गुरुवार, 9 जून 2022

लिच्छवी । शाक्य-गौतम क्षत्रिय वंश

 #क्षत्रियों में एक वंश पाया जाता है #लिच्छवी । शाक्य-गौतमों के बाद शायद यही क्षत्रियों का सबसे प्राचीन वंश है या यूं कह लीजिए दोनों एक ही वंश की दो भिन्न शाखाएं हैं। 

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       वैसाली गणराज्य के निर्माता होने के कारण क्षत्रियों के इस वंश को इतिहास में वैस/बैस नाम से भी जाना जाता है।


        नेपाल के अंशुवर्मन और सम्राट हर्षवर्धन वैस जैसी अनेकों विभूतियां इसी महान लिच्छवी कुल की देन हैं ।इन्हीं अनगिनत विभूतियों में से एक अमर शहीद राजा राव रामबख्श सिंह जी का आज बलिदान दिवस है। 

       लिच्छवी कुल-गौरव राजा राव रामबख्श सिंह डौंडियाखेड़ा रियासत के राजा थे 1857 में जब स्वतंत्रता का बिगुल बजा ।तो अवध-पूर्वांचल के सभी राजाओं/जमीदारों की भांति रणोन्मत्त राजा राव रामबख्श सिंह भी संग्राम में कूद पड़े। 

         हमारे यहाँ एक लोकश्रुति है कि यदि सकुशल जीवन जीना चाहते हैं। तो भूरे रंग की आंख वाले ठाकुर से कभी नहीं उलझना चाहिए ।कहते हैं कि ऐसी आंखों वाला ठाकुर शेर की मानिंद अत्यधिक रौद्र स्वभाव का होता है ।कब झपट्टा मारकर आपके जीवन का अंत कर दें कुछ पता नहीं चलता। 

       ब्रिटिश हुकूमत को नाकों चने चबवा देने वाले भूरी आंखों के राजा राव रामबख्श सिंह ने अपने रणकौशल से बताया कि कोई लोकश्रुति यूँ ही अकारण नहीं बन जाती।

        रायबरेली के राजा राणा बेनीमाधव सिंह वैस और डौंडियाखेड़ा के राजा राव रामबख्श सिंह वैस के नेतृत्व में लिच्छवियों ने कानपुर-लखनऊ मार्ग में ब्रिटिश सेनापतियों को कई युद्धों में पराजित किया ।

      इसके बाद राजा राव रामबख्श सिंह ने दिलेश्वर मंदिर के पीछे छिपे जनरल डिलाफ़स सहित 12 अंग्रेजों को जिंदा जला दिया।बौखलाई ब्रिटिश सेना ने जनरल हैवलॉक के नेतृत्व में जून 1857 और नवम्बर 1858 में उनके किले पर दो-दो बार तोपों से आक्रमण किया।

       तोपों के अनवरत प्रहार से राजा राव रामबख्श सिंह का किला तो नेस्ताबूत हो गया ।लेकिन हैवलॉक ये देखकर हैरान था कि रामबख्श सिंह चमत्कारिक रूप से किले से सुरक्षित निकल सेमरी पहुंच गए ।

      क्रोधोन्मत्त ब्रिटिश सेना सेमरी की ओर बढ़ गई। जहां उसे जामिनपुर, सिरियापुर, बजौरा के त्रिकोणीय क्षेत्र में लिच्छवियों की भयंकर मोर्चाबंदी का सामना करना पड़ा। 

     आधुनिक हथियारों एवं तोपों से युक्त ब्रिटिश सेना बेहद कठिन एवं लंबे चले इस युद्ध में संसाधनहीन लिच्छवियों को पराजित करने में तो सफल हो गई ।

     किंतु राजा राव रामबख्श सिंह एकबार फिर चमत्कारिक रूप से निकल बनारस पहुंच गए और वहां सन्यासी का वेश धारण कर पुनः सेना संगठित करने लगे ।

      लेकिन इस देश का दुर्भाग्य कि चिरकाल से ही इस देश के लोगों से ही इस देश को दो स्वर मिले, कानपुर कैंट में अंग्रेजो को रसद पहुंचाने वाले चंदन लाल खत्री ने अक्टूबर में 1859 में राजा राव रामबख्श सिंह की अंग्रेजों से मुखबिरी कर दी ।

     इस विश्वासघात के कारण एक बार फिर युद्ध झेडने की तैयारी कर रहे राजा राव रामबख्श सिंह अपने सहयोगियों शिवरतन सिंह, चंद्रिका बख्श सिंह, जगमोहन सिंह, लाख सिंह, रामप्रसाद सिंह, यदुनाथ सिंह, बिहारी सिंह, राम सिंह, छेदी सिंह जैसे अपने तमाम साथियों समेत गिरफ्तार कर काशी से रायबरैली ले आये गए ।

      जहां 28 दिसम्बर 1859 के दिन सभी को फांसी दे दी गई। राजा राव रामबख्श सिंह ने फांसी के फंदे पर भी अंग्रेजों को हैरान किया ।

      उन्हें लगातार तीन बार फांसी दी गई ।लेकिन हर बार फांसी का फंदा टूट जाता ।जैसे वो अंग्रेजो के हाथों मरने को ही तैयार न थे ।फिर स्वयं अपने हाथों से ही फांसी का फंदा बनाया और इस देश पर कुर्बान हो गए।

     हम क्षत्रिय हैं ।इतिहास गवाह है कि हमारे लिए सर्वदा प्राणों का मोह त्याज्य रहा। हमें अफसोस है तो बस इसका कि सबाल्टर्न हिस्ट्री के नाम पर क्रिएट की गई वृंदावन लाल वर्मा की कपोल-कल्पना जिस झलकारी बाई का कभी कोई अस्तित्व ही नहीं रहा ।

      वोटों के लिए उसे इस देश के प्रधानमंत्री तक याद करते हैं। लेकिन जिन बलिदानियों ने इस देश पर अपना जीवन होम कर दिया। आज उनका कोई नाम लेवा तक नहीं ।

     क्योंकि हम ठाकुरों का कोई वोटबैंक नहीं ।इसलिए हमारी कुर्बानी भी आज बिल्कुल मायने नहीं रखती ।वो भी तब जब पूरी दुनिया में हमारे राजनेता/कवि डींगें मारते हों कि हमने दुनिया को पहला गणतंत्र दिया ।

     लेकिन सत्य ये है कि हम अपने देश में ही उस गणतंत्र के निर्माताओं को आदर देना तो छोड़िए ।उन्हें उनके बलिदान दिवस पर भी स्मरण नहीं करते। 

      राजा राव रामबख्श सिंह के बलिदान को इस देश की सरकारों ने भले ही कभी न याद किया हो ।लेकिन 2013 में जैसे ही एक साधु शोभन सरकार ने राजा राव रामबख्श सिंह के किले में लाखों टन सोना होने का दावा किया ।

      पूरा सरकारी तंत्र उनके किले की खुदाई के लिए पहुंच गया और उनका किला जो पहले ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था ।सोना पाने के लोभ में सरकारों ने उसका भी उत्खनन कर किले को पूरी तरह से खंडहर में तब्दील कर दिया।

      तब से लेकर आज तक न उनके किले की कोई सुधि ली गई और न ही अमर शहीद राजा राव रामबख्श सिंह की। समझ नहीं आता कितने बलिदानों से इस देश का पेट भरेगा ।क्षत्रियों ने सब तो कुर्बान कर दिया अपना,खैर...


#अमर_शहीद_राजा_राव_रामबख्श सिंह जी को #बलिदान दिवस पर नमन...नमो बुद्धाय🙏💐


#लिच्छवी #वैसाली #वैस #राजा_राव_रामबख्श_सिंह


- कॉपी 


तस्वीर- राजा साहब के डौंडियाखेड़ा किले में बने मंदिर की है।


#राजन्य_क्रॉनिकल्स_टीम

मंगलवार, 7 जून 2022

भारत की जल संस्कृति-5

 


जलविज्ञान के आविष्कर्ता ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ और उनके जलचिकित्सा मंत्र


लेखक:- डॉ. मोहन चन्द तिवारी

विश्व की प्राचीनतम सभ्यता वैदिक सभ्यता का उद्भव व विकास सिन्धु-सरस्वती और गंगा-यमुना की नदी-घाटियों में हुआ. इसी लिए इस संस्कृति को ‘नदीमातृक संस्कृति’ के रूप में जाना जाता है.ऋग्वेद के मंत्रों में यह प्रार्थना की गई है कि ये मातृतुल्य नदियां लोगों को मधु और घृत के समान पुष्टिवर्धक जल प्रदान करें-


“सरस्वती सरयुः सिन्धुरुर्मिभिर्महो

महीरवसाना यन्तु वक्षणीः.

देवीरापो मातरः सूदमित्न्वो

घृत्वत्पयो मधुमन्नो अर्चत..”

            – ऋ.,10.64.9


वैदिक कालीन भारतजनों ने ही सरस्वती नदी के तटों पर यज्ञ करते हुए इस ब्रह्म देश को सर्वप्रथम ‘भारत’ नाम प्रदान किया था जैसा कि ऋग्वेद के इस मन्त्र से स्पष्ट है-


“विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्.”

                          -ऋग्वेद,3.53.12


सरस्वती नदी के तटों पर रची बसी भारत जनों की इस सभ्यता को सारस्वत सभ्यता और वहां की नदीमातृक संस्कृति को ‘भारती’ के रूप में पहचान देने वाली भी यदि कोई नदी है तो वह सरस्वती नदी ही है जिसका ऐतिहासिक प्रमाण ऋग्वेद के अनेक मन्त्रों में स्वयं मिल जाता है-


“सरस्वती साधयन्ती धियं न

इलादेवी भारती विश्वतूर्तिः.”

