एक समय था।ईस्ट इंडिया नाम की ब्रिटिश कंपनी लगभग पूरे विश्व पर राज करती थी। ब्रिटेन से सबसे बुरे पर प्रभावशाली लोग इस कंपनी के मलिक हुआ करते थे। एक टाइम में ब्रिटेन की ऑफिसियल सेना से दुगुनी बड़ी सेना इनके पास हुआ करती थी।
दुनिया के लगभग सारे व्यापार पर एकाधिकार हुआ करता था इनका। अफ़्रीका में तो लोगों की ग़ुलामी तक का व्यापार करती थी ये कंपनी……. In short जलवा जलाल था इसका।
1857 के सिपाही विद्रोह के पहले ये कंपनी भारत में भी राज करती थी और ऐसा कौन सा भारतीय होगा जो इनके जुल्म की दास्तान से परिचित ना हो ?
ख़ैर ये तो हुआ ईस्ट इंडिया का इतिहास।
अभी ये कंपनी क्या कर रही है ? क्या ये exist करती है ?
हर चीज़ का अंत होता है। जैसा मैंने ऊपर लिखा “समय होत बलवान” तो ईस्ट इंडिया कंपनी का भी बुरा समय आया। एक समय लोगों ने कंपनी के प्राइवेट इक्विटी से बहुत पैसे कमाए बाद में ईस्ट इंडिया के शेयर सर्टिफिकेट का भाव 2 कौड़ी का हो गया था । जिसके पास भी ये शेयर थे उसके लिए ये कचरा था।
इस कचरे पर एक भारतीय “संजीव मेहता” की निगाह पड़ गई । एक तो संजीव को इसमें बिज़नेस की संभावना दिख रही थी और उससे बड़ी बात उस ब्रिटिश कंपनी का मलिक बनना जो १०० सालों तक भारतीयों को ग़ुलाम बना रखा था, ये अपने आप में गर्व की बात थी।
संजीव मेहता ने ईस्ट इंडिया कंपनी को महज़ 20 मिनट में ख़रीद लिया और उससे ज़्यादा मज़ेदार बात कि उन्होंने इस कंपनी का मूल्य एक “पेपर नैपकिन” पर लिख के दे दिया था और उसी भाव में उन्होंने इस कंपनी को ख़रीदा ।
आज ईस्ट इंडिया कंपनी चाय का व्यापार करती है और इसका पहला स्टोर लंदन में ही खुला।
सोच के ही आनंद आ जाता है कि जिस कंपनी ने भारत में अत्याचार किए उसे एक भारतीय ने नैपकिन पे भाव लिख के ख़रीद लिया।
इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने कहा था कि, विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है।
भारतीय इतिहास का प्रारम्भ तथाकथित रूप से सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है। बताया जाता है, कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे।
पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान तथा (पारस) ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है।
इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।
आजकल कम्प्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर मार्कोव विधि से प्राचीन भाषा को पढना सरल हो गया है।
सिन्धु घाटी की लिपि को जानबूझ कर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सार्थक प्रयास किये गए। भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंग्रेजो और फिर नकारात्मकता से ग्रस्त स्वयं सिद्ध इतिहासकारों का कब्ज़ा रहा, ने सिन्धु घाटी की लिपि को पढने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलायी।
क्या था सिन्धु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और स्वयं सिद्ध इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे, कि सिन्धु घाटी की लिपि को पढ़ा जाए?
अंग्रेज और स्वयं सिद्ध इतिहासकारों की नज़रों में सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्नलिखित खतरे थे...
1. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जायेगी। इजिप्ट, चीनी, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा, कि यह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। भारत का महत्व बढेगा जो अंग्रेज और उन इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक सभ्यता साबित हो गयी तो अंग्रेजो और स्वयं सिद्ध द्वारा फैलाये गए आर्य द्रविड़ युद्ध वाले प्रोपगंडा के ध्वस्त हो जाने का डर है।
3. अंग्रेज और स्वयं सिद्ध इतिहासकारों द्वारा दुष्प्रचारित ‘आर्य बाहर से आई हुई आक्रमणकारी जाति है और इसने यहाँ के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उनकी महान सभ्यता नष्ट कर दी। वे लोग ही जंगलों में छुप गए, दक्षिण भारतीय (द्रविड़) बन गए, शूद्र व आदिवासी बन गए’, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।
कुछ इतिहासकार सिन्धु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे तो कुछ इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ इनको मुंडा आदिवासियों की भाषा, और तो और, कुछ इनको ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे। ये सारे प्रयास असफल साबित हुए।
सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्लिखित समस्याए बताई जाती है...
