मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

अनामी शादी




प्रस्तुति- रूही सिन्हा 


भारत विभन्नताओं का देश है,कहा जाता है कि हर सौ मीटर पर यहां बोली और रिवाज बदल जाते हैं। इतना अलग होते हुए भी यह देश प्यार और एकता के सूत्र में बंधा हुआ है। आपको पता है कि अलग-अलग जाति और धर्म को मानने वाले इस देश में शादी को लेकर भी बड़ी अजीब-अजीब और अलग-अलग परंपरायें हैं। ADVERTISEMENT Must Read: शादी की अजब-गजब परंपरायें और रीति-रिवाज आईये आपको बताते हैं ऐसी ही भारत की कुछ अजब-गजब परंपराओं के बारे में... 1. वर का पानी: हिंदू शादियों में कई जगह शादी होने से पहले दुल्हन को वर का पानी यानी कि दूल्हे का नहाया हुआ पानी भेजा जाता है ताकि दुल्हन उस पानी से नहा सके और जीवन भर दूल्हे के ऊपर आने वाली हर मुसीबत को खुद पहले झेलने के लिए तैयार रहे। 2. बारात जाने से पहले मां का गुस्सा: हिंदू शादियों में कहीं-कहीं पर बारात जाने से पहले लड़के की मां लड़के से नाराज होकर बारात ले जाने रोकती है और कहती है कि वो कुएं में कूद जायेगी, वो तब तक गुस्सा रहती है जब तक उसका बेटा उससे वादा नहीं कर लेता कि पत्नी के आने के बाद भी वो उसका पूरा ख्याल रखेगा। फिलहाल .ह परंपरा है जो वक्त के साथ नये रूप में चल रही है क्योंकि अब कुआं तो हर जगह मिलता नहीं है इसलिए लड़के की मां अब बाल्टी के पानी और कटोरे में पानी का प्रयोग कर लेती है। 3. झाड़ू देना: कुछ जगहों पर लड़की की शादी के बक्से के साथ झाडू रखने का रिवाज है, ताकि लक्ष्मी उसके साथ हमेशा रहें। 4. जूठी सुपाड़ी: हिंदू शादियों में कुछ जगह दूल्हे को दुल्हन की जूठी उस सुपाड़ी को खाने को दिया जाता है जो कि वो सुबह से मुंह पर रखी होती है, ताकि जूठा खाने से प्यार बढ़े। 5. पुड़ी पर पैर रखना: कुछ जगहों पर जब दुल्हन शादी करके ससुराल आती है तो उसे पूड़ियों पर से पैर रखकर गुजरना होता है, इसके पीछे यह माना जाता है कि लड़की के आने से घर-भर हमेशा भरा रहेगा। सर्वे: भारत में हिंदू-मुस्लिम लड़कियों की शादी हो जाती है जल्दी शादी की अजब-गजब परंपराओं के बारे में और जानने के लिए नीचे की स्लाइडों पर क्लिक कीजिये.... Some Interesting and Different wedding traditions and customs in India 1/9 सांप वाली टोकरी एमपी के कुछ आदिवासी परिवारों में शादी से पहले लड़के वाले लड़की के घर पर सांप वाली पेटी पहुंचाते है और लड़की वाले उस पेटी को जंगल में छोड़ आते हैं, ऐसा करने के पीछे माना जाता है कि लड़की को अपनाने वाले लड़के अपने घर से हर जहर को निकाल देते हैं,ताकि लड़की का जीवन खुशहाल रहे। Show Thumbnail VIDEO : Haryana Is Arranging Foreign Brides For Its Bachelors Read more about: marriage, art, culture, tradition, शादी, भारत, कला, परंपरा, संस्कृति Story first published: Thursday, May 7, 2015, 14:47 [IST] English summary Wedding may be a universal celebration, but for some it’s an unbelievable crazy adventure. In India, Some Interesting and Different wedding traditions and customs. Have a Look. Other articles published on May 7, 2015 Samachar Dictionary अंग्रेजी शब्द यहाँ टाइप करें और खोजें आज का शब्द Gnat काटने वाली मक्खी Videos

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रविवार, 4 अक्टूबर 2015

झील में खजाना

 

 

