सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

डॉ अम्बेडकर का एक दुर्लभ पत्र


30 दिसंबर, 1930 को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लंदन से रमाबाई को एक पत्र लिखा था, उसी पत्र का सम्पादित संपादित अंश।


रमा! कैसी हो रमा तुम?

तुम्हारी और यशवंत की आज मुझे बहुत याद आई। तुम्हारी यादों से मन बहुत ही उदास हो गया है। मेरी बौद्धिक ताकत बहुत ही प्रबल बन गई है। शायद मन में बहुत सारी बातें उमड़ रही हैं। हृदय बहुत ही भाव प्रवण हो गया है। मन बहुत ही विचलित हो गया है और घर की, तुम सबकी बहुत यादआ रही है। तुम्हारी यादआ रही है। यशवंत की याद आ रही है। मुझे तुम जहाज पर छोड़ने आयी थी। मैं मना कर रहा था। फिर भी तुम्हारा मन नही माना। तुम मुझे पहुंचाने आई थी। मैं राउंड टेबल कांफ्रेंस के लिए जा रहा था। हर तरफ मेरी जय-जयकार गूंज रही थी और ये सब तुम देख रही थी। तुम्हारा मन भर आया था, कृतार्थता से तुम उमड़ गयी थी। तुम्हारे मुंह से शब्द नही निकल रहे थे। परंतु, तुम्हारी आंखें, जो शब्दों से बयां नहीं हो पा रहा था, सब बोल रही थीं। तुम्हारा मौन शब्दों से भी कई ज्यादा मुखर बन गया था। तुम्हारे गले से निकली आवाज तुम्हारे होठों तक आकर टकरा रही थी।


और अब यहां लंदन में इस सुबह ये बातें मन में उठ रही हैं। दिल कोमल हो गया है। जी में घबराहट सी हो रही है। कैसी हो रमा तुम? हमारा यशवंत कैसा है? मुझे याद करता है वह? उसकी संधिवात [जोड़ों] की बीमारी कैसी है? उसको संभालो रमा! हमारे चार बच्चे हमें छोड़कर जा चुके हैं। अब है तो सिर्फ यशवंत ही बचा है। वही तुम्हारे मातृत्व का आधार है। उसे हमें संभालना होगा। यशवंत का खयाल रखना रमा। यशवंत को खूब पढ़ाना। उसे रात को पढ़ने उठाती रहना। मेरे बाबा मुझे रात को पढ़ने के लिए उठाया करते थे। तब तक वह जगते रहते थे। मुझे यह अनुशासन उन्होंने ही सिखाया। मैं उठकर पढ़ने बैठ जाऊं, तब वह सोते थे। पहले-पहले मुझे पढ़ाई के लिए रात को उठने पर बहुत ही आलस आता था। तब पढ़ाई से भी ज्यादा नींद अच्छी लगती थी। आगे चलकर तो जिंदगीभर के लिए नींद से अधिक पढ़ाई ही अहम लगने लगी।


रमा, यशवंत को भी ऐसी ही पढ़ाई की लगन लगनी चाहिए। किताबों के लिए उसके मन में उत्कट इच्छा जगानी होगी।


रमा, अमीरी-ऐश्वर्य, ये चीजें किसी काम की नहीं। तुम अपने इर्द-गिर्द देखती ही हो। लोग ऐसी ही चीजों के पीछे हमेशा से लगे हुए रहते हैं। उनकी जिन्दगियां जहां से शुरू होती है, वहीं पर ठहर जाती है। इन लोगों की जिंदगी, जगह बदल नहीं पाती। हमारा काम ऐसी जिंदगी जीने से नही चलेगा रमा। हमारे पास सिवाय दुख के कुछ भी नहीं है। दरिद्रता, गरीबी के सिवाय हमारा कोई साथी नहीं। मुश्किलें और दिक्कतें हमें छोड़ती नहीं हैं। अपमान, छलावा, अवहेलना यही चीजें हमारे साथ छांव जैसी बनी हुई हैं।

सिर्फ अंधेरा ही है। दुख का समंदर ही है। हमारा सूर्योदय हमको ही होना होगा रमा। हमें ही अपना मार्ग बनना है। उस मार्ग पर दीयों की माला भी हमें ही बनानी है। उस रास्ते पर जीत का सफर भी हमें ही तय करना है। हमारी कोई दुनिया नहीं है। अपनी दुनिया हमें ही बनानी होगी।


हम ऐसे ही हैं रमा। इसलिए कहता हूं कि यशवंत को खूब पढ़ाना। उसके कपड़ों के बारे में फिक्रमंद रहना। उसको समझाना-बुझाना। यशवंत के मन में ललक पैदा करना। मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। यशवंत की याद आती है। मैं समझता नहीं हूं, ऐसा नहीं है रमा, मैं समझता हूं कि तुम इस आग में जल रही हो। पत्ते टूटकर गिर रहे हैं और जान सूखती जाए ऐसी ही तू होने लगी है। पर रमा, मैं क्या करूं? एक तरफ से पीठ पीछे पड़ी दरिद्रता और दूसरी तरफ मेरी जिद और लिया हुआ दृढ संकल्प। संकल्प ज्ञान का!


सच कहूं रमा, मैं निर्दयी नहीं। परंतु, जिद के पंख पसारकर आकाश में उड़ रहा हूं। किसी ने पुकारा तो भी यातनाएं होती हैं। मेरे मन पर खरोंच पड़ती है और मेरा गुस्सा भड़कता है। मेरे पास भी हृदय है रमा! मैं तड़पता हूं। पर, मैं बंध चुका हूं क्रांति से! इसलिए मुझे खुद की भावनाएं चिता पर चढ़ानी पड़ती हैं। उसकी आंच तुम्हारे और यशवंत तक भी कभी-कभी पहुंचती है। यह सच है। पर, इस बार रमा मैं बाएं हाथ से लिख रहा हूं और दाएं हाथ से उमड़ आए आंसू पोंछ रहा हूं।

रमा, तुम मेरी जिंदगी में न आती तो?


तुम मन-साथी के रूप में न मिली होती तो? तो क्या होता? मात्र संसार सुख को ध्येय समझने वाली स्त्री मुझे छोड़ के चली गई होती। आधे पेट रहना, उपला (गोइठा) चुनने जाना या गोबर ढूंढकर उसका उपला थापना या उपला थापने के काम पर जाना किसे पसंद होगा? चूल्हे के लिए ईंधन जुटाकर लाना, मुम्बई में कौन पसंद करेगा? घर के चिथडे़ हुए कपड़ों को सीते रहना। इतना ही नहीं, 'एक माचिस में पूरा माह निकालना है, इतने ही तेल में और अनाज, नमक से महीने भर का काम चलाना चाहिए', मेरा ऐसा कहना। गरीबी के ये आदेश तुम्हें मीठे नहीं लगते तो?


