गुरुवार, 24 नवंबर 2022

सनातन धर्म की जानकारी

 ऐसी जानकारी व्हाट्सएप पर बार-बार नहीं आती, और आगे भेजें, ताकि लोगों को सनातन धर्म की जानकारी हो  सके.


1-अष्टाध्यायी               पाणिनी

2-रामायण                    वाल्मीकि

3-महाभारत                  वेदव्यास

4-अर्थशास्त्र                  चाणक्य

5-महाभाष्य                  पतंजलि

6-सत्सहसारिका सूत्र      नागार्जुन

7-बुद्धचरित                  अश्वघोष

8-सौंदरानन्द                 अश्वघोष

9-महाविभाषाशास्त्र        वसुमित्र

10- स्वप्नवासवदत्ता        भास

11-कामसूत्र                  वात्स्यायन

12-कुमारसंभवम्           कालिदास

13-अभिज्ञानशकुंतलम्    कालिदास  

14-विक्रमोउर्वशियां        कालिदास

15-मेघदूत                    कालिदास

16-रघुवंशम्                  कालिदास

17-मालविकाग्निमित्रम्   कालिदास

18-नाट्यशास्त्र              भरतमुनि

19-देवीचंद्रगुप्तम          विशाखदत्त

20-मृच्छकटिकम्          शूद्रक

21-सूर्य सिद्धान्त           आर्यभट्ट

22-वृहतसिंता               बरामिहिर

23-पंचतंत्र।                  विष्णु शर्मा

24-कथासरित्सागर        सोमदेव

25-अभिधम्मकोश         वसुबन्धु

26-मुद्राराक्षस               विशाखदत्त

27-रावणवध।              भटिट

28-किरातार्जुनीयम्       भारवि

29-दशकुमारचरितम्     दंडी

30-हर्षचरित                वाणभट्ट

31-कादंबरी                वाणभट्ट

32-वासवदत्ता             सुबंधु

33-नागानंद                हर्षवधन

34-रत्नावली               हर्षवर्धन

35-प्रियदर्शिका            हर्षवर्धन

36-मालतीमाधव         भवभूति

37-पृथ्वीराज विजय     जयानक

38-कर्पूरमंजरी            राजशेखर

39-काव्यमीमांसा         राजशेखर

40-नवसहसांक चरित   पदम् गुप्त

41-शब्दानुशासन         राजभोज

42-वृहतकथामंजरी      क्षेमेन्द्र

43-नैषधचरितम           श्रीहर्ष

44-विक्रमांकदेवचरित   बिल्हण

45-कुमारपालचरित      हेमचन्द्र

46-गीतगोविन्द            जयदेव

47-पृथ्वीराजरासो         चंदरवरदाई

48-राजतरंगिणी           कल्हण

49-रासमाला               सोमेश्वर

50-शिशुपाल वध          माघ

51-गौडवाहो                वाकपति

52-रामचरित                सन्धयाकरनंदी

53-द्वयाश्रय काव्य         हेमचन्द्र


वेद-ज्ञान:-


प्र.1-  वेद किसे कहते है ?

उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।


प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने दिया।


प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।


प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?

उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण         के लिए।


प्र.5-  वेद कितने है ?

उत्तर- चार ।                                                  

1-ऋग्वेद 

2-यजुर्वेद  

3-सामवेद

4-अथर्ववेद


प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।

        वेद              ब्राह्मण

1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय

2 - यजुर्वेद      -     शतपथ

3 - सामवेद     -    तांड्य

4 - अथर्ववेद   -   गोपथ


प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।

उत्तर -  चार।

      वेद                     उपवेद

    1- ऋग्वेद       -     आयुर्वेद

    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद

    3 -सामवेद      -     गंधर्ववेद

    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद


प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।

उत्तर -  छः ।

1 - शिक्षा

2 - कल्प

3 - निरूक्त

4 - व्याकरण

5 - छंद

6 - ज्योतिष


प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?

उत्तर- चार ऋषियों को।

         वेद                ऋषि

1- ऋग्वेद         -      अग्नि

2 - यजुर्वेद       -       वायु

3 - सामवेद      -      आदित्य

4 - अथर्ववेद    -     अंगिरा


प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?

उत्तर- समाधि की अवस्था में।


प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?

उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।


प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?

उत्तर-   चार ।

        ऋषि        विषय

1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान

2-  यजुर्वेद    -    कर्म

3-  सामवे     -    उपासना

4-  अथर्ववेद -    विज्ञान


प्र.13-  वेदों में।


ऋग्वेद में।

1-  मंडल      -  10

2 - अष्टक     -   08

3 - सूक्त        -  1028

4 - अनुवाक  -   85 

5 - ऋचाएं     -  10589


यजुर्वेद में।

1- अध्याय    -  40

2- मंत्र           - 1975


सामवेद में।

1-  आरचिक   -  06

2 - अध्याय     -   06

3-  ऋचाएं       -  1875


अथर्ववेद में।

1- कांड      -    20

2- सूक्त      -   731

3 - मंत्र       -   5977

          

प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                                                              उत्तर-  मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।


प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?

उत्तर-  बिलकुल भी नहीं।


प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?

उत्तर-  नहीं।


प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?

उत्तर-  ऋग्वेद।


प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?

उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 


प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?

उत्तर- 

1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।

2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।

3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।

4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।

5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।

6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।


प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?

उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।


प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?

उत्तर-  केवल ग्यारह।


प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?

उत्तर-  

01-ईश ( ईशावास्य )  

02-केन  

03-कठ  

04-प्रश्न  

05-मुंडक  

06-मांडू  

07-ऐतरेय  

08-तैत्तिरीय 

09-छांदोग्य 

10-वृहदारण्यक 

11-श्वेताश्वतर ।


प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?

उत्तर- वेदों से।

प्र.24- चार वर्ण।

उत्तर- 

1- ब्राह्मण

2- क्षत्रिय

3- वैश्य

4- शूद्र


प्र.25- चार युग।

1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।

2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।

3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।

4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।

कलयुग के 5122  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।

4,27024 वर्षों का भोग होना है। 


पंच महायज्ञ

       1- ब्रह्मयज्ञ   

       2- देवयज्ञ

       3- पितृयज्ञ

       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ

       5- अतिथियज्ञ

   

स्वर्ग  -  जहाँ सुख है।

नरक  -  जहाँ दुःख है।.


*#भगवान_शिव के  "35" रहस्य!!!!!!!!


भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।


*🔱1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।


*🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।


*🔱3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।


*🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।


*🔱5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।


*🔱6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।


*🔱7. शिव के गण : -* शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। 


*🔱8. शिव पंचायत : -* भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।


*🔱9. शिव के द्वारपाल : -* नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।


*🔱10. शिव पार्षद : -* जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।


*🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -* शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।


*🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -*  ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।


*🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -* भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।


*🔱14. शिव चिह्न : -* वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।


*🔱15. शिव की गुफा : -* शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।


*🔱16. शिव के पैरों के निशान : -* श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।


रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।


तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।


जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।


रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।


*🔱17. शिव के अवतार : -* वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।


*🔱18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : -* शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।


*🔱19.*  ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।


*🔱20.शिव भक्त : -* ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।


*🔱21.शिव ध्यान : -* शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।


*🔱22.शिव मंत्र : -* दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।


*🔱23.शिव व्रत और त्योहार : -* सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।


*🔱24.शिव प्रचारक : -* भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


*🔱25.शिव महिमा : -* शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।


*🔱26.शैव परम्परा : -* दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।


*🔱27.शिव के प्रमुख नाम : -*  शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।


*🔱28.अमरनाथ के अमृत वचन : -* शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।


*🔱29.शिव ग्रंथ : -* वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।


*🔱30.शिवलिंग : -* वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।


*🔱31.बारह ज्योतिर्लिंग : -* सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।


 दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।


*🔱32.शिव का दर्शन : -* शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


*🔱33.शिव और शंकर : -* शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।


*🔱34. देवों के देव महादेव :* देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।


*🔱35. शिव हर काल में : -* भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे,