 प्रस्तुति- स्वामी शरण 


 कमरुनाग झील - हिमाचल प्रदेश - इसमें दबा है अरबो का खजाना

आज हम आपको एक ऐसी झील के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में कहा जाता है की उसमे अरबो रुपए का खजाना दफन है यह है हिमाचल प्रदेश  के पहाड़ो में स्थित  कमरुनाग झील।


पुरे साल में 14 और 15 जून को यानी देसी महीने के हिसाब से एक तारीख और हिमाचली भाषा में साजा। गर्मियों के इन दो दिनों में बाबा कमरुनाग पूरी दुनिया को दर्शन देते है। इसलिए लोगों का यहां जन सेलाव पहले ही उमड पड़ता है। क्योंकि बाबा घाटी के सबसे बड़े देवता हैं और हर मन्नत पुरी करते हैं। हिमाचल प्रदेश के मण्डी से लगभग 60 किलोमीटर दूर आता है रोहांडा, यहीं से पैदल यात्रा शुरु होती है। कठिन पहाड़ चड़कर घने जंगल से होकर गुजरना पड़ता है। इस तरह लगभग 8 किलोमीटर चलना पड़ता है।
मंदिर के पास ही एक झील है, जिसे कमरुनाग झील के नाम से जाना जाता है। यहां पर लगने वाले मेले में हर साल भक्तों की काफी भीड़ जुटती है और पुरानी मान्यताओं के अनुसार भक्त झील में सोने-चांदी के गहनें तथा
पैसे डालते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा के आधार पर यह माना जाता है कि इस झील के गर्त में अरबों का खजाना दबा पड़ा है।

देव कमरुनाग को वर्षा का देव माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार भगवान कमरुनाग को सोने-चांदी व पैसे चढ़ाने की प्राचीन मान्यता है। यहां जून में लगने वाले मेले के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा झील में सोने-चांदी के गहनों को अर्पित करते हुए देखा जा सकता है। स्थानीय लोगों की मानें तो सदियों से चली आ रही इस परंपरा के आधार पर यह माना जाता है कि झील के गर्त में काफी बड़ा खजाना दबा हुआ है। कमरुनाग में लोहड़ी पर भव्य पूजा का आयोजन किया जाता है।


कमरुनाग जी का जिक्र महाभारत में भी आता है। इन्हें बबरुभान जी के नाम से भी जाना जाता था। ये धरती के सबसे शक्तिशाली योधा थे। लेकिन कृष्ण नीति से हार गए। इन्होने कहा था कि कोरवों और पांडवों का युद्ध देखेंगे और जो सेना हारने लगेगी में उसका साथ दुंगा। लेकिन भगवान् कृष्ण भी डर गए कि इस तरह अगर इन्होने कोरवों का साथ दे दिया तो पाण्डव जीत नहीं पायेंगे। कृष्ण जी ने एक शर्त लगा कर इन्हे हरा दिया और बदले में इनका सिर मांग लिया। लेकिन कमरुनाग जी ने एक खवाइश जाहिर की कि वे महाभारत का युद्ध देखेंगे। इसलिए भगवान् कृष्ण ने इनके काटे हुए सिर को हिमालय के एक उंचे शिखर पर पहुंचा दिया। लेकिन जिस तर्फ इनका सिर घूमता वह सेना जीत की ओर बढ्ने लगती। तब भगवान कृष्ण जी ने सिर को एक पत्थर से बाँध कर इन्हे पांडवों की तरफ घुमा दिया। इन्हें पानी की दिक्कत न हो इसलिए भीम ने यहाँ अपनी हथेली को गाड कर एक झील बना दी।


यह भी कहा जाता है कि इस झील में सोना चांदी चडाते से मन्नत पुरी होती है। लोग अपने शरीर का कोई भी गहना यहाँ चडा देते हैं। झील पैसों से भरी रहती है, ये सोना - चांदी कभी भी झील से निकाला नहीं जाता क्योंकि ये देवतायों का होता है। ये भी मान्यता है कि ये झील सीधे पाताल तक जाती है। इस में देवतायों का खजाना छिपा है। हर साल जून महीने में 14 और 15 जून को बाबा भक्तों को दर्शन देते हैं। झील घने जंगल में है और इन् दिनों के बाद यहाँ कोई भी पुजारी नहीं होता। यहाँ बर्फ भी पड जाती है।
यहाँ से कोई भी इस खज़ाने को चुरा नही सकता। क्योंकि माना जाता है कि कमरुनाग के खामोश प्रहरी इसकी रक्षा करते हैं। एक नाग की तरह दिखने बाला पेड इस पहाड के चारों ओर है। जिसके बारे मे कहते हैं कि ये नाग देवता अपने असली रुप में आ जाता है। अगर कोई इस झील के खजाने को हाथ भी लगाए।


