शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

1857 का वह लोकयुद्ध औऱ आम भागीदारी

 #1857_में_गांव_गांव_घूमती_चपाती_और_हर_छावनी_में_घूमता_रक्तकमल


परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि 1612 में व्यापार के आवरण में भारत लूटने के मकसद से आयी ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले बंगाल, फिर मैसूर और मराठाओं को पराजित कर भारत में बड़ी मजबूत पकड़ बना ली थी। तत्पश्चात कंपनी ने भारतीय राज्यों के साथ संधियां कर और उटपटांग कानून बना कर खूब सीमा विस्तार किया। फिर सिखों, नेपालियों, बेरार और अवध को हरा कर लगभग पूरा भारत कंपनी के अधिकार में चला गया था। ऐसे में पूरे भारत में अंग्रेज़ों के खिलाफ बारूद भरा था। इसमें पहली चिंगारी 1806 में वेल्लोर में लगी। परन्तु इसे कुचल दिया गया। ऐसे में 1857 में नाना साहब और तात्या टोपे ने जिस चतुराई के साथ युद्ध की पूरी रणनीति बनाई वह पढ़ने और सुनने लायक है।


1857 के विषय में पढ़ते हुए आप सब ने कुछ रहस्यमयी घटनाओं के विषय में पढ़ा होगा। गांव-गांव घूमती चपाती और हर छावनी में घूमता रक्तकमल। अंग्रेज़ों ने इस विषय में लिखा है। उनकी लेखनी से आप समझ सकते हैं कि यह कितना रहस्यमयी था उनके लिए। उनके भारतीय नौकर तक इन घटनाओं का उत्तर नहीं दे पा रहे थे।


चपातियों की घटना कुछ ऐसे होती थी....यह ज्ञात था कि गांव के बाहर से कोई संदेशवाहक आता था और गांव के मुखिया को रोटियां पकड़ाकर उन्हें अगले गांव तक इन्हें पंहुचाने का निर्देश दे जाता था। इस तरह भारत के कई भागों में ये घूमती चपातियां पाई जाने लगीं। …


अंग्रेज़ों ने इसकी व्याख्या करते हुए इसे भारतीय अंधविश्वास बताया। परन्तु भारतीयों में ऐसा कोई विश्वास नहीं ये तो हम सब जानते हैं।


ये चपातियां उत्तर-पश्चिम से लेकर अवध और बंगाल तक पायीं जाने लगीं। अंग्रेज़ों ने विवरणी में लिखा है -


… फिर हमने कुछ चपातियों के कुछ रहस्यमयी किस्से सुने। ऐसा समझ में आता है कि कानपुर के चौकीदार ने फतेहगढ़ के चौकीदार को 2 चपातियां दीं और ऐसी 10 चपातियां बनाकर उसके पड़ोस के सभी चौकीदारों को 2-2 चपातियां बांटने का निर्देश भी दिया। …


गंगा के खेतों से लेकर मध्य भारत में सागर और दूसरे शहरों तक ये पायीं जाने लगीं। अवध के पराजय के ठीक बाद से रोटियों का ये क्रम शुरू होकर फ़रवरी 1857 तक चला।


इसी तरह चपातियों से पहले 1856 के उत्तरार्ध से एक और घूर्णन शुरू हुआ - बंगाल सेना की सभी छावनियों में रक्तकमल देखा जाने लगा। इसकी सभी कहानियों में कुछ बातें सम्मान थीं -


… सूबेदार, जो एक पलटन की कमान संभालता था, अपने सभी सिपाहियों को पंक्ति में खड़ा करता और पहले सैनिक को रक्तकमल पकड़ाता। हर सैनिक अपने बाद वाले सैनिक को ये कमल देता और इस तरह जब कमल अंतिम सैनिक के हाथ पहुँचता, तो वह कमल लेकर छावनी से बाहर चला जाता।


यहां गौर करने की बात ये है कि जहां चपातियां केवल गांवों में भेजे गए, कमल भी केवल छावनियों में नज़र आये।


इन चपातियों और कमलों को 1857 के इस युद्ध का प्रतीक माना जाता है। परन्तु क्या ये सिर्फ प्रतीक मात्र थे ?


इस दौरान एक और घटना हुई। नाना साहब ने एक पूजा करवाई जिसमें मखानों का उपयोग किया गया। मखाने कमलगोटे यानी कमल के बीजों से ही बनते हैं। इन मखानों को रोटियों में भरा गया। और ये रोटियां प्रसाद स्वरुप महल से बाहर भिजवाईं गयीं।


क्या ये आपस में रहस्य के टुकड़ों की भांति जुड़ रहे हैं?


अब कुछ और तथ्य जानिये। जब छावनियों में रक्तकमल का वितरण शुरू हुआ तब कमल लेकर आने वाला सैनिक सर झुका कर कहता, “सब लाल हो जाएगा।” और 1857 की फरवरी में ये नारा बदल कर हो गया “सब लाल हो गया।”


अंग्रेज़ों के लिए ये सब भारतीय अंधविश्वास था। उन्होंने सोचा कि ये नारा अंग्रेज़ों (उन्हें रेडकोट कहते थे) द्वारा भारत जीतने को बताता है। इसी सोच के साथ हमारे इतिहासकारों ने भी इन घटनाओं की अनदेखी की।


परन्तु, ये इतिहासकार भूल गए कि किसी भी सेना की पहली जरुरत है राशन और एक बार ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध हथियार उठा लेने पर ये सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी की संरचना का उपयोग नहीं कर पाते। उन्हें अपनी अलग संरचना तैयार करनी पड़ती।


हर रक्तकमल जब नाना साहब की पूजा में पंहुचा तो वह एक पलटन का प्रतीक था। जब उससे बने मखानों को रोटियों में भरकर गांव गांव भेजा गया तो उन पलटनों के राशन का प्रबंध किया जा रहा था। एक सैनिक को कम से कम दाल-रोटी ही खिलाइये, तो भी उस पर एक दिन में लगभग एक किलो अनाज खर्च होगा ही। अतः ऐसे युद्ध से पहले इतनी योजना आवश्यक भी थी। लगभग 50000 भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ हथियार उठाये थे। अगर आप गणना करें तो सिर्फ एक महीने में उन्हें 1500 टन अन्न की आवश्यकता होती। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में हर सैनिक के साथ तीन गुरगा होता था। क्या नाना साहब की सेना में उन्हें भी गिनना चाहिए? फिर हाथी-घोड़ों को भी गिनने से ये आंकड़ा 1500 टन से कितना अधिक बढ़ जाएगा?


अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि अंधविश्वास और परंपरा के नाम पर सैनिकों की गिनती भी की गयी और उनके खाने का इंतज़ाम भी। अंग्रेज़ों को अपनी सारी शक्ति लगानी पड़ी इस युद्ध में विजय पाने के लिए। 


इस युद्ध का ही परिणाम था कि बाकी अंग्रेज उपनिवेश जहां आज भी अंगरेजी संस्कृति के गुलाम हैं, वहीं भारत की संस्कृति जीवित रही। 


अब इससे चतुर और कौन सी रणनीति होगी?

✍🏻मलंग काशी वाले


“राम भरोसे हिन्दू होटल”


सन 1857 के विद्रोह को जब फिरंगी हुक्मरानों ने कुचल दिया था तो भारत में राष्ट्रवाद का उदय ही न हो इसके लिए उन्होंने कई इन्तेज़ामत किये | भारत की शिक्षा व्यवस्था का विदेशीकरण कर डाला गया था | रोजगार से जुड़ी चीज़ें सिखाई ही नहीं जाती थी | मैकले मॉडल का मुख्य उद्देश्य ही यही था कि शिक्षा व्यवस्था से ऐसे भारतीय पैदा किये जाएँ जो दिखने में, रहन सहन के तरीकों में तो भले ही भारतीय हों मगर मानसिक तौर पर वो फिरंगी गुलाम ही रहें | मैकले ने खुद अपनी चिट्ठियों में ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था के विकास की बातें की हैं |


हथियारों पर लाइसेंस की प्रक्रिया भी उसी दौर में आई थी | अखाड़ों पर पाबंदियां लगाई गई थी, हथियार रखने और चलाना सीखने की मनाही थी | इस से जातिवाद और छुआ-छूत को बढ़ावा देने में भी मदद मिलती थी | इस समय जब ऐसा प्रचार शुरू किया गया कि भाई युद्ध कला तो सिर्फ राजपूतों को सिखाई जाती थी, तो दो सौ सालों में लोगों को इस झूठ पर भरोसा भी होने लगा | वैसे जो लोग बनारस के मणिकर्णिका घाट तक गए हैं, उन्होंने शायद डोम राजा का अखाड़ा भी देखा होगा | मैकले के मानस पुत्रों को ये भी बताना चाहिए कि अगर युद्ध कला सिर्फ राजपूत / क्षत्रिय जाति के लोग सीखते थे तो ये ज्यादातर अखाड़े उन जाति के लोगों के क्यों हैं जिन्हें अछूत माना जाता है ? फिर सवाल ये भी है कि अगर इन लोगों को छूने पर पाबन्दी थी, तो भला इन जगहों पर बिना छुए कुश्ती सीखते कैसे होंगे “सवर्ण” ?


सन 57 का विद्रोह कुचल दिया गया था और भारत 50 साल में युद्ध के लायक भी नहीं रह गया | लेकिन फिर भी करीब 50 साल में राष्ट्रीयता की भावना फिर से जागने लगी | 1915-1920 के दौर में जब गाँधी जी भारत आ गए थे और कांग्रेस के झंडे तले होम रूल का आन्दोलन जोर पकड़ने लगा था, तो लोग फिर से सड़कों पर उतरने लगे थे | उस समय के कई तथाकथित बुद्धिजीवी मानते थे कि “हिन्दुओं की कौम” तो मिट चुकी है, इनका लड़ने भिड़ने का दम नहीं रह गया | ऐसे ही दौर में एक प्रमुख क्रन्तिकारी पार्टी के सरगना अपने फिरंगी आकाओं को चिट्ठी लिख कर, रिपोर्ट भेजकर ये बताते थे कि कैसे वो इस आन्दोलन को कुचलने में मदद करके अपने फिरंगी हुक्मरानों की मदद कर रहे हैं !


