गुरुवार, 27 नवंबर 2014

बिहार की नदियाँ"

कावेरी नदी



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मोना सिन्हा


(कावेरी से अनुप्रेषित)

पश्चिमी घाट में.
कावेरी कर्नाटक तथा उत्तरी तमिलनाडु में बहनेवाली एक सदानीरा नदी है। इसे दक्षिण की गंगा भी कहा जाता है। यह पश्चिमी घाट के पर्वत ब्रह्मगिरी से निकली है। इसकी लम्बाई प्रायः 805 किलोमीटर है। दक्षिण पूर्व में प्रवाहित होकर कावेरी नदी बंगाल की खाड़ी में मिली है। सिमसा, हिमावती,भवानी इसकी उपनदियाँ है। कावेरी नदी के किनारे बसा हुआ शहर तिरूचिरापल्ली हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। कावेरी नदी के डेल्टा पर अच्छी खेती होती है। इसके पानी को लेकर दोनो राज्यों में विवाद है। इस विवाद को लोग कावेरी जल विवाद कहते हैं। Augst muni ne lord shiva ki aradha ki aur lord shiva ne august muni ko vardan diya ki aap south me kavari nadi ki utapati kiliye. lord shiva ne muni ke kamandal me apane pratap se jal bhar jiya aur kaha ki muni ko app jaha bhi is jal ko rakhege ohi se kaveri ji ki janam hoga..."source Devo ke dev mahadev".


भारत की नदी प्रणालियाँ





प्रस्तुति-- ममता शरण, दीपा शरण


भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आर्विभाव हुआ। आज भी देश की सर्वाधिक जनसंख्या एवं कृषि का संकेन्द्रण नदी घाटी क्षेत्रों में पाया जाता है। प्राचीन काल में व्यापारिक एवं यातायात की सुविधा के कारण देश के अधिकांश नगर नदियों के किनारे ही विकसित हुए थे तथा आज भी देश के लगभग सभी धार्मिक स्थल किसी न किसी नदी से सम्बद्ध है।
नदियों के देश कहे जाने वाले भारत में मुख्यतः चार नदी प्रणालियाँ है (अपवाह तंत्र) हैं। उत्तरी भारत में सिंधु, मध्य भारत में गंगा, उत्तर-पूर्व भारत में ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली है। प्रायद्वीपीय भारत में नर्मदा कावेरी महानदी आदी नदियाँ विस्तृत नदी प्रणाली का निर्माण करती हैं।
भारत की नदियों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे :-
  • हिमालय से निकलने वाली नदियाँ
  • दक्षिण से निकलने वाली नदियाँ
  • तटवर्ती नदियाँ
  • अंतर्देशीय नालों से द्रोणी क्षेत्र की नदियाँ

भारत की नदियाँ

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बर्फ़ और ग्‍लेशियरों के पिघलने से बनी हैं अत: इनमें पूरे वर्ष के दौरान निरन्‍तर प्रवाह बना रहता है। मानसून के दौरान हिमालय क्षेत्र में बहुत अधिक वृष्टि होती है और नदियाँ बारिश पर निर्भर हैं अत: इसके आयतन में उतार चढ़ाव होता है। इनमें से कई अस्‍थायी होती हैं। तटवर्ती नदियाँ, विशेषकर पश्चिमी तट पर, लंबाई में छोटी होती हैं और उनका सीमित जलग्रहण क्षेत्र होता है। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी होती हैं। पश्चिमी राजस्थान के अंतर्देशीय नाला द्रोणी क्षेत्र की कुछ्‍ नदियाँ हैं। इनमें से अधिकांश अस्‍थायी प्रकृति की हैं। हिमाचल से निकलने वाली नदी की मुख्‍य प्रणाली सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदी की प्रणाली की तरह है।

सिंधु नदी

विश्‍व की महान, नदियों में एक है, तिब्बत में मानसरोवर के निकट से निकलती है और भारत से होकर बहती है और तत्‍पश्‍चात् पाकिस्तान से हो कर और अंतत: कराची के निकट अरब सागर में मिल जाती है। भारतीय क्षेत्र में बहने वाली इसकी सहायक नदियों में सतलुज (तिब्‍बत से निकलती है), व्‍यास, रावी, चिनाब और झेलम है।

गंगा

ब्रह्मपुत्र मेघना एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण प्रणाली है जिसका उप द्रोणी क्षेत्र भागीरथी और अलकनंदा में हैं, जो देवप्रयाग में मिलकर गंगा बन जाती है। यह उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, बिहार और प.बंगाल से होकर बहती है। राजमहल की पहाडियों के नीचे भागीरथी नदी, जो पुराने समय में मुख्‍य नदी हुआ करती थी, निकलती है जबकि पद्भा पूरब की ओर बहती है और बांग्लादेश में प्रवेश करती है। ब्रह्मपुत्र नदी विशव की सबसे लम्बी नदियाँ में से एक है। जिसकी लम्बाई २९०० किलोमीटर है। इस ऩदी का उद्गम स्थान मानसरोवर झील के निकट महान हिमनद (आंग्सी ग्लेसियर) से निकलती है। इसका अपवाह तंत्र देशों- तिब्बत (चीन), भारत तथा बंग्लादेश में फैला हुआ है। ब्रह्मपुत्र का अधिकतम् विस्तार तिब्बत (चीन) में है यहाँ इसे शांगपॊ (यारलुंग) नाम से जानी जाती है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत के अरूणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है और दिहांग नाम से जानी जाती है तथा गारो पहाडी के निकट गोवालपारा के पास बांग्लादेश में प्रवेश करती है और जमुना नाम से जानी जाती है। यहाँ ब्रह्मपुत्र में तिस्ता आदि नदियाँ मिलकर अन्त में पद्मा (गंगा) नदी में मिल जाती है। ब्रह्मपुत्र नदी में ही विश्व का सबसे बडा नदी द्वीप माजुली है जो संकटग्रस्त स्थिति में है इसे विश्वविरासत में सामिल कराने का प्रयास किया जा रहा है।
ब्रह्मपुत्र तिब्बत से निकलती है, जहाँ इसे सांग-पो कहा जाता है और भारत में अरुणाचल प्रदेश तक प्रवेश करने तथा यह काफ़ी लंबी दूरी तय करती है, यहाँ इसे दिहांग कहा जाता है। पासी घाट के निकट देबांग और लोहित ब्रह्मपुत्र नदी से मिल जाती है और यह संयुक्‍त नदी पूरे असम से होकर एक संकीर्ण घाटी में बहती है। यह घुबरी के अनुप्रवाह में बांग्लादेश में प्रवेश करती है।