🙏🙏जय सच्चिदानंद जी 🙏🙏

बुधवार, 16 नवंबर 2022

भाषा और लिपियां

 २६०० वर्ष पहले तक १८ प्रकार की लिपियाँ थीं, जिन्हें ब्राह्मी कहा जाता था।

भारत की ब्राह्मी लिपि में ४६ मातृ अक्षर थे।

(व्याख्याप्रज्ञप्ति,समवाय-सूत्र, प्रज्ञापना-सूत्र,)

Chess Board के खानों की सँख्या के बराबर ६४ अक्षर वेद में होते हैं। ६४-४६=१८ अक्षर ऐसे हैं जिनका जनसामान्य उपयोग नहीं करता था।


भूर्जपत्र - ओढ़ने बिछाने से लेकर लिखने तक के काम आने वाली जलरोधी वस्तु।

चर्चित बख्शाली मेनसक्रिप्ट भोजपत्र पर ही लिखी हुई है। चीन में ६००ई.पू. के खरोष्ठी गान्धारी लिपि में लिखित सैकड़ों पत्र रखे हुये हैं। समय के साथ "लिखित" की प्रतिलिपि तैयार करनी ही पड़ती है और लिपि परिवर्तित होती चली जाती है।

भारत में इन पत्रों पर लेखन स्थायी स्याही से किया जाता रहा जिसे बनाने की भी विशेष विधि होती है। पानी से धुलती नहीं।

प्रस्तुत चित्र शारदा लिपि में लिखे एक भोजपत्र का स्कैन है। किसी प्राचीन लेख में कोई सामग्री जोड़े जाने हेतु प्रथम आवश्यकता उस पत्र में अतिरिक्त लेखन हेतु 'अवकाश' की है, द्वितीय आवश्यकता इस बात की होती है कि आप उस भाषा व लिपि के पूर्ण जानकार हों और पुराने हस्तलेख की नकल 'नटवरलाल' के जैसे कर सकें। यदि नकल करने की आपमें जन्मजात प्रतिभा हो तो भी किसी अप्रचलित प्राचीन लिपि के लेखन कर पाने के लिये बहुत कुछ सीखना व अभ्यास करना पड़ेगा।

तब भी स्मरण रखिये "नकल हमेशा होती है पर बराबरी कभी नहीं" ऐसे ही नहीं कहा जाता है।

जब कभी पत्रों का निरीक्षण विशेषज्ञों द्वारा किया जायेगा आपकी फोर्जरी पकड़ में आ जायेगी। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि किसी 'कृति' की अनेक अनुकृतियाँ कई स्थानों पर होती हैं , यदि किसी एक स्थान की प्रति में कोई गड़बड़ी हो भी या की जाये तो शेष प्रतियाँ अपरिवर्तित ही रहेंगी।

अँगरेजों के पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों का पालन आज भी पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति से हो रहा है।

लगध के याजुष् ज्योतिष की एक प्रति को छोड़ किसी में भी गणित शब्द नहीं है, षड् वेदाङ्गों में भी 'गणित' नहीं है फिर भी बड़ी ही ढिठाई से वह श्लोक लगातार "कोट" होता है।

कल्प तथा ज्योतिष वेदाङ्गों में गणित अनुप्रयुक्त होता ही है।

Mathematics is the queen of Science

पुराने मठों में भोजपत्रों पर लिखित ग्रन्थों का संग्रह आज भी है।

ब्रिटेन ने एसिआ में प्राप्त प्राचीन हस्तलिखित सामग्री जितनी उनको प्राप्त हो सकी उसको अपने अधिकार में कर अपने देश ढोकर ले गये। अब वे भी इनके संरक्षण के उपाय खोज रहे हैं और प्रतिलिपियाँ तैयार करवाने में जुटे हैं

"द हिन्दू" में प्रकाशित वर्ष 2011ई. की वार्ता पढ़ी जा सकती है


ललितविस्तर में कथित ६४ लिपियाँ

शुद्धोदनपुत्र को जब पढ़ने भेजा गया तब यह प्रश्न किया गया कि कौन सी लिपि पढ़ाई जाये? लिखने के लिये लिपिफलक अर्थात् वही पाटी ही थी।

अथ बोधिसत्त्व उरगसारचन्दनमयं लिपिफलकमादाय दिव्यार्षसुवर्णतिरकं समन्तान्मणिरत्नप्रत्युप्तं विश्वामित्रमाचार्यमेवमाह-कतमां मे भो उपाध्याय लिपिं शिक्षापयसि। ब्राह्मीखरोष्टीपुष्करसारिं अङ्गलिपिं वङ्गलिपिं मगधलिपिं मङ्गल्यलिपिं अङ्गुलीयलिपिं शकारिलिपिं ब्रह्मवलिलिपिं पारुष्यलिपिं द्राविडलिपिं किरातलिपिं दाक्षिण्यलिपिं उग्रलिपिं संख्यालिपिं अनुलोमलिपिं अवमूर्धलिपिं दरदलिपिं खाष्यलिपिं चीनलिपिं लूनलिपिं हूणलिपिं मध्याक्षरविस्तरलिपिं पुष्पलिपिं देवलिपिं नागलिपिं यक्षलिपिं गन्धर्वलिपिं किन्नरलिपिं महोरगलिपिं असुरलिपिं गरुडलिपिं मृगचक्रलिपिं वायसरुतलिपिं भौमदेवलिपिं अन्तरीक्षदेवलिपिं उत्तरकुरुद्वीपलिपिं अपरगोडानीलिपिं पूर्वविदेहलिपिं उत्क्षेपलिपिं निक्षेपलिपिं विक्षेपलिपिं प्रक्षेपलिपिं सागरलिपिं वज्रलिपिं लेखप्रतिलेखलिपिं अनुद्रुतलिपिं शास्त्रावर्तां गणनावर्तलिपिं उत्क्षेपावर्तलिपिं निक्षेपावर्तलिपिं पादलिखितलिपिं द्विरुत्तरपदसंधिलिपिं यावद्दशोत्तरपदसंधिलिपिं मध्याहारिणीलिपिं सर्वरुतसंग्रहणीलिपिं विद्यानुलोमाविमिश्रितलिपिं ऋषितपस्तप्तां रोचमानां धरणीप्रेक्षिणीलिपिं गगनप्रेक्षिणीलिपिं सर्वौषधिनिष्यन्दां सर्वसारसंग्रहणीं सर्वभूतरुतग्रहणीम्। आसां भो उपाध्याय चतुष्षष्टीलिपीनां कतमां त्वं शिष्यापयिष्यसि?

और इसके बाद अक्षर ज्ञान कराया गया जिसमें 

अ से क्ष तक का कथन है। (ऋकार लृकार नहीं बताये गये).

अ से क्ष तक अक्षर । 'र' विस्तार को सूचित करता है।

'आखर' शब्द खन् धातु से बनता है। आखर खोदे जाते थे। शिलाओं पर , धातु पर ।

'आखर' शब्द प्राचीन है। वेद में है।


भगवान् विष्णु के लेखाकार चित्रसेन या चित्रगुप्त सम्भवतः गन्धर्व थे , गान्धार प्रदेश की चित्राल घाटी का नाम यही सङ्केत करता है। पहले पहल लिपि चित्रात्मक ही बनी इसलिए तूलिका और चित्र शब्द लेखन के सम्बन्ध में प्रयुक्त होते थे। ऋग्वेद के कुछेक मन्त्रों में भी चित्रलिपि के होने के विषय में स्पष्ट घोष है।

लिपि, अक्षर, लिखित शब्द तब तक निष्प्राण ही होते हैं जब तक प्राणयुक्त न हों अर्थात् उच्चरित न हों । श्वास रहित निर्जीव ही होता है।

आज लेखनी की भी पूजा होती है, उन पूर्वजोंIi को नमस्कार जिन्होंने करोड़ों सार्थक वाक्य लिखे, जिन्हें एक जन्म में पूरा नहीं पढ़ा जा सकता ।

कहते हैं गणेश जी ने अपने एक दाँत को ही लेखनी बना लिया था , इषीक , नरकुल , पक्षियों के पंख, नख, छेनी न जाने किन किन वस्तुओं से लेखन कार्य किया जाता रहा।

फाउण्टेन पेन, छापाखाना, और बॉल-प्वाइण्ट पेन के आविष्कर्ता भी समादरणीय हैं।

जकरबर्गवा किताब पर लिखवाता है, सरवा नाम धरे है फेसबुक। कॉपीबुक जिस पर लिखा जाता है उसे भी अँगरेज 'बुक' ही कहता है और 'कॉपी' का अर्थ नकल करना ही होता है, मतलब अँगरेजों ने लिखना पढ़ना दूसरों से ही लिया है।

फोटो में कुछ देश-विदेश के रङ्गबिरङ्गे कलम्ब हैं सबसे महीन लिखाई मित्सुबिशी से ही बनती थी, अब अपने ही लिखे महीन अक्षरों को पढ़ने के लिये लेन्स उठाना पड़ता है, इसलिए सदैव बड़ा बड़ा ही लिखना चाहिए।


जैनों के 'पन्नवणा सूत्र' और 'समवायांग सूत्र' में १८ लिपियों के नाम दिए हैं जिनमें पहला नाम बंभी (ब्राह्मी) है। उन्हीं के भगवतीसूत्र का आरंभ 'नमो बंभीए लिबिए' (ब्राह्मी लिपि को नमस्कार) से होता है।

ललित-विस्तर का ६४,  अक्षर संख्या है.


