हो गया होगा।  

जावर दुनिया में सबसे पहले यशद देने वाली खदान के लिए ख्‍यात रहा है। यशद या जिंक का प्रयोग होने से पहले इस धातु को जिन लोगों ने खोजा और वाष्‍पीकृत हाेने से पहले ही धातुरूप में प्राप्‍त करने की विधि को खोजा- वे भारतीय थे और मेवाड़ के जाये जन्‍मे थे। सामान्‍य घरों में रहने वाले और जिस किसी तरह गुजारा करने वाले। जावर की खदान सबसे पहले चांदी के लिए जानी गई और ये पहाड़ाें में होने से इनको 'गिरिकूप' के रूप में शास्‍त्र में जाना गया। पर्वतीय खानों में उत्‍खनन के लिए पहले ऊपर से ही खोदते-खोदते ही भीतर उतरा जाता था। शायद इसी कारण यह नाम हुआ हो। यहां 'मंगरियो कूड़ो' या डूंगरियो खाड़ कहा भी जाता है।

तो, करीब ढाई हजार साल पहले यहां धातुओं के लिए खुदाई ही नहीं शुरू हुई बल्कि अयस्‍कों को निकालकर वहीं पर प्रदावण का कार्य भी आरंभ हुआ। जरूर यह समय मौर्यपूर्व रहा होगा तभी तो चाणक्‍य ने पर्वतीय खदानों की पहचान करने की विधि लिखी है और आबू देखने पहुंचे मेगास्‍थनीज ने भी ऐसी जगहों को पहचान कर लिखा था।

यहां प्रदावण का कार्य इतने विशाल स्‍तर पर हुआ कि यदि कोई जावर देख ले तो अांखें पलक झपकना भूल जाए। हर कदम पर रोमांच लगता है। कदम-दर-कदम मूषाओं का भंडार और उनमें भरा हुआ अयस्‍क चूर्ण जो जब पिघला होगा तो धातु की बूंद बनकर टपका होगा। धातु तत्‍काल हथिया लिया गया मगर मूषाओं का क्‍या करते ? एक मूषा एक ही बार काम में आती है। इसी कारण बड़े पैमाने पर यहां मूषाओं का निर्माण भी हुआ और उनका प्रदावण कार्य में उपयोग भी। प्राचीन भारतीय प्रौद्योगिकी का जीवंत साक्ष्‍य है जावर, जहां कितनी तरह की  मूषाएं बनीं, यह तो उनका स्‍वरूप देखकर ही बताया जा सकता है मगर 'रस रत्‍न समुच्‍चय' आदि ग्रंथों में एक दर्जन प्रकार की मूषाएं बनाने और औषधि तैयार करने के जिक्र मिलते हैं। इनके लिए मिट्टी, धातु, पशुरोम आ‍दि जमा करने की अपनी न्‍यारी और निराली विधियां हैं मगर, रोचक बात ये कि अयस्‍क का चूर्ण भरकर उनका मुख कुछ इस तरह के छिद्रित ढक्‍कन से बंद किया जाता था कि तपकर द्रव सीधे आग में न गिरे अपितु संग्रहपात्र में जमा होता जाए।

प्रदावण के बाद बची, अनुपयोगी मूषाओं का क्‍या उपयोग होता ? तब यूज़ एंड थ्रो की बजाय, यूज़ आफ्टर यूज़ का मन बना और मूषाओं का उपयोग कामगारों ने अपने लिए आवास तैयार करने में किया। कार्यस्‍थल पर ही आवास बनाने के लिए मूषाओं से बेहतर कोई वस्‍तु नहीं हो सकती थी। जिस मिट्टी से मूषाओं को बनाया जा रहा था, उसी मिट्टी के लौंदों से मूषाओं की दीवारें खड़ीकर चौकोर और वर्गाकार घर बना दिए गए। ये घर भी कोई एक मंजिल वाले नहीं बल्कि दो-तीन मंजिल वाले रहे होंगे। है न रोचक भवन विधान। 

ये बात भी रोचक है कि हवा के भर जाने के कारण वे समताप वाले भवन रहे होंगे। अंधड़ के चलने पर और बारिश के होने पर उन घरों की सुरक्षा का क्‍या होता होगा, मालूम नहीं। उनमे रहने का अनुभव कैसा रहा होगा, हममें से शायद ही किसी को ऐसे हवादार घर में रहने का अनुभव हो।

मगर, जावर की पहाडि़यां ऐसे मूषामय घरों की धनी रही हैं। आज केवल उनके अवशेष नजर आते हैं। कोई देखना चाहे तो जावर उनको बुला रहा है। 

अनुज श्रीनटवर चौहान को धन्यवाद कि वह इस नवरा‍त्र में मुझे जावर ले गया और मैं पूरे दिन इन मूषाओं के स्‍वरूप और मूषाओं के मकानों को देख देखकर हक्‍का-बक्‍का रहा। हम सबके लिए अनेक आश्‍चर्य हो सकते हैं, मगर मेरे लिए जावर भी एक बड़ा आश्‍चर्य है जहां आंखें जो देखती है, जबान उसका जवाब नही दे सकती। हां, कुछ वर्णन जरूर मैंने अपनी 'मेवाड़ का प्रारंभिक इतिहास' में किया है।


