शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

बदलाव के स्वर्णीम दौर में है शिक्षा







बदलते पैटर्न को समझने से ही सफलता के द्वार खुलेंगे।


 डा. ममता शरण


मैं अकेला ही चला था जानिबें मंजिल मगर
लोग आते ही गए और कारवां बनता गया
अपनी बात शुरू करने से पहले मैं इस शेर को पढना ज्यादा जरूरी समझ कर ही सामने रख रही ङूं क्योंकि हर आदमी किसी भी मंजिल की टोह में अकेला ही चलता है। इस कॉलेज में भी  दर्जनों शहर के लोग है, जो यहां पर आकर ही एक फेमिली की तरह साल दो साल से पूरा दिन साथ रहते है।. सबकी चिंता और सबका टारगेट एक है। सब एक दूसरे के दोस्त होकर भी सबसे बड़े कंपीटीटर है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड है। मगर यह कोई महाभारत नहीं है कि जीत के लिए विनाश किया जाए। शिक्षा में परीक्षा में यही तो एक सार्थक पहल होता है जो एक दूसरों से आगे निकलने के लिए भी एक दूसरे की ही जरूरक और सहयोग की मांग करता है। आप सब एक मंजिल के यात्री है।. हो सकता है कि कोई पहले नौकरी पाए तो कोई थोडे समय के बाद मगर उस समय भी एक दूसरे के लिए ही मदद सहयोग और प्रयास करने की निर्लोभ इच्छा ही आप सबकी एकता और सार्थक जीजीविषा का संतोषजनक प्रतिफल होगा।