भास का लिखा नाटक 'अविमारकम्'

पहले अङ्क में नेपथ्य से आवाज आती है

दश नाळिकाः पूर्णाः।

दस बज गये हैं ।

तभी से ऑफिस टाइम 10 बजे से है।

दूसरे अङ्क में चेटी और विदूषक बतिया रहे हैं

चेटी कहती है कि भोजन कराने के लिये किसी ब्राह्मण को खोजना है।

विदूषक -क्या मैं श्रमण हूँ

चेटी- तुम अवैदिक हो

विदूषक- अरे ! मैं सालभर रोज रामायण के पाँच श्लोक पढ़ता हूँ और उनके अर्थ भी जानता हूँ

चेटी- अच्छा! तो बताओ मेरी अंगूठी पर क्या लिखा है

विदूषक- यह अक्षर मेरी पुस्तक में नहीं है।

इस वार्तालाप से यह निष्कर्ष निकलता है कि भास के समय में रामायण विद्यमान थी और रामायण पढ़ने वाला पढ़ा लिखा माना जाता था ।

जैसा कि कुछ समय पहले तक लडकियों से रामचरितमानस पढ़वाकर देखी जाती थी।

चेटी की मुद्रिका पर कोई अन्य लिपि के अक्षर थे या विदूषक अनपढ़ था ।

प्रगतिशील निष्कर्ष>> रामायण एक नाटक था जिसमें केवल पाँच श्लोक थे । आज की रामायण प्रक्षिप्त है या जाली है।

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धात्री और अविमारक के मध्य हुये वार्तालाप से ज्ञात होता है कि तब तक 'योग शास्त्र' भी स्थित हो चुका था।


डी.एन.ए. भारत के बाहर का है तो मन भी उसी ओर रहेगा . समुद्र तट पर रेत में दबे अण्डों से बाहर आते ही कछुये के बच्चे समुद्र की ओर दौड़ पड़ते हैं, उनको यह बात सिखाने वाला वहाँ कोई उपस्थित नहीं होता है। उनका घर समुद्र में है ऐसी स्मृति उनके Genes में ही संगृहीत होती है।

नहि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ।

इस मन्त्र में भी यह बतलाया है कि अन्य के उदर से उत्पन्न जातक का मन उसी ओर सहज आकृष्ट होगा जिनका कि वह वंशज है। इसलिए अन्य की सन्तान गोद नहीं ले।

भारत ने पता नहीं कहाँ कहाँ से आये समूहों को गोद ले रखा है। वे भारत की प्रत्येक बात को बाहर से जोड़ने का सतत प्रयत्न करते रहते हैं। 

मानाकि पहले भी विश्व की संस्कृतियों का मेल मिलाप होता था , ज्ञान का आदान प्रदान भी होता रहता था, इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि भारत केवल ग्राही था और शेष विश्व दाता ।

विश्व की प्राचीनतम विकसित सभ्यता सारस्वत-सैन्धव सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं हम । हम लिखना पढ़ना तब से जान रहे हैं जब शेष विश्व सभ्य नहीं हो पाया था। अब तक प्राप्त सभी प्राचीन लिपियों का पठन इसलिये सम्भव हुआ कि वे लिपियाँ वास्तव में उतनी प्राचीन नहीं हैं जितनी कि सैन्धव लिपि , यही प्राचीनता ही वह कारण है जो अब तक  यह सैन्धव लिपि अपठित ही है चाहे दावे कितने ही किये जाते रहे हों।

यदि मेगस्थनीज ने यह लिखा (पता नहीं कहाँ लिखा क्योंकि जो इंडिका बताई जाती है वह कहीं है ही नहीं) कि भारतीय लिखना और पढ़ना नहीं जानते हैं; तो हम भी यह कहते हैं कि मेगस्थनीज या अलेक्जेण्डर कभी सिन्धु के पूर्व में आया ही नहीं था। बिना लिखे पढ़े ही ज्यामिति और ज्योतिष की गणनायें कैसे हो रहीं थीं ? हर बात शिलालेख में नहीं खुदी होती है। योरोपिअन तो अंक ज्ञान को अरब का कहते हैं जबकि अरब में पहली किताब मोहम्मद के समय बनी, जिसे देखकर सब सम्मोहित हो गये। भारत में बसे हुये तुर्क , यवन, हूण, शक, मंगोल, कुषाण, बाहीक, खश, पारद, दरद, पह्लव इत्यादि   भारतीय अस्मिता व गौरव को नष्ट एवं धूमिल करने का निरन्तर प्रयत्न कर रहे हैं।


✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी


हिन्‍दी - नन्दिनागरी


हिन्‍दी दिवस पर इसकी लिपि की याद भी आती है। मोबाइल, नेट के दौर में आज हिंदी को भी विदेशी लिपि में लिखने की अनावश्‍यक परम्‍परा चल पड़ी है। तब याद आते है, इसको नन्दिनागरी लिपि में लिखने के निर्देश। 

संस्‍कृत हो या अपभ्रंश या पैशाची जैसी पूर्व भाषाएं। हमारे पुराणाें और उपपुराणों में हमारी भाषाओं को प्रारम्‍भ में जहां ब्रह्माक्षर ( या ब्राह्मी। सन्‍दर्भ - शिवधर्मपुराण) में लिखने का निर्देश हैं, वहीं बाद में नन्दिनागरी लिपि में लिखने का निर्देश मिलता है। यह देवनागरी लिपि का पूर्व और प्रारम्भिक रूप है। उत्‍तर गुप्‍तकालीन देवीपुराण, शिवधर्मोत्‍तर पुराण और अग्निपुराण में नन्दिनागरी लिपि का सन्‍दर्भ मिलता है। 

देवीपुराण में कहा गया है कि नन्दिनागरी लिपि बहुत सुन्‍दर है और इसका व्‍यवहार समस्‍त वर्णों को ध्‍यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी वर्ण और उसके अंश को भी तोड़ना नहीं चाहिए। अक्षरों को हल्‍का भी नहीं लिखना चाहिए न ही कठोर लिखना चाहिए। हेमाद्रि (1260 ई.) ने भी इन श्‍लोकों को चतुर्वर्ग्‍ग चिन्‍तामणि में उद्धृत किया है-

नाभि सन्‍तति विच्छिन्‍नं न च श्‍लक्ष्‍णैर्न कर्कशै:।। 

नन्दिनागरकैव्‍वर्णै लेखयेच्छिव पुस्‍तकम्।। 

प्रारभ्‍य पंच वै श्‍लोकान् पुन: शान्तिन्‍तु कारयेत्। (देवीपुराण 91, 53-54 एवं शिवधर्मोत्‍तर)

पुस्‍तकों के लिखने के सन्‍दर्भ में यही मत अग्निपुराणकार ने भी प्रस्‍तुत किया है। नन्दिपुराण में कहा गया है कि स्‍याही का उचित प्रयोग करना चाहिए और वर्णों के बाहरी-भीतरी स्‍वरूपों को सही-सही प्रयोग करना चाहिए। उनको सुबद्ध करना चाहिए, रम्‍य लिखना चाहिए, विस्‍तीर्ण और संकीर्णता पर पूरा ध्‍यान देना चाहिए। (दानखण्‍ड अध्‍याय 7, पृष्‍ठ 549)

है न लिपि के व्‍यवहार का सुन्‍दर निर्देश...। 

✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू


एक मित्र ने प्रश्न पूछा कि,

'बचपन में 'ञ' पढ़ाया गया था, आज तक समझ नहीं आया कि उसका प्रयोग कहाँ करना है?' 