तो मेरा मन टुकड़े-टुकड़े हो गया होता। मेरी जिद में दरारें पड़ गई होतीं। मुझे ज्वार आ जाता और उसी समय तुरन्त भाटा भी आ जाता। मेरे सपनों का खेल पूरी तरह से तहस-नहस हो जाता।

रमा, मेरे जीवन के सब सुर ही बेसुरे बन जाते। सब कुछ तोड़-मरोड़ कर रह जाता। सब दुखमय हो जाता। मैं शायद बौना पौधा ही बना रहता।


संभालना खुद को, जैसे संभालती हो मुझे। जल्द ही आने के लिए निकलूंगा। फिक्र नहीं करना।

सब को कुशल कहना।


तुम्हारा,

भीमराव

लंदन

30 दिसंबर, 1930


साभार : मराठी पुस्तक ‘रमाई’, लेखक – प्रो. यशवंत मनोहर


#BheemRaoAmbedkar #RamabaiAmbedkar #Birthanniversary


शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

रानी अवंतीबाई

 

अवंतीबाई

महान वीरांगना क्रांतिकारी रानी अवंतीबाई लोधी

रानी अवन्तीबाई लोधी भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली प्रथम महिला शहीद वीरांगना थीं। 1857 की क्रांति में रामगढ़ की रानी अवंतीबाई रेवांचल में मुक्ति आंदोलन की सूत्रधार थी। 1857 के मुक्ति आंदोलन में इस राज्य की अहम भूमिका थी, जिससे भारत के इतिहास में एक नई क्रांति आई।[1]

2001 के एक डाक टिकट पर अवन्तीबाई का चित्र
रानी अवन्तीबाई
(16 अगस्त 1831 - 20 मार्च 1858)
जन्मस्थल :ग्राम मनकेड़ी, जिला सिवनी, मध्य प्रदेश
मृत्युस्थल:देवहारगढ़, मध्य प्रदेश
आन्दोलन:भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

1817 से 1851 तक रामगढ़ राज्य के शासक लक्ष्मण सिंह थे। उनके निधन के बाद विक्रमाजीत सिंह ने राजगद्दी संभाली। उनका विवाह बाल्यावस्था में ही मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह की कन्या अवंतीबाई से हुआ। विक्रमाजीत सिंह बचपन से ही वीतरागी प्रवृत्ति के थे अत: राज्य संचालन का काम उनकी पत्नी रानी अवंतीबाई ही करती रहीं। उनके दो पुत्र हुए-अमान सिंह और शेर सिंह। अंग्रेजों ने तब तक भारत के अनेक भागों में अपने पैर जमा लिए थे जिनको उखाड़ने के लिए रानी अवंतीबाई ने क्रांति की शुरुआत की और भारत में पहली महिला क्रांतिकारी रामगढ़ की रानी अवंतीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध ऐतिहासिक निर्णायक युद्ध किया जो भारत की आजादी में बहुत बड़ा योगदान है जिससे रामगढ़ की रानी अवंतीबाई उनका नाम पूरे भारत मैं अमरशहीद वीरांगना रानी अवंतीबाई के नाम से हैं।

रानी अवंतीबाई की मूर्ति, बालाघाट जिला, मध्य प्रदेश

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2022

अंग्रेजों से पहले कैसा था भारत

 अंग्रेजों के आने से पूर्व का भारत कैसा था इसका वर्णन 18वीं सदी के प्रख्यात अमेरिकी लेखक और राजनायिक जे.टी. संडरलैंड की पुस्तक india in bondage में मिलता है।


"लगभग प्रत्येक प्रकार का निर्माण या उत्पादharat, जिसे सहले भ्य विश्व जानता है–मनुष्य के मस्तिष्क या हाथों से निर्मित किसी भी प्रकार की और विश्व के किसी भी कोने में मौजूद रचना, जो अपनी उपयोगिता अथवा सुन्दरता के कारण मूल्यवान हो, भारत में लम्बे समय से बनाई जा रही थी। यूरोप अथवा एशिया के किसी भी अन्य राष्ट्र की तुलना में भारत कहीं अधिक औद्योगिक और निर्माता राष्ट्र था। उसकी कपड़े से बनी वस्तुएँ–बढ़िया सूती, ऊनी, लिनन एवं रेशमी करघा उत्पाद–सभ्य विश्व में ख़ूब प्रसिद्ध थे। इतने ही उत्कृष्ट यहाँ के आभूषण एवं क़ीमती रत्न थे जिन्हें सुन्दर रूपों में ढाला गया था। ऐसी ही गुणवत्ता और हर तरह के रंगों और सुन्दर आकारों में ढला यहाँ का चीनी मिट्टी का सामान था। ऐसा ही बढ़िया काम धातु–लोहा, स्टील, चाँदी व सोना–में देखने को मिलता था। यहाँ की स्थापत्य कला भी महान थी, जो विश्व की किसी भी स्थापत्य कला से सुन्दरता में लोहा ले सकती थी। यहाँ इंजीनियरी का कार्य भी उच्च कोटि का था। यहाँ बड़े व्यापारी, व्यवसायी थे, महान बैंकिंग विशेषज्ञ और पूँजीपति थे। भारत केवल महानतम जलपोत निर्माता देश ही नहीं था अपितु इसका वाणिज्य एवं व्यापार थल एवं जल मार्ग से सभी विख्यात सभ्य देशों तक फैला हुआ था। जब ब्रिटिश शासकों ने भारत में प्रवेश किया तो उन्हें ऐसा ही फलता–फूलता भारत मिला था।"


#स्वराज्य_75

✍🏻मिथिलेश कुमार


लूट सके तो लूट.... 

लेखक :- प्रशांत पोळ 


भारत से संबंध आने के बाद, अंग्रेजों के शब्दकोष में हिंदी व अन्य भारतीय शब्द प्रवेश करने लगे. अब तो ‘जुगाड’, ‘दादागिरी’, ‘ सूर्य नमस्कार’, ‘अच्छा’, ‘चड्डी’ आदि शब्द भी ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष में अपना स्थान बनाए हुए हैं. किंतू इस ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष में शामिल होने वाला पहला हिंदी शब्द कौन सा था? 


वह शब्द था… ‘लूट…!’


ऐसा कहते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी पर इंग्लैंड की संसद का नियंत्रण था. यदि यह सच है, तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को जो जी भरकर लूटा है, उसमें इंग्लैंड की संसद अर्थात ब्रिटिश शासन भागीदार था. 


अंग्रेज कितने लुटेरे थे, ये उन्होंने भारत के एक हिस्से, बंगाल पर हुकूमत कायम करते ही साथ दिखा दिया. १७५७ में प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब को परास्त करने के बाद अंग्रेजों ने कोई विवेक नहीं दिखाया, और न हीं ‘सोफेस्टिकेशन’. उन्होंने तो ठेठ लुटेरों के जैसे, बंगाल के पूरे खजाने को १०० जहाजों में भरा और गंगा में, नवाब महल से, कलकत्ता के उनके मुख्यालय, ‘फोर्ट विलियम’ में पहुंचाया. 


