शनिवार, 28 जून 2014

भारत में गूगल का सस्ता स्मार्टफोन




प्रस्तुति- स्वामी शरण / मेहर स्वरूप

गूगल ने घोषणा की है कि जल्द ही वह बाजार में एक बेहद सस्ता स्मार्टफोन उतारेगा. एंड्रॉयड वन नाम के इस कार्यक्रम के तहत नए फोन में स्मार्टफोन की खूबियां मौजूद होंगी और दाम बेहद कम होगा. फोन इस साल भारतीय बाजार में होगा.
इस फोन की कीमत 100 डॉलर यानि केवल 6,000 रुपये के अंदर होगी. एंड्रॉयड पर आधारित इस फोन की स्क्रीन बड़ी, पांच इंच से थोड़ी कम होगी. फोन में एफएम, दो सिम और एसडी कार्ड जैसी सुविधाएं भी होंगी. बाजार में स्मार्टफोन की बढ़ रही मांग को देखते हुए गूगल ने यह अहम घोषणा की है. कंपनी का कहना है कि उनका मकसद है भारत के कोने कोने तक इंटरनेट की सुविधा पहुंचाना.
गूगल के वरिष्ठ उपनिदेशक सुंदर पिचाई ने बताया कि गूगल इसे सारी दुनिया की बाजारों में लाने की तैयारी में है, लेकिन इसकी शुरुआत भारत से इस साल के अंत तक होगी. सैन फ्रांसिस्को में हुई सालाना दो दिवसीय डेवलपर कॉन्फ्रेंस में कंपनी ने यह घोषणा की. साथ ही दावा किया कि इस समय दुनिया भर में करीब एक अरब लोग एंड्रॉयड फोन इस्तेमाल कर रहे हैं.
उन्होंने बताया कि गूगल पहले से ही भारत में कई ऐसी योजनाओं पर काम कर रहा है जिनसे लोगों को स्मार्टफोन पर सस्ता इंटरनेट मुहैया कराया जा सकेगा. गूगल एंड्रॉयड वन को माइक्रोमैक्स, कार्बन और स्पाइस के साथ मिलकर बनाएगी. पचाई ने कहा, "अरबों लोग हैं जिनके पास स्मार्टफोन रखने की सुविधा नहीं है. हम इसे बदलना चाहते हैं."
आईटी रिसर्च कंपनी गार्टनर के निदेशक ब्रायन ब्लाउ भी मानते हैं कि कम कीमत वाले उत्पादों के बढ़ रहे बाजार को देखते हुए गूगल को ऐसा कुछ करने की जरूरत है. उन्होंने कहा, "हालांकि इस क्षेत्र में जगह बनाना मुश्किल होगा, अरबों लोगों को इंटरनेट पर लाना लंबा रास्ता तय करने जैसा है."
इस बारे में पिचाई ने कहा, "हम इस बात के कयास लगाते आ रहे हैं कि कैसा होगा अगर हर किसी के पास इंटरनेट की सुविधा और दुनिया भर की जानकारी होगी. अब यह देखने का समय आ गया है."
स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों के लिए विकासशील देशों की खास अहमियत है. हैंडसेट बनाने वाली कंपनियों के लिए एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर के मुफ्त होने से भी गूगल को फायदा मिला है. एंड्रॉयड सस्ते फोनों पर भी लोगों के बीच खासा लोकप्रिय हो चुका है.
एसएफ/आईबी (एएफपी)

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साइकिल सवार अफगान महिलाओं की बेबाकी






प्रस्तुति- दिनेश कुमार सिन्हा / अम्मी शरण

अफगानिस्तान में किसी महिला को साइकिल पर सवार देखना लोगों के लिए अजीब बात है. ट्रैकसूट, जर्सी और हेल्मेट में जब वे दस लड़कियां निकलती हैं तो टेढ़ी नजरें और भद्दी बातें उन्हें घेरे रहती हैं. लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं.
अफगानिस्तान में कट्टरपंथ के साए में महिलाओं के खुले तौर तरीकों और आजाद ख्याली के लिए कोई जगह नहीं. लेकिन महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर करने वाली रूढ़िवादिता को इन दिनों अफगानिस्तान की दस महिलाओं की राष्ट्रीय साइक्लिंग टीम चुनौती दे रही है. वे 2020 ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए खुद को तैयार कर रही हैं. उनका एक और मकसद है, अफगानिस्तान में साइकिलों पर और भी लड़कियों को सवार देखना.
राजनीति से नहीं लेना देना
टीम की सहायक कोच 26 वर्षीय मारिया सिद्दिकी कहती हैं, "हमारे लिए साइकिल आजादी की निशानी है." उनके मुताबिक साइकिल के जरिए वे किसी तरह की राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहती है. उन्होंने कहा, "हम साइकिल इसलिए चलाते हैं क्योंकि हम चलाना चाहते हैं. अगर हमारे भाई साइकिल चला सकते हैं तो हम क्यों नहीं."
साइक्लिंग के लिए उपयुक्त ट्रैकसूट, जर्सी और हेल्मेट लगाकर जब मारिया और उनकी साथी ट्रोनिंग के लिए काबुल से पगमान की पहाड़ियों की तरफ बढ़ती हैं, तो तरह तरह की तीखी आवाजें कान में पड़ती हैं. कोई उन्हें वेश्या कहता है तो कोई घर वापस जाने की सलाह दोता है. इसी बीच कोई तीसरा कहता है कि वे घर की बदनामी कराने पर तुली हुई हैं.
नफरत भरी नजरों से लोग रास्ते भर उन्हें घूरते रहते हैं. लेकिन वे लोगों के तल्ख रवैये की परवाह नहीं करतीं, क्योंकि समाज का एक छोटा सा तबका ऐसा भी है जो उनका समर्थन करता है.
ख्वाबों के पंख
एक साइकिल सवार की मां ऊपर से नीचे तक काले रंग के हिजाब में लिपटी वहां लड़कियों का मनोबल बढ़ाने पहुंची हैं. अपने परिवार में वह अकेली हैं जो ताली बजाकर उनका हौसला बढ़ाती हैं. 20 साल की यूनिवर्सिटी छात्रा फिरोजा की मां मारिया रसूली कहती हैं, "मेरी बेटी मेरे सपने पूरे कर रही है. मेरे माता पिता ने मुझे कभी साइकिल नहीं चलाने दी. मैं अपनी बेटी के साथ वह नहीं होने दूंगी." उन्होंने बताया कि उन्होंने और उनके पति ने पड़ोसियों और रिश्तेदारों से यह बात छुपाकर रखी, क्योंकि "वे कभी नहीं समझेंगे."
अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व में नाटो फौजों के आने के बाद से कट्टरपंथी तालिबानियों के प्रभाव को बहुत हद तक कम किया जा सका है. इसके बाद से महिलाओं ने कई अहम क्षेत्रों में जगह बनाई है, इनमें देश की राजनीति भी शामिल है. अफगानिस्तान में न्यायिक क्षेत्र में भी कई महिलाएं आगे आई हैं. पहली बार देश में उपराष्ट्रपति के पद की दावेदारी एक महिला उम्मीदवार ने भी की.
एसएफ/ओएसजे (एएफपी)