सहायक नदियाँ

यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानदी और सोन; गंगा की महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ है। चंबल और बेतवा महत्‍वपूर्ण उप सहायक नदियाँ हैं जो गंगा से मिलने से पहले यमुना में मिल जाती हैं। पद्मा और ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश में मिलती है और पद्मा अथवा गंगा के रूप में बहती रहती है। भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ सुबसिरी, जिया भरेली, घनसिरी, पुथिभारी, पागलादिया और मानस हैं। बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र तिस्‍त आदि के प्रवाह में मिल जाती है और अंतत: गंगा में मिल जाती है। मेघना की मुख्‍य नदी बराक नदी मणिपुर की पहाडियों में से निकलती है। इसकी महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ मक्‍कू, ट्रांग, तुईवई, जिरी, सोनई, रुक्‍वी, कचरवल, घालरेवरी, लांगाचिनी, महुवा और जातिंगा हैं। बराक नदी बांग्‍लादेश में भैरव बाज़ार के निकट गंगा-‍ब्रह्मपुत्र के मिलने तक बहती रहती है।

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ का अपवाह प्रतिरूप

भौतिक दृष्टि से देश में प्रायद्धीपेत्तर तथा प्रायद्धीपीय नदी प्रणालियों का विकास हुआ है, जिन्हे क्रमशः हिमालय की नदियाँ एवं दक्षिण के पठार की नदियाँ के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। हिमालय अथवा उत्तर भारत की नदियों द्वारा निम्नलिखित प्रकार के अपवाह प्रतिरूप विकसित किये गये हैं।

पूर्वीवर्ती अपवाह

इस प्रकार का अपवाह तब विकसित होता है, जब कोई नदी अपने मार्ग में आने वाली भौतिक बाधाओं को काटते हुए अपनी पुरानी घाटी में ही प्रवाहित होती है। इस अपवाह प्रतिरूप की नदियों द्वारा सरित अपहरण का भी उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। हिमालय से निकलने वाली सिन्धु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र, भागीरथी, तिस्ता आदि नदियाँ पूर्ववर्ती अपवाह प्रतिरूप का निर्माण करती हैं।

क्रमहीन अपवाह

जब कोई नदी अपनी प्रमुख शाखा से विपरीत दिशा से आकर मिलती है तब क्रमहीन या अक्रमवर्ती अपवाह प्रतिरूप का विकास हो जाता है। ब्रह्मपुत्र में मिलने वाली सहायक नदियाँ - दिहांग, दिवांग तथा लोहित इसी प्रकार का अपवाह बनाती है।

खण्डित अपवाह

उत्तर भारत के विशाल मैदान में पहुंचने के पूर्व भाबर क्षेत्र में विलीन हो जाने वाली नदियाँ खण्डित या विलुप्त अपवाह का निर्माण करती हैं।

मालाकार अपवाह

देश की अधिकांश नदियाँ समुद्र में मिलने के पूर्व अनेक शाखाओं में विभाजित होकर डेल्टा बनाती हैं, जिससे गुम्फित या मालाकार अपवाह का निर्माण होता है।

अन्तस्थलीय अपवाह

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र

समानान्तर अपवाह

उत्तर के विशाल मैदान में पहुंचने वाली पर्वतीय नदियों द्वारा समानान्तर अपवाह प्रतिरूप विकसित किया गया है।

आयताकार अपवाह

उत्तर भारत के कोसी तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा आयताकार अपवाह प्रतिरूप का विकास किया गया है।

दक्षिण क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ

दक्‍कन क्षेत्र में अधिकांश नदी प्रणालियाँ सामान्‍यत पूर्व दिशा में बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं। गोदावरी, कृष्‍णा, कावेरी, महानदी, आदि पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं और नर्मदा, ताप्‍ती पश्चिम की बहने वाली प्रमुख नदियाँ है। दक्षिणी प्रायद्वीप में गोदावरी दूसरी सबसे बड़ी नदी का द्रोणी क्षेत्र है जो भारत के क्षेत्र का दस प्रतिशत भाग है। इसके बाद कृष्‍णा नदी के द्रोणी क्षेत्र का स्‍थान है जबकि महानदी का तीसरा स्‍थान है। डेक्‍कन के ऊपरी भूभाग में नर्मदा का द्रोणी क्षेत्र है, यह अरब सागर की ओर बहती है, बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं दक्षिण में कावेरी के समान आकार की है और परन्‍तु इसकी विशेषताएँ और बनावट अलग है।j