सूत्रधार देपाक : अद्वितीय अभियंता

( रणकपुर मन्दिर की विशेषताएं)


मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर रणकपुर / राणकपुर का जो जिनालय प्रसिद्ध है, उसका नाम है : धरण विहार और त्रैलोक्य दीपक। ये दोनों नाम निर्माता पर केंद्रित है : धनदाता और श्रमदाता। यह मंदिर गणित और अगणित का अमित रूपक है। कुछ दिन पहले प्रियवर ताराचन्द ( प्रसिद्ध छायाकार) ने इसके बारे में खूब पूछा : जैसा पहले किसी ने न पूछा और न बताया... मैं भी चकित था।


रणकपुर के नाम और धाम के बारे में यह कौतुक ही होगा कि यह इतिहास, भूगोल, काम, अर्थ व्यवस्था और धार्मिक भावनाओं का अनूठा संगम है। 11वीं सदी में जब इस केंद्र को सूर्यपूजा स्थल के रूप में विकसित किया गया तब प्रत्येक दिशा में सात-सात अश्वों के रथ पर सवार सूर्यदेव की प्रतिमाओं का ऐसा अंकन किया गया कि गुजरात की चालुक्य शक्ति निरंतर प्रगति के पग पर आरूढ़ रहे। इस स्थान का नामकरण सूर्य की पत्नी राणकदे नाम पर हुआ। राजस्थानी लोकगीतों में उनका यशगान गाया जाता है : कालो जी कालो कांई करौं सहेल्यां ए, काला राणी राणकदे रा केश...। राणकदे की कहानियां कही जाती हैं।


यह मेवाड़, मारवाड़ ,आबू, चंद्रावती, सांभर, नागौर जैसे प्राचीन क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण स्थान रहा है। श्रेष्ठियों ने इसको बहुत महत्व दिया है । इसमें सादड़ी का श्रेष्ठिवर्ग ( सादड़ी के साहूकार) महत्वपूर्ण रहा। महाराणा कुंभा के शासनकाल (1433 – 1468 ई.) में श्री धरणाक शाह ने इस स्थान पर जिनालयों का निर्माण करवाया था। उसका कुंभा के सभागार में विशिष्ट सम्मान था और भीनमाल, अजमेर, जूनागढ़, पाटन तक बड़ा नाम। ( भारतीय ऐतिहासिक प्रशस्तियां और अभिलेख : श्रीकृष्ण जुगनू)


इस काल में देश के चार श्रेष्ठतम शिल्पी (इंजीनियर) थे – सूत्रधार नारद , सूत्रधार जयतो , सूत्रधार मण्डन और सूत्रधार देपाक। इन चारों ने कौतुकप्रद वास्तु रचनाएँ की। नारद ने चित्तौड़गढ़ का प्रसिद्ध सतबीस देवालय बनवाया तो जयतो ने कीर्तिस्तंभ (विजय स्तंभ), मण्डन ने दिव्य दीवार वाला कुंभलगढ़ और देपाक ने रणकपुर का चौमुखा जिनालय। चारों का कोई जोड़ नहीं! चारों ही बेजोड़! (प्रासाद मण्डन की भूमिका, इतिहास के स्रोत : श्रीकृष्ण )


इस मंदिर का प्रतिष्ठा उत्सव इतना भव्य हुआ कि उसके विषय में “सोम सौभाग्य काव्य ” और संस्कृत में प्रशस्तियां रची गईं और पाषाण पर उत्कीर्ण करवाई गईं। देश में किसी मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पर यह अनूठा काव्य है। उसकी संस्कृत में ही रत्नशेखरा टीका भी है। देपाक को श्रेष्ठी धरणाक शाह ने इतना सम्मान दिया कि उसकी मूर्ति भी बनवाकर मंदिर में लगवाई। कुंभा ने स्वयं सूत्रधार जयतो की मूर्ति उसके पुत्रों सहित कीर्ति स्तंभ में जड़वाई थी। 


रणकपुर के आदिनाथ प्रासाद में मूर्तिकला के अनेक पक्षों को ध्यान में रखा गया है। जैन शासन के देवताओं , इंद्रादि, विक्पालों  के अतिरिक्त लोक मंगल के केतुओं को भी मूर्तिमान किया गया। इनमें कटार में करतब दिखाती नटी की प्रतिमा राजस्थान से गुजरात तक के मंदिरों में मिलती जुलती है। साधु, संतों, यात्राओं के समूह उत्कीर्ण हैं।


क्या आप जानते हैं कि इसमें 1444 स्तंभ उस संवत के सूचक है (यानि 1387) जब धारणा शाह के पूर्वज संघपति हुए, ऐसा माना जाता है कि ये मूलत: 4 का अंक हैं। यह मंदिर भी चौमुखा है। जैन स्थापत्य का अनूठा उदाहरण है रणकपुर जैन मंदिर। ये अकेला मंदिर है जहां दिक्पाल 6 हाथ के हैं जबकि दो और चार हाथ वाले दिक्पाल राज्यभर में मिलते हैं। इसमें स्तंभों को जिस तरह से खड़ा किया गया है, वे चतुर्दिक, चतुर्मुख और चतुर्पीठीय हैं। सूत्रधार देपाक ने लीलावती (पाटी गणित ) के आधार पर इसकी गणना की और मध्य में मूल नायक की चतुर्मुखी प्रतिमा गृर्भगृह सहित विराजित कर चारों और स्तंभों का न्यास किया। 