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विज्ञान


ज्यादा टीवी देखने से घटती है जिंदगी




प्रस्तुति-- दिनेश कुमार सिन्हा

हर रोज तीन से चार घंटे टीवी देखना आपसे जिंदगी के कीमती साल छीन सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है ज्यादा टीवी देखने वालों की कम उम्र में मृत्यु की संभावना उन लोगों से लगभग दोगुनी होती है जो टीवी के सामने कम समय बिताते हैं.
अमेरिकन हार्ट असोसिएशन पत्रिका में छपी रिपोर्ट सुस्त जीवनशैली के नुकसान बयान करती ताजा रिसर्च के बारे में बताती है. इस आलसी किस्म की जीवनशैली से लोग अपने लिए उच्च रक्तचाप, मोटापे, कैंसर और दिल की बीमारियों के खतरे बढ़ा लेते हैं.
रिपोर्ट के प्रमुख लेखक मार्टिनेज गोंजालेस कहते हैं, "हमारी खोज इस दिशा में किए गए पुराने शोधों का समर्थन करती है, जिनमें टीवी देखने से बढ़ने वाले मौत के खतरों का जिक्र किया जा चुका है." गोंजालेस स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ नवारा में जनस्वास्थ्य विभाग के प्रमुख हैं.
इस रिसर्च में स्पेनी यूनिवर्सिटियों से स्नातक की पढ़ाई कर चुके 13 हजार लोगों को शामिल किया गया. इन लोगों की उम्र औसतन 37 साल थी, और उनमें से 60 फीसदी महिलाएं थीं. रिसर्चर यह पता लगाना चाहते थे कि क्या ज्यादा टीवी देखने और कम समय में मृत्यु के बीच कोई संबंध है.
उन्होंने इस बात पर भी गौर किया कि ये लोग हर दिन कितना समय कंप्यूटर के सामने बिताते हैं, और क्या देर तक ड्राइविंग करने से भी इसका कुछ संबंध है? जब उन्होंने रिसर्च शुरू की तो शोध में शामिल किए गए सभी लोग स्वस्थ थे.
वे लोग जो हर रोज तीन घंटे से ज्यादा टीवी देखने वाले थे, उनकी जल्द मृत्यु की संभावना उन लोगों से लगभग दोगुनी थी जो एक घंटा या उससे भी कम समय के लिए टीवी देखते थे.
इन मामलों में मृत्यु का सबसे प्रमुख कारण कैंसर को पाया गया. 46 लोगों की मौत कैंसर की वजह से हुई. 32 लोग अन्य कारणों से और 19 की मौत हृदय संबंधी समस्याओं के कारण हुई.
हालांकि रिसर्चर अभी तक इस बारे में पता नहीं लगा सके हैं कि कंप्यूटर पर खर्च किए जाने वाले समय और जल्द मौत के बीच किसी तरह का संबंध है या नहीं. इससे यह भी ठीक ठीक तय नहीं हो सका कि टीवी देखना ही उम्र घटाने का कारण है. बस यही संबंध पता चला कि कम टीवी देखने वालों के मुकाबले ज्यादा टीवी देखने वालों को कम उम्र में मृत्यु का खतरा ज्यादा रहता है.
गोंजालेस ने कहा, "हमारा शोध इस तरफ इशारा करता है कि लोगों को अपनी शारीरिक गतिविधि बढ़ाने की तरफ ध्यान देना चाहिए. ज्यादा सुस्त और आलसी समय को टालना चाहिए और हर रोज टीवी देखने का समय एक से दो घंटे तक ही रखना चाहिए." अमेरिकन हार्ट असोसिएशन ने भी लोगों को हर रोज करीब दो घंटे हल्की फुल्की कसरत करने की सलाह दी है.
एसएफ/ओेएसजे (एएफपी)

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