यह प्रश्न आना स्वाभाविक है, इसका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ।

पर उन लोगों को समझाने के लिए नहीं है जिन्हें knowledge सरल और 'ज्ञान' कठिन शब्द लगता है।

 जब उन्हें पता चलेगा कि ज् +ञ = ज्ञ होता है तो उनके लिए हिन्दी भाषा और क्लिष्ट दिखायी पड़ सकती है।


चलिए 'क' 'च' 'ट' वर्ग

के अंत में आने वाले पञ्माक्षरों को जानते हैं। 

हिंदी भाषा में “ञ” “ङ” "ण" "न" "म" को पञ्चमाक्षर के रूप में जाना जाता है।

पञ्चमाक्षर का प्रयोग संस्कृत में बहुतायत में पाया जाता है।

संस्कृत या कहें कि देवनागरी लिपि इन अक्षरों के बिना अधूरी है।

परंतु लिखने में तथा छपाई में होने वाली क्लिष्टता से बचने के लिए शनैः शनैः इन पञ्चमाक्षर का प्रयोग हम छोड़ते चले गए।

जैसे कि चंद्रबिंदु का प्रयोग भी कई लोग कम करना शुरू कर दिए हैं।

जैसे अब “गाँव” को आप अक्सर “गांव” लिखा हुआ ही पाते होंगे।

अब रही बात “ञ” के प्रयोग की या “ङ” के प्रयोग की तो जिन शब्दों के उच्चारण में “अ” की ध्वनि आधी और साथ ही साथ अनुनासिक ध्वनि का प्रयोग करना हो वहां उस वर्ग के के पञ्चमाक्षर का प्रयोग करते हैं।

जैसे चवर्ग का अंतिम अक्षर का उपयोग कर लिखा जाने वाला “चञ्चल” को अब “चंचल” लिखा जाने लगा है। कवर्ग का अंतिम अक्षर का प्रयोग कर लिखे जाने वाले “गङ्गा” को अब “गंगा” लिखा जाने लगा।

अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि भाषा की शुद्धता तथा उच्चारण की अस्पष्टता के लिए ञ” “ङ” जैसे शब्द जरूरी है

पर क्लिष्टता के नाम पर भाषा में अशुद्धियों की मिलावट कर ली गयी है। 

'ञ' चवर्ग का अन्तिम व्यंजन अक्षर है । ञ का उच्चारण स्थान तालू और नासिका है ।


'ञ' से हिंदी शब्दों का आरम्भ या अंत नहीं होता। परंतु यह महत्त्वपूर्ण ध्वनि है और अनेक भाषाओं में इसका प्रचुर प्रयोग होता है और हिंदी शब्दों में, बीच में, 'ञ' प्रयुक्त होता है।


चवर्ग के व्यंजनों से पूर्व आकर 'ञ' उनसे संयुक्त अक्षर बनाता है। जैसे- चञ्चल, वाच्छा, रञ्जन, सञ्झा इत्यादि।


ज्‌ और ञ का संयुक्त रूप 'ज्‌ञ' 'ज्ञ' (अज्ञ, ज्ञान, विज्ञापन) लिखा जाता है। 'ज्ञ' (अर्थात् ज्ज्ञ) का अशुद्ध उच्चारण हिंदी भाषी प्राय: 'ग्य' करते हैं। उदारणार्थ, 'ज्ञान' का शुद्ध उच्चारण 'ज्‌ञान' होना चाहिए परंतु शताब्दियों से इसे 'ग्यान' बोला जाता रहा है। 'ञ' के स्थान पर प्राय: अनुस्वार जैसी बिंदी का प्रयोग सुविधा के लिए प्रचलित है (जैसे- चंचल, वांछा, रंजन, संझा इत्यादि में) परन्तु इसे अनुस्वार समझने का भ्रम हो सकता है। इसी क्रम में जितने भी च वर्ग के संयुक्ताक्षर हैं, जैसे कि पाञ्चजन्य, रञ्जक, सञ्चालन, सञ्जय, धनञ्जय आदि उनमें नियमतः ञ ही प्रयुक्त होना चाहिए।

✍🏻डॉ अभिलाषा


जिज्ञासा...


म्लेच्छभाषा किसे कहते हैं?


समाधानम्...


संस्कार रहित (असंस्कृत) कुत्सित तथा अपशब्दों से युक्त भाषा को म्लेच्छभाषा कहा जाता है।

तथा

प्रकृति-प्रत्यय विभागपुरस्सर नियतार्थबोधक शब्दयुक्त भाषा को संस्कृत भाषा कहते हैं।


इसीलिए संस्कृत को सुरभाषा कहा जाता है,तद्

भिन्ना भाषा....स्वयं कल्पना करें।


*************

पाणिनि व्याकरणानुसार

म्लेछँ (धातु चुरादि) अव्यक्तायां वाचि =म्लेच्छयति

म्लेछँ (भ्वादि) अव्यक्तशब्दे =म्लेच्छति 

अव्यक्तशब्द का अर्थ है अपशब्दना


म्लेच्छति म्लेच्छयति =असंस्कृतं वदतीति अपभाषणं करोतीति म्लेच्छः। 


इसीलिए कहा जाता है कि  "धृतव्रतो विद्वान् न म्लेच्छयति/म्लेच्छति परन्तु मूढो मूर्खस्तु म्लेच्छयति/म्लेच्छति एव।"


महाभाष्य पस्पशाह्निक में व्याकरणाध्ययन् के प्रयोजन प्रकरण में लिखा है.. "तस्मात् ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः।"

कैयट कहते हैं म्लेच्छितवै का अर्थ है अपभाषितवै।।

साभार: समर्थ श्री

✍🏻पवन शर्मा की वॉल से


कक्को केवलो !

#ओलम

ककहरा से सीखने के सोपान चढ़ने का सिलसिला बड़ा पुराना है। पढ़ाई कैसे होती थी, शिक्षा विषयक नारदीय आदि किताबों में बड़ी बड़ी बातें हैं लेकिन ककहरे का क्रम बौद्ध ग्रन्थों में मिल जाता है, सिद्धमातृका के नाम से लिपि का एक पाठ भी भारत से जापान गए एक बौद्ध ग्रन्थ में मिला है।

सामान्य मित्र अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी का धन्यवाद कि उन्होंने हमारा ध्यान ओलम ( इल्म से मिलता जुलता, लेकिन मलयालम में सुरक्षित शब्द) शब्द की ओर खींचा और बताया कि यह ककहरा सीखने और प्रशिक्षण की पहली पोथी के अर्थ में है। इसके आसपास का ओली शब्द राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र में मिलता है जिसका आशय लिखना, दाखिला देना होता है।

मित्र इस ककहरे को संभाल कर रखें। यह कुल 46 अक्षरों का है :


मातृका  ( ओलम )

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यदा अकारं परिकीर्तयन्ति स्म, तदा अनित्यः सर्वसंस्कारशब्दो निश्चरति स्म। 