खंभों की ये गणित जगदीश मंदिर (उदयपुर ) के सोपान से मेल खाती है। हां, 1444 के अंक में से जैन शास्त्र में 14 गुण स्थान माने गए है। तीर्थंकरों के समान ही 20 विहरमान है जो महाविदेह क्षेत्र में अशरीरी रूप में विद्यमान है जबकि 24 तीर्थंकर हैं। इनको मिलाकर 44 होते हैं और इनको गणनापूर्वक स्तंभों के मंडप पर उठाकर इस विशाल मंदिर की रचना की गई है। एक मान्यता यह भी लगती है कि तत्कालीन आचार्य के 36 गुण और 8 संपदाएं होती जिनको मिलाकर भी 44 की संख्या होती है। इस तरह से भी स्तंभों का संख्या क्रम निर्धारित किया गया है जैसा कि मित्र श्री रमेशजी जैन कहते हैं। ताज्जुब यहां की आरती का भी है। कभी संध्या तक रुककर देखिए। उसमें बोली के बोल कैसे होते हैं? गणित की गणना और वास्तविकता क्या होती है?


इसमें कल्पवृक्ष की वह कला मौजूद है जो किसी काल में पत्थरों को सुई से तराशकर सूक्ष्म रूप से तैयार की जाती थी। गुजरात के बाद ये कला यहीं पर हैं। यह पाषाण ढालने जैसी कला भी है। यह कल्पवृक्ष कल्पसूत्र की प्रतिष्ठा का सूचक है। स्तंभ और तोरण रचना में  कीर्तिमुख लुम्बकों, तोड़ों और मकरमुखों का सुंदर प्रयोग किया गया है। जैन ग्रंथों में वर्णित स्वर्गपुरियों ( अमर लोक ) को भूमि पर दिखाने का आयोजन जैसा प्रासाद है। बहुत कम ही लोगों को याद होगा कि पिछली सदी में श्री नर्मदाशंकर सोमपुरा ने इसका जीर्णोद्धार किया था। वे इस कार्य से इतने प्रभावित हुए कि “शिल्प रत्नाकर” जैसा ग्रंथ भी लिख दिया... (प्रासाद मण्डन  की भूमिका)

- ✍🏻डॉ. श्रीकृष्‍ण 'जुगनू'

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिंदी / उर्दू एक समान

 *हिन्दी बोलने का प्रयास करें...*


ये वो उर्दू के शब्द जो आप प्रतिदिन प्रयोग करते हैं, इन शब्दों को त्याग कर मातृभाषा का प्रयोग करें...