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गांव

 

 

प्रस्तुति- इरा मनोज सिन्हा

 

क्या आपने कभी ऐसे घर की कल्पना की है जो की पानी के ऊपर हो ? शायद नहीं, पर दुनिया में एक ऐसी बस्ती है जो की पानी के ऊपर बसी है और वो भी पुरे 7000 लोगों की। यह है दुनिया की एक मात्र, समुद्र पर तैरती हुई बस्ती जो की चाइना में स्थित।  ये बस्ती समुद्री मछुवारो की है जो टांका कहलाते है।

एक गाँव जो की 1300 सालों से बसा है समुद्र पर


Tanak community, China  चीन में कई सदियों पहले टांका कम्युनिटी के लोग वहां के शासकों के उत्पीडऩ से इतने नाराज हुए कि उन्होंने समुद्र पर ही रहना तय किया था। करीब 700 ईस्वी से लेकर आज तक ये लोग न तो धरती पर रहने को तैयार हैं और न ही आधुनिक जीवन अपनाने को तैयार हैं।

Tanka community, china
चीन के दक्षिण पूर्व क्षेत्र में करीब 7000 मछुआरों के परिवार अपने परंपरागत नावों के मकान में रह रहे हैं। ये घर समुद्र पर तैर रहे हैं। इन विचित्र घरों की एक पूरी बस्ती है। समुद्री मछुआरों की यह बस्ती फुजियान राज्य के दक्षिण पूर्व की निंगडे सिटी के पास समुद्र में तैर रही है।
Tanka community, China

ये समुद्री मछुवारे टांका कहलाते हैं। टांका लोग नावों से बनाए घरों में रह रहे हैं इसलिए उन्हें जिप्सीज ऑफ द सी  कहा जाता है। चीन  में 700 ईस्वी में तांग राजवंश का शासन था। उस समय टांका जनजाति समूह के लोग युद्ध से बचने के लिए समुद्र में अपनी नावों में रहने लगे थे। तभी से इन्हें जिप्सीज ऑन द सी कहा जाने लगा और वह कभी-कभार ही जमीन पर आते हैं।

Tanka community, China टांका जनजाति के लोगों का पूरा जीवन पानी के घरों और मछलियों के शिकार में ही बीत जाता है। ये जमीन पर जाने से बचने के लिए  न केवल फ्लोटिंग घर बल्कि बड़े-बड़े प्लेट फार्म भी लकड़ी से तैयार कर लिए हैं।
Tanka community, China


चीन में कम्युनिस्ट शासन की स्थापना होने तक ये लोग न तो किनारे पर आते थे और न ही समुद्री किनारे बसे लोगों के साथ विवाह के रिश्ते बनाते थे। वे अपनी बोटों पर ही शादियां भी करते हैं। अभी हाल के दिनों में स्थानीय सरकार के प्रोत्साहन मिलने के बाद टांका  समूह के कुछ लोग समुद्र किनारे घर जरूर बनाने लगे हैं, लेकिन अधिकांश लोग अपने परंपरागत तैरते हुए घरों में रहना पसंद कर रहे है। 
दुनिया की टॉप 10 अंडर ग्राउंड लेक (World's Top 10 underground lake)

होटल

 

 

 

प्रस्तुति- राकेश सिन्हा, सान्या सिन्हा

 