उन दिनों बंगाल देश का संपन्न प्रांत था. बंगाल का खजाना अत्यंत समृद्ध था. ऐसे भरे पूरे खजाने का अंग्रेजों ने क्या किया ? 


इसमें का अधिकतम हिस्सा इंग्लैंड पहुंचाया गया, और उसी पैसों के एक बडे हिस्से से, इंग्लैंड के वेल्स प्रांत में स्थित पोविस के किले का जीर्णोद्धार किया गया. इस किले का मालकाना हक, बाद में रोबर्ट क्लाईव के परिवार के पास आया.  


बंगाल की इस लूट के बाद भी, सत्ता में होने के कारण अंग्रेज, बंगाल को निचोडते रहे, और ज्यादा लूटते रहे. किंतू कुछ ही वर्षों बाद जब बंगाल का महाभयानक सूखा पडा, तब इन अंग्रेज शासकों ने क्या किया ? 


कुछ नहीं ! कुछ भी नहीं..!! 


१७६९ से १७७१ यह तीन वर्ष भयानक सूखे के रहे. लेकिन आज लोकतंत्र का दंभ भरने वाले अंग्रेजों ने क्या किया ? लूटे हुए खजाने का एक छोटा हिस्सा भी सूखाग्रस्तों को दिया ? 


उत्तर नकारात्मक है. 


इस महाभयानक सूखे में लगभग एक करोड लोगों की जानें गईं. अर्थात एक तिहाई जनसंख्या मारी गई. लेकिन कंपनी, बंगाल का सारा राजस्व इंग्लैंड भेजती रही, और बंगाल में लोग मरते रहे. क्रिस होल्टे लिखते हैं, “The East India Company was devoted to organized theft. Bengal’s wealth rapidly drained into Britain.” 


बंगाल में सूखे के कारण हुई मौतें यह प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह था नरसंहार ! 


मेथ्यु व्हाइट यह प्रख्यात अमेरिकन इतिहासकार हैं. वर्ष २०११ में उन्होने एक पुस्तक लिखी, जिसकी चर्चा सारे विश्व में हो रही हैं. पुस्तक हैं – The Great Big Book of Horrible Things. इस पुस्तक में उन्होने विश्व की १०० सबसे ज्यादा क्रूरतापूर्ण घटनाओं का वर्णन किया हैं. इस सूची में चौथे क्रमांक पर हैं, अंग्रेजों की हुकूमत में भारत में पडा अकाल..! इस विपदा मे, मेथ्यु व्हाइट के अनुसार २ करोड़ ६६ लाख भारतियों की मृत्यु हुई थी. इसमे द्वितीय विश्व युध्द के समय बंगाल के अकाल में मृत ३० से ५० लाख भारतीयों की गिनती नहीं हैं. अर्थात भारत में अंग्रेजी सत्ता के रहते ३ करोड़ से ज्यादा भारतीयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. 


नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी वर्ष १७६९ के अकाल में मरने वालों की संख्या १ करोड़ से ऊपर बताई हैं. बंगाल उन दिनों अत्यंत उपजाऊ और समृध्द प्रदेश माना जाता था. ऐसे बंगाल में इतनी ज्यादा संख्या में लोक भूखमरी से मारे गए, यह समझ से बाहर हैं.  


अकाल यह तो प्राकृतिक आपदा थी. इसमे भला अंग्रेजी हुकूमत का क्या कसूर.? ऐसा प्रश्न सामने आना स्वाभाविक हैं. किन्तु इस संदर्भ में प्रख्यात इतिहासकार एवं तत्ववेत्ता विल ड्यूरांट लिखते हैं –

“भारत में १७६९ में आए महाभयंकर अकाल की जड़ में निर्दयता से किया गया शोषण, संसाधनों का असंतुलन और अकाल के समय में भी अत्यंत क्रूरता से वसूल किए गए महंगे कर थे. अकाल के कारण हो रही भुखमरी से तड़पते किसान कर भरने की स्थिति में नहीं थे. किन्तु ऐसे मरणासन्न किसानों से भी अंग्रेज़ अधिकारियों ने अत्यंत बर्बरतापूर्वक कर वसूली की.“


जिस भ्रष्टाचार के द्वारा अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से भारत में सत्ता हथियाई, उसी भ्रष्टाचार की घुन, कंपनी को बडी संख्या में लगी थी. कुछ अनुपात में तो, प्रारंभ से ही कंपनी ने अपने कर्मचारियों को व्यक्तिगत कमाने की छूट दे रखी थी. अन्यथा इतने साहसी, कठिन और अनिश्चित अभियान पर कर्मचारी मिलना, कंपनी को कठिन जा रहा था. 


राबर्ट क्लाईव ने सारे छल कपट का प्रयोग कर के बंगाल की सत्ता हथियाई थी. उसके बाद अंग्रेजों ने बंगाल को जी भर के लूटा. इस लूट का एक बडा हिस्सा रॉबर्ट क्लाईव के पास गया. वो जब ब्रिटन वापस गया, तब उसके व्यक्तिगत संपत्ती की कीमत आंकी गई थी - २,३४,००० पाउंड. तत्कालीन युरोप का वह सबसे अमीर व्यक्ति बन गया था. प्लासी की लडाई में जीतने के बाद, बंगाल के नवाब का जो खजाना, कंपनी के पास पहुंचा, उसकी कीमत आंकी गई थी, २५ लाख पाउंड.


अर्थात आज के दर से निकालें तो प्लासी की लडाई के बाद कंपनी को मिले थे २५ करोड पाउंड और रॉबर्ट क्लाईव को मिले थे २.३ करोड पाउंड !


स्टर्लिंग मीडिया के चेयरमन एवं प्रख्यात पत्रकार मेहनाज मर्चंट ने इस संदर्भ काफी खोजबीन कर के लिखा हैं, जो देश के अधिकतम बुध्दीजीवियों को स्वीकार्य हैं. मर्चंट लिखते हैं, “१७५७ से १९४७ इन १९० वर्षों में अंग्रेजों ने भारत की जो लूट की हैं, वह २०१५ के विदेशी मुद्रा विनिमय के आधार पर ३ लाख करोड़ डॉलर होती हैं. इसकी तुलना में १७३८ में नादिरशाह ने दिल्ली लूटी थी, उसकी कीमत, १४,३०० करोड़ डॉलर छोटी लगाने लगती हैं. 