ये वो दौर था जब हिन्दुओं से कुछ नहीं हो पायेगा ये बताने के लिए एक विशेष राजनैतिक विचारधारा के बुद्धिपिशाचों ने “राम भरोसे हिन्दू होटल” का जुमला उछालना शुरु किया | अगर आप सोचते हैं कि ये अजीब सा जुमला आया कहाँ से ? तो जनाब ये तस्वीर 6 अप्रैल 1919 की है जिसमें फिरंगी शासन के विरोध में लोग बिना किसी स्थापित नेतृत्व के ही सड़कों पर उतरना शुरू हो चुके थे | इनसे कुछ नहीं हो पायेगा ये कहने के लिए इस तस्वीर में पीछे दिख रहे होटल का नाम जुमले की तरह उछाला गया था |


क्या होगा ये पता नहीं, या कुछ भी नहीं हो पायेगा, सब फर्जी शोर है ये साबित करने के लिए एक आयातित विदेशी विचारधारा के बुद्धि-पिशाचों ने इस तरह “राम भरोसे हिन्दू होटल” का जुमला शुरू किया 


खुसरो खान- ये किसी मुस्लिम का नाम नहीं हे ये एक हिन्दू राजा का नाम है जिसने खिलजी सल्तनत का अंत किया था शायद ये नाम आप पहली बार सुन रहे हों, पर इतिहास का ज़िक्र हो ही रहा हे तो ये जानना भी जरूरी है की खुसरो खान कौन सी शख्सियत का नाम है| हमें हमेशा से ये ही पढ़ाया गया है की जो दलित हिन्दू थे उन्होंने स्वेच्छा से अपना धर्म परिवर्तन किया था, जो की गलत है| इस बात के प्रमाण के लिए हम आप को १२०० ई. के अंत में जाना होगा जब 1297 ई. में में नीच अल्लौद्दीन खिलजी ने पवित्र सोमनाथ के मंदिर को पूर्व मुस्लिम शासकों की तरह लूटने के उलूग खान और नुसरत खान को भेजा था| पवित्र सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए लाठी राज्य के हमीरजी गोहिल और उनके दोस्त वेगदो भील दोनों पवित्र सोमनाथ मंदिर के निकट एक लड़ाई में मारे गए थे व उन्ही वेगदो भील का मित्र था खुसरो खान| अब जानना जरूरी ये हे की खुसरो खान का असली नाम किसी को भी नहीं मालूम, क्यूंकि ये सब कुछ बहुत ही कम वक़्त में हुआ था इसीलिए वर्तमान इतिहास में खुसरो खान का बहुत ही कम जिक्र है, पर जो बात पता है वो ये थी की,

१-वेगदो भील ने मरने से पहले खुसरो खान को सोमनाथ के मंदिर के अपमान और शहीदों की मृत्यु का बदला लेने को कहा

२-खुसरो खान एक दलित (परवारी-महार) हिन्दू थे व उन्हें युद्ध में पकड़ लिया गया था| refrence - इब्नबतूता की किताबों में इसका पूरा जिक्र है|

३-खुसरो खान ने खिलजी सल्तनत का अंत किया था  न की गयासुद्दीन तुग़लक़ ने जैसा की गलत हमें पढाया गया है|

४- खुसरो खान को अत्यधिक प्रताड़ित किया गया व उन्हें इस्लाम कबूलवाया गया|

५- अंत में खुसरो खान ने अल्लौद्दीन खिलजी के मरने के बाद  उसके  बेटे  मुबारक  शाह  को मार  कर  सोमनाथ के बदला ले  लिया और खिलजी सल्तनत  का अंत कर दिया |

६- बाद  में खुसरो खान ने दुबारा  हिन्दू धर्म स्वीकार  लिया था व इस बात के स्पष्ट  प्रमाण मौजूद  हैं |

Reference -Advanced Study In The History Of Medieval India - Vol I, Volume 1 By Jaswant Lal Mehta, pg. 185

७-और उसके बाद खुसरो खान दिल्ली  का राजा बना, हालांकि वो केवेल ६ माह ही राज कर पाया उसके बाद उसे गयासुद्दीन तुग़लक़ ने हरा दिया | परन्तु ख़ुशी की बात ये हे की एक दलित हिन्दू ने मजबूरी में इस्लाम स्वीकारने के बाद फिर से हिन्दू धर्म स्वीकार करके एक हिन्दू राजा बना दिल्ली सल्तनत का|

अब हमारा एजुकेशन सिस्टम हमें क्या पढ़ाता.है ये बात तो सबको पता चल ही गयी होगी!!


खुसरो खान को तो मिटा ही दिया गया है|


संथाल जनजाति बिहार, झारखंड के अलावा बंगाल में भी होती है | बीरभूम जिले के सुलंगा गाँव में इनके करीब सौ घर होंगे | छोटा सा गाँव है, संथालों की आबादी भी वही 500-700 जैसी होगी | इतने मामूली से गाँव का जिक्र क्यों ? क्योंकि बरसों पहले यहाँ अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका गया था | जैसा कि बाकी भारत में हुआ था यहाँ भी विद्रोह की मुख्य वजह धार्मिक और आर्थिक ही थी |


ये वो दौर था जब बिहार और बंगाल अलग अलग सूबे नहीं थे | एक ही बंगाल हुआ करता था और लोग भाषाई आधार पर सीमायें मानते थे | 1907 के उस दौर में बिहार के एक करपा साहेब को बुला कर यहाँ का जमींदार बना दिया गया और वो लगे किसानों से लगान वसूलने | इस लगान की दो शर्ते थी, या तो सीधे तरीके से लगान दो, या इसाई हो जाओ तो लगान माफ़ किया जायेगा |


विरोध करने वालों को या तो मार दिया गया था या पकड़ कर असम में कुली बना कर भेजा गया था | इस नाजायज और जबरन वसूली ऊपर से धर्म परिवर्तन के खिलाफ मुर्मू लोग विद्रोह पर उतर आये | जैसा कि बाकी के भारत में होता है और तिलक ने भी किया था वैसे ही यहाँ भी लोगों ने एकजुट होने के लिए त्योहारों का ही सहारा लिया | दुर्गा पूजा की नवमी को बलि प्रदान के दिन जब सब इकठ्ठा होते वहीँ से विद्रोह की शुरुआत हुई थी | विद्रोह के नेता थे बोर्जो मुर्मू और उनके भाई |


दल हित चिन्तक आज महिषासुर को जब संथाल लोगों का वंशज और झारखण्ड इलाके का वासी बताने की कोशिश कर रहे हैं तो उन्होंने संथाल इतिहास तो जरूर ही देखा होगा ? अब ये सवाल इसलिए है क्योंकि बोर्जो मुर्मू के भाई का नाम दुर्गा मुर्मू था | जब इतिहास में संथाल विद्रोह दर्ज किया जाता है तो दुर्गा मुर्मू और बोर्जो मुर्मू का नाम साथ ही लिया जाता है | बोर्जो मुर्मू के वंशज अभी भी इसी गाँव में होते हैं | दुर्गा पूजा अभी भी यहाँ होती है, हां संस्कृत वाले मन्त्र नहीं पढ़े जाते, स्थानीय भाषा में बदले हुए मन्त्र होते हैं | तारीख़ वही बाकी भारत की दुर्गा पूजा वाली होती है मूर्तियाँ स्थानीय रंग-ढंग की |


जांच करने के लिए जो जाना चाहेंगे वो गाँव के पुजारी रोबीन टुडू से अष्टमी को गोरा साहिब को दर्शाने के लिए सफ़ेद छागर की बलि की प्रथा जांच सकते हैं | इलाके के वाम मोर्चे के पुराने मुखिया अरुण चौधरी से भी बात कर सकते हैं, दुर्गा पूजा में कम्युनिस्ट भी शामिल होते है | क्या कहा ? रोबिन टुडू नाम क्यों है पुजारी का ? भाई वो क्रिस्चियन वाला Robin नहीं है, “रविन्द्र” का बांग्ला अपभ्रंश है रोबीन ! नहीं भाई, हर बार पुजारी ब्राह्मण हो ये भी जरूरी नहीं होता |


बाकी ऊँचे अपार्टमेंट की तेरहवीं मंजिल (जिसका नाम आपने अज्ञात कारणों से 14th Floor रखा है) पर बंद ए.सी. कमरों से भारत पूरा दिखता भी नहीं जनाब ! नीचे जमीन पे आइये तो बेहतर दिखेगा |

✍🏻आनंद कुमार

पापाजी की 32वी पुण्यतिथि पर नमन श्रद्धांजलि


अनामी शरण  बबल 


पापा जी आपको कभी देह स्वरुप  में नहीं देखा मगर आप मेरे   भीतर हमेशा जीवित रहें धड़कते रहें मुझे प्रेरित करते रहें औऱ संबल दिया है. आपकी बहादुरी साहस कर्तव्य निष्ठा काम के प्रति जुनून लगाव प्रतिबद्धता तथा हमेशा सक्रिय एक जाँबाज 😝की सूरत आँखों में अंकित है. दीपक भैया हो या माँ या ममता आज भी औऱ आज तक अनगिनत उदाहरण  देकर एक संवेदनशील औऱ आपके व्यक्तित्व के अनेको रंग रुप औऱ छवि क़ो सामने रखते रहे है. देर रात क़ो जंगलो में जाना शेरों की औऱ उनके पदचापो की गणना करने के खतरनाक अभियान कार्य क़ो अंजाम देने की कल्पना  करना भी आज घर में बैठ कर रोमांचित  करने की बजाय सिंहराrtन पैदा करती है.  जोखिम पूर्ण काम में इतना व्यस्त रहने के बाद भी बच्चों क़ो घूमने  घुमाने पर ले जाना औऱ पूरा समय देना भी आपके टाइम मैनेजमेंट के दुर्लभ गुण की तरफ इंगित करता है. माँ बाबूजी के प्रति अगाध प्रेम लालसा लगाव औऱ दूर रहकर भी उनकी चिंता आपके व्यक्तित्व के श्रवण कुमार की छवि क़ो प्रस्तुत कर सबो क़ो प्रेरित करती है.. अपने बच्चों के दोस्तों के संग भी पापा या अंकल की तरह पेश आने औऱ उनके परिजनों से भी पारिवारिक रिश्ता बनाने की ललक आज अचंभित करता है कि अलग अलग शहरों में साल दो साल ही रहने के बावजूद आधा दर्जन दोस्तों का संपर्क कोई 40-41 साल के बाद भी एक दूसरे के मन में जीवित रहना आज हैरान करता है.  ढेरों दोस्त केवल बच्चों के होकर भी पापा के चलते परिवार में बदल गये. अपने बच्चों के प्रति पापा क़ो पूर्ण आस्था औऱ विश्वास  था. औऱ यह आज सोचना भी यक़ीनन यकीन करने लायक नहीं लगता जब उस समय (1980-90) संचार परिवहन के सीमित साधन थे. शाम ढलते ही ज्यातर गांव शहर अंधेरों में खो जाते थे . घर से निकलने के बाद घर तक वापस नहीं आ जाने तक आदमी से सारा परिवार अनभिज्ञ ही रहता था.


मूलतः जंगलो में कार्य के दौरान रहने औऱ परिवार क़ो भी रखने के लिए मजबूर पापा जी अपने समय से आगे की सोच रखते थे. समय से आगे रहने वाले पापा पूर्णतः आधुनिक सोच रखने  वाले मानवीय कर्मठ और सख्त  अधिकारी होने के बावजूद वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों सेवकों के परिवार की छोटी छोटी चिंता पर भी द्रवित हो जाना भी इनके स्वभाव का सबसे सबल मानवीय पक्ष है.