आकारे परिकीर्त्यमाने आत्मपरहितशब्दो निश्चरति स्म। 

इकारे इन्द्रियवैकल्यशब्दः। 

ईकारे ईतिबहुलं जगदिति। 

उकारे उपद्रवबहुलं जगदिति। 

ऊकारे ऊनसत्त्वं जगदिति। 

एकारे एषणासमुत्थानदोषशब्दः। 

ऐकारे ऐर्यापथः श्रेयानिति। 

ओकारे ओघोत्तरशब्दः। 

औकारे औपपादुकशब्दः। 

अंकारे अमोघोत्पत्तिशब्दः। 

अःकारे अस्तंगमनशब्दो निश्चरति स्म। 

ककारे कर्मविपाकावतारशब्दः। 

खकारे खसमसर्वधर्मशब्दः। 

गकारे गम्भीरधर्मप्रतीत्यसमुत्पादावतारशब्दः। 

घकारे घनपटलाविद्यामोहान्धकारविधमनशब्दः। ङकारेऽङ्गविशुद्धिशब्दः। 

चकारे चतुरार्यसत्यशब्दः। 

छकारे छन्दरागप्रहाणशब्दः। 

जकारे जरामरणसमतिक्रमणशब्दः। 

झकारे झषध्वजबलनिग्रहणशब्दः। 

ञकारे ज्ञापनशब्दः। 

टकारे पटोपच्छेदनशब्दः। 

ठकारे ठपनीयप्रश्नशब्दः। 

डकारे डमरमारनिग्रहणशब्दः। 

ढकारे मीढविषया इति। 

णकारे रेणुक्लेशा इति। 

तकारे तथतासंभेदशब्दः। 

थकारे थामबलवेगवैशारद्यशब्दः। 

दकारे दानदमसंयमसौरभ्यशब्दः। 

धकारे धनमार्याणां सप्तविधमिति। 

नकारे नामरूपपरिज्ञाशब्दः। 

पकारे परमार्थशब्दः। 

फकारे फलप्राप्तिसाक्षात्क्रियाशब्दः। 

बकारे बन्धनमोक्षशब्दः। 

भकारे भवविभवशब्दः। 

मकारे मदमानोपशमनशब्दः। 

यकारे यथावद्धर्मप्रतिवेधशब्दः। 

रकारे रत्यरतिपरमार्थरतिशब्दः। 

लकारे लताछेदनशब्दः। 

वकारे वरयानशब्दः। 

शकारे शमथविपश्यनाशब्दः। 

षकारे षडायतननिग्रहणाभिज्ञज्ञानावाप्तिशब्दः। सकारे सर्वज्ञज्ञानाभिसंबोधनशब्दः। 

हकारे हतक्लेशविरागशब्दः। 

क्षकारे परिकीर्त्यमाने क्षणपर्यन्ताभिलाप्यसर्वधर्मशब्दो निश्चरति स्म॥


इति

कुल ४६ वर्णाक्षरों का ज्ञान मिला, और सबका प्रयोग नकारात्मकता में है ।

'क' से कबूतर , कमल , कलम कुछ भी बता सकते हैं, किन्तु शिशु को जैसा प्रथम बार बता देंगे वह आजीवन अमिट रहेगा। ग से गमला बताइये चाहे ग से गणेश या ग से गधा।

 

लिपियां - छोटा देश, बड़ा लिपि संसार


हमारे यहां कई लिपियां थीं। पहली सदी तक चौंसठ लिपियां अस्तित्‍व में थीं। इन लिपियों के अलग-अलग नाम भी मौजूद हैं। यह कैसे हुआ, कोई नहीं कह सकता, मगर लिपियों का इतनी संख्‍या में होना जाहिर करता है कि ये सब एकाएक नहीं आ गई।


 एक छोटे से देश में इतनी लिपियां और उनको लिखने की परंपरा,.. बुद्ध जब पढने जाते हैं तो पहले ही शिक्षक को 64 लिपियों के नाम गिनाते हैं जिनमें पहली लिपि ब्राह्मी हैं। महाभारत में विदुर को यवनानी लिपि के ज्ञात होने का जिक्र आया है, वशिष्‍ठस्‍मृति में विदेशी लिपि का संदर्भ है। किंतु ब्राह्मी वही लिपि है जिसको चीनी विश्‍वकोश में भी ब्रह्मा द्वारा उत्‍पन्‍न करना बताया गया है..। 


पड़ नामक लिपि खोदक का नाम अशोक के शिलालेख में आता है, जो अपने हस्‍ताक्षर तो खरोष्‍टी में करता था अौर लिखता ब्राह्मीलिपि। हालांकि अशोक ने अपनी संदेशों को धर्मलिपि में कहा है...। सिंधु-हडप्‍पा की अपनी लिपि रही है, इस सभ्‍यता की लिपि के नामपट्ट धोलावीरा के उत्‍खनन में मिल चुके हैं...। कुछ शैलाश्रयों में भी संकेत लिपि के प्रमाण खोजे गए हैं।


ऐसे में ब्‍यूलर वगैरह उन पाश्‍चात्‍य विद्वानों के तर्कों का क्‍या होगा जो भारतीयों को अपनी लिपि का ज्ञान बाहर से ग्रहण करना बताते हैं। भारत में लिपियों का विकास अपने ढंग से, अपनी भाषा और अपने बोली व्‍यवहार के अनुसार हुआ है। हर्षवर्धन के काल में लिखित 'कादम्‍बरी' में राजकुमार चंद्रापीड़ को अध्‍ययन के दौरान 'सर्वलिपिषु सर्वदेश भाषासु' प्रवीण किया गया।


 इस आधार पर यह माना जाता है कि उस काल तक लोग सभी लिपियां जानते थे, अनेक देश की भाषाओं को जानते थे। उनको पढ़ाया भी जाता था। लगता है कि भारतीयों को अनेक लिपियों का ज्ञान होता था और उनकी सीखने में दिलचस्‍पी थी। तभी तो हमारे यहां लिपिन्‍यास की परंपरा शास्‍त्रों में भी मिलती है। लिपिन्‍यास का पूरा विधान ही अनुष्‍ठान में मिलता है.. इस संबंध में एक बार फिर से प्रकाशित भारतीय प्राचीन लिपिमाला की भूमिका लिखी है पिछले दिनों,,, जिक्र फिर कभी।

-✍🏻डॉ0 श्रीकृष्ण "जुगनू"

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

मांतंगनी हाजरा मुजाहिदे-आजादी शहीदे वतन

 

19 अक्टूबर जन्मदिवश पर विशेष।


प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारूहर 


भारत देश की स्वतंत्रता के संघर्ष मे पुरुष और महिला,धनवान और निर्धन, छोटे और बडे का कोई अन्तर नही रहा है। प्रत्येक वर्ग ने आजादी की लड़ाई में भाग लिया। मांतंगनी हाजरा भी ऐसी ही एक मुसलमान महिला स्वतंत्रता सेनानी थी,जिन्होने निर्धनता के बावजूद देश की आजादी मे खुलकर हिस्सा लिया। यहां तक कि उस संघर्ष में उन्होंने अपनी जान को निछावर कर दिया।