होटल प्रोरा - दुनिया का सबसे बड़ा

आपको यह सुनकर बेहद आश्चर्य हो रहा होगा कि दुनिया का सबसे विशाल होटल, जिसमें 10,000 कमरे हैं, वह पिछले 70 सालों से वीरान पड़ा है। यह भव्य बिल्डिंग एक खूबसूरत आयलैंड में समुद्र के किनारे स्थित है। ऐसा कुछ जानते ही आपके मन में कई सवाल उठ रहे होंगे कि आखिर इतना विशाल होटल किस देश और कौन से शहर में स्थित है। इसे किसने बनवाया था और क्यों बनवाया था। आज तक इसका उपयोग क्यों नहीं किया जा सका ? आखिर क्यों  पिछले 70 सालों से यह खंडहर हो रहा है?
तो आइए हम कुछ ऐसे ही सवालों के जवाबों के साथ दुनिया के सबसे विशाल होटल की ट्रैजिक स्टोरी के बारे में आपको बताते हैं। 
The world biggest hotel - Hotel Prora
विशव का  सबसे बड़ा होटल - होटल प्रोरा 
दुनिया का सबसे विशाल होटल जर्मनी के बाल्टिक सागर के रुगेन आयलैंड में स्थित है । इस सी-फेसिंग होटल में 10,000 बेडरूम हैं। इसका निर्माण करीब 70 साल पहले किया गया था, लेकिन सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि तब से लेकर आज तक इस होटल में एक भी यात्री नहीं रुका है। जर्मनी के नाजी शासन ने इस विशाल होटल दा प्रोरा का निर्माण 1936 से 1939 के बीच में करवाया था। इसे बनाने में 9000 लेबरफोर्स को तीन साल लगे थे।
Campus of Hotel Prora
विशव का  सबसे बड़ा होटल - होटल प्रोरा 
नाजियों ने इस होटल को एक प्रोग्राम स्ट्रेंथ थ्रू ज्वॉय के तहत निर्माण करवाया था। विशाल होटल के निर्माण के पीछे उद्देश्य था कि यहां जर्मनी वर्कर्स को मनोरंजक गतिविधियों में शामिल किया जाए और नाजी प्रोपेगंडा को फैलाया जाए। स्थानीय लोग बिल्डिंग के स्मारक सरीखे ढांचे के कारण इसे प्रोरा (द कोलोसस) कहते हैं, जिसका अर्थ झाड़ खंड, झाड़ीदार मैदान, बंजर भूमि आदि होता है।
Hotel Prora
होटल प्रोरा 
होटल प्रोरा में एक समान 8 बिल्डिंग बनाई गईं और हर बिल्डिंग की लंबाई 4.5 किलोमीटर है। यह बिल्डिंग समुद्र से बमुश्किल 150 मीटर दूर है। नाजियों ने यहां के लंबे समय तक की योजना बनाई थी। इसमें चार एक जैसे रिसार्ट थे, सभी में सिनेमा, फेस्टिवल हॉल, स्वीमिंग पूल और एक जेट्टी भी थी। यहां एक क्रूज शिप भी खड़ा हो सकता था।
Hotel Prora
जर्मनी का तानाशाह शासक एडोल्फ हिटलर का यह प्लान बहुत महत्वाकांक्षी था। वह एक घुमावदार सी रिसोर्ट बनाना चाहता था, जो विश्व में सबसे विशाल हो। वह चाहता था कि इस बिल्डिंग में 20,000 से अधिक बिस्तर हों। होटल के हर कमरे की ऐसी योजना बनाई गई थी कि वहां से समुद्र का नजारा देखा जा सके।
Hotel Prora
हर कमरा 5 बाय 2.5 मीटर का है। हर कमरे में दो बेड, एक अल्मरी और एक सिंक बनाया गया है। हर फ्लोर में टॉयलेट्स, शॉवर और बॉलरूम सामूहिक बनाए गए थे। बिल्डिंग के मध्य में यह व्यवस्था की गई थी कि युद्धकाल में इसे अस्पताल में बदला जा सके।
Toilet of Hotel Prora
हिटलर का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पूरा होता इससे पहले ही द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। उसने बिल्डिंग के निर्माण में लगे कर्मचारियों को पीनेमंडे वेपन प्लांट में हथियारों के उत्पादन के लिए भेज दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मित्र देशों की बमबारी के दौरान हमबर्ग से विस्थापित हुए लोगों ने यहां शरण लि थे। (द्वितीय विश्व युद्व में ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ, अमेरिका, चीन आदि मित्र राष्ट्र कहलाते थे जबकि जर्मनी, इटली, जापान आदि धुरी राष्ट्र कहलाते थे।)
Hotel Prora
द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद पूर्वी जर्मनी में विस्थापितों को दा प्रोरा के एक ब्लाक में रखा गया था। इसके बाद पूर्वी जर्मनी ने इसका उपयोग एक मिलिट्री पोस्ट के लिए किया था। 1990 में पश्चिमी जर्मनी और पूर्वी जर्मनी के एकीकरण के बाद इस जगह का उपयोग एक मिलिट्री टेक्नीकल स्कूल के लिए किया गया। इसके बाद बाल्कान देशों से आए विस्थापितों के लिए यह जगह शरण स्थली बनाई गई।
आज भी यह बिल्डिंग काफी खूबसूरत है, हालांकि इसके कुछ ब्लॉकों को छोड़कर बाकी खंडहर हो गए हैं। 2011 में इसके एक ब्लॉक  में 400 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया गया । अभी प्रोरा को 300 बिस्तरों वाले एक हॉलिडे रिसॉर्ट में बदलने की तैयारी है। इसमें टेनिस कोर्ट, स्वीमिंग पूल और शॉपिंग सेंटर होगा।
Hotel Prora