           – ऋग्वेद‚2.3.8


भारत के प्राचीन इतिहास की दृष्टि से वेदों के मंत्रद्रष्टा ऋषियों में ‘सिन्धुद्वीप’ सबसे पहले जलविज्ञान के आविष्कारक ऋषि हुए हैं.ऐतिहासिक दृष्टि से ‘सिन्धुद्वीप ऋषि की पहचान भारत वंशी इक्ष्वाकुवंश के 47वीं पीढ़ी में हुए सूर्यवंशी राजा अम्बरीष के पुत्र के रूप में की जा सकती है-

ऋग्वेद का एक सूक्त‚ अथर्ववेद के तीन सूक्त‚ यजुर्वेद के15 मंत्रों और सामवेद के चार मंत्रों का ऋषित्व ‘सिन्धुद्वीप’ को प्राप्त है. सिन्धुद्वीप ऋषि के इन सभी सूक्तों और मंत्रों की विशेषता है कि इनके देवता ‘आपो देवता’ हैं.


जल विज्ञान की दृष्टि से ‘सिन्धुद्वीप’ ही वे सर्वप्रथम भारतीय चिन्तक थे जिन्होंने जल के प्रकृति वैज्ञानिक‚ सृष्टि वैज्ञानिक‚ मानसून वैज्ञानिक‚कृषि वैज्ञानिक‚ दुर्ग वैज्ञानिक तथा ओषधि वैज्ञानिक महत्त्व को वैदिक संहिताओं के काल में ही उजागर कर दिया था. प्राकृतिक जलचक्र अर्थात् ‘नैचुरल सिस्टम ऑफ हाइड्रोलौजी’ जैसे आधुनिक जल विज्ञान की अवधारणा का भी सर्वप्रथम आविष्कार सिन्धुद्वीप ऋषि ने ही किया था.


बहुत कम लोग जानते कि आज ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव की आराधना का जो मंत्र प्रचलित है वस्तुतः वह सिन्धुद्वीप ऋषि का ही जलदेवता विषयक मंत्र है जिसमें प्रार्थना की गई है कि जिस जल को हम प्रतिदिन पीते हैं वह शुद्ध हो‚स्वास्थ्य रक्षक हो और कल्याणकारी हो-


“शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये.

शं योरभि स्रवन्तु नः. -ऋग्वेद‚10.9.4

जल चाहे सूखाग्रस्त प्रांत रेगिस्तान का हो या सिन्धु नदी का‚ समुद्रों‚ सरोवरों‚ कूपों तथा घड़ों में विद्यमान सभी प्रकार के जलों के शुद्ध होने की कामना जलवैज्ञानिक ऋषि ‘सिन्धुद्वीप’ ने अपने ‘आपो देवता’ सूक्त में की है –


“शं न आपो धन्वन्या३:शमुशन्त्वनूप्याः.

शं नः खनित्रिमा आपः शमु याः कुम्भ

आभृताः शिवा नः सन्तु वार्षिकीः..”

                      – अथर्व.‚1.6.4


अर्थात् सूखाग्रस्त प्रांतों का जल हमारे लिए कल्याणकारी हो. जलमय देशों का जल हमें सुख प्रदान करे.भूमि से खोद कर निकाला गया कुएं नौलों आदि का जल हमारे लिए सुखकारी हो. पात्र में रखा हुआ जल हमें शान्ति प्रदान करे और वर्षा से प्राप्त जल हमारे जीवन में सुख शान्ति की वृष्टि करने वाला बने.


जल का निवास पृथ्वी पर है. अन्तरिक्ष में भी जल व्याप्त है. समुद्र, जल का आधार है तथा समुद्र से ही जल, वाष्प बन कर वर्षा के रूप में धरती पर आता है.अथर्ववेद में कहा गया है कि जल ही परमौषधि है. जल रोगों को दूर करता है.जल सब बीमारियों का नाश करता है.इसलिये, यह तुम्हें भी,सभी कठिन बीमारियों से दूर रखे-


“आपो इद्धा उ भेषजोरापो अभीव चातनीः.

आपः सर्वस्य भषजोस्तान्तु कृण्वन्तु भेषजम्॥”

-अथर्ववेद,3.7.5

वेद’ मानव जाति के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं. इनकी भाषा भी बहुत पुरातन होने के कारण दुर्बोध है.वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने ‘जल’ की दिव्य उत्पत्ति के विज्ञान को किस तरह आत्मसात किया और उसके मन्त्रों का अपने दैनिक जीवन के किन-किन कार्यों में ‘विनियोग’ किया, यह जाने बिना हमारा भारत की जल संस्कृति से सम्बंधित ज्ञान अपूर्ण ही रहेगा.अतः यहां जन सामान्य की जानकारी हेतु वेदों से संकलित जल-सम्बंधी कुछ मन्त्र दिए जा रहे हैं जिन्हें ‘आपो देवता-सूक्त’ के नाम से भी जाना जाता है.

भारत में जल और वनस्पतियों को अभिमंत्रित करके रोग शान्ति की परंपरा भी हजारों वर्षों से चली आई है. इस दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद के जल चिकित्सा से सम्बन्धित ये ‘अपांभेषज’ मंत्र भारतीय जलविज्ञान और आरोग्यशास्त्र की अमूल्य धरोहर हैं.

ऋग्वेद के दसवें मंडल के नौवें सूक्त में ‘सिन्धुद्वीप’ ऋषि के ‘अपांभेषज’ के नाम से प्रसिद्ध ‘जल चिकित्सा’ से सम्बन्धित आरोग्य और आयुष्य प्रदान करने वाले ऐसे नौ मंत्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं.सिन्धुद्वीप ने चन्द्रमा की रश्मियों से संशोधित जल और सूर्य की रश्मियों से वाष्पीभूत जल को ‘भेषज’ अर्थात् ओषधि तुल्य माना है.वैदिक पद्धति से विनियोग सहित यदि इन मन्त्रों का विधिवत उच्चारण करते हुए जल को अभिमंत्रित किया जाए तो उससे अनेक प्रकार के दुस्साध्य रोग भी शांत हो सकते हैं.

भारत में जल और वनस्पतियों को अभिमंत्रित करके रोग शान्ति की परंपरा भी हजारों वर्षों से चली आई है. इस दृष्टि से ऋग्वेद और अथर्ववेद के जल चिकित्सा से सम्बन्धित ये ‘अपांभेषज’ मंत्र भारतीय जलविज्ञान और आरोग्यशास्त्र की अमूल्य धरोहर हैं. ऋग्वेद के ‘अपांभेषज’ नामक नौ  मंत्र हिंदी भावार्थ सहित इस प्रकार हैं-


1. “आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन.

महे रणाय चक्षसे..” -ऋग्वेद,10.9.1

-हे आपः! (जलदेवता) आप प्राणीमात्र को सुख देने वाले हैं. सुखोपभोग एवं संसार में रमण करते हुए,हमें उत्तम दृष्टि की प्राप्ति हेतु पुष्ट करें.


2.”यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेहः नः.

उशतीरिव मातरः..” -ऋग्वेद,10.9.2

-हे जलदेवता! आपका स्नेह उमड़ता ही रहता है, ऐसी माताओं की भाँति, आप अपने सबसे अधिक कल्याणप्रद रस (आनन्द) में हमें भी सम्मिलित करें.


3.”तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ.

आपो जनयथा च नः..” -ऋग्वेद,10.9.3

-हे जल के दिव्य प्रवाह! अन्न आदि उत्पन्न कर प्राणीमात्र का पोषण करने वाले आपो देवता! हम आपका सान्निध्य पाना चाहते हैं. हमारी अधिकतम वृद्धि हो.

4.“शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये.

शं योरभि स्रवन्तु नः. -ऋग्वेद‚10.9.4

-हे दिव्यगुणों से युक्त आपः (जल) हमारे लिए हर प्रकार से कल्याणकारी और हर्षकारक  हों. वह दिव्य जल हमारी आकांक्षाओं की पूर्ति करके हमें आरोग्य प्रदान करे.


5.”ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्.

अपो याचामि भेषजम्..” -ऋग्वेद,10.9.5

-हे व्याधि निवारक दिव्य गुणों से युक्त जल देवता! हम आपका आवाहन करते हैं. हम औषधि रूप दिव्य जल से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें सुख-समृद्धि प्रदान करे.


6.“अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा.

अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. -ऋग्वेद,10.9.6

– हे दिव्य ‘आपः’! (जल देवता!) ‘सोम’ यानी चन्द्रमा ने हमें बताया है कि आप हमारे लिए हर प्रकार से औषधीय गुणों से युक्त हैं.उसमें कल्याणकारी अग्नि भी विद्यमान रहती है.


7.”आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम.

ज्योक्च सूर्यं दृशे॥” -ऋग्वेद,10.9.7

-हे जल देवता आपः! मैं आपकी कृपा से दीर्घकाल तक सूर्य को देखता रहूं अर्थात् दीर्घ आयु प्राप्त करुं. आप मेरे शरीर के लिए आरोग्यवर्धक दिव्य औषधियाँ प्रदान करते रहो.

8.इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि.

यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम्॥”

-ऋग्वेद,10.9.8

-हे ‘आपः’! (जल देवता!) मुझ में जो कुछ दुष्कर्म हैं, मैंने जो द्रोह, विश्वासघात किया है या मैंने जो अपशब्द कहे हैं या मैंने जो झूठ बोला है,उन सबको जल बहा ले जाए.


9. “आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि.

      पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा॥”

                           -ऋग्वेद,10.9.9


आज हमने जल में प्रविष्ट होकर अवभृथ स्नान कर लिया है. इस प्रकार जल में प्रवेश करके हम रस से आप्लावित (आनन्दित) हो गए हैं. हे पयस्वान्! हे अग्निदेव! आप हमें वर्चस्वी बनाएँ. हम आपका स्वागत करते हैं.

✍🏻मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित आलेख

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

बिहार में कैसे बसे अम्बष्ठ कायस्थ्य

 अंबष्ट बिहार में आकर कैसे बसे?