सभी लिपियों में अक्षर कम होते है, जैसे अंग्रेजी में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिन्धु घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर चिन्ह हैं। सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिश वेरिएशन बहुत पाया जाता है। ये निष्कर्ष लोथल और कालीबंगा में सिन्धु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद निकला।
भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक लिपि है जिसे ब्राह्मी लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओँ की लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिमी भारत में उपयोग की जाती थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रन्थ ब्राह्मी लिपि में प्राप्त होते है।
सम्राट अशोक ने अपने धम्म का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्राह्मी लिपि को अपनाया। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेख ब्राह्मी लिपि में संस्कृत आदि भाषाओं में लिखे गए और भारत में लगाये गए।
सिन्धु घाटी की लिपि और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं है। साथ ही ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी पारस्परिक सम्बन्ध है। इस आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि को पढने का सार्थक प्रयास सुभाष काक और इरावाथम महादेवन ने किया।
सुभाष काक ने तो बहुत शोध पत्र तैयार किया एवम सिंधु घाटी की लिपि को लगभग हल कर लिया था, परंतु प्रकाशित करने के एक दिन पहले रहस्यमय मृत्यु हो गई। ये भी शास्त्री जी वाली कहानी थी।
सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षर के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कुछ वर्णमाला (स्वर व्यंजन मात्रा संख्या), कुछ यौगिक अक्षर और शेष चित्रलिपि हैं। अर्थात यह भाषा अक्षर और चित्रलिपि का संकलन समूह है। विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिन्धु घाटी की भाषा।
बाएं लिखी जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि भी दाएं से बाएं लिखी जाती है। सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त हैं।
इनमे वैसे तो 400 अक्षर चिन्ह हैं, लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80 प्रतिशत बार हुआ है। और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर है। अब हम इन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी ध्वनि पता लगा सकते हैं।
ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि पढने पर सभी संस्कृत के शब्द आते है जैसे; श्री, अगस्त्य, मृग, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अग्नि, सिन्धु, पुरम, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र आदि।
निष्कर्ष यह है कि...
1. सिन्धु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि की पूर्वज लिपि है।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को ब्राह्मी के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
3. उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिन्धु घाटी की लिपि में लिखा गया था।
4. सिन्धु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे।
5. वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन है।
वैदिक सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन व मूल सभ्यता है, यहां के लोगों का मूल निवास सप्त सैन्धव प्रदेश (सिन्धु सरस्वती क्षेत्र) था जिसका विस्तार ईरान से सम्पूर्ण भारत #इतिहासनामा #history #india देश था।वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आक्रमणकारी थे। आर्य द्रविड़ जैसी कोई भी दो पृथक जातियाँ नहीं थीं जिनमे परस्पर युद्ध हुआ हो।
तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, समुद्र की सतह के गर्म होने और अंटार्कटिक सागर में बर्फ पिघलने की एक के बाद एक घटनाओं को लेकर वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है. वैज्ञानिक कहते हैं कि इस तरह की घटनाओं में देखी जा रही तेज़ी और उनके होने का वक्त "अभूतपूर्व" है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पूरे यूरोप में चल रही भयंकर लू 'जानलेवा प्राकृतिक आपदा है' जो अभी और रिकॉर्ड तोड़ सकती है.
पाकिस्तान अभी बीते साल आई भीषण बाढ़ की तबाही से पूरी तरह उबर भी नहीं सका है और इस साल वो एक बार फिर मॉनसून की भारी बारिश का सामना कर रहा है.