समय परिवर्तनशील है। समय के साथ साथ जमाना बदल रहा है। जमाने की हर चीज समयानुसार अपना रंग रूप आकार मिजाज बदल रहा है। बदलाव के इस स्थायी काल में जड़ता यानी बदलाव की बाते ना करना संभवत समय समाज और प्रकृति के नैसर्गिक स्वभाव चरित्र के खिलाफ है। समय के बदलते स्वभाव पर यदि हम बहुत पीछे अपने पूर्वजों और मानव सभ्यता तथा मानव के विकास तथा शारीरिक संरचना में हुए जैविक प्राकृतिक मानवीय बदलाव की तरफ नहीं झांक रहे है। उस ओर ताकना इस विषय के विस्तार को विषयांतरक भी करता है और इस सेमिनार के मुख्य प्रसंग को बाधित भी करता है। पिछले 15-17 साल यानी नयी सदी के इस केवल डेढ दशक के दौरान आए परिवर्तनों पर गौर करें तो संभवत हम अचंभित रह जाए। संचार क्रांति ने  तमाम संबंधों मानवीय गुणों रिश्ते नातों पर इतना गहरा झटका दिया कि केवल एक मोबाइल ने आदमी को आदमी से काट दिया।  मोबाइल ने संचार को की रेखा को अंतहीन बना दिया है।
यहां अभी तो पूरी तरह भारत में मोबाइल क्रांति का जब प्रवेश नहीं हुआ है तब यह हालत है। जरा विचार कीजिए कि मोबाइल के साथ ब्लॉगों की ब्लॉगिंग क्रांति और वेबसाईटों की जंग का तो भारत में अभी शैशवाकाल ही चल रहा है। अगले 15- 20 साल में जब मोबाइल की तरह ही हर दमी के पास अपना ब्लॉग हो या अपना वेबसाईट होगा या उस समय तक कोई और जियो जैसी बड़ी क्रांति के साथ कोई नया खिलौना, नयी तकनीक , नया अविष्कार या कोई नया अजूबा (जिस पर अभी कोई चर्चा नहीं की जा सकती) आ गया तो आदमी इनका बंधक होकर रह जाएगा। बदलाव की इस अजीबोगरीब कारनामें और भावी परिदृश्य को ज्यादा लंबोदर बना रही हूं। मगर अस अध्याय को लंबोदर बनाने का मेरा टारगेट अपनी बात को ज्यादा लंबा करना नहीं है।
मैं आपका ध्यान इस ओर लाना चाह रही हूं कि आज से 20-22 साल पहले की जिंदगी एकदम ब्लैकएंड व्हाईट और अंबेसडर कार की तरह 30-40 किलोमीटर की थकाउ उबाउ रफ्तार से ही चलती थी। लगभग 2000 तक हमारे पास ले देकर मनोरंजन या ज्ञान तथा सूचना के साधनों के नाम पर रेडियो और न्यूज पेपर ही होते थे। संवंधों को जिंदा रखने का एकमात्र साधन पोस्टकार्ड और पैसा भेजने का साधन मनीऑर्डर ही था।एक पोस्टमैन की मनमर्जी पर ही गांव देहात से लेकर महानगर के लोग भी डाकियों की मर्जी और मनमानी पर ही निर्भर थे। समय बदला मगर आज तक डाकघर नहीं बदला तो इसका अंजाम सामने है। कल तक गुलजार रहने वाले ज्यादातर डाकघर भूतबंगला बन गए। और डाकियों को मक्खी मारने का ही काम रह गया। बदलाव की आंधी ने संचार के तमाम पौराणिक साधनों को उखाड फेंका। हर आदमी के हाथ में मोबाइल है हर आदमी की पहुंच में सारा जमाना है। मोबाइल तो एक जादू समान है। 