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 भारत पर आक्रमण के पूर्व सिकंदर ने सीमावर्ती राजा आंबि को सूचित किया की या तो वह समर्पण करे या युद्ध। निज स्वार्थ में आम्बि ने समर्पण करना तय किया, लेकिन उसके बहादुर सत्रपों को यह स्वीकार नहीं हुआ। उन बहादुर सत्रपों में पोरू के बारे में आप सब जानते हैं। मगर आम्बि के अंबष्ट सत्रप के युद्ध की कहानी आपमें से अधिकतर लोग नहीं जानते हैं। उन्होंने भी पोरू की तरह समर्पण स्वीकार नहीं किया। 

 सिकन्दर के साथ अंबष्ट बड़े बहादुरी से लड़ कर भी पराज़ित हुए। पर इस युद्ध में सिकन्दर घायल हो गया था। क्षुब्ध हो उसने अंबाष्टों को आमूल नाश करने का आदेश अपनी सेना को दिया। संकट के इस विकराल घड़ी में जाति ने हथियार छोड़ आस पास के जन जीवन में विलुप्त होने का निश्चय किया। चेनब नदी के मुहाने से वह महाकाल यानि उज्जैन की ओर रवाना हो गए। 


अंबष्ट-सिकंदर युद्ध को दो महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने नज़दीक से देखा था। एक था सिकंदर का निज इतिहासकार, डीयोदोरस। दूसरा सिकंदर के युद्ध के तरीक़े को समझने के लिए छद्मवेश में उसकी सेना में छिपा चंद्रगुप्त, जिसने घनानंद को सत्ता से हटाने के बाद बहादुर अंबाष्टों को अपनी राजधानी में बसनें के लिए आमंत्रित किया।


चंद्रगुप्त के आमंत्रण पर वह मगध गए नदी के किनारे किनारे वाले रास्ते से। राजगृह के १०० कोस के अंदर फैले गाँव में चंद्रगुप्त ने उन्हें बसाया।उनका ख़ासघर इन गाँव के नाम पर पड़ा। 


मगध क्षेत्र में अम्बस्थों का  उपनाम/खासघर और मूल गांव निम्नानुसार है:


1. कोचगवें-- कोचगवां/कोचगांव

2.  डेढ़गवें-- डेढ़गवां

3. हरगवें-- हरगवां

4.  तेतरवें-- तेतरवां

5.  परबतिआर--परबती, ब्लाक काशीचक, जिला नवादा, बिहार

6.  मलदहिआर-- मलदह

7.  घोरसवें-- घोरसवां

8.  निमीआर-- निमी

9.  दत्तकुलिआर--  कुल

10. नन्दकुलिआर-- ननन्द कुल

11. गिरियार-- गिरियक/प्राचीन नाम गिरिया

12. मैजोरवार-- मैजरा

13. राजगृहार--राजगृह/राजगीर

14.  बिरनवें--बिरनवां, ब्लाक चंडी,जिला नालन्दा बिहार

15.  समैयार--समै

16.  मंजौरवार/मंजरवार--मंजौर

17.  मलतियार-- मलती

18.  बरदिहार-- बागी बरडिहा

19.  लोहरवें-- लोहरवां

20.  बडगवें-- बडगवा

21.  ओन्दवार-- ओन्दा

22. लोहरे-- ल़ोहरपुरा

23. मंजरवें-- मंजरवां

24. संदवार-- संदवा

25. जमुआर-- जमुआवां, ब्लाक वज़ीरगंज जिला गया बिहार

26. कसरे-- गांव कसर, ब्लाक अरियारी, जिला शेखपुरा बिहार

27. बरगवें-- बरगवां

28. गोरौरिआर/गौरियार-- गोरौर

29. कतरवार-- कतरपुर

30. पुरिआर-- पुरी

31. कटरिआर/कटरियार-- कटारी

32. कत्रीआर/कत्रीयार-- कत्री

33. बिलवार-- बिलारी

34. बरहरिआर-- बरहरि 

35. पचवरे-- पचवारा

36. बिशोखिआर-- बिजोखरि

37. बरिआर-- बरिआ कलान/खुर्द

38. चंडगवें-- चंडी

39.  बेढनवें-- बेढ़ना

40.  रुखीआर-- रुखी/पंचरुखी/कोशी रुखी

41. ओदन्तिआर (ओखन्डिआर?)-- ओदन्तपुरी (बिहारशरीफ)

42.  कुमारपटने-- कुम्हरार, पटना

43.  प्रभुपटने-- नौजरघाट, पटना सिटी

44.  नागपटने-- नागला,फतुहा

45.  करपटने-- पटना सैटेलाइट गांव

46.  पानपटने-- पटना सैटेलाइट गांव

47.  नेपटने-- पटना सैटेलाइट गांव


नवादा जिले में पडने वाले अन्य मूल गांव और उपनाम/खासघर

48. पचगवें-- पचगांव

49. बिसियत-- बिसियैत 

50. नरहटिआर-- नरहट

51. गेहिलवार-- गेहलौर

52. अत्रियार/त्रियार-- अत्रि 

53. मनवंश रतनमन--सौर(?)

54. सनोखरे/सोनखरे-- सनोखरा

55. कथोटवार-- कथोकारी


पटना (P) और अम्बा-कुटुम्बा (A) मध्य अम्बस्थों का मूल गांव और उपनाम/खासघर

56. मंदीलवार-- मंदील

57. भरथुआर-- भरथुआ

58. दराद-- दरार

59. सकरदिहार-- सकरडीह 

60.  महथा-- महथा

61. इंतहार/इतेहयार/ईतेहवार--इतवां (Itwan) हसपुरा


कुटुम्बा तहसील औरंगाबाद जिला अन्तर्गत सोन नदी के किनारे और उसके पास अम्बस्थ का मूल गांव और उपनाम/खासघर

62. धुंधुआर-- धुंधुआ

63. कसौटिआर--कसौटी तथा

64. जयपुरियार-- जयपुर


गया शहर के सैटेलाइट गांव जो अम्बस्थों का मूल गांव और उपनाम/खासघर

65. सनौटिआर-- सनौट/सोनौट

66. काकन्दवार-- चाकन्द

67. गयावर-- गया का सैटेलाइट गांव

68. गयादत्त-- गया का सैटेलाइट गांव

69. गयासेन-- गया का सैटेलाइट गांव

70. गजरे गयासेन-- गया का सैटेलाइट गांव


गया (चाकन्द-मानपुर) तथा अम्बा-कुटुम्बा (औरंगाबाद) के मध्य गांव जो अम्बस्थों का मूल गांव और उपनाम/खासघर

71. परैवार/परैयार-- परैया-खुर्द

72. कस्तुआर/कस्थुआर-- कस्ठा


पुराना गया जिला के अन्तर्गत पडने वाले मूलगांव तथा उपनाम/खासघर

73. त्रियार/तेरियार आदि-- अत्रि, गया जिला

74. दफ्थुआर/दफ्थुआर-- दब्थु (दफ्थु) हुलासगंज जहानाबाद 


अन्य खासघर का नाम जिससे इंगित होने वाले मूल गांव की पहचान अभी तक नहीं हो सकी है


01.  बेदसेन 

02. डुमरवें/डुमरसेन (डुमरे), ब्लॉक बिहारशरीफ, नालन्दा

03. बरतिआर, 

04. चारगवें

05. चखैआर/चखैयार, 

06. जरुहार

07. जमैयार,

08. जोरीहार, 

09. बेदसेन

10.  सरिआर, मूलगांव सरे, ब्लाक अस्थवां जिला नालन्दा

11. नहसेन,

12. लखैयार

13. रियार 

14. गजरे सेन, 

15. गजरे पानसेन, 

16. जेवार--जिआर (Jiar) ब्लॉक अस्थवां (नालन्दा)

17. शंखेरमन/संखेरमन, Manshankhre

18ए.शाण्डिल्यवार

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

आयु और परिपक्वता

 *शरीर की आयु बढ़ने से जीवन में परिपक्वता का कोई भी संबंद्ध नही है, कोई 70 साल का बूढ़ा होकर भी अपरिपक्व होता है और कोई 40 साल का जवान भी परिपक्व हो सकता है।*

 परिपक्व व्यक्ति वह है जिसने जीवन के अनुभवों से सिखा है मेरी नज़र में-


1. परिपक्वता वह है - जब आप दूसरों को बदलने का प्रयास करना बंद कर दे, इसके बजाय स्वयं को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करें।


2. परिपक्वता वह है –  जब आप दूसरों को, जैसे हैं, वैसा ही स्वीकार करें।


3. परिपक्वता वह है –  जब आप यह समझे कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी सोच अनुसार सही हैं।


4. परिपक्वता वह है –  जब आप "जाने दो" वाले सिद्धांत को सीख लें।।


5. परिपक्वता वह है –  जब आप रिश्तों से लेने की उम्मीदों को अलग कर दें और केवल देने की सोच रखे।


6. परिपक्वता वह है –  जब आप यह समझ लें कि आप जो भी करते हैं, वह आपकी स्वयं की शांति के लिए है।


7. परिपक्वता वह है –  जब आप संसार को यह सिद्ध करना बंद कर दें कि आप कितने अधिक बुद्धिमान है।


8. परिपक्वता वह है –  जब आप दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना बंद कर दे।


9. परिपक्वता वह है –  जब आप दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कर दें।


10. परिपक्वता वह है –  जब आप स्वयं में शांत है।


11. परिपक्वता वह है –  जब आप जरूरतों और चाहतों के बीच का अंतर करने में सक्षम हो जाए और अपनी चाहतो को छोड़ने को तैयार हो।


12. आप तब परिपक्वता प्राप्त करते हैं –  जब आप अपनी ख़ुशी को सांसारिक वस्तुओं से जोड़ना बंद कर दे।

लोक संदर्भ में जीवन और लोकचार

 लोक परंपराओं और कहावतों आदि पर यदि ध्यान देंगे तो वो स्थानीय परिवेश को समेकित किये होती हैं। जैसे बर्फीले देशों की कहावतों में आइस, पेंगुइन आदि आयेगा क्योंकि उनके परिवेश में वो सहज उपलब्ध है। भारत की किसी कहावत में पेंग्विन नहीं होगा क्योंकि भारत में पेंग्विन नहीं होता। भारत की कहावत होगी, धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का। बाहर देशों में न भारत वाला धोबी है न उसका घाट है। तो इस तरह से परिवेश का समेकन भाषा में परिलक्षित होता है।