बीते साल आई बाढ़ में पाकिस्तान में 1,500 से अधिक लोगों की जान गई थी जबकि हज़ारों हेक्टेयर खेती पानी में डूब गई थी. वहीं इस साल अब तक लाहौर में दो दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है.
भारत का एक बड़ा हिस्सा इस साल ज़रूरत से अधिक बारिश की मार से जूझ रहा है. जहां देश का 40 फीसदी हिस्सा अधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति की मार झेल रहा है देश का बड़ा हिस्सा अभी भी बारिश को तरस रहा है.
भारत में राजधानी दिल्ली समेत कई इलाक़ों में इस साल मॉनसून की बारिश ने बीते दशकों के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.
जलवायु परिवर्तन पर शहर प्रशासन के ड्राफ्ट एक्शन प्लान के अनुसार मौसम में बदलाव के कारण साल 2050 तक दिल्ली 2.75 लाख करोड़ का नुक़सान हो सकता है.
इस रिपोर्ट के अनुसार आने वाले सालों में शहर के सामने गर्म हवाओं, अधिक तापमान और हवा में नमी के कम होने जैसी चुनौतियों का सामना कर सकती है. इस रिपोर्ट को अभी सरकार की मंज़ूरी का इंतज़ार है.
उन चमकते सितारों की कहानी जिन्हें दुनिया अभी और देखना और सुनना चाहती थी.
दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर
समाप्त
जानकारों की मानें तो मौसम और समंदर में हो रही इन घटनाओं को सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से जोड़ कर देखना मुश्किल है, क्योंकि ये सभी बातें बेहद जटिल हैं.
इसे लेकर कई अध्ययन किए जा रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्हें डर है कि कई खौफनाक मंज़र दुनिया के सामने आने लगे हैं.
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पर्यावरण जियोग्राफ़र डॉक्टर थोमस स्मिथ कहते हैं, "मुझे ऐसे किसी और दौर की जानकारी नहीं है जब जलवायु सिस्टम के सभी हिस्से रिकॉर्ड स्तर पर किसी न किसी आपदा से न जूझ रहे हों."
वहीं इंपीरियल कॉलेज लंदन में जलवायु विज्ञान पढ़ा रहे डॉक्टर पाओलो सेप्पी कहते हैं कि जीवाश्म से मिलने वाले ईंधन के कारण हो रही ग्लोबल वार्मिंग और एल नीनो (2018 से मौसम में हो रहे परिवर्तन की प्राकृतिक प्रक्रिया) के कारण ऐसा लगता है कि पृथ्वी "अब किसी अनजान क्षेत्र में आ गई है."
इस साल गर्मियों के दिनों में अब तक मौसम के चार रिकॉर्ड टूट चुके हैं - इस साल जुलाई में अब तक का सबसे अधिक गर्म दिन रहा, वैश्विक स्तर पर जून का महीना सबसे अधिक गर्म महीना रहा, समंदर में बेहद अधिक गर्म लू और अंटार्कटिक सागर में जम बर्फ में रिकॉर्ड कमी आई.
लेकिन मौसम में आ रहे इन बदलावों का हमारे लिए क्या संकेत हैं, धरती और मानव भविष्य को ये किस हद तक प्रभावित कर सकते हैं?
इस बार पूरी दुनिया में जुलाई महीने में अब तक का सबसे अधिक गर्म दिन रिकॉर्ड किया गया. इसने वैश्विक औसत तापमान का 2016 में बना रिकॉर्ड भी तोड़ दिया.
जलवायु पर निगरानी रखने वाली यूरोपीय संघ की एजेंसी कोपर्निकस के अनुसार इस साल 6 जुलाई को वैश्विक औसत तापमान 17.08 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा.
धरती के गर्म होने के कारणों के पीछे जीवाश्म से मिलने वाले तेल, कोयला और गैस जैसे ईंधन के जलाने से पैदा होने वाला उत्सर्जन शामिल है.
इंपीरियल कॉलेज लंदन में जलवायु वैज्ञानिक डॉक्टर फ्रेडरिक ओटो कहती हैं कि ग्रीनहाउस गैसों के कारण गर्म होने वाली धरती के बारे में इस तरह का पूर्वानुमान पहले ही लगाया गया था.