100-150 ग्राम के इस मोबाइल में इतने कारनामे भरे पड़े हैं कि इसके कमाल और पहुंच और चमत्कार को देखकर बंगाल के तमाम काले पीले हरे नीले लाल रंग के कपड़े पहनकर लोगों को चौंधियाने वाले सभी जादूगर भी इस मोबाइलची खिलौने के सामने पानी भरते है। मोबाइल क्या क्या कर सकता है और इसने जिंदगी और तमाम सुविधाओं को कितना आसान बना दिया है यह भी एक चमत्कार से कम नही है।
डाकघरों की तरह ही देश के 90 फीसदी टेलर्स यानी कपडा सिलाई करने वाले दर्जियों की भी हालत बेहद दयनीय हो गयी है। गांव देहात से लेकर शहरों महानगरों तक के 95 % पुरूषों ने दर्जी के यहां कपडे की सिलाई बंद कर दी। आधुनिकता के इस बेहद कंर्फोटेबल युग में एक दर्जी पैंट की जितनी सिलाई मांगता है , बाजार में उससे भी कम रेट में बना बनाया जींस या रेगुलर पैंट हाजिर है। सिले सिलाए हुए कपड़ों की बाजार में इस कदर भरमार है कि महानगर और शहरों की तो बातें ही छोड़ दीजिए दूर दराज के गांवों देहातों तक में हर उम्र के बच्चों युवा बुढ़ों के पास रंग बिरंगे शर्ट टी शर्टो और पैंटों की भरमार देखी जा सकती है। चेंजिंग मॉडर्न सोसाईटी एज में सलवार समीज और चुन्नी तो लगभग समाज से लापता ही हो गया है। और लगभग शत-प्रतिशत लड़कियों महिलाओं ने पैंट जींस शर्ट और टी शर्ट को ही अपना मेन ड्रेश बना लिया।
इस बदलाव से भी बडा बदलाव सामाजिक मानसिक और आर्थिक बदलाव के रूप में सामने आया है। फिएट अंबेसडर रिक्शा खटारा पैसेंजर बस रेडियों दूरदर्शन और लाउडस्पीकर के थकाउ उबाउ जमाने में जिंदगी ही थकी हारी सी थी। नौकरियौं के नाम पर केवल एक प्रतिशत शहरी बच्चे या शहर में जाकर पढ़ने वाले ही बच्चे आईएएस आईपीएस या डॉक्टरी इंजीनियरिंग के बारे में सोचते थे। 95 %  बच्चों की नौकरी का इकलौता सूत्र सरकारी पत्रिका रोजगार समाचार होता था, तो परीक्षा के नाम पर ले देकर केवल प्रतियोगिता दर्पण का जमाना था। उस समय के स्टूडेंटस नौकरी के नाम पर केवल सरकारी नौकरी को ही अपना अधिकार तथा पूरी सोसायटी सरकारी नौकरी को ही केवल नौकरी मानती थी।
मगर संचार क्रांति के इस ड़िजटिलिकरण ने  समाज की तमाम पौराणिक धारणा और सोच को ही तार तार सा कर दिया। पिछले डेढ दशक में ही जहां नौकरी की असीम संभावनाएं सामने प्रकट हुई हैं तो शिक्षा को लेकर भी अनंत द्वार खुले हैं। पहले शिक्षा का मतलब बगैर किसी योजना के समय काटने के लिए फालतू में बीए एमए की डिग्री हासिल करने का समय था तो खासकर लड़कियों के लिए तो शादी नहीं होने तक अक्षरों से हनीमून मनाते हुए शिक्षित होने का वक्त माना जाता था। लडकियों की नौकरी के लिए तो हजारों फेमिली में ही कोई दो चार लोग   ही अपनी