यदि आपसे कोई कहे कि भाषा सम्प्रेषण का माध्यम मात्र है तो उसे अज्ञानी समझकर मान जाइयेगा पर यदि वो अपना है तो उसे बताइयेगा कि भाषा संस्कृति की वाहक है। हर भाषा अपना पूरा समाज, पूरा दर्शन, पूरी पारिस्थितिकी आदि अपने अंदर सँजोये रखती है।


विश्व में सैकड़ों रामायण हैं। हर रामायण ने अपने परिवेश के अनुसार पात्रों व घटनाओं में कुछ न कुछ परिवर्तन किया है। जैसा कि हमने अभी देखा कि भाषा कैसे परिवेश की वाहक है, तो वैसे ही हर रामायण का स्थानीयकरण(localization) हुआ।


थाईलैंड की थाई रामायण में एक प्रसंग है। जब प्रभु सागर में सेतु निर्माण कर रहे थे तो सेतु की लम्बाई बढ़ नहीं रही थी। लोग चिंतित हुये कि ऐसा क्यों हो रहा है तो हनुमानजी पता लगाने निर्माणाधीन सेतु के अंतिम छोर तक गये। वहाँ जाकर इन्होंने देखा कि रावण के भेजे जलीय जीव सेतु से पत्थर चुरा कर ले जा रहे हैं। उन जलीय जीवों का नेतृत्व एक समुद्री ड्रेगन कर रहा था। फिर क्या हुआ, महाबली की क्रोध आया और ड्रेगन के मुँह से पत्थर छीन कर उसको पटक पटक कर इतना मारा कि उसके बैंकॉक का पट्टाया बन गया। खून खच्चर हो गया एकदम।


इस दृश्य को बैंकाक के एमेराल्ड बुद्ध मन्दिर में भित्तिचित्र के रूप में उकेरा गया है। बैंकाक जाने वाले मित्र इसकी पुष्टि कर सकते हैं।


यानी प्रभु श्रीराम ने ड्रेगन को भले न मारा हो, हनुमानजी ने समुद्री ड्रेगन को चीर फाड़ के थाईलैंड के तट पर फेंक दिया था। 

#हरि_अनन्त_हरि_कथा_अनन्ता

#जयहनुमान

✍🏻अवनीश कुमार सिंह


माया सभ्यता में महावीर हनुमान 


विश्व की जितनी भी प्राचीन सभ्यताएं थी उन सबमें आपस में घनिष्ठ संबंध थे ।। चाहे वह प्राचीन भारत की सिंधु सरस्वती सभ्यता हो, मेसोपोटामिया की सभ्यता हो, मिस्र की सभ्यता या लैटिन अमेरिका की 'माया सभ्यता'।


सभी प्राचीन सभ्यताओं के निवासियों के मध्य विचारों और लोगों का प्रवाह होता रहता है। 


लगभग सभी प्राचीन सभ्यताएं प्रकृति पूजक थीं। वे कभी भी अपने विचारों को दूसरों पर नही थोपती थीं।


माया सभ्यता जिसे यूरोपियन लोगों ने बर्बर की संज्ञा प्रदान की और उन्हें नष्ट कर दिया। वह भी ऐसी ही महान सभ्यता थी ।


माया सभ्यता के लोग सूर्य भगवान के महान उपासक थे। माया सभ्यता में लोग 'मंकी गॉड' अर्थात हनुमान जी के समान देवता को मानते थे .. जो उनके लिए मंदिर और मूर्तियां भी स्थापित करते थे ... 


आज भी अमेरिका के मूल निवासियों के अनेक नाम सँस्कृत के मिलते हैं .. बल्कि वहाँ आज भी "वानर" नामक एक जनजाति भी हैं .. 


हमारे देश में आज भी ऐसी अनेक जनजातियां हैं जो हनुमान जी को अपना पूर्वज और आदिपुरुष मानती हैं .. और उनके झड़े पर बंदर की मुद्रा अंकित होती है।।


हनुमान जी चारों वेदों के प्रकाण्ड विद्वान थे.. जिनके माता पिता और वनों के पवित्र और स्वछंद वातावरण में रहना पसंद किया  .. 


माया सभ्यता के कुछ चित्रों में राम और सीता जी से मिलती जुलती आकृतियां हैं .. इसी प्रकार इराक अर्थात प्राचीन मेसोपोटामिया से भी भगवान राम के चित्र मिलते हैं .. 

बाकी रामजी और हनुमानजी की महिमा अपरम्पार है।

✍🏻ध्रुव कुमार द्विवेदी


#यक्ष_प्रश्न: राजन बताओ, मीराबाई चानन के हनुमान चालीसा पढ़ने की बात सुनकर परगतिशील बिलबिलाये क्यों?


#आदर्श_लिबरल: महाबाहो, हनुमान चालीसा में "कांधे मुंज जनेऊ साजे" लिखा होता है। हनुमान जी ब्राह्मण-क्षत्रिय तो छोड़िये मनुष्य योनी के ही नहीं माने जाते। इससे केवल किन्हीं सवर्णों को जनेऊ पहनने का अधिकार था, वाला नैरेटिव टूट जाता है। वर्षों में बनाए नैरेटिव के ऐसे टूटने पर परगतिशीलों का बिलबिलाना तो बनता हैं!


बजरंगी भाई को गुस्सा क्यों आता है?

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मेरे ख़याल से ये सवाल ही उल्टा है। सवाल ये है कि गुस्सा क्यों नहीं आना चाहिए? प्रचलित कथाओं के मुताबिक उन्होंने एक बार माता सीता से सिन्दूर लगाने का कारण पूछा। जब उन्हें पता चला कि भगवान राम से प्रेम के कारण वो सिन्दूर लगाती हैं तो थोड़ी ही देर बाद वो पूरे शरीर में सिन्दूर पोतकर प्रकट हुए। कारण पूछने पर बताया कि उन्हें भगवान राम से बहुत प्रेम है, ये दर्शाने के लिए उन्होंने पूरे शरीर में ही सिन्दूर पोत लिया है।


देवताओं में सबसे कड़े दण्डों देने के लिए जाने जाने वाले न्यायाधीश की जरूरत होती है तो यमराज को नहीं, सूर्य के ही एक और पुत्र शनि को न्यायाधीश बनाया जाता है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार शनि न्याय करने ना बैठें इसलिए हनुमान की उपासना शनिवार को की जाती है। शनि के लिए काले रंग का प्रयोग भी आराम से नजर आ जाएगा। ऐसे में जब एक प्रोपोगैंडा पोर्टल जो न्यूज़ और ओपिनियन कि आड़ में चलता है वो ये कहे कि हनुमान को भगवा और काले में दिखाना साजिश है तो उस सोच पर गुस्सा आना भी चाहिए।


बरसों पहले इक़बाल कह गए थे कि जम्हूरियत, यानि लोकतंत्र में बन्दों के सर गिने जाते हैं तौले नहीं जाते। अगर तौला भी जाए तो मुझे नहीं लगता कि ऐसे ओपिनियन राइटर्स के सर में भरे भूसे का वजन कम होगा। दादी-नानी कि गोद में सुने किस्सों कि जानकारी ना होने का कारण दिमाग में भरे भूसे के अलावा और क्या हो सकता है? इसी भारी वजन कि वजह से उनकी सोच भी उतनी गिर पाती है, वरना इतना गिरना भी आम तौर पर आसान तो नहीं ही होता होगा।


प्रोपोगैंडा पोर्टल्स के गिरी हुई सोच वालों के ऐसे जमावड़े में ही तरुण तेजपाल जैसे बलात्कारी पनप पाते हैं। हनुमान का नजर आना इनके नैरेटिव के लिए ठीक नहीं होता। वो कहा करते हैं कि जनेऊ सिर्फ ब्राह्मण पुरुष धारण करते थे। हनुमान ब्राह्मण तो क्या मानव भी नहीं दिखते, ऊपर से उनके साथ ही “काँधे मूंज जनेऊ साजे” भी याद आ जाता है। ये जानकारी किसी कथित रूप से कठिन भाषा में भी नहीं, लोक-भाषा में सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध है। अभिजात्य को आम आदमी के जानकार हो जाने पर शिकायत तो होगी ही!


आप सवाल ही उल्टा कर रहे हैं। वैसे बरसों के सौतेले व्यवहार के बाद आपसे सही सवाल अपेक्षित भी नहीं था। पूछा तो ये जाना चाहिए कि आपके इतने दुर्व्यवहार, आपके इतने शोषण, आपकी इतनी झूठी नकारात्मक सोच को फैलाने की कोशिशों के बाद भी हनुमान जी को गुस्सा क्यों नहीं आता है? सनातनी सिद्धांतों के अधूरे श्लोक वाले “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसा शत्रुओं से एकतरफा प्रेम कबतक दर्शाते रहेंगे?


#एंग्री_हनुमान 


कुछ वर्ष पूर्व कर्नाटक के रहने वाले 'करण आचार्य' ने "क्रोधित हनुमान" की एक पेंटिंग बनाई थी, जिसकी प्रशंसा प्रधानमंत्री 'श्री नरेन्द्र मोदी जी' ने भी की थी और उनके द्वारा प्रशंसा किये जाने के बाद अचानक यह पेंटिंग देश भर में सुर्खियों में आ गया था। 


OLA-UBER समेत निजी वाहन वाले हनुमान जी की इस तस्वीर को अपने-अपने कारों के ऊपर लगाने लग गये तो ओला-उबर का प्रयोग करने वाले लोग ऐसे कार ड्राइवरों को प्रोत्साहित करने हेतु उन्हें बिल से अधिक पैसे पेमेंट करने लगे। इन बातों से हिन्दू द्वेषी मीडिया व अन्य जमात वालों के सीने पर सांस लोटने लगे। "द वायर" आदि जमातों ने बजरंगबली को निशाने पर लेते हुए कई लेख लिखें। अगर आप पढ़ने-लिखने में रुचि रखते हैं तो आपको यह भी याद होगा कि काफी पहले 'हंस' पत्रिका के संपादक 'राजेन्द्र यादव' में यही हरकत की थी और हनुमान जी को "मानव-सभ्यता का पहला आतंकवादी" बताया था।


आपने कभी सोचा है कि बजरंगबली से इन जमातों के चिढ़ने की वजह क्या है? क्यों बजरंग बली की उस मनभावन पेंटिंग को ये 'ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेस' "मिलिटेंट हनुमान" कहने लगें?