मांतंगनी हाजरा 19 अक्तूबर सन् 1869 ई० मे बंगाल के तामलुक जिला के ग्राम होगला के गरीब परिवार में पैदा हुई। भारत के बहुत से पुरुष एवं महिलाएं तो जन्म से ही अपने मन में आजादी के संघर्ष का जज्बा लेकर पैदा हुई। कुछ आस पास के माहौल से प्रभावित होकर आजादी की जंग में कूद पड़े। मांतंगनी हाजरा एक मजदूर घराने की देश प्रेमी स्वतंत्रता सेनानी थी । उनके मां बाप ने अपनी बेटी के खानपान का खर्चा सहन न कर पाने के करण ,12 वर्ष की छोटी उम्र में ही बडी आयु के एक धनवान व्यक्ति से उनकी शादी कर दी, ताकि वे अपना जीवन सुख चैन से गुजार सकें। किंतु उसका परिणाम उल्टा ही हुआ। 18 वर्ष की आयु में ही मांतंगनी हाजरा के सुहाग का सफर पूरा हो गया और वह विधवा हो गई। उनके हालात फिर बिगड गए। उन्होंने अपने विधवापन और गरीबी की परेशानियों को बर्दाश्त करते हुए आजादी की लड़ाई में जमकर हिस्सा लिया। उस समय देश में चारों ओर आजादी की चर्चाएं थी और आजादी के लिए संघर्ष करने का माहौल बना हुआ था। जुलूसो और जलसों में इंकलाब जिंदाबाद के नारों की गूंज थी। देशवासियों में अंग्रेजो के खिलाफ नफरत फैली हुई थी। मां हाजरा के दिल व दिमाग में भी यही सब बातें घर कर गई । उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ने की अपने मन में ठान ली।मांतंगनी हाजरा ने गांधी जी को अपना नेता मानकर चरखा कातना और खादी पहनना आरंभ कर दिया। चाहे जो भी आंदोलन हो, यह आजादी से संबंधित कोई भी गतिविधि हो, सभी में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । वह उन महिलाओं में से थी जिन्होंने अंग्रेजों के जुल्म और सजाओ की परवाह किए बगैर नमक सत्याग्रह में भाग लिया मां हाजरा ने नमक बनाकर अंग्रेजी कानून की खिलाफ़वर्जी की। उस पर फिरंगियो ने सजा देने के लिए भारतीय महिलाओ को भी नही छोडा। मातागनी हाजरा को भी सजा के तौर पर इतना ज्यादा पैदल चलवाया गया कि वह थकान के कारण चलते-चलते  गिर पडती थी। परंतु वह किसी भी सजा के कारण आजादी के संघर्ष से पीछे नहीं हटी। उनके दिल में देश प्रेमी इतनी गहराई तक बैठ गया था कि वह देश की खातिर फिरंगीयो की कोई भी सजा सहने के लिए तैयार रहती थी। वह अधिकांश आंदोलनों में हिस्सा लेकर अंग्रेज सरकार के खिलाफ चुनौती खड़ी कर देती थी । चाहे चौकीदारी के विरोध में निकाला गया जुलूस हो, या 1933 ई० मे सीरमपुर में कांग्रेस सम्मेलन,अथवा 1942 ई० मे भारत छोड़ो आंदोलन , सभी मे उन्होंने खुलकर हिस्सा लिया। उन्होंने देश की आजादी के संघर्ष में जेल की सजा काटी। जलसो, जुलूसों में फिरंगी लाठियो से जख्मी हुई। एक महिला होते हुए आजादी की लड़ाई में उनके कारनामे किसी बहादुर पुरुष से कम नहीं रहे। वह इतनी बड़ी और अनुभवी नेता बन चुकी थी की 29 सितंबर 1942 ईस्वी के तामलुक में आंदोलन के समय लगभग छः हजार महिलाओं के जुलूस का उन्होने नेतृत्व किया। उस समय इतनी ज्यादा टकराव की स्थिति बन गई थी कि अंग्रेज बल ने महिला जुलूस को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया। लेकिन वह महिला क्रांतिकारीयो को काबू में नहीं कर सकी। यहां तक कि महिला जुलूस को सरजेंट द्वारा चेतावनी दी गई कि यदि जुलूस ने आगे बढ़ने की कोशिश की तो उन्हें गोली मार दी जायेगी।


आजादी  की मतवाली मांतंगनी हाजरा को सरजेन्ट की धमकी बर्दाश्त नहीं हुई। उनके मन में तो अंग्रेज शासन से नफरत और आजादी की मोहब्बत का खून दौड़ रहा था। उन्होंने सरजेन्ट को ललकारते हुए कहा कि निहत्थी माहिलओ पर गोली चलाने की हिम्मत मत करना । वह आजादी के किसी भी आन्दोलन, जलसो,जुलूस धरने आदि को अंग्रेजों की धमकियों के डर से रोकने के खिलाफ थी। उन्होंने हमेशा देश की आबरू और आजादी की आन को अपनी जान पर प्राथमिकता दी। अतंत: हुआ भी यही कि देश की वीर महिला स्वतंत्रता सेनानी मां हाजरा अंग्रेज पुलिस के सामने आकर महिला जुलूस का नेतृत्व कर रही थी। पुलिस के रोकने के बावजूद आंदोलनकारी महिलाओं का जुलूस आगे बढ़ता जा रहा था। इसी बीच सरजेन्ट ने महिला जुलूस पर गोली चला दी। गोली मां हाजरा के बाजू को चीर गई। वह उस हाथ में देश का झंडा थामे हुए थी। उनके जख्मी हाथ से खून का फव्वारा उबल पड़ा, मगर उस बहादुर महिला ने देश का झंडा गिरने नहीं दिया। उसे दूसरे हाथ में ले लिया। और नारे लगाती हुई आगे बढ़ती गई। सरजेन्ट ने उनके दूसरे हाथ पर भी गोली दाग दी। उनका दूसरा हाथ जख्मी हो गया। दूसरे हाथ के पवित्र खून की धार से देश की धरती लाल होने लगी। उस बहादुर महिला ने दो गोलियां खाकर भी हिम्मत नहीं हारी और दूसरे लहूलुहान हाथ से ही देश का झंडा थामे रही। वह इतनी तकलीफ की हालत में भी अपनी लड़खड़ाती आवाज में देशभक्ति के नारे लगाती हुईं और भी आगे बढ़ने का प्रयास कर रही थी। इतने में करूर सरजेन्ट ने भारत की उस वीर महिला के माथे को अपनी गोली का निशाना बना दिया। उनके माथे को फिरंगी गोली पार कर गई। ऐसी हालत मे देश का परजम हाजरा बी के हाथ से दूसरी क्रांतिकारी महिला ने अपने हाथ में ले लिया। खून से भरी हुई मांतंगनी हाजरा अपने देश की धरती पर गिर पडी। फिर क्या था भीड़ ने गम और गुस्से से बेकाबू होकर अदालत पर क़ब्जा कर लिया। तामलुक मे एक समानातंर सरकार कायम कर ली गई । जो कि बाद में गांधी के निर्देश पर खत्म कर दी गई।


मांतंगनी हाजरा की शहादत इसका खुला सबूत है कि भारत देश को आजाद कराने के लिए इस देश की मुसलमान महिलाओं ने भी अपनी जानो को कुर्बान किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के खून से खींचा गया यह आजादी का पौधा आज भी आपसी एकता और भाईचारे का हमें संदेश दे रहा है। स्वतंत्रता सेनानी मांतंगनी हाजरा का देश की आजादी के लिए बलिदान इतिहास के पन्नो मे अमर रहेगा।


संदर्भ 1-हिन्दुस्तान की जंगे-आजादी मे ख्वातीन 

लेखक-डा.बानो सरताज पृष्ठ संख्या 45,47

2- जंगे आजादी और मुसलमान

लेखक-खालिद मोहम्मद खान 

संकलन हसरत अली 

शेरपुर जिला मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)

फ़ोन नंबर 8580533689

स्वतंत्रता सेनानी कुलसुम सयानी

                 

🕔 21 अक्टुबर 1900, जन्मदिन पर विशेष।



कुलसुम सयानी, जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेते हुए सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उनका जन्म 21 अक्टूबर 1900 को गुजरात में हुआ था।  वह 1917 में अपने पिता के साथ महात्मा गांधी से मिलीं।  तब से उन्होंने गांधी के दिखाए रास्ते पर चलना शुरू किया।  उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सामाजिक सुधारों के लिए अपने प्रयासों को लड़ा और केंद्रित किया।  उन्होंने एक अन्य प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी डॉ. जान मोहम्मद सयानी से शादी की।  जैसा कि उन्हें अपने पति से समर्थन मिला, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विभिन्न गतिविधियों में बहुत सक्रिय भाग लिया।  उन्होंने निरक्षरों को पढ़ाना शुरू किया और चरखा वर्ग की सदस्यता ली।  उन्होंने सामाजिक बुराइयों पर लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'जन जागरण' कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  सयानी की गतिविधियों में मुंबई शहर और उसके उपनगर शामिल थे।  मुस्लिम लीग के नेता उसकी गतिविधियों को पचा नहीं सके।  उन्होंने सोचा कि वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर गरीबों को आकर्षित कर रही है और अपने प्रयासों का मुकाबला करने के लिए समानांतर कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया।  इस तरह के शत्रुतापूर्ण माहौल में होते हुए भी वह पीछे नहीं हटीं, बल्कि उन्होंने अपनी गतिविधियों को और तेज कर दिया।  उन्होंने वयस्क शिक्षा पाठकों के उपयोग के लिए 'रहबर' (हेल्पर) नाम से एक उर्दू पाक्षिक शुरू किया।  उन्होंने बड़े पैमाने पर विभिन्न देशों की यात्रा की और भारत के प्रतिनिधि के रूप में कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया।  

उन्होंने वयस्क शिक्षा कार्यक्रम, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका, समाज सेवा, भारत-पाक मित्रता आदि विषयों पर कई किताबें लिखीं। उन्होंने हिंदी भाषा में 'प्रौधा शिक्षा में मेरे अनुभव', 'भारत' जैसी किताबें लिखीं।  -पाक मैत्री - मेरे प्रयास', 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओ की भूमिका', 'भारत में प्रौध शिक्षा' आदि।  भारत के राष्ट्रपति द्वारा नेहरू साक्षरता पुरस्कार।  महिलाओं और समाज के सर्वांगीण विकास के लिए काम करने वाली कुलसुम सयानी का 27 मई 1987 को निधन हो गया।