अमूमन जंगलो में यात्रा के दौरान बाघो या औऱ हिंसक जानवरो के संग भी इनका अबोल विश्वास का रिश्ता भी चकित करता है. सचमुच प्यार औऱ अहिंसा की भाषा जानवर भी समझते है तभी तो दर्जनों बार ऐसा हुआ जब एक ही रास्ते में दूर से एक दूसरे क़ो देखकर या आमने सामने पड़ जाने के बाद भी खुद रूककर या गाड़ी ख़डी करके उनको निकलने का मूक संदेश द या मूक संकेतो पर यकीन करके रास्ता पर करा देना  भी उनके विश्वास क़ो सबल करता है कि जानवर भी प्यार स्नेह औऱ इंसानियत पर यकीन करते है.


आदमखोर जमींदार के रुप में विख्यात  कुख्यात मनातू के खूंखार जमींदार से मुठभेड़ औऱ तीखे रिश्तों की आज कल्पना करके भी मन सिहर जाता है. शेर के मांद में रहते हए भी अपने काम दायित्व औऱ कर्तव्यों के प्रति सदा बेदाग रहना भी आपकी ही एक कला है, निसंदेह पापा जी आप इस कला में भी दक्ष थे. अपनी वर्दी अपना पोजीशन औऱ अपने काम के प्रति इतना भरोसा था की कोई भी हाथ डाल कर बच नहीं सकता.. अपने काम के प्रति इतना आत्मसम्मान होना भी आपके अनूठे कार्य क्षमता औऱ काम करने के तौर तरीको क़ो साफ करता है.


आज जब मैं उन दिनों कि बातों क़ो लिखना चाह रहा हूँ तो उस समय के माहौल वातावरण भी अजीब सा होता था. आज की  तरह मॉल मेट्रो मोबाइल मल्टीनेशनल कम्पनियों मल्टीस्टोरी अपार्टमेंटो मल्टीप्लेक्सो मोटर कार औऱ मनी के जल्वो की धूम नहीं थी. जिंदगी भी बेरंग औऱ सुस्त थी. आदमी के सपने भी सरल सीधे  साधे होते थे वैसी जिंदगी में भी पापा की ज़िंदादिली रंग भरती थी. माँ बाबू के प्रति समर्पित निष्ठा भी सहसा  एक बेहतर बेटे की छवि रौशन  करती थी . समय के साथ सेवानिवृति के बाद भी हरदम सक्रिय उत्साहित पापा जी एक साथ चार  चार कम्पनियो के ब तौर सलाहकार थे. सेवा अवकाश के बाद भी अपने आपको न टायर्ड फिल  किया औऱ ना ही रिटायर्ड.. समय के पाबंद पापाजी सबसे पहले तैयार  होते थे. बुलेट औऱ जीप के प्रति उनका लगाव भी आश्चर्य जनक सा था. लगता था मानो वाहन उनकी धड़कन की तरह थी.  पापा की जाँबाजी की अनेको घटनाये मेरे मन में इनके प्रति लगाव क़ो औऱ मजबूत करता है. आप मेरे पापा बने यह मेरा सौभाग्य है पर साथ में यह बद किस्मत भी है कि आपको  देख नहीं पाया. आप मेरे मन में एक खिलाडी की तरह हमेशा एक्टिव  सकारात्मक गुणों कि महक के साथ धड़कते है. देखें बगैर ही मेरी कल्पना में आपकी अमिट कामयाब कमांडर की तरह स्पन्दित होते है. अदेह हुए तीन दशक (32 साल ) हो जाने के बाद भी आपको लोग  न भूल सके है न भूल पाएंगे. पिता कि तरह सबको छाया देने कि ललक रखने वाले पूज्य पापा जी विनम्र श्रद्धांजलि के साथ नमन प्रणाम करता हूँ.  पापा जी 🙏🏼🙏🏼 आप स्वर्ग में रहते हुए भी सबो पर अपना प्यार आशीष औऱ कृपा दृष्टि बनाये रखे. यहीं आस विश्वास  के साथ आप सदैव हम सब के अंग  संग रहे. आपकी 32 वी पुण्यतिथि  पर  ढेरों आदर मान सम्मान  के साथ मेरा प्रणाम स्वीकार करें.🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼


✌🏼🙏🏼🙏🏼

गुरुवार, 30 सितंबर 2021

शिक्षा नीति में शामिल हो अनुवाद की अहमियत ::: अनेजा

 

* राजधानी कॉलेज में मनाया गया अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस*_



 अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस के अवसर पर “राष्ट्रीय चेतना और अनुवाद” विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के राजा गार्डन स्थित  राजधानी महाविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य परिषद द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का अयोजन किया गया| इसमें दस से अधिक विश्वविद्यालयों से जुड़े चयनित प्राध्यापकों, विद्वानों व अनुवादकों ने अनुवाद से जुड़े अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए| संगोष्ठी के उदघाटन सत्र में मुख्य अतिथि के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्रोफ़ेसर अनिल कुमार अनेजा ने कहा कि राष्ट्रीय चेतना में अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका है| यही कारण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अनुवाद को बहुत महत्व दिया गया है| आनुवाद से जुड़ा विषय राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक मजबूत आधारस्तंभ है| उन्होंने महाविद्यालयों में अनुवाद प्रकोष्ठ स्थापित किए जाने का भी आवाह्न किया|


बीजवक्ता के रूप में बोल रहे जी एल ए विश्वविद्यालय मथुरा के अंग्रेजी विभाग से विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर पंचानन मोहंती ने अनुवाद को मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में एक आवश्यक कारक मानते हुए पश्चिमी सभ्यता ही नहीं भारतीय सभ्यता के भी सतत पुष्पन-पल्लवन के लिए आवश्यक बताया| राष्ट्रीय चेतना और अनुवाद के सहसंबंध विषय पर उनके द्वारा भारत के औपनिवेशिककाल से लेकर आज के समय के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए| सत्र की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफ़ेसर राजेश गिरि ने की| उन्होने कहा की शैक्षणिक संस्थानों की अनुवाद विषय की बहुत ही महत्ता है। ज्ञान विज्ञान के हर क्षेत्र में अनुवाद आज बहुत हद तक अध्ययन अध्यापन अनुवाद द्वारा ही संभव हो रहा है। इस दौरान महाविद्यालय की प्रोफेसर वर्षा गुप्ता व संगोष्ठी के संयोजक डॉ वेद मित्र शुक्ल ने भी अपने विचार रखे|



संगोष्ठी के एक अन्य महत्वपूर्ण सत्र में महाविद्यालयी कक्षाओं में अनुवाद की भूमिका को लेकर गहन चिंतन-मनन किया गया| इस दौरान अध्यक्ष के रूप में डॉ बरुन मिश्र और मुख्य वक्ता के रूप में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय से डॉ उमेश कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय के दीनदयाल उपाध्याय कोलेज से डॉ ललित कुमार और राजधानी महाविद्यालय से शफीकुल आलम उपस्थित रहे| विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता और संयोजक की भूमिका में डॉ रचना सेठी, डॉ दिव्या बाजपेयी झा, डॉ युमी कपाई, डॉ अनुभा अनुश्री, डॉ शेफाली राठोर, डॉ अदिति शर्मा, नेहा राणा, डॉ सच्चिदानन्द झा आदि विद्वान प्राध्यापक़गण मौजूद रहे| एक दिवसीय संगोष्ठी का संचालन महाविद्यालय के विद्यार्थी स्तुति व महिमा द्वारा किया गया| इस दौरान अर्चित, सक्षम, शुभम, पूजा, कामदेव अविनाशी, हर्षिता पाठक, याशिका, ईशा रानी, ध्रुव मल्होत्रा, आशुतोष राज आदि की विशेष सहभागिता रही|  


                 

बुधवार, 29 सितंबर 2021

ब्राह्मण_और_जनेऊ(यज्ञोपवीत / कृष्णा सिंह )

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पिछले दिनों मैं हनुमान जी के मंदिर में गया था जहाँ पर मैंने एक ब्राह्मण को देखा, जो एक जनेऊ हनुमान जी के लिए ले आये थे | संयोग से मैं उनके ठीक पीछे लाइन में खड़ा था, मेंने सुना वो पुजारी से कह रहे थे कि वह स्वयं का काता (बनाया) हुआ जनेऊ हनुमान जी को पहनाना चाहते हैं, पुजारी ने जनेऊ तो ले लिया पर पहनाया नहीं | जब ब्राह्मण ने पुन: आग्रह किया तो पुजारी बोले यह तो हनुमान जी का श्रृंगार है इसके लिए बड़े पुजारी (महन्थ) जी से अनुमति लेनी होगी, आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें वो आते ही होगें | मैं उन लोगों की बातें गौर से सुन रहा था, जिज्ञासा वश मैं भी महन्थ जी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।


थोड़ी देर बाद जब महन्थ जी आए तो पुजारी ने उस ब्राह्मण के आग्रह के बारे में बताया तो महन्थ जी ने ब्राह्मण की ओर देख कर कहा कि देखिए हनुमान जी ने जनेऊ तो पहले से ही पहना हुआ है और यह फूलमाला तो है नहीं कि एक साथ कई पहना दी जाए | आप चाहें तो यह जनेऊ हनुमान जी को चढ़ाकर प्रसाद रूप में ले लीजिए |


 इस पर उस ब्राह्मण ने बड़ी ही विनम्रता से कहा कि मैं देख रहा हूँ कि भगवान ने पहले से ही जनेऊ धारण कर रखा है परन्तु कल रात्रि में चन्द्रग्रहण लगा था और वैदिक नियमानुसार प्रत्येक जनेऊ धारण करने वाले को ग्रहणकाल के उपरांत पुराना बदलकर नया जनेऊ धारण कर लेना चाहिए बस यही सोच कर सुबह सुबह मैं हनुमान जी की सेवा में यह ले आया था प्रभु को यह प्रिय भी बहुत है | हनुमान चालीसा में भी लिखा है कि - "हाथ बज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूज जनेऊ साजे"।


 अब महन्थ जी थोड़ी सोचनीय मुद्रा में बोले कि हम लोग बाजार का जनेऊ नहीं लेते हनुमान जी के लिए शुद्ध जनेऊ बनवाते हैं, आपके जनेऊ की क्या शुद्धता है | इस पर वह ब्राह्मण बोले कि प्रथम तो यह कि ये कच्चे सूत से बना है, इसकी लम्बाई 96 चउवा (अंगुल) है, पहले तीन धागे को तकली पर चढ़ाने के बाद तकली की सहायता से नौ धागे तेहरे गये हैं, इस प्रकार 27 धागे का एक त्रिसुत है जो कि पूरा एक ही धागा है कहीं से भी खंडित नहीं है, इसमें प्रवर तथा गोत्रानुसार प्रवर बन्धन है तथा अन्त में ब्रह्मगांठ लगा कर इसे पूर्ण रूप से शुद्ध बनाकर हल्दी से रंगा गया है और यह सब मेंने स्वयं अपने हाथ से गायत्री मंत्र जपते हुए किया है |