आख़िर हनुमान जी से इनके चिढ़ने की वजह क्या है? वजह है कि :-


💐 "बजरंग बली" के उज्ज्वल चरित्र और कृतित्व से सम्पूर्ण भारतवर्ष न जाने कितने सदियों से प्रेरणा लेता आया है। 


💐 हनुमान प्रतीक हैं उस स्वाभिमान" के जिन्होंने 'बाली' जैसे महापराक्रमी परंतु अधम शासक के साथ रहने की बजाए 'बाली' के अनाचार से संतप्त 'सुग्रीव' के साथ रहना स्वीकार किया था ताकि दुनिया के सामने यह आदर्श स्थापित हो कि सत्य और न्याय के साथ खड़ा होना ही धर्म है। 


💐 हनुमान प्रतीक हैं उस "स्वामी-भक्ति" और "राज-भक्ति" के जिन्हें उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के प्रतिनिधि प्रभु श्रीराम का सानिध्य प्राप्त था परंतु उन्होंने अपने स्वामी सुग्रीव का साथ नहीं छोड़ा और उनके प्रति उनकी राजभक्ति असंदिग्ध रही।


💐 हनुमान प्रतीक हैं उस सेतु के जो उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ती है। जिसने किष्किंधा और अयोध्या को जोड़ा। पेंटिंग बनाने वाले "करण आचार्य" दक्षिण से थे और पेंटिंग वायरल होने लगी दिल्ली में तो इनके पेट में मरोड़ उठने लगी कि अरे ये कैसे हो गया? हमने उत्तर भारत और दक्षिण भारत में कनफ्लिक्ट पैदा करने के लिए जो वर्षों- बर्ष मेहनत की है वो इतनी आसानी से कैसे जाया हो रही है?


💐 हनुमान प्रतीक हैं उस "अनुशासन और प्रोटोकॉल" के जिसका अनुपालन उन्होंने अपने जीवन में हर क्षण किया जबकि 'हनुमान' विरोधियों को अनुशासनहीन समाज पसंद है।


💐 हनुमान प्रतीक हैं उस पौरुष के जिसका स्वामी 'बाली' जब अधम होकर एक स्त्री पर कुदृष्टि डालने लगा तो उन्होंने उसे सहन नहीं किया और बाली का साथ छोड़ने में एक पल भी नहीं लगाया। 


💐 हनुमान प्रतीक हैं स्त्री रक्षण के प्रति उस कर्तव्य के जो किसी और की स्त्री के सम्मान की रक्षा के लिए भी निडर-बेखौफ होकर उस समय के सबसे शक्तिशाली शासक को चुनौती देने उसके राज्य में घुस जाते हैं।


💐 हनुमान प्रतीक हैं उस  'चातुर्य और निडरता' के जिनकी वाणी के ओज ने श्री राम को भी मंत्रमुग्ध कर दिया था।


अगर हम रामायण का कथानक देखें तो पता चलता है कि हनुमान, जामवंत, सुग्रीव, नल-नील, अंगद और तमाम दूसरे वानर वीर ये सब वो लोग हैं जो वनवासी-गिरिवासी और वंचित समाज के प्रतिनिधि हैं। ये उनलोगों के रूप में चिन्हित हैं जिनकी भाषा संस्कृत नहीं थी, जो किसी कथित उच्च वर्ग से नहीं थे, जो शहरी सभ्यता के नहीं थे परंतु इनके प्रतिनिधि के रूप में "हनुमान क्या उच्च वर्ण और क्या निम्न वर्ण, क्या नगरवासी और क्या वनवासी, सब हिन्दुओं के घरों में आराध्य रूप में पूजित हैं। 


इनको "हनुमान जी" से पीड़ा इसलिये है क्योंकि इन्हें बर्दाश्त नहीं हो रहा कि कैसे वनवासी वर्ग का एक प्रतिनिधि हर हिन्दू घर में पूजित है। इन्हें ये पच नहीं रहा कि कैसे कोई ऐसा पात्र हो सकता है जिसके प्रति हिंदुओं के वंचित समाज से लेकर भारत का प्रधानमंत्री तक में एक समान भावना है। "हनुमान" से इनकी वेदना इसलिए है क्योंकि उनके होते वर्ग-संघर्ष, जाति-संघर्ष, आर्य-द्रविड़ विवाद, उत्तर-दक्षिण संघर्ष पैदा करने के इनके तमाम षडयंत्र विफल हो जा रहे हैं।


हनुमान से इनको तकलीफ़ इसलिए भी है क्योंकि "मारुति" इन्द्रिय संयम के जीवंत प्रतीक हैं यानि बजरंगबली "यौन-उच्छृंखलता" के इनके नारों की राह के रोड़े भी हैं। हनुमान धर्म के नाम पर कहीं भी सॉफ्ट नहीं हैं, ये इनकी पीड़ा है। 


एक अकेले हनुमान के कारण "ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेस" के तमाम मंसूबें नाकाम हैं तो इनको हनुमान से तकलीफ़ क्यों न हो?


आज हर हिन्दू घर में हनुमान कई रूपों में मौजूद हैं, कहीं वो तस्वीर रूप में, कहीं मूर्ति-रूप में, कहीं, महावीरी-ध्वज रूप में, कहीं हनुमान-चालीसा, बजरंग-बाण या सुंदर-काण्ड रूप में उपस्थित हैं।

✍️ अभिजीत सिंह


अब इन लोगों ने एक नई चाल चली है हनुमानजी को  विवादित बनाने की। पिछले कई वर्षों से हनुमान जयंती आने पर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट सर्कुलेट की जाती है कि जयंती के स्थान पर जन्मोत्सव या जन्मदिन मनाया जाए, जबकि इस बात का कोई भी आधार नहीं है। कोई सन्दर्भ या कोई प्रमाण तो छोड़िये किसी मान्य सन्त का भी ऐसा वक्तव्य तक नहीं है। और हम हिन्दुजन ऐसी बातों का सन्दर्भ या प्रमाण मांगने के स्थान पर उसे फोरवर्ड करते हैं। कुछ लोग तो कुतर्क भी करने लगते हैं। ये बस हनुमान जी को विवादित बनाने का षड़यंत्र भर है, क्योंकि किसी भी शास्त्र में ऐसा कोई वर्णन नहीं है और किसी सन्त या आचार्य आदि का मत भी ऐसा नहीं है।

गुरुवार, 31 मार्च 2022

सम्वत्सर के वर्षो का नाम

 पिछले लेख में इस बात की चर्चा थी कि भारतीय परंपरा में वर्षों का निरूपण संख्या के साथ साथ नाम से भी होता है, और न सिर्फ निरूपण होता है अपितु  व्यवहारिक प्रयोग भी होता है। संकल्प मंत्र - जिसका प्रयोग प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान से पहले किया जाता है उसमें वर्ष की संख्या नहीं वर्ष का नाम लिया जाता है। बहुत से मित्रों का निवेदन है कि इन वर्षों के नाम भी बताए जाएं। इसीलिए आज की पोस्ट सम्वत्सर के वर्षों के नामों की चर्चा से प्रारंभ करते हैं । वर्षों के नाम और उनकी बोधक संख्या इस प्रकार है - 


बार्हस्पत्य वर्ष को फल की दृष्टि से ५-५ वर्ष के १२ युगों में बांटा गया है। अन्य विभाजन है २०-२० वर्षों के ३ खण्ड-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र विंशतिका।

ब्रह्मा-१. प्रभव, २. विभव, ३ शुक्ल, ४. प्रमोद, ५. प्रजापति, ६. अङ्गिरा, ७. श्रीमुख, ८. भाव, ९. युवा, १०. धाता, ११. ईश्वर, १२. बहुधान्य, १३. प्रमाथी, १४. विक्रम, १५. वृष, १६. चित्रभानु, १७. सुभानु, १८. तारण, १९. पार्थिव, २०. व्यय। विष्णु-२१. सर्वजित्, २२. सर्वधारी, २३. विरोही, २४. विकृत, २५. खर, २६. नन्दन, २७. विजय, २८. जय, २९. मन्मथ, ३०. दुर्मुख, ३१. हेमलम्ब, ३२. विलम्ब, ३३. विकारी, ३४. शर्वरी, ३५. प्लव, ३६. शुभकृत्, ३७. शोभन, ३८.  क्रोधी, ३९. विश्वावसु, ४०. पराभव, रुद्र-४१. प्लवङ्ग, ४२. कीलक, ४३. सौम्य, ४४. साधारण, ४५. विरोधकृत्, ४६. परिधावी, ४७. प्रमादी, ४८. आनन्द, ४९. राक्षस, ५०. अनल, ५१. पिङ्गल, ५२. कालयुक्त, ५३. सिद्धार्थ, ५४. रौद्र, ५५. दुर्मति, ५६. दुन्दुभि, ५७. रुधिरोद्गारी, ५८. रक्ताक्ष, ५९. क्रोधन, ६०. क्षय।  


कभी ५ वर्ष का एक युग होता था, ६० महीनों का (वेदाङ्ग ज्यौतिष)। जब आप शताब्दियों की परास में कालचक्र का प्रेक्षण करना चाहते हैं तो बड़ी इकाई की भी आवश्यकता पड़ती है। जितनी बड़ी संख्या, त्रुटि की सम्भावना उतनी ही अल्प। 