 

Reference-The Immortals

Book by Syed Naseer Ahamed 

Page number 272,273

Compalition Hasrat Ali

भारत पर मंगोलों का हमला नाकाम करने वाला सुल्तान

 भारत पर मंगोलों का हमला नाकाम करने वाला सुल्तान


भारतीय इतिहास का सबसे ताक़तवर शासक अलाउद्दीन खिलजी:

 कुछ दिलचस्प दास्तान


प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारुहार 


अलाउद्दीन खिलजी का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प रहा है अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली के सुल्तान थे और वह खिलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी के भतीजे और दामाद थे इतिहासकारों के अनुसार यह माना जाता है अलाउद्दीन खिलजी खिलजी साम्राज्य का सबसे अधिक शक्तिशाली शासक रहा थे और उसने सुल्तान बनने के पहले इलाहाबाद के पास कड़ा नाम की जागीर दी गई थी जिसे उन्होंने संभाला था ।


अलाउद्दीन खिलजी के बचपन का नाम गुरु शासक था अलाउद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के बाद अमीरे उन्हें अमीर ए तुजुक से भी नवाजा गया.दुनियाँ की बड़ी बड़ी सल्तनत जब मंगोलो के ख़ौफ़ से थर थर कांप रही थी, तब उस वक़्त हिन्दुस्तान में एक ऐसा बहादुर और दिलेर शहंशाह हुकुमत कर रहा था जिनसे मंगोलो को एक बार नही बल्कि पांच बार युद्ध में शिकस्त दिया बुरी तरह हार का सामना कर रहे मंगोलो मे अलाउद्दीन ख़िलजी के नाम का ख़ौफ़ तारी हो गया था. अलाउद्दीन ख़िलजी दुनिया के ऐसे चंद शासकों में भी शामिल थे जिन्होंने मंगोल आक्रमणों को नाकाम किया और अपने राज्य की रक्षा की.


उन्होंने न सिर्फ़ बड़ी मंगोल सेनाओं को हराया बल्कि मध्य एशिया में मंगोलों के ख़िलाफ़ अभियान भी चलाया।एक बार तो उन्हे अफ़्गानिस्तान में घुस कर भगाया; उनके ख़ौफ़ का ये आलम था के हिन्दुस्तान पर हमला करने वाले मंगोल फ़ौज के राजा ने अपने चार हज़ार सिपाहीयों के साथ इस्लाम क़बुल कर लिया, जिन्हे आज के निज़ामुद्दीन में मुग़लपुरा बना कर बसाया गया था.


इस अज़ीम फ़ातेह ने 1301 मे रंणथम्बोर फ़तह किया, 1303 में चित्तौड़, 1304 में गुजरात, 1305 में मालवा, 1308 में सवाना को फ़तह किया ,विंध्याचल कोहिसार पार करके 1308 में देवगिरी,, तो 1310 में वारंगल, 1311 में द्वार समंदर फ़तह किया,, 

1311 में ही जालोर और परमार ख़ानदान की ताक़त को तोड़ा और पांडिया ख़ानदान को बाजगुज़र बनाया और एक मज़बुत हिन्दुस्तान की बुनियाद डाली जिसकी दारुलहुकुमत दिल्ली के ज़ेर ए निगरानी दकन का इलाक़ा भी था.


अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में शराब और भांग जैसे मादक पदार्थों का सेवन तथा जुआ खेलना बंद करा दिया गया था. 


अलाउद्दीन दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान था, जिसने भूमि की पैमाइश कराकर राजस्व वसूल करना आरंभ किया. उसने केंद्र के अधीन एक बड़ी और स्थायी सेना रखी तथा उसे नकद वेतन दिया. ऐसा करने वाला वह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था. 

उसने धर्म को राजनीति से पृथक किया खलीफा की सत्ता को अपने राजकाज में क़तई हस्तक्षेप नहीं करने दिया


अलाउद्दीन ख़िलजी ने जीवन की अत्यावश्यक वस्तुओं से लेकर विलास-वस्तुओं-जैसे दासों, अश्वों, हथियारों, सिल्क और सामग्री तक सभी चीजों के मूल्य निश्चित कर दिये थे. राजधानी के चतुर्दिक खालसा गाँवों में भूमिकर नकद के बदले अन्न के रूप में लिया जाने लगा. अन्न दिल्ली नगर की राजकीय अन्न-शालाओं में संचित किया जाता था ताकि दुर्मिक्ष के समय सुल्तान इसे बाजारों में भेज सके. अन्न का कोई भी व्यक्तिगत रूप में संचय नहीं कर सकता था. बाजारों पर दीवाने-रियासत एवं शहना-ए-मंडी (बाजार का दारोगा) नामक दो अधिकारियों का नियंत्रण रहता था.

सुल्तान को बाजारों की दशा की सूचना देने के लिए गुप्तचरों का एक दल नियुक्त था. व्यापारियों को अपना नाम एक सरकारी दफ्तार में रजिस्ट्री कराना पड़ता था. उन्हें अपनी सामग्री को बेचने के लिए बदायूं द्वार के अन्दर सराय-अदल नामक एक खुले स्थान पर ले जाने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी. उन्हें अपने आचरण के लिए पर्याप्त जामिन देना पड़ता था. सुल्तान के नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर दण्ड की व्यवस्था थी. दुकानदारों द्वारा हल्के बटखरों का व्यवहार रोकने के लिए यह आज्ञा थी कि वजन जितना कम हो उतना ही मांस उनके शरीर से काट लिया जाए. बाजारों में अनाज का अपरिवर्तनशील मूल्य उस समय का एक आश्चर्य ही समझा जाता था.

अलाउद्दीन ख़िलजी ने ही भारत में लोगों को व्यापार करना सिखाया और अपने साम्राज्य को दक्षिण की दिशा में बढ़ाया। उनका साम्राज्य कावेरी नदी के दक्षिण तक फैल गया था।


शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

तन्त्रों की कूट-भाषा उसका कवच है।



 तन्त्रों की कूट-भाषा उसका कवच है। 


भारत में शास्त्र के संरक्षण का पहला सिद्धान्त रहा है कि वह केवल अधिकारी व्यक्ति को ही दिया जाये। वैदिक काल में ही यह अवधारणा रही कि अनधिकारी व्यक्ति विद्या का दुरुपयोग करेंगे अथवा आधे-अधूरे ज्ञान के कारण उसे हानि पहुँचायेंगे। अतः स्पष्ट शब्दों में कहा गया-


विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम - गोपाय मा शेवधिष्ठेऽ हमस्सि ।

असूयकायानृजवे शठाय मा मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ॥ 


वर्तमान में भारतीय विद्याओं पर गोपनीयता का आरोप लगाकर उसे नष्ट करने और अन्य लोगों को वंचित करने का आरोप लगाया जाता रहा है। यह गोपनीयता भारत के सभी शास्त्रों में है। यहाँ तक कि निरुक्त, जो कि शब्द निर्वचन विज्ञान है, उसके लिए भी यास्क ने कहा है –


नावैयाकरणाय नानुपसन्नाय अनिदंविदे वा । 

नित्यं ह्यविज्ञातुर्विज्ञानेऽसूया । 

उपसन्नाय तु निर्ब्रूयाद्यो वा अलं विज्ञातुं स्यान्मेधाविने तपस्विने वा ॥ २.३ ॥


अर्थात जिसने व्याकरण शास्त्र का अध्ययन न किया हो, जो सीखने के लिए नहीं आया हो, अथवा जो इसे न जानता हो, उसे निरुक्त का उपदेश न करें। 