      *उर्दू*                *हिंदी*

01 ईमानदार       - निष्ठावान

02 इंतजार         - प्रतीक्षा

03 इत्तेफाक       - संयोग

04 सिर्फ            - केवल, मात्र

05 शहीद           - बलिदान

06 यकीन          - विश्वास, भरोसा

07 इस्तकबाल    - स्वागत

08 इस्तेमाल       - उपयोग, प्रयोग

09 किताब         - पुस्तक

10 मुल्क            - देश

11 कर्ज़             - ऋण

12 तारीफ़          - प्रशंसा

13 तारीख          - दिनांक, तिथि

14 इल्ज़ाम         - आरोप

15 गुनाह            - अपराध

16 शुक्रीया          - धन्यवाद, आभार

17 सलाम           - नमस्कार, प्रणाम

18 मशहूर           - प्रसिद्ध

19 अगर             - यदि

20 ऐतराज़          - आपत्ति

21 सियासत        - राजनीति

22 इंतकाम          - प्रतिशोध

23 इज्ज़त           - मान, प्रतिष्ठा

24 इलाका           - क्षेत्र

25 एहसान          - आभार, उपकार

26 अहसानफरामोश - कृतघ्न

27 मसला            - समस्या

28 इश्तेहार          - विज्ञापन

29 इम्तेहान          - परीक्षा

30 कुबूल             - स्वीकार

31 मजबूर            - विवश

32 मंजूरी             - स्वीकृति

33 इंतकाल          - मृत्यु, निधन 

34 बेइज्जती         - तिरस्कार

35 दस्तखत          - हस्ताक्षर

36 हैरानी              - आश्चर्य

37 कोशिश            - प्रयास, चेष्टा

38 किस्मत            - भाग्य

39 फै़सला             - निर्णय

40 हक                 - अधिकार

41 मुमकिन           - संभव

42 फर्ज़                - कर्तव्य

43 उम्र                  - आयु

44 साल                - वर्ष

45 शर्म                 - लज्जा

46 सवाल              - प्रश्न

47 जवाब              - उत्तर

48 जिम्मेदार          - उत्तरदायी

49 फतह               - विजय

50 धोखा               - छल

51 काबिल             - योग्य

52 करीब               - समीप, निकट

53 जिंदगी              - जीवन

54 हकीकत            - सत्य

55 झूठ                  - मिथ्या, असत्य

56 जल्दी                - शीघ्र

57 इनाम                - पुरस्कार

58 तोहफ़ा              - उपहार

59 इलाज               - उपचार

60 हुक्म                 - आदेश

61 शक                  - संदेह

62 ख्वाब                - स्वप्न

63 तब्दील              - परिवर्तित

64 कसूर                 - दोष

65 बेकसूर              - निर्दोष

66 कामयाब            - सफल

67 गुलाम                - दास

68 जन्नत                -स्वर्ग 

69 जहन्नुम             -नर्क

70 खौ़फ                -डर

71 जश्न                  -उत्सव

72 मुबारक             -बधाई/शुभेच्छा

73 लिहाजा़             -इसलीए

74 निकाह             -विवाह/शादि

75 आशिक            -प्रेमी 

76 माशुका             -प्रेमिका 

77 हकीम              -वैध

78 नवाब               -राजसाहब

79 रुह                  -आत्मा 

80 खु़दकुशी          -आत्महत्या 

81 इज़हार             -प्रस्ताव

82 बादशाह           -राजा/महाराजा

83 ख़्वाहिश          -महत्वाकांक्षा

84 जिस्म             -शरीर/अंग

85 हैवान             -दैत्य/असुर

86 रहम              -दया

87 बेरहम            -बेदर्द/दर्दनाक

88 खा़रिज           -रद्द

89 इस्तीफ़ा          -त्यागपत्र 

90 रोशनी            -प्रकाश 

91मसीहा             -देवदुत

92 पाक              -पवित्र

93 क़त्ल              -हत्या 

94 कातिल           -हत्यारा

95 मुहैया             - उपलब्ध

96 फ़ीसदी           - प्रतिशत

97 कायल           - प्रशंसक

98 मुरीद             - भक्त

99 कींमत           - मूल्य (मुद्रा में)

100 वक्त            - समय

101 सुकून        - शाँति

102 आराम       - विश्राम

103 मशरूफ़    - व्यस्त

104 हसीन       - सुंदर

105 कुदरत      - प्रकृति

106 करिश्मा    - चमत्कार

107 इजाद       - आविष्कार

108 ज़रूरत     आवश्यकता

109 ज़रूर       - अवश्य

110 बेहद        - असीम

111 तहत       - अनुसार


*इनके अतिरिक्त हम प्रतिदिन अनायास ही अनेक उर्दू शब्द प्रयोग में लेते हैं ! कारण है ये बोलिवुड और मीडीया जो एक इस्लामी षड़यंत्र के अनुसार हमारी मातृभाषा पर ग्रहण लगाते आ रहे हैं।*


*हिन्दी हमारी राजभाषा एवं मातृभाषा हैं इसका सम्मान करें।*


*भाषा बचाईये, संस्कृति बचाईये*

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रविवार, 5 सितंबर 2021

सृष्टि का रहस्य जानते थे भारतीय /+

 डॉ. ओमप्रकाश पांडेय (अंतरिक्षविज्ञानी हैं।)


सृष्टि विज्ञान के दो पहलू हैं। पहला पहलू है कि सृष्टि क्या है? आधुनिक विज्ञान यह मानता है कि आज से 13.7 अरब वर्ष पहले बिग बैंग यानी कि महाविस्फोट हुआ था। उसके बाद जब भौतिकी की रचना हुई, अर्थात्, पदार्थ में लंबाई, चौड़ाई और गोलाई आई, वहाँ से विज्ञान की शुरुआत हुई। उससे पहले क्या हुआ, इस पर विज्ञान मौन है। क्योंकि भौतिकी की यह सीमा है। क्वांटम सिद्धांत के आधार पर अवश्य आगे का जानने के कुछ प्रयास हुए, परंतु उसमें कुछ खास सफलता नहीं मिली। उससे जो कुछ निकाला गया, वह सारी बातें हमारे शास्त्रों में पहले से है। परंतु सृष्टि रहस्य को समझने से पहले हम यह जान लें कि यह ब्रह्मांड कैसा है, उसे हम किस तरह से देखते हैं और भारतीय विधा में उसे किस प्रकार से देखा गया। पहले इसका एक विवरण यहाँ प्रस्तुत है।

भगवद्गीता में दो प्रकार के जगत की बात कही गई है – क्षर और अक्षर जगत। क्षर जगत में यह संपूर्ण ब्रह्मांड आता है और इसकी विविधता में सन्निहित एकत्व को अक्षर ब्रह्म कहा गया है। अभी हम इसी क्षर जगत के विज्ञान यानी कि ब्रह्मांड का चित्र यहाँ रखूंगा। साथ ही इस ब्रह्मांड का जो चित्र आज के आधुनिकतम यंत्रों से देखा गया, वह भी प्रस्तुत किया जाएगा।