दक्षिण क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ का अपवाह प्रतिरूप

दक्षिण भारत अथवा प्रायद्वीपीय पठारी भाग पर प्रवाहित होने वाली नदियों द्वारा भी विभिन्न प्रकार के अपवाह प्रतिरूप विकसित किये गये हैं। जिनका विवरण निम्नलिखित हैं।

अनुगामी अपवाह

जब कोई नदी धरातलीय ढाल की दिशा में प्रवाहित होती है तब अनुगामी अपवाह का निर्माण होता है। दक्षिण भारत की अधिकांश नदियों का उद्भाव पश्चिमी घाट पर्वत माला में हैं तथा वे ढाल के अनुसार प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी अथवा अरब सागर में गिरती हैं और अनुगामी अपवाह का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

परवर्ती अपवाह

जब नदियाँ अपनी मुख्य नदी में ढाल का अनुसरण करते हुए समकोण पर आकर मिलती हैं, तब परवर्ती अपवाह निर्मित होता है। दक्षिण प्रायद्वीप के उत्तरी भाग से निकलकर गंगा तथा यमुना नदियों में मिलने वाली नदियाँ - चम्बल, केन, काली, सिन्ध, बेतवा आदि द्वारा परवर्ती अपवाह प्रतिरूप विकसित किया गया है।

आयताकार अपवाह

विन्ध्य चट्टानों वाले प्रायद्वीपीय क्षेत्र में नदियों ने आयताकार अपवाह प्रतिरूप का निर्माण किया है, क्योंकि ये मुख्य नदी में मिलते समय चट्टानी संधियों से होकर प्रवाहित होती हैं तथा समकोण पर आकर मिलती है।

जालीनुमा अपवाह

जब नदियाँ पूर्णतः ढाल का अनुसरण करते हुए प्रवाहित होती है तथा ढाल में परिवर्तन के अनुसार उनके मार्ग में भी परिवर्तन हो जाता है, जब जालीनुमा अथवा ‘स्वभावोद्भूत’ अपवाह प्रणाली का विकास होता है। पूर्वी सिंहभूमि के प्राचीन वलित पर्वतीय क्षेत्र में इस प्रणाली का विकास हुआ है।

अरीय अपवाह

इसे अपकेन्द्रीय अपवाह भी कहा जाता है। इसमें नदियाँ एक स्थान से निकलकर चारों दिशाओं में प्रवाहित कहा जाता है। इसमें नदियाँ एक स्थानसे निकलकर चारों दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। दक्षिण भारत में अमरकण्टक पर्वत से निकलने वाली नर्मदा, सोन तथा महानदी आदि ने अरीय अपवाह का निर्माण किया गया है।

पादपाकार अथवा वृक्षाकांर अपवाह

जब नदियाँ सपाट तथा चौरस धरातल पर प्रवाहित होते हुए एक मुख्य नदी की धारा में मिलती हैं, तब इस प्रणाली का विकास होता है। दक्षिण भारत की अधिकांश नदियों द्वारा पादपाकार अपवाह का निर्माण किया गया है।

समानान्तर अपवाह

पश्चिमी घाट पहाड़ से निकलकर पश्चिम दिशा में तीव्र गति से बढ़कर अरब सागर में गिरने वली नदियों द्वारा समानान्तर अपवाह का निर्माण किया गया है।

तटवर्ती नदियाँ

भारत में कई प्रकार की तटवर्ती नदियाँ हैं जो अपेक्षाकृत छोटी हैं। ऐसी नदियों में काफ़ी कम नदियाँ-पूर्वी तट के डेल्‍टा के निकट समुद्र में मिलती है, जबकि पश्चिम तट पर ऐसी 600 नदियाँ है। राजस्थान में ऐसी कुछ नदियाँ है जो समुद्र में नहीं मिलती हैं। ये खारे झीलों में मिल जाती है और रेत में समाप्‍त हो जाती हैं जिसकी समुद्र में कोई निकासी नहीं होती है। इसके अतिरिक्‍त कुछ मरुस्‍थल की नदियाँ होती है जो कुछ दूरी तक बहती हैं और मरुस्‍थल में लुप्‍त हो जाती है। ऐसी नदियों में लुनी और मच्‍छ, स्‍पेन, सरस्‍वती, बानस और घग्‍गर जैसी अन्‍य नदियाँ हैं।

भारत में बाढ़ प्रभावित क्षेत्र

भारत की प्रमुख नदियाँ

देखें भारत के नदियों की सूची

बाहरी कडियाँ

भारत की प्रमुख नदियाँ






प्रस्तुति-- स्वामी शरण, सृष्टिशरण

 

 

भारत की नदियों का देश के आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में प्राचीनकाल से ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। सिन्धु तथा गंगा नदियों की घाटियों में ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताओं - सिन्धु घाटी तथा आर्य सभ्यता का आर्विभाव हुआ। आज भी देश की सर्वाधिक जनसंख्या एवं कृषि का जमाव नदी घाटी क्षेत्रों में पाया जाता है। प्राचीन काल में व्यापारिक एवं यातायात की सुविधा के कारण देश के अधिकांश नगर नदियों के किनारे ही विकसित हुए थे तथा आज भी देश के लगभग सभी धार्मिक स्थल किसी न किसी नदी से सम्बद्ध है।