धरा के १२ माह १२ आदित्यों से जोड़ कर देखे जाते थे, सूर्य नमस्कार मन्त्रों का ध्यान करें। सूर्य के आभासी वार्षिक पथ को १२ आदित्यों में बाँट कर देखा जाता। यह पाया गया कि गुरु ग्रह लगभग एक वर्ष में एक आदित्य की दूरी पूरी करता है। अर्थात् १२ वर्षों में पूरा चक्र। अर्थात् यदि एक पृथ्वी वर्ष को महामास मानें तो महावर्ष हुआ १२ पृथ्वी वर्ष और ऐसे ५ महावर्षों का हुआ एक महायुग (कलि, द्वापर आदि को इसमें न लायें, यह भिन्न बीज वाला गणित है।) १२×५ = ६० वर्षों के संवत्सर चक्र का यही रहस्य है। सबको भिन्न भिन्न नाम दिये गये और एक चक्र पूरा होने पर पुन: उन्हीं नामों का दूसरा चक्र आरम्भ होता। लेखा जोखा व गणना हेतु बड़ी परास मिल गयी। 

किन्तु प्रकृति व पूर्णाङ्क में बैर है। गुरु एक आदित्य से दूसरे के घर  ~३६५.२५ दिनों में न जा कर ~३६१.०३ दिनों में ही पहुँच जाते हैं। आप जानते ही हैं कि चान्द्रवर्ष अर्थात चन्द्रकलाओं वाले २९.५ दिनों के १२ मासों का वर्ष मात्र ३५४ दिनों का होता है तथा लगभग प्रत्येक ८ वर्ष में ३ मलमास लगा कर उसे सौरवर्ष के निकट लाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक १९वें वर्ष सौर दिनांक व चान्द्रमास तिथि सम्पाती हो जाते हैं। 

अर्थात् जो हमारा सौर-चान्द्र समन्वित वर्ष है, उसे लम्बी परास में सौर वर्ष माना जा सकता है। 

अब देखिये कि किसी वर्ष प्रतिपदा को आपका वर्ष और बार्हस्पत्य संवत्सर एक साथ आरम्भ हुये, परन्तु बार्हस्पत्य संवत्सर का अन्त वर्षान्त से ४.२३ दिन पहले ही हो गया। अगले वर्ष यह अन्तर हो जायेगा २×४.२३ दिन, उसके अगले वर्ष ३×४.२३ दिन... इसी प्रकार यह अन्तर बढ़ता जायेगा और लगभग ८५ या ८६ वर्षों पश्चात ऐसा होगा कि पीछे घटता नया संवत्सर नये वर्ष का स्पर्श ही नहीं कर पायेगा। ऐसा होने पर उसका लोप माना जाता है क्योकि नववर्ष लगने पर उससे आगे वाले संवत्सर का क्रम आ जाता है। चक्र ऐसे ही चलता रहता है।

एक अपर बात। 

६० संवत्सरों को २०-२० कर ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र की ३ 'बीसियों' में बाँटा गया है। प्लवङ्ग से ही रुद्र की बीसी चल रही है (विक्रम २०७१, 2014-15 CE) से। रुद्र की बीसी को सामान्यतया ज्योतिषी विनाशी ही बताते हैं किन्तु संहार से निर्माण भी जुड़ा है। केन्द्र में दशक पश्चात हुये सत्ता परिवर्तन को देखें। विष्णु की बीसी में तो वेटिकनी मौनी राज था। उससे तो अच्छा ही है। 

दक्षिण भारत ने लगभग १२०० वर्ष पूर्व आर्यसिद्धान्त को अपनाया और बार्हस्पत्य संवत्सर चक्र से लोप प्रक्रिया का त्याग कर दिया। परिणामत: उनके संवत्सर नाम की संगति उत्तर के सूर्यसिद्धान्तीय पद्धति से नहीं बैठती।


यह भी है कि यदि वह आरम्भ बिन्दु जब बार्हस्पत्य संवत्सर एवं सौर-चांद्र वर्ष सम्पाती माने गये किसी पद्धति में भिन्न हुआ तो उसमें लोप हुआ संवत्सर आनन्द से भिन्न होगा।  


पुनश्च:


१९ वर्षीय सम्पात की बात की न! १९×५ = ९५ वर्षों का एक अन्य युग वैदिक याज्ञिक परम्परा में प्रयुक्त होता था। श्येनवेदी अर्थात पंख पसारे गरुळ की आकृति वाली महावेदी जोकि संवत्सर चक्र की रेखागणितीय प्रारूप होती, उसमें ९५ की संख्या भी मह्त्वपूर्ण थी। अपने आप में बहुत रोचक है जिसका सैद्धान्तिक ज्यौतिष से कोई सम्बन्ध नहीं।

✍🏻सनातन कालयात्री श्री गिरिजेश राव


दो प्रकार के बार्हस्पत्य संवत्सर हैं। दक्षिण भारत में पितामह सिद्धान्त के अनुसार सौर वर्ष को ही बार्हस्पत्य संवत्सर मानते हैं। उत्तर भारत में सूर्य सिद्धान्त के अनुसार बृहस्पति की मध्यम गति से एक राशि में चलने का समय बार्हस्पत्य संवत्सर मानते हैं। यह प्रायः ३६१ दिन ४ घण्टे का होता है, या ८५ सौर वर्ष में ८६ बार्हस्पत्य संवत्सर होते हैं। यदि वर्ष आरम्भ के संवत्सर को ही पूरे वर्ष माना जाए तो ८५ सौर वर्ष में एक क्षय संवत्सर होगा।

नव वर्ष आरम्भ-वर्ष गणना की भारत में २ पद्धति हैं। दिनों की क्रमागत गणना के अनुसार दिन (सूर्योदय से आगामी सूर्योदय) तथा सौर मास-वर्ष की गणना को शक कहते हैं। इसमें प्रत्येक सूर्योदय में (या मध्यरात्रि, सूर्यास्त, मध्याह्न) में १ दिन बदल जाता है, अतः गणना में सुविधा होती है। १-१ की गणना कुश द्वारा होती है, हर भाषा में १ का चिह्न कुश है। उनको मिलाने से वह शक्तिशाली होता है अतः उसे शक कहते हैं। 

पूजा या अन्य पर्व (सौर संक्रान्ति को छोड़ कर) चान्द्र तिथि के अनुसार होते हैं क्यों कि यह मन का कारक है-चन्द्रमा मनसो जातः (पुरुष सूक्त)। तिथि निर्णय के लिये शक दिनों के अनुसार तिथि की गणना होती है। १२ चान्द्र मास का वर्ष प्रायः ३५४ दिन का होता है, अतः ३० या ३१ मासों के बाद १ अधिक मास जोड़ते हैं, जिस मास में सूर्य की संक्रान्ति (राशि परिवर्तन नहीं होता है। यह दीर्घ काल में सौर मास वर्ष के अनुसार चलता है, या इसके अनुसार समाज चलता है, अतः इसे सम्वत्सर (सम्+ वत्+ सरति) कहते हैं। 

बार्हस्पत्य संवत्सर २ प्रकार का होता है। गुरु (बृहस्पति) ग्रह १२ वर्ष में सूर्य की १ परिक्रमा करता है। मध्यम गुरु १ राशि जितने समय में पार करता है वह ३६१.०२६७२१ दिन (सूर्य सिद्धान्त, अध्याय १४) का गुरु वर्ष कहा जाता है।  यह सौर वर्ष से ४.२३२ दिन छोटा है। अतः ८५+ ६५/२११ सौर वर्ष में ८६ + ६५/२११ बार्हस्पत्य वर्ष होते हैं। दक्षिण भारत में पैतामह सिद्धान्त के अनुसार सौर वर्ष को ही गुरु वर्ष कहा गया है। रामदीन पण्डित द्वारा संग्रहीत-बृहद्दैवज्ञरञ्जनम्, अध्याय ४


अतः कलि आरम्भ (१७-२-३१०२ ई.पू. उज्जैन मध्य रात्रि) के समय । उसके ६ मास ११ दिन (१८८ दिन बाद, २९.५ दिन का चान्द्र मास) २५-८-३१०२ ई.पू. को जय संवत्सर आरम्भ हुआ तो परीक्षित को राज्य दे कर पाण्डव अभ्युदय के लिये हिमालय गये। इस दिन से युधिष्ठिर जयाभ्युदय शक आरम्भ हुआ। दक्षिण भारत के पितामह सिद्धान्त के अनुसार कलि आरम्भ से प्रमाथी (१३वां) संवत्सर आरम्भ हुआ। इसके १२ वर्ष पूर्व से प्रभव वर्ष का चक्र आरम्भ हुआ था। अतः मेक्सिको के मय पञ्चाङ्ग का आरम्भ १२ वर्ष पूर्व ३११४ ई.पू. से हुआ था। दोनों प्रकार के बार्हस्पत्य वर्ष चक्र ५१०० (८५x ६०) वर्ष में मिल जाते हैं अतः मय पञ्चाङ्ग ५१०० वर्ष का था। 

 अधिकांश पञ्चाङ्ग निर्माता विक्रम संवत् तथा बार्हस्पत्य संवत्सर का अन्तर भूल गये हैं । गणना की कठिनाई के कारण अधिकतर पञ्चाङ्ग पूरे वर्ष यही संवत्सर मान लेते हैं तथा सङ्कल्प में भी यही पढ़ा जाता है। प्रमादी (४७ वां) है, इसे भूल से प्रमाथी लिख देते हैं जो १३ वां है।

✍🏻अरुण उपाध्याय


वर्ष २०७९ में संवत्सर नल है या अनल

विवेचन

आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री 


इस वर्ष 2079 मे संवत्सर का नाम "नल" या "अनल"

इस वर्ष संवत्सर के नाम पर विवाद चल रहा है नल या अन्य विभिन्न पंचांगकारो ने अपने ज्ञानानुसार अथवा फलित  ग्रंथानुसार संवत्सर का नाम निरूपित किया है।