सबसे पहले मनुष्यों के मन में प्रश्न उठा कि हम कौन हैं, कहाँ से आए, हमें बनाने वाला कौन है और ये सारी चीजें कब तक रहेंगी। इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने का उन्होंने प्रयास किया तो ज्ञान की दो विधाएं प्रारंभ हुई। एक को हम दर्शन कहते हैं और दूसरे को विज्ञान कहते हैं। जिस समय मिश्र में शरीर को सुरक्षित रखने के लिए पिरामिडों का निर्माण किया जा रहा था, उस समय भारत ज्ञान में रमा हुआ था और शरीर से ऊपर उठ कर अध्यात्म तथा आत्मा को जानने का प्रयास कर रहा था। उसने पिरामिड तो नहीं बनाया, परंतु आत्मा को जानने का प्रयास किया। कई बार यह प्रश्न लोग पूछते हैं और यह प्रश्न मुझसे भी विदेशों में कई विज्ञानियों ने पूछा कि आज तो इतने विकसित दूरबीन जैसे यंत्र हैं जिससे हम आज ब्रह्मांड को देख रहे हैं, प्राचीन काल में तो ये यंत्र नहीं थे, फिर उन्होंने ब्रह्मांड को कैसे देखा?

इसको समझने के लिए मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। आप जल की एक बूंद को लें उसे कन्याकुमारी के समुद्र तट पर ले जाकर पूछें कि तुम कहाँ हो तो वह उत्तर देगी वह कन्याकुमारी के तट पर है। परंतु जैसे ही उस बूंद को समुद्र में मिला देंगे, उसी क्षण वह समुद्र हो जाएगी, तो वह बूंद केवल हिंद महासागर नहीं होगी, वह उसी क्षण अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर, पीला सागर, लाल सागर सभी कुछ हो जाएगी क्योंकि पृथिवी का तीन चौथाई हिस्सा जलमय है, तो फिर वह पूरे विश्व की खबर आपको देगी। ठीक इसी प्रकार हमारे ऋषियों ने समाधि अवस्था में जाकर अपनी व्यक्तिगत मेधा को ब्रह्मांडीय मेधा के साथ एकाकार कर दिया। इससे उन्हें ब्रह्मांड की सारी चीजें स्पष्ट हो गईं और उसे उन्होंने श्रुति परंपरा में डाल दिया। उसे ही बाद में लेखनीबद्ध किया। इसलिए इसे दर्शन कहा गया। इसे वह देखता है। कहा भी गया है ऋषयो मंत्रद्रष्टार:। ऋषि मंत्रों को देखते हैं। देख कर साक्षात्कार किया। इसलिए उन्होंने वेद-वेदांग, षड दर्शन, ब्राह्मण, आरण्यक आदि ग्रंथों की रचनाएं कीं। भारत के ज्ञान का प्रकाश पूरी दुनिया में फैला। यहाँ तक कि वह चीन की दिवाल को पार करके वहाँ तक भी पहुँचा।

हमारे यहाँ अंकविद्या की बात होती है। ज्योतिष का अर्थ केवल फलित ज्योतिष नहीं है। ज्योतिष का अर्थ है नक्षत्र विद्या। अंकगणित के बारे में हमें यह बताया गया कि शून्य की खोज आर्यभट ने की। परंतु यजुर्वेद के एक मंत्र 17/2 में एक से लेकर एक पर घात सत्ताइस शून्य तक का वर्णन है। साफ है कि शून्य का ज्ञान आर्यभट के पहले से ही यजुर्वेद के काल से हमारे यहाँ रहा है। यहीं से यह अंक विद्या अरब और वहाँ से यूरोप पहुँची। इसलिए इसे वहाँ अरबी न्यूमेरल्स कहा जाता है। दुर्भाग्य से अपने यहाँ भी इसे अरबी न्यूमेरल्स ही कहा जाता है।

जब इटली में पीसा की मीनार बनाई जा रही थी, भारत वेधशालाओं का निर्माण कर रहा था। उज्जैन, जयपुर में और दिल्ली में वेधशालाएं बनाई गई थीं। पश्चिम में वर्ष 1609 में गैलिलियो ने दूरबीन बनाया था। वहाँ से यह आगे बढ़ता गया। इन दूरबीनों से देखने के बाद विज्ञानियों को यह समझ आया कि पृथिवी पर स्थित दूरबीन से हम देखें तो हम अपनी आकाशगंगा का एक हिस्सा भर ही देख सकते हैं। इससे अधिक देखने के लिए आकाश में दूरबीनें स्थापित करनी होंगी। नासा ने धरती से 486 कि.मी. की ऊँचाई पर हब्बल टेलिस्कोप स्थापित किया। फिर एक टेलीस्कोप चंद्राएक्सरे 7000 कि.मी. की ऊँचाई पर और स्पिट्जर को धरती से 18 हजार कि.मी. की ऊँचाई पर स्थापित किया गया। इसके बाद और भी कई टेलिस्कोप अंतरिक्ष में स्थापित की गईँ ताकि हम ब्रह्मांड को देख सकें। अंतरिक्ष मे एक स्टेशन स्थापित किया गया है जो 7.66 कि.मी.प्रति सेकेंड की गति से चल रहा है। उस स्टेशन पर रहने वाले व्यक्ति के लिए चौबीस घंटे में सोलह दिन-रात होते हैं।