१ अक्तूबर २०१९ को वॉशिंग्टन डीसी मे, ‘अटलांटिक काउंसिल’ इस विचार समूह (थिंक टैंक) के सदस्यों के सम्मुख बोलते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, “अंग्रेजों ने भारत को लगभग दो सौ वर्ष न केवल अपमानित और तिरस्कृत किया, वरन भारत को जी भर के लूटा. इस लूट की कीमत आज के दर से ४५ ट्रिलियन डॉलर होती हैं (अर्थात ४५ लाख करोड़ डॉलर या रुपयों में ३,३५,६८,९६,५०,००,००,००० रुपये).


यह लूट, पूरे भारत के एक वर्ष के कुल खर्चे से भी ज्यादा हैं. (सन २०२० – २१ के भारत सरकार के राष्ट्रीय बजट में कुल खर्चा ३४.५० ट्रिलियन डॉलर दिखाया गया हैं.)


ये अटलांटिक काउंसिल क्या हैं..?


साठ के दशक में, जब अमेरिका और रशिया के बीच शीतयुद्ध चरम पर था, तब अमेरिका ने १९६१ मे, अपने हितों की रक्षा के लिए एक विचार समूह (थिंक टैंकl) बनाया – ‘अटलांटिक काउंसिल’. मूलतः यह समूह, अमेरिका और युरोपियन देशों के बीच ज्यादा से ज्यादा सहयोग बढ़े, इसकी चिंता करने के लिए बनाया गया था. बाद में इस विचार समूह का विस्तार होता गया. आज विश्व के दस स्थानों से इस समूह का कार्य चलता हैं. 


इस विचार समूह ने, मंगलवार १ अक्तूबर २०१९ को वॉशिंग्टन डीसी में एक कार्यक्रम रखा था. इस कार्यक्रम में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को आमंत्रित किया गया था. इस कार्यक्रम में बोलते हुए, एस जयशंकर ने अमेरिका और नाटो के अधिकारियों को खरी – खरी सुनाई थी. 


यह ४५ ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा कहां से आया..?


प्रसिध्द अर्थशास्त्री श्रीमति उत्सा पटनायक ने उपनिवेश के दिनों का गहराई से अध्ययन कर के यह निष्कर्ष निकाला हैं. अमेरिका की कोलम्बिया युनिवर्सिटी ने इस शोध को प्रकाशित भी किया हैं. 


श्रीमति उत्सा पटनायक और उनके पति, प्रभात पटनायक, यह दोनों मार्क्सवादी अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते हैं. 


चाहे उत्सा पटनायक का शोध प्रबंध हो, या वर्ष १९०१ में दादाभाई नौरोजी द्वारा बताई गई ‘ड्रेन थियरी’ हो, इतिहासकार विल ड्यूरंट का ‘द स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन’ इस पुस्तक में दिया गया सिध्दांत हो, या प्रोफेसर अंगस मेडिसन ने दिये हुए आंकड़े हो.... यह सब एक ही बात की ओर इंगित करते हैं – १९० वर्षों के राज में अंग्रेजों ने भारत को जमकर लूटा. भर – भर के लूटा. ‘एन इरा ऑफ डार्कनेस’ इस पुस्तक की शुरुआत ही शशि थरूर ने ‘द लूटिंग ऑफ इंडिया’ इस अध्याय से की हैं.  


शशि थरूर ने जॉन सलिवन (John Sullivan) को इस संदर्भ में उद्धृत (quote) किया हैं. जॉन सलिवन को इतिहास, ऊटी (उटकमंड) इस पर्वतीय पर्यटक स्थल के संस्थापक के रूप में पहचानता हैं. सन १८४० में इन जॉन सलिवन महोदय महोदय ने लिख कर रखा हैं की, “छोटे राज्य समाप्त हुए. व्यापार की दुर्दशा हो गई. रियासतों की राजधानियों की रौनक चली गई. लोग गरीब होते चले गए. किन्तु अंग्रेजों की हालत एकदम सुधर गई. अंग्रेज़ एक स्पंज जैसे हो गए हैं. गंगा के पानी में डुबोना, और लंदन के थेम्स नदी में निचोड़ना..!”


बंगाल पर कब्जा करने के बाद, और पूरे देश पर कब्जा करने के बीच, अर्थात वर्ष १७६५ से १८१८ के बीच, अंग्रेजों ने प्रतिवर्ष १८ करोड़ पाउंड भारत से कमाए. अर्थात कुल ९०० करोड़ पाउंड कमाएं. उन दिनों, यूरोप के बहुत थोड़े ही अमीर – उमराव या राजे – महाराजे ऐसे थे, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालकों से भी ज्यादा धनवान थे. 


ईस्ट इंडिया कंपनी के जो अधिकारी बहुत ज्यादा धन कमाकर इंग्लैंड वापस लौटते थे, उन्हे ‘नबोब’ कहा जाता था. भारतीय ‘नवाब’ के जैसा यह शब्द गढ़ा था, एडमंड बर्क ने. कंपनी के अनेक अधिकारी, कंपनी की नौकरी करने के साथ ही निजी व्यापार भी करते थे. यह करना एक प्रकार से जायज माना जाता था. प्लासी की लड़ाई जीत कर, भारत में अङ्ग्रेज़ी शासन का प्रारंभ करने वाले  रॉबर्ट क्लाइव ने तो सारे नियम कायदे ताक पर रख कर खूब संपत्ति बटोरी और इंग्लैंड में आलीशान महल बनवाएं. पहली बार जब वह इंग्लैंड गया, तब वह २ लाख ३४ हजार पाउंड (आज के भाव से इसकी कीमत २ करोड़ ३० लाख पाउंड से भी ज्यादा होगी) लेकर गया. दूसरी बार सन १७६५ से १७६७ तक वह भारत में रहा और इंग्लैंड वापस जाते समय ४ लाख पाउंड से भी ज्यादा की संपत्ति ले कर गया. इन पैसों से उसने अपने पिता के लिए और खुद के लिए इंग्लैंड के संसद में स्थान सुनिश्चित किया. उसने खूब सारी जमीन खरीदी और उस जमीन, याने ‘काउंटी क्लेयर इस्टेट’ को ‘प्लासी’ यह नाम दिया. 


ये तो आधिकारिक रूप से इंग्लैंड में ले जाई गई संपत्ति के आंकड़े हैं. किन्तु चोरी छिपे कितने हीरे, कितना सोना, कितनी प्राचीन दुर्लभ मूर्तियां भारत के बाहर गई, इसकी कोई गिनती ही नहीं हैं. आज बड़ी संख्या में जो प्राचीन भारतीय मूर्तियां विदेशों के विभिन्न संग्रहालयों में या अनेक धनवानों के निजी संग्रह में दिखती हैं, उन में से अधिकतम, अंग्रेजी शासन के दौरान ही भारत से बाहर गई हैं. 