ब्राह्मण देव की जनेऊ निर्माण की इस व्याख्या से मैं तो स्तब्ध रह गया मन ही मन उन्हें प्रणाम किया, मेंने देखा कि अब महन्त जी ने उनसे संस्कृत भाषा में कुछ पूछने लगे, उन लोगों का सवाल - जबाब तो मेरे समझ में नहीं आया पर महन्त जी को देख कर लग रहा था कि वे ब्राह्मण के जबाब से पूर्णतया सन्तुष्ट हैं अब वे उन्हें अपने साथ लेकर हनुमान जी के पास पहुँचे जहाँ मन्त्रोच्चारण कर महन्त व अन्य 3 पुजारियों के सहयोग से हनुमान जी को ब्राह्मण देव ने जनेऊ पहनाया तत्पश्चात पुराना जनेऊ उतार कर उन्होंने बहते जल में विसर्जन करने के लिए अपने पास रख लिया |


 मंदिर तो मैं अक्सर आता हूँ पर आज की इस घटना ने मन पर गहरी छाप छोड़ दी, मेंने सोचा कि मैं भी तो ब्राह्मण हूं और नियमानुसार मुझे भी जनेऊ बदलना चाहिए, उस ब्राह्मण के पीछे-पीछे मैं भी मंदिर से बाहर आया उन्हें रोककर प्रणाम करने के बाद अपना परिचय दिया और कहा कि मुझे भी एक जोड़ी शुद्ध जनेऊ की आवश्यकता है, तो उन्होंने असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तो वह बस हनुमान जी के लिए ही ले आये थे हां यदि आप चाहें तो मेरे घर कभी भी आ जाइएगा घर पर जनेऊ बनाकर मैं रखता हूँ जो लोग जानते हैं वो आकर ले जाते हैं | मेंने उनसे उनके घर का पता लिया और प्रणाम कर वहां से चला आया।


शाम को उनके घर पहुंचा तो देखा कि वह अपने दरवाजे पर तखत पर बैठे एक व्यक्ति से बात कर रहे हैं , गाड़ी से उतरकर मैं उनके पास पहुंचा मुझे देखते ही वो खड़े हो गए, और मुझसे बैठने का आग्रह किया अभिवादन के बाद मैं बैठ गया, बातों बातों में पता चला कि वह अन्य व्यक्ति भी पास का रहने वाला ब्राह्मण है तथा उनसे जनेऊ लेने आया है | ब्राह्मण अपने घर के अन्दर गए इसी बीच उनकी दो बेटियाँ जो क्रमश: 12 वर्ष व 8 वर्ष की रही होंगी एक के हाथ में एक लोटा पानी तथा दूसरी के हाथ में एक कटोरी में गुड़ तथा दो गिलास था, हम लोगों के सामने गुड़ व पानी रखा गया, मेरे पास बैठे व्यक्ति ने दोनों गिलास में पानी डाला फिर गुड़ का एक टुकड़ा उठा कर खाया और पानी पी लिया तथा गुड़ की कटोरी मेरी ओर खिसका दी, पर मेंने पानी नहीं पिया 


इतनी देर में ब्राह्मण अपने घर से बाहर आए और एक जोड़ी जनेऊ उस व्यक्ति को दिए, जो पहले से बैठा था उसने जनेऊ लिया और 21 रुपए ब्राह्मण को देकर चला गया | मैं अभी वहीं रुका रहा इस ब्राह्मण के बारे में और अधिक जानने का कौतुहल मेरे मन में था, उनसे बात-चीत में पता चला कि वह संस्कृत से स्नातक हैं नौकरी मिली नहीं और पूँजी ना होने के कारण कोई व्यवसाय भी नहीं कर पाए, घर में बृद्ध मां पत्नी दो बेटियाँ तथा एक छोटा बेटा है, एक गाय भी है | वे बृद्ध मां और गौ-सेवा करते हैं दूध से थोड़ी सी आय हो जाती है और जनेऊ बनाना उन्होंने अपने पिता व दादा जी से सीखा है यह भी उनके गुजर-बसर में सहायक है | 


इसी बीच उनकी बड़ी बेटी पानी का लोटा वापस ले जाने के लिए आई किन्तु अभी भी मेरी गिलास में पानी भरा था उसने मेरी ओर देखा लगा कि उसकी आँखें मुझसे पूछ रही हों कि मेंने पानी क्यों नहीं पिया, मेंने अपनी नजरें उधर से हटा लीं, वह पानी का लोटा गिलास वहीं छोड़ कर चली गयी शायद उसे उम्मीद थी की मैं बाद में पानी पी लूंगा | 


अब तक मैं इस परिवार के बारे में काफी है तक जान चुका था और मेरे मन में दया के भाव भी आ रहे थे | खैर ब्राह्मण ने मुझे एक जोड़ी जनेऊ दिया, तथा कागज पर एक मंत्र लिख कर दिया और कहा कि जनेऊ पहनते समय इस मंत्र का उच्चारण अवश्य करूं -- |


मैंने सोच समझ कर 500 रुपए का नोट ब्राह्मण की ओर बढ़ाया तथा जेब और पर्स में एक का सिक्का तलाशने लगा, मैं जानता था कि 500 रुपए एक जोड़ी जनेऊ के लिए बहुत अधिक है पर मैंने सोचा कि इसी बहाने इनकी थोड़ी मदद हो जाएगी | ब्राह्मण हाथ जोड़ कर मुझसे बोले कि सर 500 सौ का फुटकर तो मेरे पास नहीं है, मेंने कहा अरे फुटकर की आवश्यकता नहीं है आप पूरा ही रख लीजिए तो उन्हें कहा नहीं बस मुझे मेरी मेहनत भर का 21 रूपए दे दीजिए, मुझे उनकी यह बात अच्छी लगी कि गरीब होने के बावजूद वो लालची नहीं हैं, पर मेंने भी पांच सौ ही देने के लिए सोच लिया था इसलिए मैंने कहा कि फुटकर तो मेरे पास भी नहीं है, आप संकोच मत करिए पूरा रख लीजिए आपके काम आएगा | उन्होंने कहा अरे नहीं मैं संकोच नहीं कर रहा आप इसे वापस रखिए जब कभी आपसे दुबारा मुलाकात होगी तब 21रू. दे दीजिएगा | 


इस ब्राह्मण ने तो मेरी आँखें नम कर दीं उन्होंने कहा कि शुद्ध जनेऊ की एक जोड़ी पर 13-14 रुपए की लागत आती है 7-8 रुपए अपनी मेहनत का जोड़कर वह 21 रू. लेते हैं कोई-कोई एक का सिक्का न होने की बात कह कर बीस रुपए ही देता है | मेरे साथ भी यही समस्या थी मेरे पास 21रू. फुटकर नहीं थे, मेंने पांच सौ का नोट वापस रखा और सौ रुपए का एक नोट उन्हें पकड़ाते हुए बड़ी ही विनम्रता से उनसे रख लेने को कहा तो इस बार वह मेरा आग्रह नहीं टाल पाए और 100 रूपए रख लिए और मुझसे एक मिनट रुकने को कहकर घर के अन्दर गए, बाहर आकर और चार जोड़ी जनेऊ मुझे देते हुए बोले मेंने आपकी बात मानकर सौ रू. रख लिए अब मेरी बात मान कर यह चार जोड़ी जनेऊ और रख लीजिए ताकी मेरे मन पर भी कोई भार ना रहे |


मेंने मन ही मन उनके स्वाभिमान को प्रणाम किया साथ ही उनसे पूछा कि इतना जनेऊ लेकर मैं क्या करूंगा तो वो बोले कि मकर संक्रांति, पितृ विसर्जन, चन्द्र और सूर्य ग्रहण, घर पर किसी हवन पूजन संकल्प परिवार में शिशु जन्म के सूतक आदि अवसरों पर जनेऊ बदलने का विधान है, इसके अलावा आप अपने सगे सम्बन्धियों रिस्तेदारों व अपने ब्राह्मण मित्रों को उपहार भी दे सकते हैं जिससे हमारी ब्राह्मण संस्कृति व परम्परा मजबूत हो साथ ही साथ जब आप मंदिर जांए तो विशेष रूप से गणेश जी, शंकर जी व हनूमान जी को जनेऊ जरूर चढ़ाएं...


उनकी बातें सुनकर वह पांच जोड़ी जनेऊ मेंने अपने पास रख लिया और खड़ा हुआ तथा वापसी के लिए बिदा मांगी, तो उन्होंने कहा कि आप हमारे अतिथि हैं पहली बार घर आए हैं हम आपको खाली हाथ कैसे जाने दो सकते हैं इतना कह कर उनहोंने अपनी बिटिया को आवाज लगाई वह बाहर निकाली तो ब्राह्मण देव ने उससे इशारे में कुछ कहा तो वह उनका इशारा समझकर जल्दी से अन्दर गयी और एक बड़ा सा डंडा लेकर बाहर निकली, डंडा देखकर मेरे समझ में नहीं आया कि मेरी कैसी बिदायी होने वाली है | 


अब डंडा उसके हाथ से ब्राह्मण देव ने अपने हाथों में ले लिया और मेरी ओर देख कर मुस्कराए जबाब में मेंने भी मुस्कराने का प्रयास किया | वह डंडा लेकर आगे बढ़े तो मैं थोड़ा पीछे हट गया उनकी बिटिया उनके पीछे पीछे चल रह थी मेंने देखा कि दरवाजे की दूसरी तरफ दो पपीते के पेड़ लगे थे डंडे की सहायता से उन्होंने एक पका हुआ पपीता तोड़ा उनकी बिटिया वह पपीता उठा कर अन्दर ले गयी और पानी से धोकर एक कागज में लपेट कर मेरे पास ले आयी और अपने नन्हें नन्हा हाथों से मेरी ओर बढ़ा दिया उसका निश्छल अपनापन देख मेरी आँखें भर आईं।


मैं अपनी भीग चुकी आंखों को उससे छिपाता हुआ दूसरी ओर देखने लगा तभी मेरी नजर पानी के उस लोटे और गिलास पर पड़ी जो अब भी वहीं रखा था इस छोटी सी बच्ची का अपनापन देख मुझे अपने पानी न पीने पर ग्लानि होने लगी, मैंने झट से एक टुकड़ा गुड़ उठाकर मुँह में रखा और पूरी गिलास का पानी एक ही साँस में पी गया, बिटिया से पूछा कि क्या एक गिलास पानी और मिलेगा वह नन्ही परी फुदकता हुई लोटा उठाकर ले गयी और पानी भर लाई, फिर उस पानी को मेरी गिलास में डालने लगी और उसके होंठों पर तैर रही मुस्कराहट जैसे मेरा धन्यवाद कर रही हो , मैं अपनी नजरें उससे छुपा रहा था पानी का गिलास उठाया और गर्दन ऊंची कर के वह अमृत पीने लगा पर अपराधबोध से दबा जा रहा था।


अब बिना किसी से कुछ बोले पपीता गाड़ी की दूसरी सीट पर रखा, और घर के लिए चल पड़ा, घर पहुंचने पर हाथ में पपीता देख कर मेरी पत्नी ने पूछा कि यह कहां से ले आए तो बस मैं उससे इतना ही कह पाया कि एक ब्राह्मण के घर गया था तो उन्होंने खाली हाथ आने ही नहीं दिया