डॉक्टर फ्रेडरिक कहती हैं, "इस ट्रेंड के बढ़ने के पीछे सौ फीसदी इंसान का ही हाथ है."
डॉक्टर थोमस स्मिथ कहते हैं "अगर मुझे किसी बात पर आश्चर्य है तो वो हम देख रहे हैं कि रिकॉर्ड जून के महीने में ही टूट गया है. अब तो साल भी पूरा नहीं हुआ. आम तौर पर वौश्विक स्तर पर एल-नीनो की प्रक्रिया का असर इसके शुरू होने के पांच छह महीनों तक दिखाई नहीं देता."
एल-नीनो जलवायु में उतार-चढ़ाव की प्राकृतिक तौर पर होने वाली दुनिया की सबसे ताकतवर प्रक्रिया है. उष्णकटिबंधीय प्रशांत में ये प्रक्रिया समुद्र की सतह पर मौजूद पानी को गर्म कर देती है, जिससे वायुमंडल में गर्म हवाएं चलने लगती हैं. आम तौर पर ये प्रक्रिया वैश्विक स्तर पर वातावरण का तापमान बढ़ा देती है.
भारत में तबाही मचाने वाला पानी अब पाकिस्तान पहुंचा
औद्योगिकरण से पहले के दौर में जून के महीने के तापमान की तुलना में इस साल जून के महीने में औसत वैश्विक तापमान 1.47 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा. औद्योगिकरण क़रीब 1800 के आसपास शुरू हुआ जिसके बाद से इंसान लगातार बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में छोड़ता रहा है.
क्या 2023 की गर्मियों में जो कुछ हुआ उसके बारे में दशक भर पहले पूर्वानुमान लगाया गया था?
इस सवाल के उत्तर में डॉक्टर स्मिथ कहते हैं कि जलवायु को लेकर पूर्वानुमान लगाने के लिए जो मॉडल हैं वो लंबे वक्त में ट्रेंड का आकलन करने में कारगर हैं लेकिन 10 साल में होने वाले बदलावों का पुख्ता तौर पर आकलन नहीं कर सकते.
वो कहते हैं, "1990 के मॉडल के अनुसार हम काफी हद तक वहीं हैं जहां पर आज हैं. लेकिन अगले 10 सालों में स्थिति वास्तव में कैसी होगी इसका सही-सही आकलन लगा पाना बेहद मुश्किल है."
वो कहते हैं, "बढ़ रहा तापमान कम होने लगेगा, ऐसा नहीं लगता."
समंदर के औसत वैश्विक तापमान ने मई, जून और जुलाई के महीनों में सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. साल 2016 में समुद्र की सतह पर सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया था, इसके बाद इस साल तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने वाला है.
लेकिन उत्तर अटलांटिक सागर में अत्यधिक गर्मी के कारण बढ़ रहा समुद्र का तापमान वैज्ञानिकों के लिए ख़ास चिंता का विषय बना हुआ है.
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में पृथ्वी विज्ञान की प्रोफ़ेसर डेनिला श्मिड कहती हैं, "हमने पहले कभी अटलांटिक के इस हिस्से में गर्म लहरें नहीं देखी थीं. मैं इसकी उम्मीद नहीं कर रही थी."
जून के महीने में आयरलैंड के पश्चिमी तट पर तापमान औसत से 4 और 5 डिग्री सेल्सियस अधिक तक पहुंच गया. नेशनल ओशनिक और एटमॉसफ़ेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे कैटगरी 5 की गर्म लू यानी "अत्यधिक से भी अधिक" गर्म हवाएं कहा.
हालांकि प्रोफ़ेसर डेनिला श्मिड कहती हैं कि बढ़ रहे तापमान की इस घटना को जलवायु परिवर्तन ने जोड़ना जटिल है लेकिन आप कह सकते हैं कि ये हो रहा है.
वो समझाती हैं कि ये स्पष्ट है कि धरती गर्म हो रही है और वायुमंडल मे मौजूद गर्म हवा को समंदर सोख रहा है.
