शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

बदलाव के स्वर्णीम दौर में है शिक्षा







बदलते पैटर्न को समझने से ही सफलता के द्वार खुलेंगे।


 डा. ममता शरण


मैं अकेला ही चला था जानिबें मंजिल मगर
लोग आते ही गए और कारवां बनता गया
अपनी बात शुरू करने से पहले मैं इस शेर को पढना ज्यादा जरूरी समझ कर ही सामने रख रही ङूं क्योंकि हर आदमी किसी भी मंजिल की टोह में अकेला ही चलता है। इस कॉलेज में भी  दर्जनों शहर के लोग है, जो यहां पर आकर ही एक फेमिली की तरह साल दो साल से पूरा दिन साथ रहते है।. सबकी चिंता और सबका टारगेट एक है। सब एक दूसरे के दोस्त होकर भी सबसे बड़े कंपीटीटर है। एक दूसरे से आगे निकलने की होड है। मगर यह कोई महाभारत नहीं है कि जीत के लिए विनाश किया जाए। शिक्षा में परीक्षा में यही तो एक सार्थक पहल होता है जो एक दूसरों से आगे निकलने के लिए भी एक दूसरे की ही जरूरक और सहयोग की मांग करता है। आप सब एक मंजिल के यात्री है।. हो सकता है कि कोई पहले नौकरी पाए तो कोई थोडे समय के बाद मगर उस समय भी एक दूसरे के लिए ही मदद सहयोग और प्रयास करने की निर्लोभ इच्छा ही आप सबकी एकता और सार्थक जीजीविषा का संतोषजनक प्रतिफल होगा।

समय परिवर्तनशील है। समय के साथ साथ जमाना बदल रहा है। जमाने की हर चीज समयानुसार अपना रंग रूप आकार मिजाज बदल रहा है। बदलाव के इस स्थायी काल में जड़ता यानी बदलाव की बाते ना करना संभवत समय समाज और प्रकृति के नैसर्गिक स्वभाव चरित्र के खिलाफ है। समय के बदलते स्वभाव पर यदि हम बहुत पीछे अपने पूर्वजों और मानव सभ्यता तथा मानव के विकास तथा शारीरिक संरचना में हुए जैविक प्राकृतिक मानवीय बदलाव की तरफ नहीं झांक रहे है। उस ओर ताकना इस विषय के विस्तार को विषयांतरक भी करता है और इस सेमिनार के मुख्य प्रसंग को बाधित भी करता है। पिछले 15-17 साल यानी नयी सदी के इस केवल डेढ दशक के दौरान आए परिवर्तनों पर गौर करें तो संभवत हम अचंभित रह जाए। संचार क्रांति ने  तमाम संबंधों मानवीय गुणों रिश्ते नातों पर इतना गहरा झटका दिया कि केवल एक मोबाइल ने आदमी को आदमी से काट दिया।  मोबाइल ने संचार को की रेखा को अंतहीन बना दिया है।
यहां अभी तो पूरी तरह भारत में मोबाइल क्रांति का जब प्रवेश नहीं हुआ है तब यह हालत है। जरा विचार कीजिए कि मोबाइल के साथ ब्लॉगों की ब्लॉगिंग क्रांति और वेबसाईटों की जंग का तो भारत में अभी शैशवाकाल ही चल रहा है। अगले 15- 20 साल में जब मोबाइल की तरह ही हर दमी के पास अपना ब्लॉग हो या अपना वेबसाईट होगा या उस समय तक कोई और जियो जैसी बड़ी क्रांति के साथ कोई नया खिलौना, नयी तकनीक , नया अविष्कार या कोई नया अजूबा (जिस पर अभी कोई चर्चा नहीं की जा सकती) आ गया तो आदमी इनका बंधक होकर रह जाएगा। बदलाव की इस अजीबोगरीब कारनामें और भावी परिदृश्य को ज्यादा लंबोदर बना रही हूं। मगर अस अध्याय को लंबोदर बनाने का मेरा टारगेट अपनी बात को ज्यादा लंबा करना नहीं है।