वस्तुतः गोपनीयता शास्त्र की रक्षा के लिए एक कवच के समान है। जो जिस शास्त्र के लिए अधिकारी हैं वे ही उस शास्त्र का अध्ययन करें, अन्यथा वह शास्त्र नष्ट हो जायेगा। वे सर्वांगीण ज्ञान के अभाव में मनमाने ढंग से  व्याख्या करेंगे, जिससे दुष्प्रचार होगा। इसलिए तन्त्र की भाषा कूटात्मक है। यदि हम कहीं से एक-आध पंक्ति सुन लेते है, तो उस पंक्ति की पृष्ठभूमि के अभाव में हम गलत व्याख्या कर लेते हैं। इसलिए अधिकारी को ही उपदेश करना चाहिए, यह भारत का सार्वजनीन सिद्धान्त है। आज भी हम विशिष्ट परीक्षा के द्वारा ही चिकित्सा-विज्ञान, अभियंत्रण आदि के क्षेत्र में उचित व्यक्ति को शिक्षा दे रहे हैं।


अनधिकारी व्यक्ति ने किस प्रकार तन्त्र के सिद्धान्त को भ्रष्ट किया है इसका एक रोचक उदाहरण यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। तन्त्र में एक श्लोक बहुधा प्रचलित है-


पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा पतितत्वा च महीतले।

उत्थाय च पुनः पीत्वा वचनं सत्य-सम्मतम्।।


इसका सामान्य अर्थ है- बार बार पीकर, फिर पीकर, गिरकर भी फिर से उठकर पीना चाहिए। सामान्य जन इसका अर्थ मदिरा-पान के सन्दर्भ में लेते हैं। यहाँ तक कि एक यूरोपियन अधिकारी ने नेपाल के क्षेत्र में अफीम और गाँजा के व्यापार को बढावा देने के लिए इस पंक्ति का उपयोग कर इसे वहाँ की संस्कृति बताने का भी काम किया है।


लेकिन, कालीविलासतन्त्र के षष्ठ पटल के अंतिम की इस पंक्ति की पृष्ठभूमि देखने से स्पष्ट हो जाता है कि इस पंक्ति के ठीक ऊपर कहा गया है कि मद्यं न रचयेद् भद्रे कलिकाले वरानने। जब इसके ठीक ऊपर मद्यपान का निषेध है तो फिर कैसे इस पंक्ति को नशा का प्रतिपादक माना जायेगा। वस्तुतः वहाँ खेचरी मुद्रा का वर्णन है और कहा गया है कि जिह्वा के अग्रभाग को कण्ठविवर में डाल देने पर ब्रह्मरन्ध्र से एक रस टपकता हुआ प्रतीत होता है। वह रस अमृत है, उसे बार बार पीना चाहिए। गिरने के बाद भी पीना चाहिए। स्पष्ट है कि यहाँ मदिरा नहीं, ब्रह्मरन्ध्र से निःसृत अमृत को पीने की बात कही गयी है और यहाँ खेचरी मुद्रा का विधान किया गया है।


कौलोपनिषद् भी सिद्धान्तों की गोपनीयता पर बल देती है। इसका स्पष्ट आदेश है कि अपने मत की स्थापना भी न करें। यदि कोई कौल मत का विरोध करता है तो वहाँ से उठ जायें किन्तु उनकी बातों का प्रतिवाद कदापि न करें। इससे सिद्धान्तों की गोपनीयता समाप्त हो जायेगी।


शास्त्र की गोपनीयता के लिए तन्त्र में दो प्रकार की कूट भाषा का प्रयोग हुआ है। एक तो बीज-मन्त्रों की गोपनीयता के लिए प्रत्येक वर्ष को प्रकट करनेवाले सार्थक शब्दों की सूची दी गयी है। इसके आधार पर एकाक्षरी कोष, मातृका-कोष, तन्त्र-कोष आदि का निर्माण किया गया है जिसमें अ से क्ष तक प्रत्येक अक्षर के द्योतन के लिए अनेक शब्द रखे गये हैं। इस कोष का ज्ञान होने पर ही कोई व्यक्ति बीज-मन्त्रोद्धार कर सकेगें। इससे मन्त्रों की रक्षा होगी। इसका एक उदाहरण देना यहाँ पर्याप्त होगा। प्रसिद्ध तन्त्राचार्य अभिनवगुप्त के गुरु आचार्य पृथ्वीधर कृत चण्डीस्तोत्र में कहा गया है-


यद् वारुणात्परमिदं जगदम्ब यत्ते बीजं स्मरेदनुदिनं दहनाधिरूढम्।

मायाङ्कितं तिलकितं तरुणेन्दुबिन्दुनादैरमन्दमिह राज्यमसौ भुनक्ति।।


यहाँ शक्ति बीज ह्रीँ का प्रतिपादन किया गया है। अरुण अर्थात् ह वर्ण के बाद दहन अर्थात् र, इसके बाद माया अर्थात् ई, और उसके बाद तिलक एवं अर्द्धचन्द्र इनसे युक्त जो बीज है उसके स्मरण करने से विशिष्ट साम्राज्य को पाने की बाद कही गयी है।


दूसरे प्रकार से गोपन के लिए, सिद्धान्तों को सुरक्षित रखने के लिए हास्यास्पद कथनों के द्वारा, सामाजिक शिष्टाचार के विपरीत कथनों के द्वारा भी सिद्धान्तों का गोपन किया गया है। यह भी तन्त्रों की एक कूट भाषा है। लोग तान्त्रिकों को भ्रष्ट समझें, उनकी हँसी उडावें लेकिन उनकी वास्तविकता को अनधिकारी व्यक्ति न जान सकें इसके लिए ये सारे प्रयास किये गये हैं। यही कारण है कि तन्त्र के विरुद्ध लोगों के मन में अवधारणा फैली।


आज बस इतना ही......

शनिवार, 1 अक्टूबर 2022

पश्चिमीकरण ओर भारतीयकरण AQ

 पश्चिमीकरण ओर भारतीयकरण की प्रतिस्पर्धा जिसमे दोनों स्वेच्छिक है मगर एक भौतिकवाद से प्रेरित है एक आध्यात्मिकवाद से प्रेरित है एक दिशाहीन अंधानुकरण है दूसरा  अंतरात्मा की आवाज और अभिष्टमय है.

 एक का नेतृत्व बॉलीवुड हॉलीवुड व नारीवादी करते है दूसरा नेतृत्वहीन है  पश्चिमीकरण गरीबी से अमीरी की और बढ़ती युवापीढ़ी में ज्यादा पाई जाता है भारतीयकरण अमीरी से सादगी की ओर बढ़ते लोगो में ज्यादा दिख रहा है पश्चिमीकरण का सम्बंध जीवन के सभी पक्षों से मगर भारत में इसका प्रभाव भौतिक ज्यादा वैचारिक कम है जबकि भारतीयकरण वैचारिक ज्यादा भौतिकवादी कम है दोनों प्रकिया  पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में ज्यादा नजर आ रही है.

 भारतीय नारी पूर्णपरिधान से अर्द्धनग्नता की बढ़ रही है पश्चिम की नारी नग्नता से पूर्णतया की ओर बढ़ रही है आज से 20 साले पहले भारत आने वाले विदेशी अर्द्ध नग्न घूमते थे मगर आज अधिकतर भारतीय परिधानों में ही नजर आते है विशेषकर विदेशी महिलाओं को सूट में देखा जा सकता है वही भारतीय पर्यटक भारत या विदेशों में अर्द्ध नग्न होकर भृमण करते देख सकते है 

ऋषिकेश जैसी तपोभूमि पर हमारी लड़कियों बेशर्मीता के साथ अर्द्ध नग्न परिधानों में घूमती दिखती है उनके परिजन बड़े गौरवान्वित होकर उनके साथ चलते है और विदेशी महिलाओं को उनको देखकर कुटिल हंसी करते जब हम देखते है तो वो  बहुत कुछ बयान कर जाती है वो सब सूट व सौम्य परिधानों में होने के साथ उस तीर्थ की पावनता का सम्मान करती है मगर हमारे बच्चे तीर्थ की पावनता को तिलांजलि देते देखा जा सकता पर्यटक स्थलों पर पश्चिमीकरण ओर भारतीयता की प्रतिस्पर्धा स्पष्ट नजर  आती है भारतीय भारतीयता के विध्वंसक के रूप में ओर विदेशी भारतीयता के रक्षक के रूप में देखा जा सकता है  पश्चिमी लोग यह देखकर खुश है कि उनकी झूठन भारत में पल्लवित है और हम यह देखकर खुश है कि चलो हमारे देश में ना सही विदेशों में तो हमारी संस्कृति पल्लवित हो रही है ।


डॉ राजेन्द्र जोशी