नहर वाला गांव

 

 

 

 

सपनो सा एक गाँव, केवल है नहरे 

 

प्रस्तुति-  राजेन्द्र प्रसाद, उषा रानी सिन्हा


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गिएथूर्न, नीदरलैंड (हॉलैंड) का एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है  जो की 'दक्षिण का वेनिस' या 'नीदरलैंड का वेनिस' के नाम से भी जाना जाता है।  यहाँ पर साल भर पर्यटकों का ताँता लगा रहता है क्योंकि यह एक सपनो का गाँव है, एक ऐसा गाँव जहाँ की खूबसूरती और सादगी देख कर वही बस जाने का मन करता हैं।
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इस गाँव की सबसे बड़ी खासियत यह है की यह पूरा गाँव नहरों से घिरा है। इस गाँव में एक भी गाडी या बाइक नहीं है क्योकि यहाँ पर इनको चलाने लायक एक भी रोड नहीं हैं। जिस किसी को भी कहीं जाना हो वह बोट के सहारे ही जा सकता है। यहां के नहरों में इलेक्ट्रिक मोटर से नाव चलती हैं, जिसके जरिए लोग कहीं आते जाते हैं। इन नावों से बहुत कम शोर होता है और लोगों को इनसे कोई शिकायत नहीं रहती। वहीं, कुछ लोगों ने एक से दूसरी जगह जाने के लिए गांव के बीच से गुजरने वाली नहर पर लकड़ी के पुल बना लिए हैं।
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1230 में बना था ये गांव :
इस गाँव में इतना पानी 1170 की एक भयंकर बाढ़ में आया था लेकिन इस गाँव की स्थापना 1230 में हुई थी। जब लोग यहाँ पर रहने आये तो उन्हें यहाँ पर बहुत सारे जंगली बकरियों के सिंग मिले जो की सम्भवतया 1170 की बाढ़ में यहाँ बह कर आई  होगी। इसलिए इस जगह का शुरुआती नाम पड़ा  'गेटेनहोर्न' (Geytenhorn), जिसका मतलब होता है 'बकरियों के सिंग'। बाद में इसका नाम गिएथूर्न (Giethroon)  हो गया। 
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कैसे बनी नहरे :
इन नहरों के बनने के पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है, यहाँ पर इन नहरों का निर्माण अनजाने में ही हुआ। हुआ यूँ की जब लोग यह पर रहने आये तो उन्होंने देखा की 1170 की बाढ़ के कारण यहाँ पर जगह जगह प्रचुर मात्रा में पिट इकठ्ठी ही गई है।  पिट एक तरह की दलदली मिटटी और वनस्पतियों का मिश्रण होता है जो की ईंधन के रूप में काम में लिया जाता है। उन लोगो ने इस पिट को काम में लेने के लिए जगह जगह उसकी खुदाई करी।  इस तरह खुदाई करते करते कई सालों में यहाँ पर नहरों का निर्माण हो गया।  तब, शायद किसी को यह अंदाजा नहीं होगा कि पीट निकालने से बनी नहरों के कारण यह जगह दुनिया के नक्शे पर खूबसूरत पर्यटक स्थल के रूप में छा जाएगी। इस गाँव से कुल 7.5 किलो मीटर लम्बी नहरें निकलती है। 
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एक फिल्म से हुआ फेमस :
वर्ष 1958 में बर्ट हांस्त्रा की डच कॉमेडी फिल्म फेनफेयर (Fanfare) की शूटिंग यहाँ होने के कारण गिएथूर्न विशव स्तर पर प्रशिद्ध हो गया।  
Other Amazing Places :

10 खूबसूरत मस्जिदें,

 

 

प्रस्तुति- रेणु दत्ता

आइए नज़र डालते है दुनिया की 10 सबसे बेहतरीन मस्जिदों पर...