इस तारतम्य प्राचीन ग्रंथो का अवलोकन करने पर पाया जो निम्नानुसार दर्शाया गया है।

संवत्सर का नाम नल

यह सर्वप्रथम सूर्य सिद्धांत मध्यमाधिकार, मांसाहारी, ज्योतिष सार ओर ज्योतिष रत्न  इनका संस्कृत श्लोक दर्शाता है कि "राक्षसोनल:" जिसके अनुसार नल नाम संवत्सर अनल दृष्टिगत होता है।

नारद संहिता, मुहुर्त गणपति, बाल बोध, ज्योतिष समुच्चय, भारतीय काल मीमांसा आदि ग्रंथो मे अनर्गल लिखा है। इसके संस्कृत श्लोक मे "राक्षसों यदि इस संस्कृत शब्द का अन्वय एवं संधि विच्छेद करे तो अनल नाम ही आता है।

इतने ग्रंथो का अवलोकन करने के बाद मात्र यह समझ आया कि इसमे भी विरोधाभास ही है।

लेकिन इतना अध्ययन करने के उपरांत भी मै किसी निष्कर्ष पर नही पहुंच सका कि संवत्सर का नाम इस वर्ष नल रहेगा या अनल रहेगा। कर्मकांडी ब्राह्मण किस नाम का उच्चारण करे या अगर दैनिक  पूजा संकल्प मे किस नाम का उच्चारण करे। 

विद्वानो से मार्गदर्शन की अपेक्षा के साथ।

आदरणीय आचार्य सुनील शर्मा जी की पोस्ट


हमारा प्रत्युत्तर

यह अनल नामक संवत्सर है। जो राक्षस के बाद आता है। जो विद्वान इसका अर्थ नल कर रहे हैं, वे हिंदी अर्थ में विकृत अनुवाद के कारण कर रहे हैं। वास्तव में यह अनल है। २८ वें श्लोक में स्पष्ट है - राक्षसोSनल:।


 यह समस्या वस्तुत: ज्योतिष की नहीं, व्याकरण की है। पाणिनीनीय सूत्रों के अनुसार ह्रस्व अकारांत शब्द के बाद विसर्ग हो तो विसर्ग का ओ हो जाता है।  राक्षस को राक्षसो हुआ है, क्योंकि उसके आगे ह्रस्व अकार उपस्थित है। 

इसकी सूत्र व्याख्या है 

विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है उसे विसर्ग-संधि कहते हैं। जैसे- मनः + अनुकूल = मनोनुकूल

व्याकरण की भाषा में इसे इस प्रकार कहेंगे।-


अतोरोरप्लुतादप्लुते।। 

सूत्र 1/1/1 अष्टाध्यायी सूत्रपाठः (पाणिनिनीय प्राच्या व्याकरण)

यदि विसर्ग से पहले व बाद में दोनों स्थानों पर ह्रस्व ‘अ’ आ जाए तो विसर्ग ‘ओ’ में परिवर्तित हो जाता है तथा बाद वाले ‘अ’ के स्थान पर ह्रस्व अ (ऽ) आ जाता है।

उदाहरण के लिए

कः + अपि = कोऽपि

सः + अपि = सोऽपि

सः + अहम् = सोऽहम्

देवः + अस्ति = देवोऽस्ति

नरः + अवदत् = नरोऽवदत्

छात्रः + अयम् = छात्रोऽयम्

इस प्रकार यह अनल नामक संवत्सर है। इसमें कोई संदेह नहीं है। जो कुछ ग्रंथों में नल नाम प्रकाशित हुआ है, वह भाषा विज्ञान की दृष्टि से अशुद्ध है। इसलिए शुद्ध शब्द केवल अनल है।

✍🏻आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री

श्री पीतांबरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ

सोमवार, 28 मार्च 2022

प्राचीन भारतमें विनोद क्रीडा का विनोद

प्रस्तुति - अखौरी प्रमोद 


क्रीडा शव्द क्रीडृँ विहा॒रे अर्थ में मनोरञ्जन क्रिया वोध कराता है । शव्दरत्नावली में क्रीडा का अर्थ परिहास माना गया है । मेदिनीकोष में क्रीडा का अर्थ अवज्ञानम् कहा गया है । यह अवज्ञाकृत परिहास का वोध कराता है । क्रीडा में मनोरञ्जन के लिये प्रतिद्वन्दी को पराभूत करने का इच्छा रहता है – प्रतिशोध का नहीँ । प्रतिशोध के इच्छा रहने से वह द्वन्द वन जाता है – क्रीडा नहीँ । प्राचीन भारतमें क्रीडा विनोद के 20 विभाग किये जाते थे । यहाँ सोमदेव के मत से यह विभाग दर्शाया गया है ।


1. भूधर क्रीडा । (उपवन विधि) ।

2. वन क्रीडा ।

3. आन्दोलन क्रीडा । (झुला झुलना) ।

4. सेचन  (सेवन) क्रीडा । (प्रासाद मध्यस्थ जलक्रीडा) ।

5. तोय क्रीडा ।

6. शाद्वल क्रीडा । (शरत् ऋतु में वन विहार) ।

7. वालुका क्रीडा ।

8. ज्योत्स्ना क्रीडा ।

9. सस्य क्रीडा ।

10. मदिरापान क्रीडा ।

11. प्रहेलिका क्रीडा ।

12. चतुरङ्ग क्रीडा ।

13. पाशक क्रीडा ।

14. वराटिका क्रीडा ।

15. फणिदा क्रीडा । (हस्तलाघव क्रिया) । 

16. फञ्जिका क्रीडा । (एक क्रीडा जो कृष्ण भगवान खेला करते थे) ।

17. तिमिर क्रीडा । (वन्द गृहमें लुका छिपि) ।

18. वीर क्रीडा । (तान्त्रिक सिद्धि लाभ के लिये क्रिया) ।

✍🏻बसुदेव मिश्रा


गाथा गेंद की... खेलते हुए सुनियेगा


बॉल हमारी बहुत जानी पहचानी है। बॉल यानी गोल, गोल यानी बॉल। दादी-दादा खेले। माता-पिता खेले। हम खेले और हमारे बाद बेटी-बेटे। बॉल सबकी प्रिय से भी प्रिय है। कई खेलों का आधार है बॉल। यदि बॉल है तो खेल है, बस हाथ में आ जाए तो खेलने की तरकीब हम ढूंढ ही लेते हैं। बाॅल पकड़ी जाती है। फेंकी जाती है। उछाली और झेली जाती है। धकेली तथा चलाई भी जाती है... इस बाॅल ने हर सभ्‍यता और संस्‍कृति में अपनी मौजूदगी दिखाई है, चाहे माया जैसी सभ्‍यता ही क्‍यों न हो, जिसकी तस्‍वीर मिली है। अन्‍यत्र उत्‍खननों में साबुत बॉलें मिली हैं....। नाम तो है इसका गेंद या गेंदू मगर संस्‍कृत में कन्‍दुक कहा जाता है। यह 'क' हमारे मुखलाघव के लिए 'ग' में बदल गया है, वैसे ही जैसे प्रकट को प्रगट बोलने में सहुलियत होती है, कुछ नियमों के तहत प्राक् भी प्राग् हाे जाता है..।


नींबू, नारियल, कपित्‍थ या कबिती और बेल जैसे किसी फल को देखकर बॉल का निर्माण किया गया होगा। बात गेंद की हो रही है। उत्‍खननों, खासकर हड़प्‍पाकालीन कानमेर-गुजरात याद आता है जहां बजने वाले गेंद भी मिले हैं..। कहीं दौड़ लगवाने वाली होने से इसका नाम दाेड़ी या दड़ी पड़ गया तो कहीं डोट या पीटने वाली होने से डोट कहलाई...।


यो तो बालकों को यह बहुत रुचिकर लगती है। हरिवंश में श्रीकृष्‍ण के कंदुक खेल पर तो कई श्‍लोक मिल जाते है, उसको खोजने की आड़ में कालिया नाथ लिया गया...। नारियों ने भी गेंदों की कई क्रीड़ाएं दिखाई हैं तभी तो 'मूंछों पर नींबू ठहराने' जैसी कहावत की तरह 'कूर्पर (कोहनी) पर कंदुक दिखाना' जैसी कहावत भी रही होगी। क्‍यों नहीं, कुषाणकालीन एक वेदिका स्‍तंभ पर एेसा मोटिफ भी है, जिसमें नायिका अपनी कोहनी पर कंदुक को लिए कौतुक रच रही है। 


मृच्‍छकटिकं के रचयिता शूद्रक जैसे रचनाकार को यह खेल इतना भाया कि अपने एक भाण में उन्‍होंने विट के मुंह से इसकी प्रशंसा करवाई कि इस खेल में शरीर की कई क्रियाएं संपन्‍न होती हैं। इन अंग संचालनों में नत, उन्‍नत, आवर्तन, उत्‍पतन, अपसर्पण, प्रधावन वगैरह वगैरह। विट स्‍वयं इन संचालनों को पसंद करता था। उसने सखी-सहेलियों के साथ प्रियंगुयष्टिका नामक एक नायिका की कंदुक क्रीड़ा का वर्णन करते हुए सौ बार गेंद उछालने पर जीतकर खिताब लेने का संदर्भ दिया है... गुप्‍तकाल की यह दास्‍तान है। अनेकानेक मंदिरों में यह क्रीड़ा अनेकत्र देखी जा सकती है। ऐसी नायिकाओं को 'कंदुकक्रीड़ाकर्त्री' के रूप में शिल्‍पशास्‍त्रों में जाना गया है। 

है न नन्‍हीं सी गेंद की गौरवशाली गाथा...।


 वीटा क्रीड़ा जिसे आजकल गुल्ली-डंडे का खेल कहते हैं। इसका वर्णन 'महाभारत' के आदिपर्व (131/17)मे आया है

गुल्ली डंडा :

काष्ठयुग का खेल। 

वीटा = कनिका अंगुल कम अंगूठे तक का प्रमाण, ये हमारे यहां कहते है। इसी प्रमाण की गुल्ली होती है...