जो भूभाग अंग्रेजों के सीधे नियंत्रण में नहीं था, या जहां राजे – रजवाड़ों का शासन था, रियासते थी, वहां पर अंग्रेजों ने उन राजाओं से जबरदस्त ‘प्रोटेक्शन मनी’ (आज की भाषा में ‘गुंडा टैक्स’) वसूला. अगर ये प्रोटेक्शन मनी नहीं दिया, तो उस राज्य / रियासत में तैनात अंग्रेज़ फौज, उस राजा के विरोध में युध्द के लिए तैयार हो जाती थी. 


सन १८२६ में, अपने मृत्यु से कुछ दिन पहले, बिशप रेजीनाल्ड हेबर ने लिखा की, “हम (अंग्रेज़) जितना कर वसूलते हैं, उतना कोई भी भारतीय राजा नहीं वसूलता और पहले भी नहीं वसूला था”. बंगाल में शासन में आने के मात्र ३० वर्षों में जमीन का राजस्व ८,१७,५५३ पाउंड से बढ़कर २५,८०,००० पाउंड तक जा पहुंचा. इसका कारण था, ‘अत्यंत क्रूरता से और अमानुष पध्दति से वसूला गया कर..!’ इस के बदले भारतीय किसानों को या छोटे व्यवसायियों को क्या मिला.?


कुछ भी नहीं, सिवाय जुलूम ज़बरदस्ती के !


(दिल्ली के प्रभात प्रकाशन द्वारा शीघ्र प्रकाशित, ‘विनाशपर्व’ इस पुस्तक से)

-  ✍🏻 प्रशांत पोळ 

 #विनाशपर्व

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

#ऋग्वेद_में_भूगोल /


प्रस्तुति - स्वामी शरण 

आज हमें बताया जाता है कि सबसे पहले आर्यभट ने कहा था कि पृथ्वी गोल है... 

लेकिन हमें तो बचपन में यह पढ़ाया गया था कि सबसे पहले कॉपरनिकस ने कहा था कि पृथ्वी गोल है। 


और तब कोपरनिकस के साथ ईसाइयों ने बड़ा ही अमानवीय व्यवहार किया था। क्योंकि बाइबिल के जेनेसिस के अध्याय में लिखा था कि पृथ्वी चपटी है। 


हमारे अंदर जब थोड़ी जागरूकता आई तो हम कॉपरनिकस से थोड़ा पीछे गए।तब जाकर हमें पता चला कि आर्यभट ने हमें पहले ही बताया था कि पृथ्वी गोल है। 


परंतु ऋग्वेद 1/33/8 में कहा गया है - 

चक्राणास: परिणहं पृथिव्या। 

यानी पृथ्वी चक्र के जैसी गोल है। 

पृथ्वी से जुड़ा जो भी विषय हम पढ़ते हैं - उस विषय का नाम है - 'भूगोल'.(भू = पृथ्वी     और      गोल = वृत्ताकार) यह नाम ही साबित करता है कि पृथ्वी गोल है। फिर हमें वैदिक ऋषियों ने बताया कि - 

माता भूमि: पुत्रोस्हं पृथिव्या:। 

यानी हम पृथ्वी की संतानें हैं, 

अर्थात पृथ्वी हमारी माँ है। 

पृथ्वी माता कैसे हैं? 

माँ के गर्भ में हम एक झिल्ली में होते हैं, ताकि माता के शरीर के अंदर के बैक्टीरिया हमें नुकसान नहीं पहुँचा सकें। माँ के गर्भ में इस झिल्ली द्वारा ही हमें सुरक्षित रखा जाता है। अन्यथा हम वहीं सड़ - गल जाते...और कभी जन्म नहीं ले पाते। ठीक इसी प्रकार... पृथ्वी भी एक झिल्ली में सुरक्षित है। इसे हम 'ओजोन परत' कहते हैं। यह परत हमें सूर्य के हानिकारक अल्ट्रावॉइलेट विकिरणों से सुरक्षित रखती है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नासा ने ओज़ोन परत का चित्र लिया है। यह सुनहरे रंग की दिखती है।


ऐसा ही उल्लेख ऋग्वेद में पाया जाता है। वहाँ पृथ्वी को 'हिरण्यगर्भा' कहा गया है। 'हिरण्य' अर्थात 'हिरन के जैसा' या सुनहरे रंग का। मतलब, जिस जिस तथ्य की जानकारी आधुनिक विज्ञान को आज पता चली, उसकी जानकारी हमारे ऋषियों को लाखों साल पहले प्राप्त हो चुकी थी। इस जानकारी का इतनी सूक्ष्मता से वर्णन हमारे ऋग्वेद में मिलता है।


आज हम जानते हैं कि पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। इसलिए सूर्योदय हमेशा पूरब में होता है। इस सम्बंध में ऋग्वेद (7/992) में ऋषि कहते हैं - कि 

बूढ़ी महिला की तरह झुकी हुई पृथ्वी पूरब की ओर जा रही है। ऋग्वेद हमें यह भी बताता है कि 

पृथ्वी अपने अक्ष पर झुकी हुई है। 

आज आधुनिक विज्ञान भी यही बताता है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.44 डिग्री पर झुकी हुई है।


इसके अतिरिक्त एक घूमते हुए लट्टू में जो एक लहर सी आती है, उसी प्रकार पृथ्वी के घूर्णन में भी एक लहर आती है। इसके कारण पृथ्वी की एक और गति बनती है। इस चक्र को पूरा करने में पृथ्वी को  छब्बीस हजार वर्ष लगते हैं। 

भास्कराचार्य ने इसे 'भचक्र सम्पात' कहा है  और इसकी कालावधि 25812 वर्ष निकाली थी। यह आज की गणना के लगभग बराबर ही है। इस गति के कारण पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के सामने और तेरह हजार वर्षों तक सूर्य के विपरीत में होता है। जब यह सूर्य के विपरीत में होता है तो 'हिम युग' होता है और जब यह सूर्य के सामने होगा तो यहाँ ताप बढ़ जाएगा जिससे बर्फ पिघलने लगेगी। इसके लिए आधुनिक विज्ञानियों ने पिछले 161 वर्षों के 

उत्तरी ध्रुव में होने वाले तापमान में परिवर्तन की एक तालिका बनाई है। इससे भी यह बात सिद्ध हो जाती है।

तो क्यों न हम गर्व करें स्वयं के सनातनी होने पर।

✍️प्रमोद शुक्ला जी की वॉल पर राष्ट्रवादी रवि कांत मिश्र  जी के पटल से


विश्व की पहली भूगोल पुस्तक - श्री विष्णु पुराण . World's first Geography Book - Shri Vishnu Puran 


जी हाँ! ठीक शीर्षक पढ़ा आपने, पृथ्वी का संपूर्ण लिखित वर्णन सबसे पहले विष्णु पुराण में देखने को मिलता है... विष्णु पुराण के रचियता है... महान ऋषि पाराशर...