हमें बताया जाता है कि आर्यभट ने सबसे पहले कहा कि पृथिवी गोल है और हमें तो बचपन में यह पढ़ाया गया था कि कॉपरनिकस ने सबसे पहले कहा कि पृथिवी गोल है। उसके साथ ईसाइयों ने बड़ा ही अमानवीय व्यवहार किया, क्योंकि बाइबिल के जेनेसिस के अध्याय में लिखा है कि पृथिवी चपटी है। हमारे अंदर जब कुछ जागरुकता आई तो हम कॉपरनिकस से छोड़ा पीछे गए और कहा कि आर्यभट ने हमें बताया कि पृथिवी गोल है। परंतु ऋग्वेद 1/33/8 में कहा है चक्राणास: परिणहं पृथिव्या। यानी पृथिवी चक्र के जैसी गोल है। पृथिवी से जुड़ा जो भी विषय हम पढ़ते हैं, वह विषय है भूगोल। यह नाम ही बताता है कि पृथिवी गोल है।

फिर हमें वैदिक ऋषियों ने बताया कि माता भूमि: पुत्रोस्हं पृथिव्या:। यानी हम पृथिवी की संतानें हैं, वह हमारी माँ है। माता कैसे हैं? माँ के गर्भ में हम एक झिल्ली में होते हैं, ताकि माता के शरीर के अंदर के बैक्टीरिया को नुकसान नहीं पहुँचा पाता। माँ के गर्भ में ही इस झिल्ली से ही हमें सुरक्षित रखा गया है। तभी हम जन्म ले पाते हैं। ठीक इसी प्रकार पृथिवी भी एक झिल्ली में सुरक्षित है। इसे हम ओजोन परत कहते हैं। यह परत हमें सूर्य के हानिकारक विकिरणों से सुरक्षित रखती है। नासा ने इसका चित्र लिया है। उससे पता चलता है कि यह सुनहरे रंग का दिखता है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख पाया जाता है। वहाँ कहा गया है कि वह परत हिरण्य के रंग का अर्थात् सुनहरा है। इतनी सूक्ष्मता से ऋग्वेद इसका वर्णन करता है।

आज हम जानते हैं कि पृथिवी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। इसलिए सूर्योदय हमेशा पूरब में होता है। इस बात को ऋग्वेद (7/992) का ऋषि कहता है कि बूढ़ी औरत की तरह झुकी हुई पृथिवी पूरब की ओर जा रही है। ऋग्वेद हमें यह भी बताता है कि पृथिवी अपने अक्ष पर झुकी हुई है। आज आधुनिक विज्ञान भी बताता है कि पृथिवी अपने अक्ष पर 23.44 डिग्री पर झुकी हुई है। इसके अलावा एक घूमते हुए लट्टू में जो एक लहर सी आती है, उसी प्रकार पृथिवी के घूर्णन में भी एक लहर आती है। इसके कारण पृथिवी की एक और गति बनती है। इस चक्र को पूरा करने में पृथिवी को छब्बीस हजार वर्ष लगते हैं। भास्कराचार्य ने इसे भचक्र सम्पात कहा है और इसकी कालावधि 25812 वर्ष निकाली थी। यह आज की गणना के लगभग बराबर ही है। इस गति के कारण पृथिवी का उत्तरी ध्रुव तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के सामने और तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के विपरीत में होता है। जब यह सूर्य के विपरीत में होता है तो बर्फ युग होता है और जब यह सूर्य के सामने होगा तो यहाँ ताप बढ़ा जाएगा जिससे बर्फ पिघलने लगेगी। इसके लिए आधुनिक विज्ञानियों ने पिछले 161 हजार वर्षों के उत्तरी ध्रुव में होने वाले तापमान में परिवर्तन की एक तालिका बनाई है। इससे भी यह बात साबित हो जाती है।

अब हम आज जानते हैं कि पृथिवी सूर्य की परिक्रमा करती है। इसके बारे में भी ऋग्वेद का एक मंत्र 10/149/1 हमें बताता है कि सविता यानी कि सूर्य एक यंत्र की भांति पृथिवी को अपने चारों ओर घुमा रहा है। पृथिवी की गति 29.78 कि.मी. प्रति सेकेंड की गति से घूम रही है। यह अपना परिक्रमा पथ 365 दिन छह घंटे बाईस मिनट में पूरा करती है। सूर्य पृथिवी को कैसे घुमा रहा है? यंत्र की भांति गुरुत्व के बल से। गुरुत्व की अगर बात की जाए तो सभी को यही पढ़ाया जाता है कि गुरुत्व का सिद्धांत आइजैक न्यूटन ने दिया। कहा जाता है कि उसने बगीचे में सेब को गिरते देख कर यह सिद्धांत दिया। अब आप वैशेषिक दर्शन का यह सूत्र देखें – अपां संयोगे अभावे गुरुत्वात् पतनम्। इसका साफ अर्थ है कि गुरुत्व के कारण गिर जाएगा। प्रश्न उठता है कि कणाद पहले हुए कि न्यूटन? कणाद तो काफी पहले हुए हैं। दूसरी बात यह है कि आज से सात वर्ष पहले लंदन के टाइम्स पत्रिका में एक खबर छपी थी कि न्यूटन के व्यक्तिगत पुस्तकालय में आर्यभटीय ग्रंथ मिला। इसमें आर्यभट की इस पुस्तक के उस पृष्ठ को चिह्नित किया हुआ था, जिसे संभवत: न्यूटन ने ही किया होगा, जिसमें आर्यभट के मुजफ्फरपुर में लीची को नीचे गिरते देखने और गुरुत्व के सिद्धांत की व्याख्या किए जाने की चर्चा है। इसका उल्लेख करके टाइम्स का संवाददाता लिखता है कि संभव है कि न्यूटन ने आर्यभट के इस उदाहरण की चोरी कर ली हो और लीची की जगह सेब देखने की बात कह दी।