 गिल्ली : उत्तोलक व गणन खेल

#गिच_पिच

गिल्ली-डंडा का खेल ! 

पहले टेल ! 

फिर पेल ! 

फिर नेल ! 

और, फिर मेल। 

संक्रान्ति आती है और खेलों का उत्सव हो जाता है। कहीं पतंग तो कहीं सितोलिया, कहीं मार दड़ी तो कहीं गिल्ली और डंडा। गिल्ली को गुल्ली भी कहते हैं। यह बलिस्त प्रमाण लकड़ी का पर्याय है और कोश में संकलित है।


यूं तो महाभारत में इस गिल्ली-डंडा का "वीटा" नाम से विवरण है लेकिन प्रमाण गिल्ली को शुंगकाल तक ले जाते हैं। बड़ा सच ये भी है कि यह उस काल का खेल है जबकि मानव धातु का प्रयोग करना नहीं सीखा था और लकड़ी का बहुत से क्रिया व्यापार में उपयोग करता था। शालभंजन (डालभांग), शाखकाष्ठ (डाल कामड़ी) जैसे कई खेल है न!


गिल्ली यानी डंडे का टुकड़ा, उसका तीसरा प्रमाण (1: 3)। डंड यानी एक हाथ = 24 अंगुल। कुछ छोटी भी हो सकती है। मगर, तृतीयांश होने पर पीटे जाने पर उछलती अच्छी है। डाट-पाट में उछलती गिल्ली कहां तक पहुंचाई गई, उस आधार पर खेल स्थल से दंड प्रमाण भूमि का अनुमान लगाया जाता है। यह प्रमाण भूमि ही दूसरे पक्ष को अपनी बारी में खेलकर उतारनी पड़ती है।

गिल्ली खेलने के अपने अपने तरीके हैं : 


1. छालण गिल्ली :

इस में गिच पर रखकर दंड से उछाला जाता है। गिच, जिसे गप्पी भी कहा जाता है, गिल्ली के बराबर जमीन पर किया गया छेद है जिस पर आड़ी रखकर गिल्ली को दंडे से इतना जोर से उछाला जाता है कि वह फर्लांग भर दूर जा गिरे। उछलने से पहले खिलाड़ी दूसरे पक्ष वालों से बोलता है : रेडो। यानी सावधान ! कोई खिलाड़ी अगर गिरती गिल्ली को झेल ले तो उछालने वाला खेल से बाहर हो जाता है।


2. अलट गिल्ली

छोटे बच्चे पहले अनुसार ही गिल्ली को गिच से उछालते हैं और या तो उसे झेलने की कोशिश करते या गिरी गिल्ली को गिच पर रखे डंडे तक फेंकते है। यदि डंडे को अलट (छू) जाए तो उछालने वाला बाहर और नहीं छूए तो वह पदाएगा। 

वह बारी बारी डंडे से गिल्ली को उछालकर उसे विपरीत दिशा में पहुंचाता है। जहां कहीं वह चूक जाता है, वहीं से गिच तक दंड प्रमाण को मांगा जाता है...।

गिल्ली चल्ली पल्ली मार।

पल्ली मार, टल्ली मार।

दिल्ली द्वार, हरिद्वार...। 

गिल्ली को लेकर दोबारा गिच के पिच पर पहुंचाने के लिए दूसरे पक्ष का एक खिलाड़ी एक ही टांग पर कूदता हुआ बढ़ता है। यह 'पदाना' है। सजा से कम नहीं, मगर बात मजे की है और इस मजे ने ही गिल्ली डंडा को मजेदार बना रखा है।

है न गिल्ली : गप्पी और गिच-पिच का खेल ! 

हां, तो उठाइये डंडा और उछालिए गिल्ली ... :)

जय-जय।

बालमन रंजक क्रीडनक

#toy_n_toy

बच्चों के लिये माँ के बाद सबसे बड़ा आकर्षण होते हैं खिलौने। खेलकं, खेलां, खिलूने या रमकड़े। टॉय या क्रीड़नक। दुनिया की हर भाषा में खिलौने की पहचान के लिए कोई न कोई शब्द है यानी कि हर सभ्यता और संस्कृति में खिलूने, रमकड़े रहे हैं। माँ ने हर युग में शिशु रंजन के लिए खिलौने दिए। अपने से चिपके रहने की बजाय शिशु का ध्यान खिलौने की आड़ में बांटा और उसकी कल्पना को पंख दिए।


उत्खनन में प्रायः दो ढाई हज़ार वर्ष पुराने, जबकि मौर्यों से लेकर शुंग-कुषाण काल रहा, के खिलौने खास तौर पर मिलते हैं। इस काल में खिलौने बने भी बहुत और अनूठे भी रहे। आपात काल होने पर भी लोग खिलौने खरीद लेते थे, शायद बच्चों की संख्या ज्यादा हो। हारिति का आख्यान बताता है कि वह सौ संतान वाली थी और उसे एक भी बच्चे का खो जाना नागवार गुजरता था। 


उस काल में राजा को भी यह अनुमति थी कि वह अपने गुजारे के लिए खिलौने बनाये और बेचे। अर्थशास्त्र और महाभाष्य में ये सन्दर्भ है और महाभारत इसकी पुष्टि करता है कि व्यक्ति अपने और पराये जिस भी शिशु से लगाव रखता हो, उसके लिए खिलौने लेकर जाये।

इसी काल को प्रगट करने वाला महान आयुर्वेदिक ग्रन्थ है : चरक संहिता। चरक ने शिशु रंजन पर बड़ा ध्यान दिया और कहा है कि तब अथर्वेदीय विधियां बताकर पंडित लोग बच्चों के लिए मणियां और औषध की सलाह देते थे। 


खिलौने बनाने और उनका प्रयोग करने के क्रम में यह निर्देश था : क्रीडनकानि खलु कुमारस्य विचित्राणि...। 


1. खिलौने चित्र विचित्र, अनेक तरह के हों,

2. खिलौने आवाज़ करने वाले हों,

3. सुन्दर लगने वाले और हल्के हों

4. धारदार फलक, जानलेवा न हों

5. मुँह में धुसने वाले न हों,

6. भयावह नहीं लगने चाहिए।


है न आवश्यक बात। आज खिलौनों का बाजार लाखों, करोडों का है और बच्चों के लिए महंगे से महंगे खिलौने मिलते हैं मगर अब चरक की अपेक्षा वाले खिलौने कहाँ! वैसे बच्चे भी नहीं। हम इमली के बीज के खेल से लेकर कंचे, लट्टू, चकरी, झुंझने, झूमर, गाड़ी, हाथी घोड़े, गाय बकरी और बिल्ली से खुश हो जाते लेकिन अब वह बात नहीं, जब निरामय, निरोग शिशु के साथ निर्भय, निष्कंटक, निरूपद्रव, निस्तेज किंतु निराले खिलौने बनाये, मंगवाये, लाये, सजाये, धजाये जाते थे...।

आप भी तो अपने खिलौने की बात बताएं 😊

जय जय।


गेंदनृत्य : कितना ज्ञात


मनोकामना पूर्ति के लिए नृत्य करने की परम्परा उतनी ही  पुरानी है जितना शैलाश्रयों में मानव का निवास। यह किसी वस्तु की प्राप्ति पर उल्लास का उत्सवी अवसर भी होता है और मनौती का भाव भी, जैसा कि संस्कृत कवियों ने सायास माना है। ऐसा ही एक नृत्य है : कंदुक नृत्य अर्थात् गेंद नाच। 


इस नृत्य के विषय में हमें कोई जानकारी नहीं है लेकिन सर्कस में गेंद घूमाने वाली बालाएं तो याद आती ही हैं जो संतुलन से गेंद के कौतुक दिखाकर दर्शकों की पलकें नहीं गिरने देती, खुद भी पलकों के धनुष तानकर थिरकती हैं!  कोणार्क और कोल्हापुर से लेकर मेवाड़ के नागदा और मध्य भारत के खजुराहो तक मन्दिरों के जंघा भागों पर अलस कन्याओं के साथ कंदुक धारिणियों की मूर्तियां मिलती हैं, लेकिन क्यों? गेंद कभी कन्याओं का खेल रहा और खेल ही नहीं, नृत्य भी रहा। लंबे समय से नाम भी रखें जाते हैं : गेंदकुंवर, गेंदीबाई आदि।


कवि दंडी के वर्णन के लिए जिन्होंने पूरा ग्रंथ पढ़ा है, वे जान सकते हैं कि गेंद का खेल क्या है? कैसे होता है? कहां-कहां होता है और उसके पीछे का मनोगत क्या होता है? प्रत्येक कृतिका नक्षत्र में कंदुक नृत्य होता था और विंध्यवासिनी देवी के मन्दिर में होता था। ऐसे आयोजन को "कंदुकोत्सव" के नाम से जाना जाता था। 


इस नृत्य में गेंद को संचालित करने के स्तर, विराम और सोपानों की बड़ी शब्दावली काम आती थी जिसे जानकर कौतुक होता है : हस्तक्रीडनक, अमंदेन, अतिशयेन, प्रसृता, उन्नीय, चटुल्या, भ्रमरमालय, स्तबकमिव, अपतन्त, गगनतल। गति के लिए जो शब्द आए हैं, वे हैं : मध्य, विलंबित, द्रुतलय, मृदुमृदु, प्रहरान्ती आदि लगभग बीस शब्द। 


दंडी ने कन्दुक के खेल, नृत्य के लिए किसी शास्त्रीय नियमावली का भी उल्लेख किया है : कन्दुकतन्त्र। उसमें आए चूर्णक्रिया, दशपद चंक्रमण, निश्चल, निर्दयप्रहार, मंगलिक भ्रमण, पंचावर्त प्रहार जैसे दर्जनों शब्द लिखे हैं। कौन जानता है उन सबका यथा रूप आशय? मैं तो बस पढ़कर ही चकित हूं...

✍🏻डॉ श्री कृष्ण जुगनू