वो कहती हैं, "जलवायु परिवर्तन के हमारे मॉडल्स में प्राकृतिक परिवर्तनशीलता है और ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जिनके बरे में पहले पूर्वानुमान नहीं लगाया गया था, कम से कम उनके अभी घटने का तो नहीं."
दुनिया की ज़रूरत का 50 फीसदी ऑक्सीजन समुद्र से ही मिलता है.
समुद्री इकोसिस्टम पर मौसम में आ रहे बदलाव के असर के बारे में कहती हैं, "जब हम गर्म लू की बात करते हैं तो लोग अक्सर सूख रहे पेड़ और पीली पड़ती घास के बारे में सोचते हैं."
"अटलांटिक सागर का तापमान जितना होना चाहि उससे 5 डिग्री सेल्सियस अधिक है. इसका मतलब है कि जीवों को अपना काम सामान्य रूप से करने के लिए अब 50 फीसदी अधिक खाद्य की ज़रूरत है."
वीडियो कैप्शन,
ये पूरा शहर एक साथ ऊपर कैसे उठ जाएगा?
अंटार्कटिक में जमी बर्फ में रिकॉर्ड कमी
जुलाई के महीने में अंटार्कटिक सागर में मौजूद बर्फ की चादर में रिकॉर्ड कमी आई है. 1981 से लेकर 2010 के औसत की तुलना में देखें तो अंटार्कटिक से यूके के आकार से 10 गुना बड़े हिस्से जितनी बर्फ अब तक पिघल चुकी है.
वैज्ञानिकों के अनुसार ये चेतावनी की घंटी है और जलवायु परिवर्तन से इसके सही लिंक के बारे में जानकारी जुटाने की वो कोशिश कर रहे हैं.
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे की डॉक्टर कैरोलीन होम्स का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अंटार्कटिक सागर की बर्फ पिघल सकती है, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखें तो इलाक़े में मौसम में हो रहे बदलाव के कारण भी हो सकता है या फिर समुद्र की लहरों के कारण भी हो सकता है.
वो कहती हैं कि ये केवल एक रिकॉर्ड टूटने का मामला नहीं हैं बल्कि ये रिकॉर्ड लंबे वक्त के लिए टूट गया है.
वो कहती हैं, "ये ऐसा कुछ है जो हमने इस जुलाई से पहले नहीं देखा था. पहले भी बर्फ कम हुई थी लेकिन ये उससे भी 10 फीसदी तक कम हुई है, ये अपने आप में बड़ी बात है. ये इस बात का संकेत है कि हम असल में नहीं समझ रहे कि परिवर्तन कितनी तेज़ गति से हो रहा है."
वैज्ञानिकों का मानना था कि ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा असर कभी न कभी अंटार्कटिक में जमी बर्फ पर पड़ेगा. लेकिन डॉक्टर होम्स कहती हैं कि 2015 तक इसने दूसरे महासागरों में वैश्विक ट्रेंड को पीछे छेड़ दिया.
वो कहती हैं, "आप कह सकते हैं कि हम पहाड़ की चोटी से नीचे गिर रहे हैं, लेकिन हमें ये भी नहीं पता कि खाई असल में कितनी गहरी है."
"मुझे लगता है कि ये जिस तेज़ गति से हो रहा है वो हमारे लिए आश्चर्य की बात है. इसे किसी सूरत में बेहतर स्थिति नहीं कहा जा सकता लेकिन इस पर हम नज़र रख रहे हैं और हम कह सकते हैं कि ये सबसे बुरी स्थिति के क़रीब है."
वैज्ञानिक कहते हैं कि इस साल के आने वाले महीनों में और 2024 के शुरूआती वक्त में हम इस तरह की अधिक घटनाएं देख सकते हैं.
हालांकि डॉक्टर फ्रेडरिक ओटो कहती हैं कि जो कुछ हो रहा है उसे "जलवायु का पतन" या फिर "अनियंत्रित वॉर्मिंग" कह सकते हैं.
वो कहती हैं, "हम एक नए दौर में हैं लेकिन हम अभी भी कइयों के लिए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं."
(मार्क पॉइन्टिंग और बैकी डेल की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)