प्राचीन इराक और भारत

 

१. प्राचीन भारत-इराक भारतवर्ष का भाग था। भारत वर्ष का ३ अर्थों में प्रयोग हुआ है-

(१) लोक पद्म- उत्तरी गोलार्द्ध के नकशे के ४ भागों में एक। इनको भू-पद्म के ४ दल कहा गया है-

(विष्णु पुराण २/२)-भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः।२४।

भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः।४०।

यहां भारत-दल का अर्थ है विषुवत रेखा से उत्तरी ध्रुव तक, उज्जैन (७५०४३’ पूर्व) के दोनों तरफ ४५-४५ अंश पूर्व-पश्चिम। इसके पश्चिम में इसी प्रकार केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व तथा विपरीत दिशा में (उत्तर) कुरु, ९०-९० अंश देशान्तर में हैं। महाभारत, भीष्मपर्व (९/५-९) के अनुसार यह इन्द्र (१७५०० ईपू), पृथु (१७,१०० ईपू), वैवस्वत मनु (१३९०२ ईपू), इक्ष्वाकु तथा उनके वंशजों का क्षेत्र रहा है। 

विषुव से उत्तर ध्रुव तक इन्द्र के ३ लोक थे-भूलोक हिमालय तक, भुवः मंगोलिया तक, उसके बाद ध्रुव तक स्वः लोक।

३ कुरु थे। विषुव रेखा पर शून्य देशान्तर पर लंका था (लक्कादीव का दक्षिन भाग) इसके डूबने पर उज्जैन को शूण्य देशान्तर कहा गया था। कुरुक्षेत्र प्रायः इस रेखा पर था। इस रेखा पर सबसे उत्तर का नगर उत्तर कुरु था। यहां से देशान्तर अंश गिनती आरम्भ होती है अतः इसे ॐ नगर कहा गया (सिबिर या साइबेरिया की राजधानी ओम्स्क)। कुरुक्षेत्र की विपरीत दिशा में कुरु देश था (मेक्सिको, अमेरिका का पश्चिम भाग)। 

मान्धाता (७५०० ईपू) का प्रभुत्व पूरी पृथ्वी पर था, अतः उनके राज्य में सदा किसी स्थान पर सूर्य का उदय और अन्य किसी स्थान पर अस्त होता रहता था। विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय, २-

तदस्तु मान्धाता चक्रवर्ती सप्तद्वीपां महीं बुभुजे॥६३॥तत्रायं श्लोकः॥६५॥

यावत् सूर्य उदेत्यस्तं यावच्च प्रतितिष्ठति। सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते॥६५॥

इसकी नकल कर अंग्रेजों ने कहा कि ब्रिटिश राज्य में सूर्य का अस्त नहीं होता।

(२) भारत वर्ष- हिमालय को पूर्व पश्चिम में समुद्र तक फैलाया जाय तो उसके दक्षिण समुद्र तक भारतवर्ष था जिसके ९ खण्ड थे। यहां द्वीप या महाद्वीप का अर्थ केवल समुद्र से घिरा क्षेत्र नहीं है, यह पर्वत, नदी या मरुस्थल द्वारा प्राकृतिक विभाजन भी है। मत्स्य पुराण, अध्याय ११४-

अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः। भरणच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते।५।

निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम्। यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः।६।

न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौकर्मविधिः स्मृतः। भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोधत।७।

इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः।८।

अयं तु नवमस्तेषं द्वीपः सागरसंवृतः। योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः।९।

आयतस्तुकुमारीतो गङायाः प्रवहावधिः।तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु।१०।

यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यग् यामः प्रकीर्तितः। य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः।१५।

इनमें इन्द्रद्वीप इरावती नदी क्षेत्र है, जहां का ऐरावत इन्द्र का हाथी था( वायु पुराण, ३७/२५)। नागद्वीप अण्डमान निकोबार से सुमात्रा तक था। पश्चिम इण्डोनेसिया सेलेबीज तथा पूर्व भाग गभस्तिमान था। गभस्तिमान की एक नदी गभस्ति (न्यूगिनी में) को शक द्वीप ) आस्ट्रेलिया में भी कहा गया है। ताम्रपर्ण तमिलनाडु की ताम्रपर्णी नदी के निकट का सिंहल-लंका द्वीप थे। सौम्य तिब्बत भाग था। गान्धर्व द्वीप अफगानिस्तान, किर्गिज आदि थे। ईरान-ईराक को मैत्रावरुण कहा गया है। मित्र भाग ईरान तथा उसके उत्तर पश्चिम का कामभोज भाग भी था। वारुण द्वीप इराक-अरब था। इसकी पश्चिमी सीमा पर यम थे (यमन, अम्मान, मृत सागर)।

(३) कुमारिका खण्ड-वर्तमान भारत (नेपाल, बंगलादेश, पाकिस्तान सहित) कुमारिका खण्ड था जो अधोमुख त्रिकोण है, गंगा स्रोत तक उत्तर में चौड़ा होता गया है। अधोमुख त्रिकोण को शक्ति त्रिकोण कहते हैं। शक्ति का मूल स्वरूप कुमारी होने से यह कुमारिका खण्ड था। इसके दक्षिण अण्टार्कटिक (अनन्त द्वीप) तक का समुद्र भी कुमारिका खण्ड था जिसका वर्णन तमिल महाकाव्य शिलप्पाधिकारम् में है। 

उत्तर से देखने पर हिमालय अर्ध चन्द्राकार दीखता है जिसके केन्द्र में कैलास शिव का स्थान हैं। अतः शिव के सिर पर अर्ध चन्द्र रहता है जो अरब में भी आजकल पूजा जाता है। अतः ३ कारणों से चीन के लोग इसे इन्दु कहते थे (आज भी कहते हैं)। अर्ध चन्द्र (इन्दु) रूप हिमालय, चन्द्र की तरह शीतल, चन्द्र की तरह ज्ञान प्रकाश विश्व को देने वाला। हुएन्सांग की भारत यात्रा वर्णन में कहा है कि ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते हैं, जिससे इण्डिया हुआ है। 

विश्व का भरण पोषण करने के कारण यहां के मनु (अग्नि, अग्रि = अग्रवाल) या शासक को भरत तथा इस देश को भारत कहते थे (मत्स्य पुराण, ११४/५-६)। 

हिमालय द्वारा यह विभाजित होने से हिमवत् वर्ष या अरबी में हिमयार (अल बिरूनि-प्राचीन देशों की काल गणना) कहते थे। 

विश्व सभ्यता की नाभि या केन्द्र होने से यह अजनाभ वर्ष था। जम्बूद्वीप के राजा आग्नीध्र के पुत्र को नाभि कहा गया है जिनको भारत का राज्य मिला। विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-

जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥

पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥

हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः। तस्यर्षभॊऽभवत् पुत्रो मेरुदेव्यां महाद्युतिः॥२७॥

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते। भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रातिष्ठिता वनम्॥३२॥

भारत मुख्यतः २ भागों में विभाजित था-सिन्धु से पूर्व वियतनाम, इण्डोनेसिया तक इन्द्र प्रभुत्व तथा सिन्धु से पश्चिम वरुण प्रभुत्व। विक्रमादित्य की मृत्यु के बाद उसका राज्य १८ खण्डों में बंट गया और चीन, कामरूप, शक, बाह्लीक, तातार, रोमन, खुरज (कुर्द्द) ने आक्रमण किया। विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन ने उनको सिन्धु के पश्चिम खदेड़ कर उसे भारत की सीमा माना। शालिवाहन राज्य सिन्धुस्थान कहा गया। विक्रमादित्य का प्रभुत्व अरब तक था। भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड ३, अध्याय २-

 विक्रमादित्य पौत्रश्च पितृराज्यं गृहीतवान्। जित्वा शकान् दुराधर्षान् चीन तैत्तिरि देशजान्॥१८॥

बाह्लीकान् कामरूपांश्च रोमजान् खुरजान् शठान्। तेषां कोषान् गृहीत्वा च दण्डयोग्यानकारयत्॥१९॥

स्थापिता तेन मर्य्यादा म्लेच्छार्य्याणां पृथक् पृथक्। सिन्धुस्थानमिति ज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम्॥२०॥

म्लेच्छानां परं सिन्धोः कृतं तेन महात्मना। 

२. इराक का वैदिक उल्लेख-

वरुण की प्रजा को यादस (एक असुर जाति) कहते थे-यादसांपतिः अप्-पतिः (अमरकोष, १/१/५६)। यादस का ताज हुआ, ये अभी ताजिकिस्तान में बसे हैं। यहां प्रचलित ज्योतिष शास्त्र ताजिक था जो अभी केवल भारत में प्रचलित है। पश्चिम भाग में अप्-पति के नाम पर सम्मान के लिए अप्पा साहब या आप कहते हैं।

शिल्प शास्त्र के अनुसार विष्णु ने नगरों का निर्माण किया जिनको उरु कहते थे। बाद में वरुण ने इराक में भी वैसा ही उरु नगर बनाया। ऊर नगर इराक का सबसे पुराना नगर कहा जाता है, जहां के अब्राहम थे (बाइबिल जेनेसिस. अध्याय ११, १५, १६, १७, २१, २५)। 

शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग्वेद, १/९०/१)

उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)। 

उरु नगर की गोल रचना है जिसका केन्द्र भाग सबसे ऊंचा होगा तथा परिधि की तरफ जल का निकास होगा। उरु नगर दक्षिण भारत के पर्वतीय भागों में हैं-चित्तूर, नेल्लोर, बंगलूरु, मंगलूरु, तंजाउर आदि। ऊरु का विशिष्ट श्रीनगर है जो श्रीयन्त्र के ९ चक्रों जैसा होगा। अष्टा चक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)। यह मनुष्य शरीर, आकाश के विश्व तथा नगर के लिए भी है। श्रीयन्त्र के केन्द्रीय विन्दु के बाहर ८ चक्रों में नगर का निर्माण होता था, जो अयोध्या का स्वरूप थे। भारत मे ३ प्रसिद्ध नगर इस प्रकार के बने-कश्मीर, गढ़वाल के श्रीनगर, विजयनगर की राजधानी श्रीविद्यानगर। श्रीविद्यानगर का प्रारूप विद्यारण्य स्वामी ने बनाया था। इसका विजयनगर नाम बदलने पर कहा कि यह नगर ५०० वर्षों में नष्ट हो जायेगा। समतल भाग के लिये इन्द्र चौकोर पुर बनवाये जिनमें परस्पर लम्ब सड़कें थीं। चीन की राजधानी बीजिंग इसी प्रकार की थी। पर्वतीय भागों में मेरु नगर भी बने जो चौकोर पिरामिड की तरह थे, जैसे अजयमेरु। नदी के दोनों तरफ नगर बनाने पर वह वर्गाकार होता था जिसका कर्ण नदी थी और उसकी दिशा में जल निष्कासन होता था। इसे वज्र-नगर (ताश के डायमण्ड चिह्न की तरह) कहते थे।