मैं आपका ध्यान इस ओर लाना चाह रही हूं कि आज से 20-22 साल पहले की जिंदगी एकदम ब्लैकएंड व्हाईट और अंबेसडर कार की तरह 30-40 किलोमीटर की थकाउ उबाउ रफ्तार से ही चलती थी। लगभग 2000 तक हमारे पास ले देकर मनोरंजन या ज्ञान तथा सूचना के साधनों के नाम पर रेडियो और न्यूज पेपर ही होते थे। संवंधों को जिंदा रखने का एकमात्र साधन पोस्टकार्ड और पैसा भेजने का साधन मनीऑर्डर ही था।एक पोस्टमैन की मनमर्जी पर ही गांव देहात से लेकर महानगर के लोग भी डाकियों की मर्जी और मनमानी पर ही निर्भर थे। समय बदला मगर आज तक डाकघर नहीं बदला तो इसका अंजाम सामने है। कल तक गुलजार रहने वाले ज्यादातर डाकघर भूतबंगला बन गए। और डाकियों को मक्खी मारने का ही काम रह गया। बदलाव की आंधी ने संचार के तमाम पौराणिक साधनों को उखाड फेंका। हर आदमी के हाथ में मोबाइल है हर आदमी की पहुंच में सारा जमाना है। मोबाइल तो एक जादू समान है। 100-150 ग्राम के इस मोबाइल में इतने कारनामे भरे पड़े हैं कि इसके कमाल और पहुंच और चमत्कार को देखकर बंगाल के तमाम काले पीले हरे नीले लाल रंग के कपड़े पहनकर लोगों को चौंधियाने वाले सभी जादूगर भी इस मोबाइलची खिलौने के सामने पानी भरते है। मोबाइल क्या क्या कर सकता है और इसने जिंदगी और तमाम सुविधाओं को कितना आसान बना दिया है यह भी एक चमत्कार से कम नही है।
डाकघरों की तरह ही देश के 90 फीसदी टेलर्स यानी कपडा सिलाई करने वाले दर्जियों की भी हालत बेहद दयनीय हो गयी है। गांव देहात से लेकर शहरों महानगरों तक के 95 % पुरूषों ने दर्जी के यहां कपडे की सिलाई बंद कर दी। आधुनिकता के इस बेहद कंर्फोटेबल युग में एक दर्जी पैंट की जितनी सिलाई मांगता है , बाजार में उससे भी कम रेट में बना बनाया जींस या रेगुलर पैंट हाजिर है। सिले सिलाए हुए कपड़ों की बाजार में इस कदर भरमार है कि महानगर और शहरों की तो बातें ही छोड़ दीजिए दूर दराज के गांवों देहातों तक में हर उम्र के बच्चों युवा बुढ़ों के पास रंग बिरंगे शर्ट टी शर्टो और पैंटों की भरमार देखी जा सकती है। चेंजिंग मॉडर्न सोसाईटी एज में सलवार समीज और चुन्नी तो लगभग समाज से लापता ही हो गया है। और लगभग शत-प्रतिशत लड़कियों महिलाओं ने पैंट जींस शर्ट और टी शर्ट को ही अपना मेन ड्रेश बना लिया।
इस बदलाव से भी बडा बदलाव सामाजिक मानसिक और आर्थिक बदलाव के रूप में सामने आया है। फिएट अंबेसडर रिक्शा खटारा पैसेंजर बस रेडियों दूरदर्शन और लाउडस्पीकर के थकाउ उबाउ जमाने में जिंदगी ही थकी हारी सी थी। नौकरियौं के नाम पर केवल एक प्रतिशत शहरी बच्चे या शहर में जाकर पढ़ने वाले ही बच्चे आईएएस आईपीएस या डॉक्टरी इंजीनियरिंग के बारे में सोचते थे। 95 %  बच्चों की नौकरी का इकलौता सूत्र सरकारी पत्रिका रोजगार समाचार होता था, तो परीक्षा के नाम पर ले देकर केवल प्रतियोगिता दर्पण का जमाना था। उस समय के स्टूडेंटस नौकरी के नाम पर केवल सरकारी नौकरी को ही अपना अधिकार तथा पूरी सोसायटी सरकारी नौकरी को ही केवल नौकरी मानती थी।
मगर संचार क्रांति के इस ड़िजटिलिकरण ने  समाज की तमाम पौराणिक धारणा और सोच को ही तार तार सा कर दिया। पिछले डेढ दशक में ही जहां नौकरी की असीम संभावनाएं सामने प्रकट हुई हैं तो शिक्षा को लेकर भी अनंत द्वार खुले हैं। पहले शिक्षा का मतलब बगैर किसी योजना के समय काटने के लिए फालतू में बीए एमए की डिग्री हासिल करने का समय था तो खासकर लड़कियों के लिए तो शादी नहीं होने तक अक्षरों से हनीमून मनाते हुए शिक्षित होने का वक्त माना जाता था। लडकियों की नौकरी के लिए तो हजारों फेमिली में ही कोई दो चार लोग   ही अपनी कन्याओं को