मस्जिद नाबावी, सऊदी अरेबिया (Masjid nabawi Saudi arabia)
मस्जिद नाबावी, सऊदी अरेबिया (Masjid nabawi Saudi arabia)
मस्जिद अलहरम, सऊदी अरेबिया (Masjid al-haram Saudi arabia)
मस्जिद अलहरम, सऊदी अरेबिया (Masjid al-haram Saudi arabia)

जामे असर हसनी मस्जिद ब्रूनेई (jame asr hassanil masjid brunei)
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उम्मयद मस्जिद, डमस्कस (Umayyad mosque Damascus)
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फैसल मस्जिद,पाकिस्तान (Faisal masjid, Pakistan)
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जुमेराह ग्रांड मस्जिद, दुबई  (Jumeirah grand masjid, Dubai)
जुमेराह ग्रांड मस्जिद, दुबई  (Jumeirah grand masjid, Dubai)

पुत्र मस्जिद, मलेशिया  (Putra masjid, Malaysia)
पुत्र मस्जिद, मलेशिया  (Putra masjid, Malaysia)

शेख जायद बिन सुल्तान मस्जिद, अबू धाबी (Sheikh zayed bin sultan mosque, Abu dhabi)
शेख जायद बिन सुल्तान मस्जिद, अबू धाबी (Sheikh zayed bin sultan mosque, Abu dhabi)

ब्लू मस्जिद , इस्तांबुल (टर्की) (Blue masjid, Turkey)
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क्रिस्टल मस्जिद, मलेशिया (Crystal masjid, Malaysia)
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स्काई बुरिअल(Sky Burial) - एक विभित्स अंतिम संस्कार किर्या - लाश के छोटे छोटे टुकड़े कर खिला देते हैं गिद्धों को
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पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीर




प्रस्तुति-  रेणु दत्ता


एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीर


आज हम आपको महाभारत से जुडी एक अदभुत घटना के बारे में बता रहे है जब महाभारत युद्ध में मारे गए समस्त शूरवीर जैसे की भीष्म, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, कर्ण, शिखंडी  आदि एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे यह घटना महाभारत युद्ध ख़त्म होने के 15 साल बाद घटित हुई थी। साथ ही हम आपको बताएँगे की धृतराष्ट्, गांधारी, कुन्ती और विदुर की मौत कैसे हुई ? आइए इन सब के बारे में विस्तार पूर्वक जानते है -
Unknowm Facts About Mahabharat
Image Credit Wikipedia
15 साल पश्चात धृतराष्ट् गए थे वन :-

राजा बनने के पश्चात हस्तिनापुर में युधिष्ठिर धर्म व न्यायपूर्वक शासन करने लगे। युधिष्ठिर प्रतिदिन धृतराष्ट्र व गांधारी का आशीर्वाद लेने के बाद ही अन्य काम करते थे। इस प्रकार अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी आदि भी सदैव धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा में लगे रहते थे, लेकिन भीम के मन में धृतराष्ट्र के प्रति हमेशा द्वेष भाव ही रहता। भीम धृतराष्ट्र के सामने कभी ऐसी बातें भी कह देते जो कहने योग्य नहीं होती थी।

इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी को पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजर गए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र व गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी, जिसे सुनकर उनके मन में बहुत शोक हुआ। तब धृतराष्ट्र ने सोचा कि पांडवों के आश्रय में रहते अब बहुत समय हो चुका है। इसलिए अब वानप्रस्थ आश्रम (वन में रहना) ही उचित है। गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय ने वन जाने का निर्णय लिया।


कार्तिक पूर्णिमा के दिन वन में गए थे धृतराष्ट्र :-

वन जाने का विचार कर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को बुलाया और उनके सामने पूरी बात कह दी। पहले तो युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ, लेकिन बाद में महर्षि वेदव्यास के कहने पर युधिष्ठिर मान गए। जब युधिष्ठिर को पता चला कि धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय भी वन जा रहे हैं तो उनके शोक की सीमा नहीं रही। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कार्तिक मास की पूर्णिमा को वन के लिए यात्रा करेंगे। वन जाने से पहले धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों व अन्य परिजनों के श्राद्ध के लिए युधिष्ठिर से धन मांगा।