वरुण की पूजा कर राजा हरिश्चन्द्र ने यशस्वी तथा दीर्घजीवी पुत्र का वरदान पाया। पुनः उसके बलिदान के लिए वरुण ने कहा। मार कर बलि देना दीर्घजीवी पुत्र के वर के विपरीत था। अतः यहां बलिदान का अर्थ था कि पहले स्वयं की उन्नति और उसके बाद देश की उन्नति के लिए अपना बलिदान करना। यहां बलिदान आत्महत्या नहीं है, अपनी पूरी शक्ति तथा साधन लगाना है। ऋक्, १/२४ सूक्त में शुनःशेप की कथा है, उसी में वरूण के ऊर नगर का भी उल्लेख है। उर के अब्राहम को भी वरदान में दीर्घजीवी इस्माइल पुत्र मिला था जिसका पुनर्जन्म पैगम्बर मुहम्मद को कहा जाता है। इस्माइल की बलि के बदले भेड़ या बकरे की बलि देना मूल कथा के विपरीत है। बकरीद का मूल अर्थ है गौ की पूजा। बकर = गौ, ईद = पूजा (ऋक्, १/१/१ में ईळे)।

३. महाभारत युग-

हरिवंश पुराण, विष्णु पर्व अध्याय ९१-९७ में इसकी विस्तृत कथा है। वहां वज्र-नगर का राजा वज्रनाभ असुर था। वज्र नगर अभी बसरा है, जो दजला नदी के किनारे है (प्राचीन सप्त गंगा में एक)। 

ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/१८)-ततो विसृज्यमानायाः स्रोतस्तत् सप्तधा गतम्। तिस्रः प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं तिस्र एव तु॥३९॥

नद्याः स्रोतस्तु गंगायाः प्रत्यपद्यत सप्तधा। नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः॥४०॥

सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च प्रतीचीं दिशमास्थिताः। सप्तमी त्वन्वगात्तासां दक्षिणेन भगीरथम्॥४१॥ 

पश्चिम की सीता-चक्षु के बीच ईराक था अतः अंग्रेजों ने इसे मेसोपोटामिया (दो नदियों के बीच का क्षेत्र) कहा।

वज्रनाभ की पुत्री प्रभावती से भगवान् कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने विवाह कर असुरों को पराजित किया। प्रद्युम्न, उनके भाई गद, साम्ब तथा इन्द्र पुत्र जयन्त के पुत्रों के बीच ४ भागों में विभाजित हुआ। पराजित हो कर असुर लोग षट्-नगर चले गये। यह षट्-कोण रहा होगा। अभी इसका नाम शट-अल-अरब है।

४. मध्य युग-अरब में इस्लाम का प्रभुत्व होने पर उनके प्रमुख खलीफा की राजधानी बगदाद बनी जिसे पश्चिमी भगदत्त का नगर कहा गया। पूर्वी भगदत्त चीन तथा असम का राजा था। दोनों का उल्लेख महाभारत, सभा पर्व में है। अध्याय १४ में उनको पश्चिम दिशा में यवनाधिपति तथा मुर और नरकदेश का शासन करने वाला कहा है-

मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः। अपर्यन्त बलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा॥१४॥

भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा। स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः॥१५॥

सभा पर्व, अध्याय २६ में भारत के पूर्वी भाग के राजा तथा चीन और समीपवर्ती द्वीपों का भी अधिपति और इन्द्र का मित्र कहा गया है-

शाकलद्वीपवासाश्च सप्तद्वीपेषु ये नृपाः। अर्जुनस्य च सैन्यैस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत्॥६॥

स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ। तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत्॥७॥

तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते। तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः॥८॥

स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत्। अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः॥९॥

खलीफा का भगदत्त (बगदाद) पर शासन होने के बाद भी बगदाद विश्वविद्यालय में संस्कृत की पढ़ाई जारी रही। ६२२ ई. में हिजरी सन् आरम्भ होने पर उसकी गणना का आधार ईपू का ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त (६२ ईपू, चाप शक ५५०, जो ६१२ ईपू से आरम्भ था) था। शालिवाहन शक ७८ से गणना करने पर इसका समय ६२८ ई होगा जो हिजरी आरम्भ होने के ६ वर्ष बाद का होगा। ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त का प्रयोग होने के कारण खलीफा अल मन्सूर ने इसका अरबी में अनुवाद कराया। नाम का अनुवाद हुआ अल-जबर (ब्रह्म) उल मुकाबला (स्फुट सिद्धान्त) इससे अलजबरा शब्द बना, जो इस पुस्तक का गणित भाग है।

ईराक के राजाओं के मन्त्री अग्निहोत्री ब्राह्मण ही होते थे जिनका अरबी में बरमक नाम हो गया। यह उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित मुस्तफा खान मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोष में बरमक शब्द के अर्थ में दिया है। बगदाद में अभी तक संस्कृत शिक्षा चल रही है। सद्दाम हुसेन की मृत्यु के बाद यह बन्द हुआ था।

✍🏻अरुण उपाध्याय

मंगलवार, 28 सितंबर 2021

प्राचीन इराक और भारत / ✍🏻अरुण उपाध्याय

 १. प्राचीन भारत-इराक भारतवर्ष का भाग था। भारत वर्ष का ३ अर्थों में प्रयोग हुआ है-

(१) लोक पद्म- उत्तरी गोलार्द्ध के नकशे के ४ भागों में एक। इनको भू-पद्म के ४ दल कहा गया है-

(विष्णु पुराण २/२)-भद्राश्वं पूर्वतो मेरोः केतुमालं च पश्चिमे। वर्षे द्वे तु मुनिश्रेष्ठ तयोर्मध्यमिलावृतः।२४।

भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा। पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः।४०।

यहां भारत-दल का अर्थ है विषुवत रेखा से उत्तरी ध्रुव तक, उज्जैन (७५०४३’ पूर्व) के दोनों तरफ ४५-४५ अंश पूर्व-पश्चिम। इसके पश्चिम में इसी प्रकार केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व तथा विपरीत दिशा में (उत्तर) कुरु, ९०-९० अंश देशान्तर में हैं। महाभारत, भीष्मपर्व (९/५-९) के अनुसार यह इन्द्र (१७५०० ईपू), पृथु (१७,१०० ईपू), वैवस्वत मनु (१३९०२ ईपू), इक्ष्वाकु तथा उनके वंशजों का क्षेत्र रहा है। 

विषुव से उत्तर ध्रुव तक इन्द्र के ३ लोक थे-भूलोक हिमालय तक, भुवः मंगोलिया तक, उसके बाद ध्रुव तक स्वः लोक।

३ कुरु थे। विषुव रेखा पर शून्य देशान्तर पर लंका था (लक्कादीव का दक्षिन भाग) इसके डूबने पर उज्जैन को शूण्य देशान्तर कहा गया था। कुरुक्षेत्र प्रायः इस रेखा पर था। इस रेखा पर सबसे उत्तर का नगर उत्तर कुरु था। यहां से देशान्तर अंश गिनती आरम्भ होती है अतः इसे ॐ नगर कहा गया (सिबिर या साइबेरिया की राजधानी ओम्स्क)। कुरुक्षेत्र की विपरीत दिशा में कुरु देश था (मेक्सिको, अमेरिका का पश्चिम भाग)। 

मान्धाता (७५०० ईपू) का प्रभुत्व पूरी पृथ्वी पर था, अतः उनके राज्य में सदा किसी स्थान पर सूर्य का उदय और अन्य किसी स्थान पर अस्त होता रहता था। विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय, २-

तदस्तु मान्धाता चक्रवर्ती सप्तद्वीपां महीं बुभुजे॥६३॥तत्रायं श्लोकः॥६५॥

यावत् सूर्य उदेत्यस्तं यावच्च प्रतितिष्ठति। सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते॥६५॥

इसकी नकल कर अंग्रेजों ने कहा कि ब्रिटिश राज्य में सूर्य का अस्त नहीं होता।

(२) भारत वर्ष- हिमालय को पूर्व पश्चिम में समुद्र तक फैलाया जाय तो उसके दक्षिण समुद्र तक भारतवर्ष था जिसके ९ खण्ड थे। यहां द्वीप या महाद्वीप का अर्थ केवल समुद्र से घिरा क्षेत्र नहीं है, यह पर्वत, नदी या मरुस्थल द्वारा प्राकृतिक विभाजन भी है। मत्स्य पुराण, अध्याय ११४-

अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः। भरणच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते।५।

निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम्। यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः।६।

न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौकर्मविधिः स्मृतः। भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान् निबोधत।७।

इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान्। नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः।८।

अयं तु नवमस्तेषं द्वीपः सागरसंवृतः। योजनानां सहस्रं तु द्वीपोऽयं दक्षिणोत्तरः।९।

आयतस्तुकुमारीतो गङायाः प्रवहावधिः।तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु।१०।

यस्त्वयं मानवो द्वीपस्तिर्यग् यामः प्रकीर्तितः। य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः।१५।

इनमें इन्द्रद्वीप इरावती नदी क्षेत्र है, जहां का ऐरावत इन्द्र का हाथी था( वायु पुराण, ३७/२५)। नागद्वीप अण्डमान निकोबार से सुमात्रा तक था। पश्चिम इण्डोनेसिया सेलेबीज तथा पूर्व भाग गभस्तिमान था। गभस्तिमान की एक नदी गभस्ति (न्यूगिनी में) को शक द्वीप ) आस्ट्रेलिया में भी कहा गया है। ताम्रपर्ण तमिलनाडु की ताम्रपर्णी नदी के निकट का सिंहल-लंका द्वीप थे। सौम्य तिब्बत भाग था। गान्धर्व द्वीप अफगानिस्तान, किर्गिज आदि थे। ईरान-ईराक को मैत्रावरुण कहा गया है। मित्र भाग ईरान तथा उसके उत्तर पश्चिम का कामभोज भाग भी था। वारुण द्वीप इराक-अरब था। इसकी पश्चिमी सीमा पर यम थे (यमन, अम्मान, मृत सागर)।

(३) कुमारिका खण्ड-वर्तमान भारत (नेपाल, बंगलादेश, पाकिस्तान सहित) कुमारिका खण्ड था जो अधोमुख त्रिकोण है, गंगा स्रोत तक उत्तर में चौड़ा होता गया है। अधोमुख त्रिकोण को शक्ति त्रिकोण कहते हैं। शक्ति का मूल स्वरूप कुमारी होने से यह कुमारिका खण्ड था। इसके दक्षिण अण्टार्कटिक (अनन्त द्वीप) तक का समुद्र भी कुमारिका खण्ड था जिसका वर्णन तमिल महाकाव्य शिलप्पाधिकारम् में है। 