टारगेट के साथ शिक्षित कराते थे। मगर बदलते समय में आधी आबादी ने जब  शिक्षा और नौकरी को सर्वोच्च लक्ष्य माना तो ज्यादातर नौकरियों पर इनका ही कब्जा सा हो गया। खासकर अध्यापन सेक्टर में जो आमतौर पर आधी आबादी के लिए सबसे सेफ और सबसे नोबल जॉब माना जाता है में आधी आबादी ने लगभग पूरा कब्जा कर लिया है। सामाजिक बदलाव के सूत्रधार संचार क्रांति के जमाने में देश विदेश में नौकरियों का जाल बिछ गया है तो केवल मोबाइल कंप्यूटर के कारण घऱ बैठे दुनिया के किसी भी देश के किसी भी यूनीवर्सिटी, इंस्टीट्यूट, में दाखिले के लिए फॉर्म भरना एकदम सरल हो गया है। इन सुविधाओं ने जहां जिंदगी को आसान कर दिया है वही एक क्लिक या मोबाइल कंप्यूटर के बटन ने हर परिवार को चमत्कारी सुख प्रदान किया है।  
जब हमें नाना प्रकारेण तमाम जादूई सुविधाएं हासिल हो रही है तो यहां पर यही एक विचाणीय सवाल खडा होता है कि अखिरकार यह सब कैसे हासिल हुआ ??   जमाने के साथ हमसब कैसे बदल गए ? चाहे अनचाहे किस तरह एक अंगूठाटेक आदमी भी इन सुविधाओं के साथ डिजिटल हो गया ?  तो यह सब संभव हुआ है समय के साथ बदलती शिक्षा प्रणाली और रोजगार परक शिक्षा के साथ साथ शिक्षा की अनंत संभावनाओं के बीच अपनी जरूरतों के अनुसार शिक्षा चयन करने की आजादी से।
केवल 15-17 सालों में शिक्षा प्राप्त करने के तमाम दरवाजे खुल गए। संचार माध्यमों और टीवी के खबरिया चैनलों की अंधाधुंध मारा मारी में न्यूज और जानकारियों का संसार फैल गया। वही गूगल बाबा नामक एक जादूई खिलौना सबके पास है जिसके भीतर जानकारियों का पूरा संसार बसा है। गूगल ज्ञान का सागर नहीं है मगर सूचना और जानकारिय़ों का वह महासागर है। वही जस्ट डायल भी एक इसी तरह का साधन है जस्ट डायल यानी 8888888888 यानी दस बार आठ आठ। जेडी के नाम से विख्यात जस्ट डायल एक इतना अपना सुरक्षित गाईड है जो देश के किसी भी कोने में होटल से लेकर रेस्तरां  और कॉलेज ट्यूटर से लेकर पार्लर तक की जानकारी बस एक कॉल पर मुहैय्या करा देता है। ।
 यहां पर इन बातों का जिक्र करके मैं कोई नया ज्ञान नहीं दे रही हूं। आपको भी यह सब पता है। बदलते समय और ट्रेंड के बीच आपको भी बदलना होगा। पढाई के साधन बदल गए। आपकी जिंदगी में मोबाइल और कंप्यूटर अब विलासिता के नहीं परम आवश्यक जरूरत बन गया है। किताबों और कुंजियों को पढ़कर पास हो जाने और डिग्री लेकर खुश होने का जमाना भी खत्म हो गया है। सबसे बडा कंपीटिशन अब आपको अपने आप से देना है। दूसरों को तो झूठ बोलकर टरकाया जा सकता है मगर जैसे, कातिल आईना झूठ नहीं बोलता उसी प्रकार आदमी भी अपने आपसे झूठ बोलकर खुद को बरगला नहीं सकता।  

लगभग दो दशक तक अपने अध्यापन अनुभव के बाद मैं यहां पर आप तमाम काबिल छात्रों और कल के एक सुंदर भविष्य के लिए दिन रात मेहनत कर रहे तमाम छात्र छात्राओं से अपील करना चाहूंगी कि आप भी इस बदलते समय के पदचाप को सुनिए परखिए और उसके अनुसार ही खुद को बदलिए. केवल किताबी ज्ञान अब किसी को न किसी विषय में पारंगत बना सकता है और ना ही पूर्ण ज्ञान ही दे सकता है। आज शिक्षा  का विकास विस्तार भी किसी क्रांति से कम नहीं है। आपको पढाई का पैटर्न बदलना होगा. परीक्षा की शैली और प्रश्नावली में क्या नया ट्रेंड आ रहा है इसको गंभीरता के साथ विश्लेषण करना