भारत की नदियों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है जैसे :- (1) हिमालय से निकलने वाली नदियाँ
(2) दक्षिण से निकलने वाली नदियाँ
(3) तटवर्ती नदियाँ
(4) अंतर्देशीय नालों से द्रोणी क्षेत्र की नदियाँ

सिंधु नदी सिन्धु नदी संसार की प्रमुख नदियों में से एक है। तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा सिन्धु नदी का उद्गम स्थल है। इस नदी की लंबाई प्रायः 3,200 किलोमीटर है। यहाँ से यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती है। नंगा पर्वत के उत्तरी भाग से घूम कर यह दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीच से गुजरती है और फिर जाकर अरब सागर में मिलती है।

गंगा भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा, उत्तर भारत के मैदानों की विशाल नदी है। गंगा भारत और बांग्लादेश में मिलकर 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में भारत के लगभग एक-चौथाई भू-क्षेत्र को अपवाहित करती है तथा अपने बेसिन में बसे विराट जनसमुदाय के जीवन का आधार बनती है। जिस गंगा के मैदान से होकर यह प्रवाहित होती है, वह इस क्षेत्र का हृदय स्थल है, जिसे हिन्दुस्तान कहते हैं। गंगा नदी को उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था का मेरुदण्ड भी कहा गया है। यहाँ तीसरी सदी में अशोक महान के साम्राज्य से लेकर 16वीं सदी में स्थापित मुग़ल साम्राज्य तक सारी सभ्यताएँ विकसित हुईं। गंगा नदी अपना अधिकांश सफ़र भारतीय इलाक़े में ही तय करती है, लेकिन उसके विशाल डेल्टा क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश में है। गंगा के प्रवाह की सामान्यत: दिशा उत्तर-पश्चिमोत्तर से दक्षिण-पूर्व की तरफ है और डेल्टा क्षेत्र में प्रवाह आमतौर से दक्षिण मुखी है।

ब्रह्मपुत्र ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय में अपने उद्गम से लगभग 2,900 किमी बहकर यमुना के नाम से दक्षिण में बहती हुई गंगा नदी की मूल शाखा पद्मा के साथ मिलती है और बाद में दोनों का मिश्रित जल बंगाल की खाड़ी में गिरता है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत के दक्षिण में मानसरोवर के निकट चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है। अपने मार्ग में यह चीन के स्वशासी क्षेत्र तिब्बत, भारतीय राज्यों, अरुणाचल प्रदेश व असम और बांग्लादेश से होकर बहती है। अपनी लंबाई के अधिकतर हिस्से में नदी महत्त्वपूर्ण आंतरिक जलमार्ग का कार्य करती है; फिर भी तिब्बत के पहाड़ों और भारत के मैदानी इलाक़ों में यह नौका चालक के योग्य नहीं है। अपने निचले मार्ग में यह नदी सृजन और विनाश, दोनों ही करती है। साथ ही यह बड़ी मात्रा में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी जमा करती है। परंतु अक्सर विनाशकारी बाढ़ लाने वाली सिद्ध होती है।

सहायक नदियाँ यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानदी, और सोन; गंगा की महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ है। चंबल और बेतवा महत्‍वपूर्ण उप सहायक नदियाँ हैं जो गंगा से मिलने से पहले यमुना में मिल जाती हैं। पद्मा और ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश में मिलती है और पद्मा अथवा गंगा के रूप में बहती रहती है। भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ सुबसिरी, जिया भरेली, घनसिरी, पुथिभारी, पागलादिया और मानस हैं। बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र तिस्‍त आदि के प्रवाह में मिल जाती है और अंतत: गंगा में मिल जाती है। मेघना की मुख्‍य नदी बराक नदी मणिपुर की पहाडियों में से निकलती है। इसकी महत्‍वपूर्ण सहायक नदियाँ मक्‍कू, ट्रांग, तुईवई, जिरी, सोनई, रुक्‍वी, कचरवल, घालरेवरी, लांगाचिनी, महुवा और जातिंगा हैं। बराक नदी बांग्‍लादेश में भैरव बाज़ार के निकट गंगा-‍ब्रह्मपुत्र के मिलने तक बहती रहती है।

दक्षिण क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ दक्‍कन क्षेत्र में अधिकांश नदी प्रणालियाँ सामान्‍यत पूर्व दिशा में बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं।
गोदावरी, कृष्‍णा, कावेरी, महानदी, आदि पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं और नर्मदा, ताप्‍ती पश्चिम की बहने वाली प्रमुख नदियाँ है। दक्षिणी प्रायद्वीप में गोदावरी दूसरी सबसे बड़ी नदी का द्रोणी क्षेत्र है जो भारत के क्षेत्र 10 प्रतिशत भाग है। इसके बाद कृष्‍णा नदी के द्रोणी क्षेत्र का स्‍थान है जबकि महानदी का तीसरा स्‍थान है। डेक्‍कन के ऊपरी भूभाग में नर्मदा का द्रोणी क्षेत्र है, यह अरब सागर की ओर बहती है, बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं दक्षिण में कावेरी के समान आकार की है और परन्‍तु इसकी विशेषताएँ और बनावट अलग है।

भारत की प्रमुख नदियों की सूची
सिन्धु नदी
नदी सिन्धु नदी
लम्बाई (कि.मी.) 2,880 (709)
उद्गम स्थान मानसरोवर झील के निकट (तिब्बत)
सहायक नदियाँ सतलुज, व्यास, झेलम, चिनाब, रावी, शिंगार, गिलगित, श्योक
प्रवाह क्षेत्र (सम्बन्धित राज्य) जम्मू और कश्मीर, लेह