ऋषि पाराशर महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा एवं ग्रंथकार थे... राक्षस द्वारा मारे गए वसिष्ठ के पुत्र शक्ति से इनका जन्म हुआ। बड़े होने पर माता अदृश्यंती से पिता की मृत्यु की बात ज्ञात होने पर राक्षसों के नाश के निमित्त इन्होंने राक्षस सत्र नामक यज्ञ शुरू किया जिसमें अनेक निरपराध राक्षस मारे जाने लगे। यह देखकर पुलस्त्य आदि ऋषियों ने उपदेश देकर इनकी राक्षसों के विनाश से निवृत्त किया और पुराण प्रवक्ता होने का वर दिया। इसके पश्चात् इन्होने विष्णु पुराण की रचना की...


यह पुराण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा प्राचीन है। इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिमाण, समुद्र, सूर्य आदि का परिमाण, पर्वत, देवतादि की उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है। अष्टादश महापुराणों में श्रीविष्णुपुराण का स्थान बहुत ऊँचा है। इसमें अन्य विषयों के साथ भूगोल, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, राजवंश और श्रीकृष्ण-चरित्र आदि कई प्रंसगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन किया गया है। 


यहाँ स्वयं भगवान् कृष्ण महादेवजी के साथ अपनी अभिन्नता प्रकट करते हुए श्रीमुखसे कहते हैं-


“त्वया यदभयं दत्तं तद्दत्तमखिलं मया। 

मत्तोऽविभिन्नमात्मानं द्रुष्टुमर्हसि शङ्कर।

योऽहं स त्वं जगच्चेदं सदेवासुरमानुषम्। 

मत्तो नान्यदशेषं यत्तत्त्वं ज्ञातुमिहार्हसि। 

अविद्यामोहितात्मानः पुरुषा भिन्नदर्शिनः। 

वन्दति भेदं पश्यन्ति चावयोरन्तरं हर॥"


इस पुराण में इस समय सात हजार श्लोक उपलब्ध हैं। कई ग्रन्थों में इसकी श्लोक संख्या तेईस हजार बताई जाती है। विष्णु पुराण में पुराणों के पांचों लक्षणों अथवा वर्ण्य-विषयों-सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का वर्णन है। सभी विषयों का सानुपातिक उल्लेख किया गया है। बीच-बीच में अध्यात्म-विवेचन, कलिकर्म और सदाचार आदि पर भी प्रकाश डाला गया है।


ये निम्नलिखित भागों मे वर्णित है-

१. पूर्व भाग-प्रथम अंश

२. पूर्व भाग-द्वितीय अंश

३. पूर्व भाग-तीसरा अंश

४. पूर्व भाग-चतुर्थ अंश

५. पूर्व भाग-पंचम अंश

६. पूर्व भाग-छठा अंश

७. उत्तरभाग


यहाँ पर मैं सारे भागों का संछिप्त वर्णन भी नहीं करना चाहता... क्योकिं लेख के अत्याधिक लम्बे हो जाने की सम्भावना है ... परन्तु लेख की विषय वस्तु के हिसाब से इसके "पूर्व भाग-द्वितीय अंश" का परिचय देना चाहूँगा .... इस भाग में ऋषि पाराशर ने पृथ्वी के द्वीपों, महाद्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, व धरती के समस्त भूभाग का विस्तृत वर्णन किया है...


ये वर्णन विष्णु पुराण में ऋषि पाराशर जी श्री मैत्रेय ऋषि से कर रहे हैं उनके अनुसार इसका वर्णन सहस्त्र वर्षों में भी नहीं हो सकता है। यह केवल अति संक्षेप वर्णन है। हम इससे इसकी महानता तथा व्यापकता का अंदाजा लगा सकते हैं...


जो मनुष्य भक्ति और आदर के साथ विष्णु पुराण को पढते और सुनते है,वे दोनों यहां मनोवांछित भोग भोगकर विष्णुलोक में जाते है।


ऋषि पाराशर के अनुसार ये पृथ्वी सात महाद्वीपों में बंटी हुई है... (आधुनिक समय में भी ये ७ Continents में विभाजित है यानि - Asia, Africa, North America, South America, Antarctica, Europe, and Australia)


ऋषि पाराशर के अनुसार इन महाद्वीपों के नाम हैं -

१. जम्बूद्वीप

२. प्लक्षद्वीप

३. शाल्मलद्वीप

४. कुशद्वीप

५. क्रौंचद्वीप

६. शाकद्वीप

७. पुष्करद्वीप


ये सातों द्वीप चारों ओर से क्रमशः खारे पानी, नाना प्रकार के द्रव्यों और मीठे जल के समुद्रों से घिरे हैं। ये सभी द्वीप एक के बाद एक दूसरे को घेरे हुए बने हैं, और इन्हें घेरे हुए सातों समुद्र हैं। जम्बुद्वीप इन सब के मध्य में स्थित है।

इनमे से जम्बुद्वीप का सबसे विस्तृत वर्णन मिलता है... इसी में हमारा भारतवर्ष स्थित है...


सभी द्वीपों के मध्य में जम्बुद्वीप स्थित है। इस द्वीप के मध्य में सुवर्णमय सुमेरु पर्वत स्थित है। इसकी ऊंचाई चौरासी हजार योजन है और नीचे कई ओर यह सोलह हजार योजन पृथ्वी के अन्दर घुसा हुआ है। इसका विस्तार, ऊपरी भाग में बत्तीस हजार योजन है, तथा नीचे तलहटी में केवल सोलह हजार योजन है। इस प्रकार यह पर्वत कमल रूपी पृथ्वी की कर्णिका के समान है।


सुमेरु के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक वर्ष पर्वत हैं, जो भिन्न भिन्न वर्षों का भाग करते हैं। सुमेरु के उत्तर में नील, श्वेत और शृंगी वर्षपर्वत हैं। इनमें निषध और नील एक एक लाख योजन तक फ़ैले हुए हैं। हेमकूट और श्वेत पर्वत नब्बे नब्बे हजार योजन फ़ैले हुए हैं। हिमवान और शृंगी अस्सी अस्सी हजार योजन फ़ैले हुए हैं।

मेरु पर्वत के दक्षिण में पहला वर्ष भारतवर्ष कहलाता है, दूसरा किम्पुरुषवर्ष तथा तीसरा हरिवर्ष है। इसके दक्षिण में रम्यकवर्ष, हिरण्यमयवर्ष और तीसरा उत्तरकुरुवर्ष है। उत्तरकुरुवर्ष द्वीपमण्डल की सीमा पार होने के कारण भारतवर्ष के समान धनुषाकार है।


इन सबों का विस्तार नौ हजार योजन प्रतिवर्ष है। इन सब के मध्य में इलावृतवर्ष है, जो कि सुमेरु पर्वत के चारों ओर नौ हजार योजन फ़ैला हुआ है। एवं इसके चारों ओर चार पर्वत हैं, जो कि ईश्वरीकृत कीलियां हैं, जो कि सुमेरु को धारण करती हैं,