कन्याओं को टारगेट के साथ शिक्षित कराते थे। मगर बदलते समय में आधी आबादी ने जब  शिक्षा और नौकरी को सर्वोच्च लक्ष्य माना तो ज्यादातर नौकरियों पर इनका ही कब्जा सा हो गया। खासकर अध्यापन सेक्टर में जो आमतौर पर आधी आबादी के लिए सबसे सेफ और सबसे नोबल जॉब माना जाता है में आधी आबादी ने लगभग पूरा कब्जा कर लिया है। सामाजिक बदलाव के सूत्रधार संचार क्रांति के जमाने में देश विदेश में नौकरियों का जाल बिछ गया है तो केवल मोबाइल कंप्यूटर के कारण घऱ बैठे दुनिया के किसी भी देश के किसी भी यूनीवर्सिटी, इंस्टीट्यूट, में दाखिले के लिए फॉर्म भरना एकदम सरल हो गया है। इन सुविधाओं ने जहां जिंदगी को आसान कर दिया है वही एक क्लिक या मोबाइल कंप्यूटर के बटन ने हर परिवार को चमत्कारी सुख प्रदान किया है।  
जब हमें नाना प्रकारेण तमाम जादूई सुविधाएं हासिल हो रही है तो यहां पर यही एक विचाणीय सवाल खडा होता है कि अखिरकार यह सब कैसे हासिल हुआ ??   जमाने के साथ हमसब कैसे बदल गए ? चाहे अनचाहे किस तरह एक अंगूठाटेक आदमी भी इन सुविधाओं के साथ डिजिटल हो गया ?  तो यह सब संभव हुआ है समय के साथ बदलती शिक्षा प्रणाली और रोजगार परक शिक्षा के साथ साथ शिक्षा की अनंत संभावनाओं के बीच अपनी जरूरतों के अनुसार शिक्षा चयन करने की आजादी से।
केवल 15-17 सालों में शिक्षा प्राप्त करने के तमाम दरवाजे खुल गए। संचार माध्यमों और टीवी के खबरिया चैनलों की अंधाधुंध मारा मारी में न्यूज और जानकारियों का संसार फैल गया। वही गूगल बाबा नामक एक जादूई खिलौना सबके पास है जिसके भीतर जानकारियों का पूरा संसार बसा है। गूगल ज्ञान का सागर नहीं है मगर सूचना और जानकारिय़ों का वह महासागर है। वही जस्ट डायल भी एक इसी तरह का साधन है जस्ट डायल यानी 8888888888 यानी दस बार आठ आठ। जेडी के नाम से विख्यात जस्ट डायल एक इतना अपना सुरक्षित गाईड है जो देश के किसी भी कोने में होटल से लेकर रेस्तरां  और कॉलेज ट्यूटर से लेकर पार्लर तक की जानकारी बस एक कॉल पर मुहैय्या करा देता है। ।
 यहां पर इन बातों का जिक्र करके मैं कोई नया ज्ञान नहीं दे रही हूं। आपको भी यह सब पता है। बदलते समय और ट्रेंड के बीच आपको भी बदलना होगा। पढाई के साधन बदल गए। आपकी जिंदगी में मोबाइल और कंप्यूटर अब विलासिता के नहीं परम आवश्यक जरूरत बन गया है। किताबों और कुंजियों को पढ़कर पास हो जाने और डिग्री लेकर खुश होने का जमाना भी खत्म हो गया है। सबसे बडा कंपीटिशन अब आपको अपने आप से देना है। दूसरों को तो झूठ बोलकर टरकाया जा सकता है मगर जैसे, कातिल आईना झूठ नहीं बोलता उसी प्रकार आदमी भी अपने आपसे झूठ बोलकर खुद को बरगला नहीं सकता।  