झेलम नदी
नदी झेलम नदी
लम्बाई (कि.मी.) 720
उद्गम स्थान शेषनाग झील, जम्मू-कश्मीर
सहायक नदियाँ किशन, गंगा, पुँछ, लिदार, करेवाल, सिंध
प्रवाह क्षेत्र (सम्बन्धित राज्य) जम्मू-कश्मीर, कश्मीर

बुधवार, 26 नवंबर 2014

अंडमान के निवासी मोपला






प्रस्तुति-- रत्नेश्वर, मोना सिन्हा
बंगलौर

वैसे तो अण्डेमान में बसे हुए लोग भारत के प्रत्येक कोने से सबन्धित हैं और आज वे सब के सब अण्डेमान की अपनी हिन्दी बोली बोलते हैं। जिन लोगों ने अण्डेमान की औपनिवेशिक बस्ती को बसाया है उनमें से कुछ का उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है -

मालाबार के मोपला

अण्डेमान में लगभग १,१३३ मोपला निष्कासित किए गए। इनमें से २२८ बन्दियों को कृषि कार्य करने के निकट दिए गए थे। ये लोग अपने साथ बीबी बच्चों और अन्य सम्बन्धियों को भी अण्डेमान ले आए और तब इनकी संख्या ४६८ हो गई परन्तु बाद में मोपला लोगों को अपनी बीबियों और सम्बन्धियों को लाने से मना कर दिया गया।
मोपला लोग केरल में कालीकट के समीप मालाबार तट के निवासी हैं। यह क्षेत्र कालीमिर्च के व्यापार का प्रसिद्ध केन्द्र है। नवीं शताब्दी में कुछ मुसलमान सौदागर अरब से आकर मालाबार में रहने लगे और स्थानीय हिन्दू द्रविड़ महिलाओं से विवाह कर लिया। ऐसे दम्पति के वशंज, मोपला कहे जाने लगे। ये लोग हिन्दू राजा को कर अदा करते थे, परन्तु पक्के सुन्नी मुसलमान थे। वे तुर्किस्तान के खलीफा को अपना धर्म गुरू मानते थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने तुर्किस्तान के सुलतान के पक्ष में "खिलफत का आन्दोलन" छेड़ा तो मोपला भी अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। बड़ी संख्या में मोपला आन्दोलनकारियों ने सरकारी थानों पर धरना देना शुरु कर दिया। वे हिन्दू जमीदारों को कर देते थे और इस आन्दोलन ने कुछ सीमा तक साम्प्रदायिक रूप भी ले लिया। ब्रिटिश सरकार मोपला नेताओं को पकड़ने में असफल रही। प्राय: हजारों मोपला आन्दोलनकारी सरकारी अधिकारिओं के निवास-स्थानों, रेलवे स्टेशनों, डाकखानों, शराब की दुकानों तथा अन्य स्थानों पर हमला करने लगे थे। इस लोगों ने मुहम्मद हाजी को `खिलाफत बादशाह' की उपाधि दे दी। हिन्दुओं को काफिर घोषित करके उनके घरों को लूटा जाने लगा। अनेक हिन्दू-महिला-पुरुषों का जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कर दिया गया। २५ जुलाई १९२१ को पुलिस और ५००० मोपला आन्दोलनकारियों की भिड़न्त में एक ब्रिटिश फौजी अधिकारी और एक पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी गई। फौज के दो अधिकारी और कई जवान मारे गए। एक रेलवे स्टेशन में आग लगाकर रेलवे लाइन तोड़ दी गई। आंतक के इस वातावरण को समाप्त करने के लिए गोरखे, गढ़वाली और बर्मी फौजियों को आना पड। अकेले पंडिक्का थाने पर संघर्ष में २१६ मोपला विद्रोही मारे गए और एक अंग्रेज अफसर तथा आठ सिपाही और दो गोरखा अधिकारी तथा २७ अन्य सैनिक मारे गए।
मोहम्मद हाजी और उसके २१ साथियों को पकड़ कर कोर्ट मार्शल के बाद गोली से उड़ा दिया गया। इस संघर्ष में २,२६६ मोपला मारे गए और १,६१५ घायल हुए तथा ५,६८८ को गिरफ्तार कर लिया गया। कुल मिलाकर ३८,२५६ मोपला विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों द्वारा बदले की कार्यवाही में कलकत्ते की कालकोठरी वाली घटना को फिर से दोहराया गया। कासलीकट से मद्रास जाने वाली एक मालगाड़ी के डब्बे में १०० मोपला बन्द कर दिए गए थे। भीषण गर्मी में मद्रास पहुंचने पर जब मालगाड़ी का डब्बा खोला गया तो ६६ मोपला मर चुके थे और शेष की दशा गम्भीर थी।
जिन मोपला आन्दोलनकारियों ने आत्मसमर्पण किया था या जिन्हें गिरफ्तार किया गया उन्हीं में से अनेक कालेपानी का दण्ड पाकर अण्डमान आए थे। आजकल, मन्नारघाट और विम्बर्लीगंज आदि क्षेत्रों में मोपला परिवारों के वंशज रहते हैं। ये लोग मलयालम के साथ-साथ हिन्दी भाषा भी बोलते हैं। एंग्लो-इंडियन—भारतीय केन्द्रीय विधान सभा के एक एंग्लो-इंडियन सदस्य ले। कर्नलन सर हेनरी सिडनी चाहते थे कि भारत सरकार अण्डेमान में एक पृथक एंग्लों इंडियन प्रदेश बनाए। कुछ एंग्लों-इंडियन परिवार अण्डेमान में बसने के इरादे से आए। परन्तु वे शहरी जीवन के आदी थे और अण्डेमान की परिस्थितियाँ उन्हें रास नहीं आई। जार्ज़ डाकर्टी नामक एक एंग्लों-इंडियन ने एक करेन महिला से शादी कर ली और वे मध्य अण्डेमान के वेबी नामक गांव में बस गए। श्री डाकर्टी को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानियों ने बन्दी बना लिया था।