उत्तर से देखने पर हिमालय अर्ध चन्द्राकार दीखता है जिसके केन्द्र में कैलास शिव का स्थान हैं। अतः शिव के सिर पर अर्ध चन्द्र रहता है जो अरब में भी आजकल पूजा जाता है। अतः ३ कारणों से चीन के लोग इसे इन्दु कहते थे (आज भी कहते हैं)। अर्ध चन्द्र (इन्दु) रूप हिमालय, चन्द्र की तरह शीतल, चन्द्र की तरह ज्ञान प्रकाश विश्व को देने वाला। हुएन्सांग की भारत यात्रा वर्णन में कहा है कि ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते हैं, जिससे इण्डिया हुआ है। 

विश्व का भरण पोषण करने के कारण यहां के मनु (अग्नि, अग्रि = अग्रवाल) या शासक को भरत तथा इस देश को भारत कहते थे (मत्स्य पुराण, ११४/५-६)। 

हिमालय द्वारा यह विभाजित होने से हिमवत् वर्ष या अरबी में हिमयार (अल बिरूनि-प्राचीन देशों की काल गणना) कहते थे। 

विश्व सभ्यता की नाभि या केन्द्र होने से यह अजनाभ वर्ष था। जम्बूद्वीप के राजा आग्नीध्र के पुत्र को नाभि कहा गया है जिनको भारत का राज्य मिला। विष्णु पुराण, खण्ड २, अध्याय १-

जम्बूद्वीपेश्वरो यस्तु आग्नीध्रो मुनिसत्तम॥१५॥

पित्रा दत्तं हिमाह्वं तु वर्षं नाभेस्तु दक्षिणम्॥१८॥

हिमाह्वयं तु वै वर्षं नाभेरासीन्महात्मनः। तस्यर्षभॊऽभवत् पुत्रो मेरुदेव्यां महाद्युतिः॥२७॥

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषु गीयते। भरताय यतः पित्रा दत्तं प्रातिष्ठिता वनम्॥३२॥

भारत मुख्यतः २ भागों में विभाजित था-सिन्धु से पूर्व वियतनाम, इण्डोनेसिया तक इन्द्र प्रभुत्व तथा सिन्धु से पश्चिम वरुण प्रभुत्व। विक्रमादित्य की मृत्यु के बाद उसका राज्य १८ खण्डों में बंट गया और चीन, कामरूप, शक, बाह्लीक, तातार, रोमन, खुरज (कुर्द्द) ने आक्रमण किया। विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन ने उनको सिन्धु के पश्चिम खदेड़ कर उसे भारत की सीमा माना। शालिवाहन राज्य सिन्धुस्थान कहा गया। विक्रमादित्य का प्रभुत्व अरब तक था। भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड ३, अध्याय २-

 विक्रमादित्य पौत्रश्च पितृराज्यं गृहीतवान्। जित्वा शकान् दुराधर्षान् चीन तैत्तिरि देशजान्॥१८॥

बाह्लीकान् कामरूपांश्च रोमजान् खुरजान् शठान्। तेषां कोषान् गृहीत्वा च दण्डयोग्यानकारयत्॥१९॥

स्थापिता तेन मर्य्यादा म्लेच्छार्य्याणां पृथक् पृथक्। सिन्धुस्थानमिति ज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम्॥२०॥

म्लेच्छानां परं सिन्धोः कृतं तेन महात्मना। 

२. इराक का वैदिक उल्लेख-

वरुण की प्रजा को यादस (एक असुर जाति) कहते थे-यादसांपतिः अप्-पतिः (अमरकोष, १/१/५६)। यादस का ताज हुआ, ये अभी ताजिकिस्तान में बसे हैं। यहां प्रचलित ज्योतिष शास्त्र ताजिक था जो अभी केवल भारत में प्रचलित है। पश्चिम भाग में अप्-पति के नाम पर सम्मान के लिए अप्पा साहब या आप कहते हैं।

शिल्प शास्त्र के अनुसार विष्णु ने नगरों का निर्माण किया जिनको उरु कहते थे। बाद में वरुण ने इराक में भी वैसा ही उरु नगर बनाया। ऊर नगर इराक का सबसे पुराना नगर कहा जाता है, जहां के अब्राहम थे (बाइबिल जेनेसिस. अध्याय ११, १५, १६, १७, २१, २५)। 

शं नो विष्णुरुरुक्रमः (ऋग्वेद, १/९०/१)

उरुं हि राजा वरुण श्चकार (ऋग्वेद, १/२४/८)। 

उरु नगर की गोल रचना है जिसका केन्द्र भाग सबसे ऊंचा होगा तथा परिधि की तरफ जल का निकास होगा। उरु नगर दक्षिण भारत के पर्वतीय भागों में हैं-चित्तूर, नेल्लोर, बंगलूरु, मंगलूरु, तंजाउर आदि। ऊरु का विशिष्ट श्रीनगर है जो श्रीयन्त्र के ९ चक्रों जैसा होगा। अष्टा चक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या (अथर्व, १०/२/३१)। यह मनुष्य शरीर, आकाश के विश्व तथा नगर के लिए भी है। श्रीयन्त्र के केन्द्रीय विन्दु के बाहर ८ चक्रों में नगर का निर्माण होता था, जो अयोध्या का स्वरूप थे। भारत मे ३ प्रसिद्ध नगर इस प्रकार के बने-कश्मीर, गढ़वाल के श्रीनगर, विजयनगर की राजधानी श्रीविद्यानगर। श्रीविद्यानगर का प्रारूप विद्यारण्य स्वामी ने बनाया था। इसका विजयनगर नाम बदलने पर कहा कि यह नगर ५०० वर्षों में नष्ट हो जायेगा। समतल भाग के लिये इन्द्र चौकोर पुर बनवाये जिनमें परस्पर लम्ब सड़कें थीं। चीन की राजधानी बीजिंग इसी प्रकार की थी। पर्वतीय भागों में मेरु नगर भी बने जो चौकोर पिरामिड की तरह थे, जैसे अजयमेरु। नदी के दोनों तरफ नगर बनाने पर वह वर्गाकार होता था जिसका कर्ण नदी थी और उसकी दिशा में जल निष्कासन होता था। इसे वज्र-नगर (ताश के डायमण्ड चिह्न की तरह) कहते थे।

वरुण की पूजा कर राजा हरिश्चन्द्र ने यशस्वी तथा दीर्घजीवी पुत्र का वरदान पाया। पुनः उसके बलिदान के लिए वरुण ने कहा। मार कर बलि देना दीर्घजीवी पुत्र के वर के विपरीत था। अतः यहां बलिदान का अर्थ था कि पहले स्वयं की उन्नति और उसके बाद देश की उन्नति के लिए अपना बलिदान करना। यहां बलिदान आत्महत्या नहीं है, अपनी पूरी शक्ति तथा साधन लगाना है। ऋक्, १/२४ सूक्त में शुनःशेप की कथा है, उसी में वरूण के ऊर नगर का भी उल्लेख है। उर के अब्राहम को भी वरदान में दीर्घजीवी इस्माइल पुत्र मिला था जिसका पुनर्जन्म पैगम्बर मुहम्मद को कहा जाता है। इस्माइल की बलि के बदले भेड़ या बकरे की बलि देना मूल कथा के विपरीत है। बकरीद का मूल अर्थ है गौ की पूजा। बकर = गौ, ईद = पूजा (ऋक्, १/१/१ में ईळे)।

३. महाभारत युग-

हरिवंश पुराण, विष्णु पर्व अध्याय ९१-९७ में इसकी विस्तृत कथा है। वहां वज्र-नगर का राजा वज्रनाभ असुर था। वज्र नगर अभी बसरा है, जो दजला नदी के किनारे है (प्राचीन सप्त गंगा में एक)। 

ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/१८)-ततो विसृज्यमानायाः स्रोतस्तत् सप्तधा गतम्। तिस्रः प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं तिस्र एव तु॥३९॥

नद्याः स्रोतस्तु गंगायाः प्रत्यपद्यत सप्तधा। नलिनी ह्लादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगाः॥४०॥

सीता चक्षुश्च सिन्धुश्च प्रतीचीं दिशमास्थिताः। सप्तमी त्वन्वगात्तासां दक्षिणेन भगीरथम्॥४१॥ 

पश्चिम की सीता-चक्षु के बीच ईराक था अतः अंग्रेजों ने इसे मेसोपोटामिया (दो नदियों के बीच का क्षेत्र) कहा।

वज्रनाभ की पुत्री प्रभावती से भगवान् कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने विवाह कर असुरों को पराजित किया। प्रद्युम्न, उनके भाई गद, साम्ब तथा इन्द्र पुत्र जयन्त के पुत्रों के बीच ४ भागों में विभाजित हुआ। पराजित हो कर असुर लोग षट्-नगर चले गये। यह षट्-कोण रहा होगा। अभी इसका नाम शट-अल-अरब है।

४. मध्य युग-अरब में इस्लाम का प्रभुत्व होने पर उनके प्रमुख खलीफा की राजधानी बगदाद बनी जिसे पश्चिमी भगदत्त का नगर कहा गया। पूर्वी भगदत्त चीन तथा असम का राजा था। दोनों का उल्लेख महाभारत, सभा पर्व में है। अध्याय १४ में उनको पश्चिम दिशा में यवनाधिपति तथा मुर और नरकदेश का शासन करने वाला कहा है-

मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः। अपर्यन्त बलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा॥१४॥

भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा। स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः॥१५॥

सभा पर्व, अध्याय २६ में भारत के पूर्वी भाग के राजा तथा चीन और समीपवर्ती द्वीपों का भी अधिपति और इन्द्र का मित्र कहा गया है-

शाकलद्वीपवासाश्च सप्तद्वीपेषु ये नृपाः। अर्जुनस्य च सैन्यैस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत्॥६॥

स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ। तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत्॥७॥

तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते। तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः॥८॥

स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत्। अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः॥९॥

खलीफा का भगदत्त (बगदाद) पर शासन होने के बाद भी बगदाद विश्वविद्यालय में संस्कृत की पढ़ाई जारी रही। ६२२ ई. में हिजरी सन् आरम्भ होने पर उसकी गणना का आधार ईपू का ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त (६२ ईपू, चाप शक ५५०, जो ६१२ ईपू से आरम्भ था) था। शालिवाहन शक ७८ से गणना करने पर इसका समय ६२८ ई होगा जो हिजरी आरम्भ होने के ६ वर्ष बाद का होगा। ब्राह्म-स्फुट-सिद्धान्त का प्रयोग होने के कारण खलीफा अल मन्सूर ने इसका अरबी में अनुवाद कराया। नाम का अनुवाद हुआ अल-जबर (ब्रह्म) उल मुकाबला (स्फुट सिद्धान्त) इससे अलजबरा शब्द बना, जो इस पुस्तक का गणित भाग है।

ईराक के राजाओं के मन्त्री अग्निहोत्री ब्राह्मण ही होते थे जिनका अरबी में बरमक नाम हो गया। यह उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित मुस्तफा खान मद्दाह के उर्दू-हिन्दी कोष में बरमक शब्द के अर्थ में दिया है। बगदाद में अभी तक संस्कृत शिक्षा चल रही है। सद्दाम हुसेन की मृत्यु के बाद यह बन्द हुआ था।

✍🏻अरुण उपाध्याय

सोमवार, 27 सितंबर 2021

भारत स्काउट एवं गाइड

 



भारत स्काउट एवं गाइड प्रार्थना

दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना .
हमारे ध्यान में आओ ,प्रभु आँखों में बस जाओ,
अँधेरे दिल में आकर के ,परम ज्योति जगा देना.
बहा दो प्रेम की गंगा,दिलो में प्रेम का सागर,
हमे आपस में मिलजुलकर प्रभु रहना सिखा देना.
हमारा कर्म हो सेवा,हमारा धर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा व सेवकचर बना देना.
वतन के वास्ते जीना,वतन के वास्ते मरना,
वतन पर जां फ़िदा करना प्रभु हमको सिखा देना.
दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना.