ये सभी पर्वत इस प्रकार से हैं:-


पूर्व में मंदराचल

दक्षिण में गंधमादन

पश्चिम में विपुल

उत्तर में सुपार्श्व


ये सभी दस दस हजार योजन ऊंचे हैं। इन पर्वतों पर ध्वजाओं समान क्रमश कदम्ब, जम्बु, पीपल और वट वृक्ष हैं। इनमें जम्बु वृक्ष सबसे बड़ा होने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बुद्वीप पड़ा है। यहाँ से जम्बु नद नामक नदी बहती है। उसका जल का पान करने से बुढ़ापा अथवा इन्द्रियक्षय नहीं होता। उसके मिनारे की मृत्तिका (मिट्टी) रस से मिल जाने के कारण सूखने पर जम्बुनद नामक सुवर्ण बनकर सिद्धपुरुषों का आभूषण बनती है।


मेरु पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है, और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ , दक्षिण की ओर गन्धमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नन्दन नामक वन हैं। तथा सदा देवताओं से सेवनीय अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस – ये चार सरोवर हैं।


मेरु के पूर्व में


शीताम्भ, 

कुमुद, 

कुररी, 

माल्यवान, 

वैवंक आदि पर्वत हैं।


मेरु के दक्षिण में


त्रिकूट, 

शिशिर, 

पतंग, 

रुचक 

और निषाद आदि पर्वत हैं।


मेरु के उत्तर में


शंखकूट, 

ऋषभ, 

हंस,

नाग 

और कालंज पर्वत हैं।


समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है। इसका विस्तार नौ हजार योजन है। यह स्वर्ग अपवर्ग प्राप्त कराने वाली कर्मभूमि है। इसमें सात कुलपर्वत हैं: महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र ।


भारतवर्ष के नौ भाग हैं: 


इन्द्रद्वीप, 

कसेरु, 

ताम्रपर्ण, 

गभस्तिमान, 

नागद्वीप, 

सौम्य, 

गन्धर्व 

और वारुण, तथा यह समुद्र से घिरा हुआ द्वीप उनमें नवां है।


यह द्वीप उत्तर से दक्षिण तक सहस्र योजन है। यहाँ चारों वर्णों के लोग मध्य में रहते हैं। शतद्रू और चंद्रभागा आदि नदियां हिमालय से, वेद और स्मृति आदि पारियात्र से, नर्मदा और सुरसा आदि विंध्याचल से, तापी, पयोष्णी और निर्विन्ध्या आदि ऋक्ष्यगिरि से निकली हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणी, सह्य पर्वत से; कृतमाला और ताम्रपर्णी आदि मलयाचल से, त्रिसामा और आर्यकुल्या आदि महेन्द्रगिरि से तथा ऋषिकुल्या एवंकुमारी आदि नदियां शुक्तिमान पर्वत से निकलीं हैं। इनकी और सहस्रों शाखाएं और उपनदियां हैं।


इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, मध्याअदि देशों के; पूर्व देश और कामरूप के; पुण्ड्र, कलिंग, मगध और दक्षिणात्य लोग, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव और पारियात्र निवासी; सौवीर, सन्धव, हूण; शाल्व, कोशल देश के निवासी तथा मद्र, आराम, अम्बष्ठ और पारसी गण रहते हैं। भारतवर्ष में ही चारों युग हैं, अन्यत्र कहीं नहीं। इस जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बूद्वीप का विस्तार एक लाख योजन है।


प्लक्षद्वीप का वर्णन -


प्लक्षद्वीप का विस्तार जम्बूद्वीप से दुगुना है। यहां बीच में एक विशाल प्लक्ष वृक्ष लगा हुआ है। यहां के स्वामि मेधातिथि के सात पुत्र हुए हैं। ये थे:

शान्तहय, 

शिशिर, 

सुखोदय, 

आनंद, 

शिव,

क्षेमक, 

ध्रुव ।


यहां इस द्वीप के भी भारतवर्ष की भांति ही सात पुत्रों में सात भाग बांटे गये, जो उन्हीं के नामों पर रखे गये थे: शान्तहयवर्ष, इत्यादि।


इनकी मर्यादा निश्चित करने वाले सात पर्वत हैं: 


गोमेद, 

चंद्र, 

नारद, 

दुन्दुभि, 

सोमक, 

सुमना 

और वैभ्राज।


इन वर्षों की सात ही समुद्रगामिनी नदियां हैं अनुतप्ता, शिखि, विपाशा, त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता। इनके अलावा सहस्रों छोटे छोटे पर्वत और नदियां हैं। इन लोगों में ना तो वृद्धि ना ही ह्रास होता है। सदा त्रेतायुग समान रहता है। यहां चार जातियां आर्यक, कुरुर, विदिश्य और भावी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यहीं जम्बू वृक्ष के परिमाण वाला एक प्लक्ष (पाकड़) वृक्ष है। इसी के ऊपर इस द्वीप का नाम पड़ा है।


प्लक्षद्वीप अपने ही परिमाण वाले इक्षुरस के सागर से घिरा हुआ है।


शाल्मल द्वीप का वर्णन


इस द्वीप के स्वामि वीरवर वपुष्मान थे। इनके सात पुत्रों : 

श्वेत, 

हरित, 

जीमूत, 

रोहित, 

वैद्युत, 

मानस 

और सुप्रभ के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। इक्षुरस सागर अपने से दूने विस्तार वाले शाल्मल द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।


इसमें महाद्वीप में 

कुमुद, 

उन्नत, 

बलाहक, 

द्रोणाचल, 

कंक, 

महिष, 

ककुद्मान नामक सात पर्वत हैं।


इस महाद्वीप में -

योनि, 

तोया, 

वितृष्णा, 

चंद्रा, 

विमुक्ता, 

विमोचनी 

एवं निवृत्ति नामक सात नदियां हैं।


यहाँ - 

श्वेत, 

हरित, 

जीमूत, 

रोहित, 

वैद्युत, 

मानस 

और सुप्रभ नामक सात वर्ष हैं। 


यहां - 

कपिल, 

अरुण, 

पीत

और कृष्ण नामक चार वर्ण हैं। 


यहां शाल्मल (सेमल) का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने से दुगुने विस्तार वाले सुरासमुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।


कुश द्वीप का वर्णन


इस द्वीप के स्वामि वीरवर ज्योतिष्मान थे। 


इनके सात पुत्रों : 

उद्भिद, 

वेणुमान, 

वैरथ, 

लम्बन, 

धृति, 

प्रभाकर,

कपिल


इनके नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। मदिरा सागर अपने से दूने विस्तार वाले कुश द्वीप से चारों ओर से घिरा हुआ है। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।