भाथू

उत्तर प्रदेश मुरादाबाद और अन्य पश्चिमी जेलों में सुलताना डाकू बहुत कुख्यात था। सुलताना डाकू और उसके अनुयायी भाथू लोग एक अपराधी जनजाति से सम्बन्धित थे। सुलतान डाकू का आंतक मिटाने के लिए उच्च अंग्रेज अधिकारी, पुलिस व फौज की सहायता से सफल हो सके। सुलताना डाकू की पत्नी और उसकी जाति के अनेक लोगों को अण्डेमान में निर्वासित कर दिया गया। ये लोग पोर्ट ब्लेयर के निकट भाथू बस्ती, फरार गंज और कैडलगंज के ग्रामों में आबाद हैं। आजकल इस जाति के अनेक युवक युवतियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त करके डॉक्टर और इंजिनियर जैसे पदों पर पदासीन हैं।

करेन

बर्मा और भारतवर्ष के सीमा क्षेत्र में करेन जन-जाति के लोग प्राय: उपद्रव मचाया करते थे--ब्रिटिश राज के दिनों में इनमें से अनेक लोगों को अण्डेमान में निर्वासित कर दिया गया। जब बर्मा को स्वतन्त्रता मिली तो इनमें से अनेक लोग अपने देश बर्मा पहुंच गये। मध्य अण्डेमान में माया बन्दर से लगभग ९ किलोमीटर की दूरी पर करेन लोगों की बस्ती है। बेबी नामक इस गांव में करेन लोगों के कई गिरजाघर हैं। गिरजागर में बच्चों के लिये एक ईसाई मिशन द्वारा स्थापित एक विद्यालय भी चलता है। इस बच्चों को करेन बोली के साथ-साथ अंग्रेजी, हिन्दी और धार्मिक शिक्षा का ज्ञान दिया जाता है।
करेन लोग गोरे रंग के होते हैं--इनका मुंह गोल, नाक चपटी और कद नाटा होता है। ये शिकार के शौकीन, मेहनती और बड़े हट्टे-कट्टे होते हैं। स्त्री और पुरुष सभी लुंगी पहनते हैं। यह खुशी की बात है कि करेन लोग अपने पड़ोस की बस्तियों जैसे, लखनऊ, लटाव, रामपुर, दानापुर और पोखाडेरा में रहने वाले बंगालियों और अन्य भाषा-भाषियों के साथ हिन्दी में बातचीत करते हैं। बच्चों को विद्यालय में करेन, हिन्दी और अंग्रेजी के गीत आदि सिखाये जाते हैं।

बर्मी लोग

पहले बर्मा भी भारत का एक अंग था। भारत के वाइसराय के अधीन एक उपराज्यपाल बर्मा प्रान्त का शासन देखता था। जिन लोगों को आजीवन कारावास का दण्ड दिया जाता था, उन्हें भी बर्मा से इन द्वीपों में भेज दिया जाता था। शुरू में आजीवन कारावास में भेजे जाने वालों की संख्या कम थी। परन्तु थारवर्दी विद्रोह के बाद ५३५ लोग एक साथ आजीवन कारावास के लिए अण्डेमान भेजे गए और उसी दिन चौबीस फरवरी, उन्नीस सौ पैंतीस को थारवर्दी विद्रोहियों को मृत्यु दण्ड दे दिया गया। सन् १९४२ ई। में जब द्वीपों पर जापानियों ने कब्जा किया तो लगभग पांच हजार बर्मी थे। १९२८ में बर्मी संघ ने डा। सायासेन को अपना महासचिव चुना। डा। सेन ने किसानों की मदद से एक विद्रोही सेना का गठन कर लिया। उन्होंने थारवर्दी के घने वनों में बन्दूकें और गोला बारूद का भण्डार बना लिया। दिसम्बर १९३० ई। में सारे बर्मा के युवकों ने डा। सेन के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। डा। सेन ने एक घोषणा पत्र द्वारा किसानों पर लगे सारे ऋण माफ कर दिए। बौद्ध धर्म को राज्य का धर्म घोषित कर दिया गया। थारवर्दी क्षेत्र में जेलों के फाटक तोड़ कर बन्दियों को मुक्त कर दिया गया। पुलिस कर्मचारियों और ग्रामों के मुखियाओं से हथियार छीन लिए गए। पुल, रेल की लाइनें, टेलीग्राफ और टेलीफोन के तार काट दिये गए।
सात दिन के लिए डॉ॰ सेन के स्वयं-सेवक, थारवर्दी प्रदेश में अंग्रेज कलेक्टर के आत्मसमर्पण के बाद, सत्ता को सम्भाले रहे। सात दिन के बाद अंग्रेजी फौज आ गई और तीन दिन युद्ध के बाद विद्रोह कुचल दिया गया। डा। सेन स्वयं बर्मा के अन्य क्षेत्रों में पहुंच गए और उनके अनुयायियों ने थानों और जेलों पर कब्जा कर लिया। अग्रेज सरकार ने पूरी शक्ति से दमन कार्य प्रारम्भ किया और गांव के गांव तोपों से भस्मीभूत कर दिए गए। ग्रामवासियों पर हर तरह के जुल्म ढाए गए। इस बर्माव्यापी विद्रोह को शान्त करने में चार वर्ष का समय लगा और उसके चार वर्ष बाद एक मित्र द्वारा विश्वासघात किए जाने पर डा। सायासेन को माण्डले वन में बीमारी की हालत में गिरफ्तार किया जा सका।
जो बर्मी क्रान्तिकारी अण्डेमान भेगे गए, वे कारावास की अवधि समाप्त करने के बाद, पोर्टब्लेयर में फोनिक्सेबे के क्षेत्र, सिप्पी घाट, हर्म्फीगंज और बर्मा नाला के आसपास बस गए। पोर्टब्लेयर के लाइट हाऊस सिनेमा के समीप स्थित बौद्ध मन्दिर आज भी अण्डमान के बर्मी लोगों की याद ताजा किए है। वर्ष सन् १९५१ ई। में कुल ३१ हजार जनसंख्या में से १,६०४ बौद्ध लोग थे। सन् १९६१ ई। की जनगणना में कुल ६३,५४८ व्यक्तियों में से १,७०७ बौद्ध धर्मावलम्बी थे परन्तु इसके बाद बर्मी लोग बर्मा लौट गए जिसके परिणामस्वरूप सन् १९७१ ई। की जनगणना में कुल ११५१३३ लोगों में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या केवल १०३ रह गई थी।