पृथिवी का परिक्रमा पथ बारह भागों में बाँटा गया है। इसे ही हम बारह राशियां कहते हैं। इसे कहा जाता है कि यह सारी जानकारी हमने बेबिलोनिया तथा ग्रीस से ली। ऋग्वेद के 1/164/48वें मंत्र में कहा है बारह राशियों की चर्चा पाई जाती है। ऋग्वेद तो ग्रीस के इतिहास से काफी पुराना है। ऐसे में राशियों का सिद्धांत भारत का अपना सिद्धांत साबित होता है। इसे कहीं बाहर से नहीं लिया गया।

आज के विज्ञान ने पता लगाया है कि पृथिवी सूर्य के चारो ओर एक झूले की तरह घूम रही है। उसका परिक्रमा पथ स्थिर नहीं है। वह सूर्य की ओर दोलन करता है। इसका कालखंड एक लाख से लेकर चार लाख वर्षों का है। इस दोलन में पृथिवी कभी सूर्य के नजदीक चली जाती है और कभी सूर्य से एकदम दूर। इससे भी पृथिवी के वायुमंडल में बदलाव आता है।

हमने एक पैराणिक कथा सुनी होगी अगस्त्य द्वारा समुद्र को पी लेने की। यह कहानी भी वास्तव में अंतरिक्ष के अगस्त्य तारे से जुड़ी हुई है। अगस्त्य ऋषि द्वारा खोजे जाने के कारण इस तारे का नाम अगस्त्य तारा पड़ा। अंतरिक्ष के पिंडो के नाम ऐसे ही उनके खोजकर्ताओं के नाम पर या किसी महान हस्ती के नाम पर रखे जाते हैं। बुध नाम के ऋषि ने बुध ग्रह को खोजा। इसी प्रकार शुक्र ऋषि ने शुक्र का और वृहस्पति ऋषि ने वृहस्पति की खोज की थी। यह अगस्त्य तारा हमारे सूर्य से सौ गुणा बड़ा है। अगस्त्य तारा दक्षिण में उगता है। यह मई में अस्त हो जाता है। यह तब उदय होता है जब सूर्य दक्षिणायण होते हैं। तो एक तो सूर्य की सारी उष्मा दक्षिण की ओर जा रही है, दूसरी ओर अगस्त्य की उष्मा भी आ रही है। दोनों की संयुक्त उष्मा पृथिवी के दक्षिण में पड़ती है। हम जानते हैं कि सारे समुद्र दक्षिण में ही हैं। उन दोनों की उष्मा के कारण समुद्र से वाष्पीकरण होने लगता है। सूर्य जनवरी में उत्तरायण हो जाते हैं, परंतु अगस्त्य तारा मई तक रहता है, तब तक वाष्पीकरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इसे ही अगस्त्य का समुद्र पीना कहा जाता है। यह एक पर्यावरणीय घटना है। जैसे ही अगस्त्य तारा अस्त होता है, वाष्पीकरण की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है।

वराहमीहिर के सिद्धांत के अनुसार साढ़े छह महीने में मेघ गर्भधारण कर लेता है। इसलिए अगस्त्य के अस्त होते हैं मई के अंतिम सप्ताह से मानसून केरल से शुरू हो जाता है और जून के अंतिम सप्ताह में उत्तर भारत में आ जाता है। कालीदास के मेघदूत को अगर हम पढ़ें तो उसमें हमें मानसून का यह पूरा चक्र मिल जाएगा।

प्रकाश की गति के बारे में ऋग्वेद 1/50/9 में कहा गया है तरणिर्वश्वदर्शतो ज्योतिकृदसि सूर्य विश्वमाभासिरोचन। इसकी व्याख्या में सायणाचार्य ने लिखा है कि आधे निमिष में प्रकाश 2202 योजन यानी कि 186 हजार मील की दूरी तय करता है। आधुनिक गणना से भी यही गति प्राप्त होती है। यह बात संस्कृत के विद्वानों को तो पता है और वे इसे कहते भी हैं। इसको ही आगे बढ़ाते हुए ऋग्वेद 3/53/8 में कहा गया है त्रिर्यत् दिव: परिमुहुर्तम् आ अगात् स्वै:। अर्थात् एक मुहुर्त में सूर्य का प्रकाश तीन बार पृथिवी पर आ जाता है। एक मुहुर्त में 24.5 मिनट होते हैं। इस गणना से सूर्य का प्रकाश पृथिवी पर 8.17 मिनट में पहुंचता है। आधुनिक विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है। वह सूर्य के प्रकाश के पृथिवी तक पहुंचने का समय 8.19 मिनट बताता है। इससे हम सूर्य से पृथिवी की दूरी की भी गणना कर सकते थे। ऋग्वेद की इस गणना की बात कोई नहीं करता। सायण तो नौवीं शताब्दी में हुए हैं। ऋग्वेद तो काफी पुराना ग्रंथ है।