पर्वत -

विद्रुम, 

हेमशौल, 

द्युतिमान, 

पुष्पवान, 

कुशेशय, 

हरि 

और मन्दराचल नामक सात पर्वत हैं।


नदियां -


धूतपापा, 

शिवा, 

पवित्रा, 

सम्मति, 

विद्युत, 

अम्भा

और मही नामक सात नदियां हैं।


सात वर्ष - 


उद्भिद, 

वेणुमान,

वैरथ, 

लम्बन, 

धृति, 

प्रभाकर, 

कपिल नामक सात वर्ष हैं। 


वर्ण - 


दमी, 

शुष्मी, 

स्नेह 

और मन्देह नामक चार वर्ण हैं। 


यहां कुश का अति विशाल वृक्ष है। यह महाद्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।


क्रौंच द्वीप का वर्णन - 


इस द्वीप के स्वामि वीरवर द्युतिमान थे। 


इनके सात पुत्रों : 


कुशल, 

मन्दग, 

उष्ण, 

पीवर, 

अन्धकारक, 

मुनि 

और दुन्दुभि के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।


पर्वत -


क्रौंच, 

वामन, 

अन्धकारक, 

घोड़ी के मुख समान रत्नमय स्वाहिनी पर्वत, 

दिवावृत, 

पुण्डरीकवान, 

महापर्वत 

दुन्दुभि नामक सात पर्वत हैं।


नदियां -


गौरी, 

कुमुद्वती, 

सन्ध्या, 

रात्रि, 

मनिजवा, 

क्षांति 

और पुण्डरीका नामक सात नदियां हैं।


सात वर्ष -


कुशल, 

मन्दग, 

उष्ण, 

पीवर, 

अन्धकारक, 

मुनि और 

दुन्दुभि ।


वर्ण -


पुष्कर, 

पुष्कल, 

धन्य 

और तिष्य नामक चार वर्ण हैं। 


यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले शाक द्वीप से घिरा है।


शाकद्वीप का वर्णन - 


इस द्वीप के स्वामि भव्य वीरवर थे।


इनके सात पुत्रों : 


जलद, 

कुमार, 

सुकुमार, 

मरीचक,

कुसुमोद, 

मौदाकि 

और महाद्रुम के नाम संज्ञानुसार ही इसके सात भागों के नाम हैं। 


यहां भी सात पर्वत, सात मुख्य नदियां और सात ही वर्ष हैं।


पर्वत - 


उदयाचल, 

जलाधार, 

रैवतक, 

श्याम, 

अस्ताचल, 

आम्बिकेय 

और अतिसुरम्य गिरिराज केसरी नामक सात पर्वत हैं।


नदियां - 


सुमुमरी, 

कुमारी, 

नलिनी, 

धेनुका, 

इक्षु, 

वेणुका 

और गभस्ती नामक सात नदियां हैं।


सात वर्ष -


जलद, 

कुमार, 

सुकुमार, 

मरीचक, 

कुसुमोद, 

मौदाकि 

और महाद्रुम । 


वर्ण - 


वंग, 

मागध, 

मानस 

और मंगद नामक चार वर्ण हैं।


यहां अति महान शाक वृक्ष है, जिसके वायु के स्पर्श करने से हृदय में परम आह्लाद उत्पन्न होता है। यह द्वीप अपने ही बराबर के द्रव्य से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है। यह सागर अपने से दुगुने विस्तार वाले पुष्कर द्वीप से घिरा है।


पुष्करद्वीप का वर्णन -


इस द्वीप के स्वामि सवन थे।


इनके दो पुत्र थे: 


महावीर 

और धातकि। 


यहां एक ही पर्वत और दो ही वर्ष हैं।


पर्वत -


मानसोत्तर नामक एक ही वर्ष पर्वत है। यह वर्ष के मध्य में स्थित है । यह पचास हजार योजन ऊंचा और इतना ही सब ओर से गोलाकार फ़ैला हुआ है। इससे दोनों वर्ष विभक्त होते हैं, और वलयाकार ही रहते हैं।


नदियां -

यहां कोई नदियां या छोटे पर्वत नहीं हैं।


वर्ष - 


महवीर खण्ड 

और धातकि खण्ड। 


महावीरखण्ड वर्ष पर्वत के बाहर की ओर है, और बीच में धातकिवर्ष है । 


वर्ण - 


वंग, 

मागध, 

मानस 

और मंगद नामक चार वर्ण हैं।


यहां अति महान न्यग्रोध (वट) वृक्ष है, जो ब्रह्मा जी का निवासस्थान है यह द्वीप अपने ही बराबर के मीठे पानी से भरे समुद्र से चारों ओर से घिरा हुआ है।


समुद्रो का वर्णन -


यह सभी सागर सदा समान जल राशि से भरे रहते हैं, इनमें कभी कम या अधिक नही होता। हां चंद्रमा की कलाओं के साथ साथ जल बढ़्ता या घटता है। (ज्वार-भाटा) यह जल वृद्धि और क्षय 510 अंगुल तक देखे गये हैं।


पुष्कर द्वीप को घेरे मीठे जल के सागर के पार उससे दूनी सुवर्णमयी भूमि दिल्खायी देती है। वहां दस सहस्र योजन वाले लोक-आलोक पर्वत हैं। यह पर्वत ऊंचाई में भी उतने ही सहस्र योजन है। उसके आगे पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए घोर अन्धकार छाया हुआ है। यह अन्धकार चारों ओर से ब्रह्माण्ड कटाह से आवृत्त है। (अन्तरिक्ष) अण्ड-कटाह सहित सभी द्वीपों को मिलाकर समस्त भू-मण्डल का परिमाण पचास करोड़ योजन है। (सम्पूर्ण व्यास)


आधुनिक नामों की दृष्टी से विष्णु पुराण का सन्दर्भ देंखे तो... हमें कई समानताएं सिर्फ विश्व का नक्शा देखने भर से मिल जायेंगी...

१. विष्णु पुराण में पारसीक - ईरान को कहा गया है,

२. गांधार वर्तमान अफगानिस्तान था, 

३. महामेरु की सीमा चीन तथा रशिया को घेरे है.

४. निषध को आज अलास्का कहा जाता है.

५. प्लाक्ष्द्वीप को आज यूरोप के नाम से जाना जाता है.

६. हरिवर्ष की सीमा आज के जापान को घेरे थी.

७. उत्तरा कुरव की स्तिथि को देंखे तो ये फ़िनलैंड प्रतीत होता है.

इसी प्रकार विष्णु पुराण को पढ़कर विश्व का एक सनातनी मानचित्र तैयार किया जा सकता है... ये थी हमारे ऋषियों की महानता। - 


अंत में एक बात और - महाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था। 


महाभारत में कहा गया है कि - यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है- 


उक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था- 


"सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। 

परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥ 

यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। 

एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ 

द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।c


"अर्थात हे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है।"


अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से शत प्रतिशत समानता दिखाता है।