बंगाली शरणार्थी

कलकत्ता में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का मुख्य कार्यालय था और अण्डेमान में ब्रिटिश अधिकार के समय कलकत्ता बन्दरगाह से प्राय: जलयान भेजे जाते थे। सन् १८५८ ई। और उसके बाद के वर्षों में निर्वासित किए जाने वाले व्यक्ति भी मुख्य रूप से कलकत्ता से ही पोर्टब्लेयर लाए जाते थे। बंगाल के क्रान्तिकारी और अन्य अपराधी प्राय: अण्डेमान में निर्वासित कर दिये जाते थे। परन्तु बंगालियों की संख्या पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थियों को बसाने के कारण धीरे-धीरे बढ़ती गई। सन् १९४९ ई। में पहली बार २०२ बंगाली परिवारों को पोर्टब्लेयर से आठ दस मील के घेरे में बसाया गया। १९५० ई। में ११९ बंगाली परिवार और सन् १९५१ में ७८ बंगाली परिवार बसाए गए। बाद में हर साल नए परिवार आते गए और दूर-दूर के इलाकों में फैलते गए। दक्षिण अण्डेमान के दूरवर्ती प्रदेशों के बाद उनको लांग आइलैण्ड, लिटिल अण्डेमान, ओरलकच्चा, मध्य अण्डेमान और उत्तरी अण्डेमान में बसाया गया। इन बंगाली शरणार्थियों को द्वतीय पंचवर्षीय योजना के अन्त तक दक्षिणी अण्डेमान में (५६५ परिवार), मध्य अण्डेमान में (९३१ परिवार) और उत्तरी अण्डेमान में (११४८ परिवार) बसाया गया। ३३९ शरणार्थी परिवार मध्य अण्डेमान के बेटापुर क्षेत्र में बसाये गए। इन पूर्वी पाकिस्तान से आये हुए बंगालियों के लिये २,०५० एकड़ भूमि साफ की गई। इसी तरह के १०० बंगाली परिवारों को नील द्वीप में १,१९० एकड़ भूमि पर बसाया गया। इस तरह से ग्रेट अण्डेमान के तीनों क्षेत्रों अर्थात् उत्तरी अण्डेमान, मध्य अण्डेमान और दक्षिणी अण्डेमान में पूर्वी पाकिस्तान से आये हुए २,८८७ बंगाली परिवार बसा दिये गये। इन बंगाली शरणार्थियों के अलावा केरल के १५७ परिवार तमिलनाडु के ४३ परिवार, बिहार के १८४ परिवार, माही से आये ४ परिवार और बर्मा से आये ५ परिवारों को ग्रेट अण्डेमान में बसाया गया था।
लिटिल अण्डेमान में भी पूर्वी पाकिस्तान से आये बंगाली शरणार्थियों और श्रीलंका से आये तमिल शरणार्थियों के लगभग २००० परिवारों को बसाने की योजना तैयार की गई थी। रामकृष्णापुरम आदि की बंगाली बस्तियों की तुलना में अब ओंगी जन-जाति अपने ही द्वीप लिटिन अण्डेमान में एक नगण्य समुदाय में संकुचित हो गई है। इसी तरह हैव लाक द्वीप में बंगाली शरणार्थियों को बसाया गया।
आज बंगाली समुदाय के सदस्यों का इन द्वीपों में सबसे बड़ा समूह बन गया है। बंगाल की संस्कृति और सभ्यता अण्डेमान में मुखरित हो उठी है। दुर्गापूजा, "यात्रा", "तर्जा", "कवि गान", "बाउल" और `कीर्तन' के स्वर गूंजते सुनाई देते हैं। इन बस्तियों में दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा, लक्ष्मी पूजा, मनसा पूजा, दोलोत्सव और झूलन जैसे उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाये जाते हैं।
पोर्टब्लेयर के समीपवर्ती क्षेत्र जैसे छोलादारी, नील, हैवलाक और मध्य अण्डेमान में भांति-भांति के फल और सब्जियां उगाई जाने लगी हैं। इन बस्तियों में छेने से बनी हुई स्वादिष्ट बंगाली मिठाइयां भी मिल जाती हैं।