(प्रार्थना में लगने वाला समय – 90 सेकण्ड)
प्रार्थना के रचियता – श्री वीर देव वीर

स्काउट एवं गाइड झंडा गीत

भारत स्काउट गाइड झंडा ऊँचा सदा रहेगा,
ऊँचा सदा रहेगा झंडा ऊँचा सदा रहेगा.
नीला रंग गगन सा विस्तृत भात्र भाव फैलाता,
त्रिदल कमल नित तीन प्रतिज्ञाओं की याद दिलाता.
और चक्र कहता है प्रतिपल आगे कदम बढेगा,
ऊँचा सदा रहेगा झंडा ऊँचा सदा रहेगा.
भारत स्काउट गाइड झंडा ऊँचा सदा रहेगा.

(झंडा गीत में लगने वाला समय – 45 सेकण्ड)
भारत स्काउट एवं गाइड झंडा गीत के रचियता -श्री दयाशंकर भट्ट

भारत स्काउट एवं गाइड का इतिहास History of Scout and Guide

क्या आपको पता है स्काउट एवं गाइड आंदोलन वर्ष 1908 में ब्रिटेन में सर बेडेन पॉवेल द्वारा आरम्भ किया गया? धीरे-धीरे यह आंदोलन हर एक सुसंगठित राष्ट्र में फैलने लगा, जिसमे भारत भी शामिल था। 

भारत स्काउट एवं गाइड की शुरुआत वर्ष 1909 में हुई, तथा आगे चलकर भारत वर्ष 1938 में स्काउट आंदोलन के विश्व संगठन का सदस्य भी बना। वर्ष 1911 में भारत में गाइडिंग की शुरुआत हुई, तथा 1928 में स्थापित गर्ल गाइड्स तथा गर्ल स्काउट्स के विश्व संगठन में भारत ने एक संस्थापक सदस्य की भूमिका निभाई। 

भारतवासियों के लिए स्काउटिंग की शुरूआत न्यायाधीश विवियन बोस, पंडित मदन मोहन मालवीय, पंडित हृदयनाथ कुंजरू, गिरिजा शंकर बाजपेई, एनी बेसेंट तथा जॉर्ज अरुंडाले के प्रयासों से वर्ष 1913 में हुई। 

भारत में ‘भारत स्काउट एवं गाइड (बी.एस.जी.)’ राष्ट्रीय स्काउटिंग एवं गाइडिंग संगठन है। इसकी स्थापना 7 नवम्बर, 1950 को स्वतंत्र भारत में जवाहरलाल नेहरूमौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा मंगल दास पकवासा के द्वारा की गई।

इसमें ब्रिटिश भारत में मौजूद सभी स्काउट एवं गाइड संगठनों को सम्मिलित किया गया। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। इसके एक वर्ष पश्चात् 15 अगस्त, 1951 को आल इंडिया गर्ल गाइड्स एसोसिएशन को भी भारत स्काउट्स एंड गाइड्स संगठन में शामिल कर लिया गया।

विश्व स्काउट संगठन में वर्ष 1947 से 1949 तक अपने अहम योगदान के लिए विवियन बोस जी को विशेष तौर पर याद किया जाता है। वर्ष 1969 में विश्व स्काउटिंग में अद्वितीय सेवा के लिए श्रीमती लक्ष्मी मजूमदार को विश्व स्काउटिंग द्वारा ‘ब्रॉन्ज़-वोल्फ’ सम्मान से सम्मानित किया गया था।

भारत स्काउट एवं गाइड क्या है? What is Scout and Guide in Hindi?

स्काउट्स एवं गाइड्स एक स्वयंसेवी, गैर-राजनीतिक, शैक्षिक आंदोलन है, जो हर एक नव जवान को मानवता की सेवा करने का मौका प्रदान करता है, बिना किसी भी तरह के रंग, मूल अथवा जाति भेद के।

भारत स्काउट एवं गाइड अपने लक्ष्यों, सिद्धांतों एवं विधियों के आधार पर कार्य करताज है, जिन्हें इसके संस्थापक लार्ड बेडेन पॉवेल द्वारा 1907 में बनाया गया था।

भारत स्काउट एवं गाइड का उद्देश्य Aim of Scout and Guide in Hindi

स्काउट एवं गाइड का उद्देश्य नवयुवकों की पूर्ण शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक क्षमताओं का विकास करना है, जिससे कि वे एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी क्षमताओं के द्वारा स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर योगदान कर सकें।

भारत स्काउट एवं गाइड निम्न कुछ प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है –

  1. ईश्वर के प्रति कर्तव्य:- आध्यात्मिक नियमों का पालन करना, अपने धर्म के प्रति निष्ठावान रहना तथा अपने ईश्वर द्वारा प्रदत्त कर्तव्यों एवं ज़िम्मेदारियों को स्वीकार करना।
  2. अन्य लोगों के प्रति कर्तव्य:- अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठावान रहते हुए, स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति, समझ एवं आपसी सहयोग की प्रोत्साहित करना।
  3. स्वयं के प्रति कर्तव्य:- स्वयं के विकास की ज़िम्मेदारी को निभाना।

स्काउट एवं गाइड की विधियां Methods

भारत स्काउट एवं गाइड पद्धति प्रगतिशील स्वयं शिक्षा प्रणाली है, यद्यपि –

  • यह एक वचन तथा कानून भी है।
  • यह कर के सीखने में विश्वास रखता है।
  • किसी वयस्क के नेतृत्व में छोटे समूहों की सदस्यता।
  • प्रतिभागियों की रूचि के अनुसार विभिन्न प्रगतिशील एवं प्रेरणादायक कार्यक्रमों का आयोजन।

स्काउट एवं गाइड के नियम Laws of Scout and Guide

भारत स्काउट एवं गाइड के कुछ मुख्य कानून व नियम –

  • स्काउट / गाइड विश्वसनीय होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड वफादार होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड सबका/सबकी मित्र ओर प्रत्येक दुसरे स्काउट /गाइड का/की भाई/बहिन होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड विनम्र होता/होती है।
  • स्काउट/ गाइड पशु पक्षीयो का मित्र ओर प्रकृति – प्रेमी होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड अनुशासनशील होता/होती है ओर सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करने में सहायता करता / करती है ।
  • स्काउट/ गाइड साहसी होता/होती है ।
  • स्काउट/गाइड मितव्ययी होता/होती है।
  • स्काउट/गाइड मन,वचन,और कर्म से शुद्ध होता/होती है ।

भारत स्काउट एवं गाइड मोटो(सिद्धांत): “बी प्रिपेयर्ड (तैयार रहो)”

भारत स्काउट एवं गाइड के वचन

“अपने सम्मान को साक्षी बनाकर, मैं यह वचन देता हूँ कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करूंगा,
अपने ईश्वर तथा राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाने में,
अन्य व्यक्तियों की सहायता करने में तथा,
स्काउट नियमों का पालन करने में।”

भारत स्काउट एवं गाइड का ध्वज Flag of Scout and Guide

स्काउट के ध्वज में प्रतीक के रूप में चक्र है जिसमे 24 तीलियाँ है। इसे अशोक चक्र कहा जाता है, क्योंकि यह चक्र सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है। ध्वज के पार्श्व पर भगवा तथा हरा रंग होता है।

आमतौर पर “स्काउट्स एंड गाइड्स” शब्द में बालक तथा बालिकाओं दोनों को ही सम्मिलित किया जाता है। इसके अलावा इन्हें ” कब्स एंड बुलबुल” तथा ” रोवर्स एंड रेंजर्स” भी कहा जाता है। 

स्काउट एवं गाइड से कैसे जुड़ें? How Join Scouts and Guides?

स्काउट एवं गाइड ज्वाइन करने के लिए निम्न दो तरीके हैं-

  • अगर आप किसी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, तो आपको अपने विद्यालय के ऑफिस में सीधे जाकर उनसे कहना होगा कि आप भारत स्काउट एवं गाइड ज्वाइन करने के इच्छुक हैं तथा इसमें आपको शामिल किया जाये।
  • और अगर आप किसी विद्यालय में नही हैं, तो इसे ज्वाइन करने के लिए स्काउट्स के रेलवे डिवीज़न में जाकर उन्हें इस बारे में सूचित करना होगा। जिसके बाद वो आपको इसमें शामिल करने पर विचार- विमर्श तथा वार्ता करेंगे।
  • इसके अलावा एक सबसे अहम बात जो आपको पता होनी चाहिए कि आप भारत स्काउट एवं गाइड क्यों ज्वाइन करने के इच्छुक हैं? तथा हर वर्ष के अंत तक वे ऐसे कौन- कौन से लक्ष्य होंगे, जिन्हें आप हर हाल में पूरा करना चाहते हैं, एकल रूप से, तथा एक समूह के तौर पर??

भारत स्काउट एवं गाइड सर्टिफिकेट आपके करियर में क्या भूमिका निभा सकते हैं? How can scout and guide certificate help you with your career?

भारत स्काउट एवं गाइड में राष्ट्रपति तथा राज्य पुरस्कार सर्टिफिकेट से सीधे तौर पर जॉब की प्राप्ति नही हो सकती। परंतु ये सर्टिफिकेट आपके बायोडाटा के साथ संलग्न होने पर आपके जॉब पाने की सम्भावना को, बिना सर्टिफिकेट वाले लोगों से, कहीं अधिक बढ़ा देते हैं।

इंटरव्यू के वक़्त स्काउट गाइड प्रशिक्षण में मिले अनुभव आपको अपने प्रतिद्वंदियों से हमेशा दो कदम आगे रखते हैं। इसके अलावा भारतीय रेलवे में जॉब के लिए स्काउट्स/गाइड्स आरक्षण का भी प्रावधान है।

कुल मिलाकर आपको अपनी स्काउट/गाइड में मिले उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए। ये अनुभव प्रत्यक्ष रूप में तो न सही, परंतु अप्रत्यक्ष रूप में आपके आगामी जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल द्वारा हस्ताक्षरित तथा स्टाम्पड सर्टिफिकेट बहुत अधिक महत्ता रखते हैं।

आशा करते हैं आपको भारत स्काउट एवं गाइड की पूरी जानकारी Scout and Guide full detail in Hindi आपको पसंद आई होगी।

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