भीम ने द्वेषतावश धृतराष्ट्र को धन देने के इनकार कर दिया, तब युधिष्ठिर ने उन्हें फटकार लगाई और धृतराष्ट्र को बहुत-सा धन देकर श्राद्ध कर्म संपूर्ण करवाया। तय समय पर धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर व संजय ने वन यात्रा प्रारंभ की। इन सभी को वन जाते देख पांडवों की माता कुंती ने भी वन में निवास करने का निश्चय किया। पांडवों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन कुंती भी धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ वन चलीं गईं।


धृतराष्ट्र से मिलने 1 साल बाद गए थे युधिष्ठिर :-

- धृतराष्ट्र आदि ने पहली रात गंगा नदी के तट पर व्यतीत की। कुछ दिन वहां रुकने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, विदुर व संजय कुरुक्षेत्र आ गए। यहां महर्षि वेदव्यास से वनवास की दीक्षा लेकर ये सभी महर्षि शतयूप के आश्रम में निवास करने लगे। वन में रहते हुए धृतराष्ट्र घोर तप करने लगे। तप से उनके शरीर का मांस सूख गया। सिर पर महर्षियों की तरह जटा धारण कर वे और भी कठोर तप करने लगे। तप से उनके मन का मोह दूर हो गया। गांधारी और कुंती भी तप में लीन हो गईं। विदुर और संजय इनकी सेवा में लगे रहते और  तपस्या किया करते थे।

इस प्रकार वन में रहते हुए धृतराष्ट्र आदि को लगभग 1 वर्ष बीत गया। इधर हस्तिनापुर में एक दिन राजा युधिष्ठिर के मन में वन में रह रहे अपने परिजनों को देखने की इच्छा हुई। तब युधिष्ठिर ने अपने सेना प्रमुखों को बुलाया और कहा कि वन जाने की तैयारी करो। मैं अपने भाइयों व परिजनों के साथ वन में रह रहे महाराज धृतराष्ट्र, माता गांधारी व कुंती आदि के दर्शन करूंगा। इस प्रकार पांडवों ने अपने पूरे परिवार के साथ वन जाने की यात्रा प्रारंभ की। पांडवों के साथ वे नगरवासी भी थे, जो धृतराष्ट्र आदि के दर्शन करना चाहते थे।


युधिष्ठिर के शरीर में समा गए थे विदुरजी के प्राण :-

पांडव अपने सेना के साथ चलते-चलते उस स्थान पर आ गए, जहां धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती रहते थे। जब युधिष्ठिर ने उन्हें देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए और मुनियों के वेष में अपने परिजनों को देखकर उन्हें शोक भी हुआ। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती भी अपने पुत्रों व परिजनों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। जब युधिष्ठिर ने वहां विदुरजी को नहीं देखा तो धृतराष्ट्र से उनके बारे में पूछा। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कठोर तप कर रहे हैं। तभी युधिष्ठिर को विदुर उसी ओर आते हुए दिखाई दिए, लेकिन आश्रम में इतने सारे लोगों को देखकर विदुरजी पुन: लौट गए।

युधिष्ठिर उनसे मिलने के लिए पीछे-पीछे दौड़े। तब वन में एक पेड़ के नीचे उन्हें विदुरजी खड़े हुए दिखाई दिए। उसी समय विदुरजी के शरीर से प्राण निकले और युधिष्ठिर में समा गए। जब युधिष्ठिर ने देखा कि विदुरजी के शरीर में प्राण नहीं है तो उन्होंने उनका दाह संस्कार करने का निर्णय लिया। तभी आकाशवाणी हुई कि विदुरजी संन्यास धर्म का पालन करते थे। इसलिए उनका दाह संस्कार करना उचित नहीं है। यह बात युधिष्ठिर ने आकर महाराज धृतराष्ट्र को बताई। युधिष्ठिर के मुख से यह बात सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ।