अपने शास्त्रों में पृथिवी को अग्निगर्भा यानी कि अग्नि के गर्भ से उत्पन्न कहा गया है। आधुनिक विज्ञान ने आज से साढ़े चार अरब वर्ष पहले की पृथिवी का जो चित्र बनाया है, उससे यह सही साबित होता है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि उस समय पृथिवी एक हॉट बॉल यानी कि आग का गोला थी। धीरे-धीरे वह ठंडी हुई। महाभारत में भीष्म पृथिवी की गोलाई को बारह हजार कोस यानी कि चौबीस हजार मील बताते हैं। इसको किलोमीटर में बदलें तो यह अठतीस हजार छह सौ चौबीस कि.मी. आता है। आज का विज्ञान भी पृथिवी की परिधि को चालीस हजार कि.मी. ही मानता है। यह लगभग समान ही है। वैदिक ज्योतिष में पृथिवी का भार भी मापा गया है और 1600 शंख मन बताया गया है। इसे यदि हम किलोग्राम में बदलें तो आधुनिक गणना के अनुसार निकाले गए मान 6 गुणा 1024 के निकट ही आता है।

सौर मंडल को अगर हम देखें तो अपने यहाँ पुराणों में बहुत सारी कथाएं ऐसी मिलेंगी जो आपत्तिजनक प्रतीत होती हैं। जैसे कि एक कथा वृहस्पति की पत्नी और चंद्रमा के जार से बुध की उत्पत्ति होने की है। वास्तव में ऐसी कथाएं अंतरिक्ष जगत की हैं। यह कथा वृहस्पति के विभिन्न नक्षत्रों में भ्रमण करने और चंद्रमा के उसके घर में प्रवेश करने के ज्योतिषीय घटना की है। ऐसी कथाओं को बनाने का उद्देश्य इतना भर ही था कि यदि ज्योतिषीय ज्ञान कभी लुप्त भी हो तो इन्हें डिकोड करके उसे फिर से समझा जा सकेगा। इसी प्रकार आज हम देखते हैं कि शनि की काफी महिमा मानी जाती है। वास्तव में देखा जाए तो हमारे सौर मंडल में शनि का विशेष महत्व है भी। शनि और सूर्य के बीच में क्षुद्र ग्रहों की एक विशाल पट्टी है। इन्हें शनि अपनी ओर खींचता रहता है। यदि शनि इन्हें अपनी ओर नहीं खींचता तो ये सूर्य की खिंच जाते। ऐसे में क्षुद्र ग्रहों के पृथिवी से टकराने की काफी अधिक आशंका होती। लगभग प्रतिदिन कोई न कोई क्षुद्र ग्रह पृथिवी से टकराता रहता और फिर यहाँ जीवन संभव ही नहीं होता। इसलिए भी भारतीयों ने शनि को इतना महत्वपूर्ण माना।

सौर मंडल के अलग-अलग ग्रहों का परिक्रमा पथ अलग-अलग है और इस कारण उनके एक वर्ष का मान भी अलग-अलग हैं। जैसे वरूण यानी कि नेपच्यून ग्रह का एक वर्ष पृथिवी के 164 वर्ष का है। यानी यदि आप नेपच्यून पर एक वर्ष बिता कर लौटेंगे तो पृथिवी पर 164 वर्ष बीत चुके होंगे। इसको समझाने के लिए भी पुराणों में रेवती की एक कथा आती है। इस कथा में रेवती के विवाह के लिए चिंतित उसके पिता उसे लेकर ब्रह्मलोक चले जाते हैं। वहाँ वे ब्रह्मा से रेवती के लिए योग्य वर के बारे में पूछते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि शीघ्रता से वापस पृथिवी पर जाओ अन्यथा वहाँ वर नहीं मिल पाएगा। वे सतयुग में पृथिवी से गए थे और लौटे तो यहाँ द्वापर युग का अंत चल रहा था। फिर उन्होंने रेवती की शादी बलराम से की। इस प्रकार ब्रह्मांड में भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्न-भिन्न वर्ष होते हैं।

आज हम यह जानते हैं कि चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होता है। यह बात यजुर्वेद 18/40 का ऋषि भी कहता है। वहाँ कहा गया है – सूर्य रश्मि: चन्द्र्मसं प्रति दीप्यते। सूर्य की रश्मि से चंद्रमा प्रकाशमान है। भारतीय मासों के नाम चंद्रमा के अनुसार ही तय किए गए हैं। चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसके नाम पर ही उस मास का नाम होता है। चित्रा नक्षत्र में चंद्रमा हो तो वह चैत्र मास कहलाता है, विशाखा में हो तो वैशाख, ज्येष्ठा में हो तो ज्येष्ठ कहलाएगा। इस प्रकार भारतीय कालगणना पूरी तरह विज्ञान पर आधारित है।

✍🏻साभार भारतीय धरोहर