लगभग दो दशक तक अपने अध्यापन अनुभव के बाद मैं यहां पर आप तमाम काबिल छात्रों और कल के एक सुंदर भविष्य के लिए दिन रात मेहनत कर रहे तमाम छात्र छात्राओं से अपील करना चाहूंगी कि आप भी इस बदलते समय के पदचाप को सुनिए परखिए और उसके अनुसार ही खुद को बदलिए. केवल किताबी ज्ञान अब किसी को न किसी विषय में पारंगत बना सकता है और ना ही पूर्ण ज्ञान ही दे सकता है। आज शिक्षा  का विकास विस्तार भी किसी क्रांति से कम नहीं है। आपको पढाई का पैटर्न बदलना होगा. परीक्षा की शैली और प्रश्नावली में क्या नया ट्रेंड आ रहा है इसको गंभीरता के साथ विश्लेषण करना होगा। एक दशक पहले और आज के प्रश्नावली पैटर्न ही बदल चुका है। इस बदलाव को समझने की और समझकर खुद को उसके मुताबिक तैयारियों के पैटर्न को ढालने की आवश्यकता है। इस जमाने में लोग चांद तक चले गए मंगल ग्रह में पानी की खोज हो गयी और विज्ञान तो सूरज पर जाने की जिद में लगा है। यानी असंभव अब कुछ भी नहीं रहा. बाजार में पिछले 10 सालों के प्रश्नावली के क्वेश्चन बैंक एक किताब की तरह हाजिर है। पहले इस तरह की किताबें नहीं होती थी, मगर अब यह सुविधा हासिल है तो इस प्रश्नावली बैंक के तमाम प्रश्नों को देखे। उसमें आए बदलाव की आहट को परखे तथा हर सवाल के दिए गए उतर को परखे कि किस तरह सवाल तो वही है मगर जवाब देने का साल दर साल पैटर्न चेंज कर गया। तमाम सवालों के जवाब सिकुडते चले गए तो सवालों की संख्या लंबी हो गयी। पहले यानी 10-12 साल पहले 8-10 सवाल होते थे मगर आज सवालों की संख्या 20 से लेकर कहीं कहीं तो 40-50 तक हो गए है। मार्क सिस्टम भी बदला है। इन बदलावों के साथ कदमताल करने के लिए सभी स्टूडेंटस को भी अपनी तैयारी में योजना के अनुसार परिवर्तन लाना ही होगा।
जब आप बहुत सारे स्टूडेंटस यहां पर हैं तो कॉलेज की पढाई के अलावा आपलोग भी अपनी दो या तीन टीम बनाए. अपनी तैयारी करें और आपस में जब भी समय मिले तो अपनी तैयारियों खोजों या तमाम सवालों पर डिशकशंस (चर्चा) करे। सामूहिक तौर पर चर्चा करना और अपनी तैयारियों का मूल्यांकन करने से बेहतर कोई दूसरी स्टडी स्टाईल दुनिया में हो ही नहीं सकती। एक ही सवाल पर यदि 20-30 स्टूडेंटस मिलकर चर्चा करेंगे तो एक ही सवाल के इतने आयाम सामने आएंगे जो जीवन भर आपको अव्वल ही रखेगा। इसका सबसे बेहतर उदाहरण गया बिहार के धागा कातने काले जाति के बच्चों की है। आज से 10 साल पहले इन बच्चों ने केवल ग्रूप डिशकशंस  के आधार पर आईआईटी की परीक्षाओं में एक ही साथ सामूहिक तौर पर बाजी मारी। पटना के सुपर थर्टी में ज्यादातर गया के ही निर्धन बच्चे ही होते हैं।  गया के 150 से भी ज्यादा बच्चे आईआईटी करने के बाद अब अपना पैटर्न बदला है । हर लड़के ने एक एक दो लड़के को गोद लिया है और अब इनका मिशन आईएएस और आपीएस  सिविल परीक्षाओं में आने की है। आपलोग तो इन बच्चों की हालत से बहुत बेहतर है। यह कॉलेज भी आपलोगों के लिए आपके सुनहरे भविष्य के लिए एकदम सबसे जरूरी विषय पर सेमिनार  करा रहा है। यहां पर बहुत सारे लोग अपनी तरफ से अपने अनुभवों के आधार पर शिक्षा की बदलती जरूरतों पर विचार रखेंगे । जिसे ना केवल आप सुने और नोट करे । बाद में इन वक्ताओं के आलेख की आपस में चर्चा करे तथा तमाम बातों विचारों और नए नए टिप्स को अपनी सुविधा के अनुसार मूल्यांकन करके अपनी जरूरत के अनुसार काम में लाए। एक सेमिनार गुलदस्ते के समान होता है जिसमें नाना प्रकार के विद्वान एकत्रित होकर किसी एक दो विषय की समीक्षा करके अपनी राय जाहिर करते है। इसमें नए विचारों की खिड़की खुलती है। और आप तमाम स्टूडेंटस इन विचारों धारणाओं तथा टिप्पणियों का लाभ ले और उपयोगी बातों को अपनी जिंदगी और अपने कैरियर में शामिल करे।
अंत में मैं फिर एक शेर के साथ ही अपनी बात खत्म करना चाहूंगी  मशहूर शायर जनाब कैफी आजमी का एक नज्म है--
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात नींद नहीं आएगी
तुम उठो तुम उठो तुम उठो तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।।
हिन्दी के शायर दुष्यंत कुमार का भी एक बहुत मशहूर शेर है
कैसे आसमान में सूराख हो नहीं सकता ।
तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारो ।।

यहां पर इस कॉलेज के तमाम स्टूडेंटस  को मैं यही अपील करना चाहूंगी कि चाहे आसमान में सूराख करना हो या किसी दीवार में खिड़की खुलवानी हो शायरी में बहुत सरल लगता है, मगर हकीकत में इस तरह की लाईने आपको ताकत देती है। आपकी धारणा को और मजबूत करती है। आपके टारगेट के प्रति आपको और संजीदा बनाते हैं कि यदि कड़ी मेहनत पक्का इरादा और सार्थक पहल करते हैं तो दुनियां की कोई भी परीक्षा कोई भी टारगेट इतना विकराल नहीं है जिसको पाया ना जा सके। जमाना बहुत ग्लैमर का है । चारो तरफ चकाचौंध आकर्षण है मगर यह दो चार साल आपकी जी जान से मंजिल पाने तक लगे रहने का समय है । जिसको नहीं खोना है। यही दो तीन साल है कि जो मेहनत करेगा वहीं अगले 30-35 साल तक मौज भी करेगा।

डा. ममता शऱण (लेक्चरर),

7 टिप्‍पणियां:

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