तमिल

मद्रास से पोर्टब्लेयर के बीच सीधी वायुयान सेना के साथ-साथ नियमित जलयान सेवा भी उपलब्ध है। तमिलनाडु से अनेक तमिल व्यवसायी पोर्टब्लेयर और अन्य द्वीपों में व्यापार और वाणज्य का कार्य सम्भाल रहे हैं। जंगलों में और दूसरे सरकारी विभागों तथा कारखानों में काम करने के लिये बहुत बड़ी संख्या में तमिल मूल के श्रमिक आते रहे हैं। श्रीलंका में विस्थापित तमिल परिवारों को भी अण्डेमान में बसाया गया है। तमिल परिवार दक्षिण और मध्य अण्डेमान में मुख्य रूप से बसे हैं परन्तु श्रीलंका से विस्थापित १२०० परिवारों को कचाल द्वीप में बसाने की व्यवस्था की गई थी। तमिल भाषी मुख्य रूप से हैडो, विमबर्लीगंज, रंगत, माया-बन्दर, डिगलीपुर, हटबे, कपंगा द्वीप तथा शबनम नगर ग्रेट निकोबार में रहते हैं।
तमिल लोग अपने साथ दक्षिण भारतीय संस्कृति और देवी देवताओं को लेकर आये हैं। जहां-जहां भी तमिल लोगों की बस्तियां है वहा पर तमिल शैली के मन्दिर और धार्मिक उत्सव देखने को मिलते हैं।

तेलगू भाषी

विशाखापटनम और पोर्टब्लेयर के बीच सीधी जलयान व्यवस्था होने के कारण अनेक आन्ध्र प्रदेश वासी श्रमिक इन द्वीपों में आते रहे हैं। अधिकांश आन्ध्र प्रदेश वासियों को हैडो, लांग आइलैन्ड, डेरी फार्म (पोर्टब्लेयर) बम्बूफलैट, माया बन्दर, सुभापग्राम (उत्तरी अण्डेमान) आदि की बस्तियों में देखा जा सकता है। ये लोग बहुत परिश्रमी और लगन से काम करने वाले होते हैं। अपने अवकाश के समय में वे दक्षिण भारतीय संगीत और नृत्य के कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

मलयाली

केरल से अनेक मलयालम भाषी लोग आकर इन द्वीपों में बसे हैं। मालावार तट के मोपला लोगों के अलावा अनेक शिक्षक, लिपिक, अधिकारी, नर्सें आदि इन द्वीपों में आकर बस गये हैं। लगभग सभी उच्च अधिकारियों के निजी सहायक केरलवासी हैं। इन द्वीपों का जलवायु केरल के जलवायु से बहुत मिलता जुलता है। मलयालम भाषी वर्ग ने एक मत होकर अपने बच्चों के लिये पांचवी कक्षा के बाद अनिवार्य रूप से हिन्दी पढ़ाने की मांग की है। केरल वासी अपने साथ केरल की संस्कृति और कथाकली जैसी परम्पराओं का इन द्वीपों में प्रसार कर रहे हैं। मलयालम भाषी लोग मुख्य रूप से ओबरा ब्राज, मन्नार घाट, पद्मनाभ पुरम, स्वदेश नगर और हैडो आदि क्षेत्रों में केन्द्रित हैं।

राँची लोग

इन द्वीपों में बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश के मिलन स्थल छोटा नागपुर क्षेत्र से द्वीपों में आए व्यक्तियों को "राँची लोग" का नाम दिया गया है। छोटा नागपुर क्षेत्र में राँची नामक पर्वतीय स्थल बिहार राज्य की ग्रीष्म ऋतु की राजधानी कही जाती है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोग प्राय: ओरांव, मुण्डा और मिण्डारी बोलियां बोलते हैं। छोटा नागपुर की जनजातियां बहुत परिश्रमी और मन लगा कर काम करने वाली होती है। अण्डेमान के वन क्षेत्र, बहुत कुछ छोटानागपुर के धरातल से मेल खाते हैं। रांची मजदूर बहुत बड़ी संख्या में इन द्वीपों में आए हैं और ये मुख्य रूप से ठेकेदारों द्वारा जंगलों में काम करने के लिए नियुक्त किए गए हैं। जिन क्षेत्रों में बंगाली शरणार्थियों को खेती के लिए भूमि दी गई है वहां भी रांची श्रमिक बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। रांची मजदूरों की एक बहुत बड़ी बस्ती वाराटांग द्वीप में स्थित है। पोर्टब्लेयर, बाराटांग (ओरलकच्चा) और मायाबन्दर क्षेत्र में कई इसाई मिशन इन लोगों के बीच सेवाकार्य कर रहे हैं। इसाई मिशन द्वारा संचालित पोर्टब्लेयर का निर्मला उच्चतम माध्यमिक विद्यालय मुख्य रूप से रांची के लड़के-लड़कियों के लिए शिक्षा और छात्रावास की सुविधाएं प्रदान करता है। इन लोगों ने अपनी मेहनत और लगन से दक्षिणी अण्डेमान और मध्य अण्डेमान से वन विकास तथा कृषि कार्यों में विशेष योगदान दिया है।