यमराज के अवतार थे विदुर :-

युधिष्ठिर आदि ने वह रात वन में ही बिताई। अगले दिन धृतराष्ट्र के आश्रम में महर्षि वेदव्यास आए। जब उन्हें पता चला कि विदुरजी ने शरीर त्याग दिया तब उन्होंने बताया कि विदुर धर्मराज (यमराज) के अवतार थे और युधिष्ठिर भी धर्मराज का ही अंश हैं। इसलिए विदुरजी के प्राण युधिष्ठिर के शरीर में समा गए। महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती से कहा कि आज मैं तुम्हें अपनी तपस्या का प्रभाव दिखाऊंगा। तुम्हारी जो इच्छा हो वह मांग लो।

तब धृतराष्ट्र व गांधारी ने युद्ध में मृत अपने पुत्रों तथा कुंती ने कर्ण को देखने की इच्छा प्रकट की। द्रौपदी आदि ने कहा कि वह भी अपने परिजनों को देखना चाहते हैं। महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ऐसा ही होगा। युद्ध में मारे गए जितने भी वीर हैं, उन्हें आज रात तुम सभी देख पाओगे। ऐसा कहकर महर्षि वेदव्यास ने सभी को गंगा तट पर चलने के लिए कहा। महर्षि वेदव्यास के कहने पर सभी गंगा तट पर एकत्रित हो गए और रात होने का इंतजार करने लगे।


विधवा स्त्रियां अपने पतियों के साथ कूद गई थीं गंगा में :-

रात होने पर महर्षि वेदव्यास ने गंगा नदी में प्रवेश किया और पांडव व कौरव पक्ष के सभी मृत योद्धाओं का आवाहन किया। थोड़ी ही देर में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अभिमन्यु, धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, घटोत्कच, द्रौपदी के पांचों पुत्र, राजा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, शकुनि, शिखंडी आदि वीर जल से बाहर निकल आए। उन सभी के मन में किसी भी प्रकार का अंहकार व क्रोध नहीं था। महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र व गांधारी को दिव्य नेत्र प्रदान किए। अपने मृत परिजनों को देख सभी के मन में हर्ष छा गया।

सारी रात अपने मृत परिजनों के साथ बिता कर सभी के मन में संतोष हुआ। अपने मृत पुत्रों, भाइयों, पतियों व अन्य संबंधियों से मिलकर सभी का संताप दूर हो गया। तब महर्षि वेदव्यास ने वहां उपस्थित विधवा स्त्रियों से कहा कि जो भी अपने पति के साथ जाना चाहती हैं, वे सभी गंगा नदी में डुबकी लगाएं। महर्षि वेदव्यास के कहने पर अपने पति से प्रेम करने वाली स्त्रियां गंगा में डुबकी लगाने लगी और शरीर छोड़कर पतिलोक में चली गईं। इस प्रकार वह अद्भुत रात समाप्त हुई।

आग में जल कर हुई धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु :-

इस प्रकार अपने मृत परिजनों से मिलकर धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व पांडव बहुत प्रसन्न हुए। लगभग 1 महीना वन में रहने के बाद युधिष्ठिर आदि पुन: हस्तिनापुर लौट आए। इस घटना के करीब 2 वर्ष बाद एक दिन देवर्षि नारद युधिष्ठिर के पास आए। युधिष्ठिर ने उनका स्वागत किया। जब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि वे गंगा नदी के आस-पास के तीर्थों के दर्शन करते हुए आए हैं तो युधिष्ठिर ने उनसे धृतराष्ट्र, गांधारी व माता कुंती के बारे में पूछा। तब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि तुम्हारे वन से लौटने के बाद धृतराष्ट्र आदि हरिद्वार चले गए। वहां भी उन्होंने घोर तपस्या की।

एक दिन जब वे गंगा स्नान कर आश्रम आ रहे थे, तभी वन में भयंकर आग लग गई। दुर्बलता के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती भागने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने उसी अग्नि में प्राण त्यागने का विचार किया और वहीं एकाग्रचित्त होकर बैठ गए। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया। संजय ने ये बात तपस्वियों को बताई और वे स्वयं हिमालय पर तपस्या करने चले गए। धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु का समाचार जब महल में फैला तो हाहाकार मच गया। तब देवर्षि नारद ने उन्हें धैर्य बंधाया। युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक सभी का श्राद्ध कर्म करवाया और दान-दक्षिणा देकर उनकी आत्मा की शांति के लिए संस्कार किए।   (यदि आप और पौराणिक कहानियाँ पढ़ना चाहे तो यहाँ पढ़े - पौराणिक कथाओं का विशाल संग्रह )

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