होगा। एक दशक पहले और आज के प्रश्नावली पैटर्न ही बदल चुका है। इस बदलाव को समझने की और समझकर खुद को उसके मुताबिक तैयारियों के पैटर्न को ढालने की आवश्यकता है। इस जमाने में लोग चांद तक चले गए मंगल ग्रह में पानी की खोज हो गयी और विज्ञान तो सूरज पर जाने की जिद में लगा है। यानी असंभव अब कुछ भी नहीं रहा. बाजार में पिछले 10 सालों के प्रश्नावली के क्वेश्चन बैंक एक किताब की तरह हाजिर है। पहले इस तरह की किताबें नहीं होती थी, मगर अब यह सुविधा हासिल है तो इस प्रश्नावली बैंक के तमाम प्रश्नों को देखे। उसमें आए बदलाव की आहट को परखे तथा हर सवाल के दिए गए उतर को परखे कि किस तरह सवाल तो वही है मगर जवाब देने का साल दर साल पैटर्न चेंज कर गया। तमाम सवालों के जवाब सिकुडते चले गए तो सवालों की संख्या लंबी हो गयी। पहले यानी 10-12 साल पहले 8-10 सवाल होते थे मगर आज सवालों की संख्या 20 से लेकर कहीं कहीं तो 40-50 तक हो गए है। मार्क सिस्टम भी बदला है। इन बदलावों के साथ कदमताल करने के लिए सभी स्टूडेंटस को भी अपनी तैयारी में योजना के अनुसार परिवर्तन लाना ही होगा।
जब आप बहुत सारे स्टूडेंटस यहां पर हैं तो कॉलेज की पढाई के अलावा आपलोग भी अपनी दो या तीन टीम बनाए. अपनी तैयारी करें और आपस में जब भी समय मिले तो अपनी तैयारियों खोजों या तमाम सवालों पर डिशकशंस (चर्चा) करे। सामूहिक तौर पर चर्चा करना और अपनी तैयारियों का मूल्यांकन करने से बेहतर कोई दूसरी स्टडी स्टाईल दुनिया में हो ही नहीं सकती। एक ही सवाल पर यदि 20-30 स्टूडेंटस मिलकर चर्चा करेंगे तो एक ही सवाल के इतने आयाम सामने आएंगे जो जीवन भर आपको अव्वल ही रखेगा। इसका सबसे बेहतर उदाहरण गया बिहार के धागा कातने काले जाति के बच्चों की है। आज से 10 साल पहले इन बच्चों ने केवल ग्रूप डिशकशंस  के आधार पर आईआईटी की परीक्षाओं में एक ही साथ सामूहिक तौर पर बाजी मारी। पटना के सुपर थर्टी में ज्यादातर गया के ही निर्धन बच्चे ही होते हैं।  गया के 150 से भी ज्यादा बच्चे आईआईटी करने के बाद अब अपना पैटर्न बदला है । हर लड़के ने एक एक दो लड़के को गोद लिया है और अब इनका मिशन आईएएस और आपीएस  सिविल परीक्षाओं में आने की है। आपलोग तो इन बच्चों की हालत से बहुत बेहतर है। यह कॉलेज भी आपलोगों के लिए आपके सुनहरे भविष्य के लिए एकदम सबसे जरूरी विषय पर सेमिनार  करा रहा है। यहां पर बहुत सारे लोग अपनी तरफ से अपने अनुभवों के आधार पर शिक्षा की बदलती जरूरतों पर विचार रखेंगे । जिसे ना केवल आप सुने और नोट करे । बाद में इन वक्ताओं के आलेख की आपस में चर्चा करे तथा तमाम बातों विचारों और नए नए टिप्स को अपनी सुविधा के अनुसार मूल्यांकन करके अपनी जरूरत के अनुसार काम में लाए। एक सेमिनार गुलदस्ते के समान होता है जिसमें नाना प्रकार के विद्वान एकत्रित होकर किसी एक दो विषय की समीक्षा करके अपनी राय जाहिर करते है। इसमें नए विचारों की खिड़की खुलती है। और आप तमाम स्टूडेंटस इन विचारों धारणाओं तथा टिप्पणियों का लाभ ले और उपयोगी बातों को अपनी जिंदगी और अपने कैरियर में शामिल करे।
अंत में मैं फिर एक शेर के साथ ही अपनी बात खत्म करना चाहूंगी  मशहूर शायर जनाब कैफी आजमी का एक नज्म है--
आज की रात बहुत गरम हवा चलती है
आज की रात नींद नहीं आएगी
तुम उठो तुम उठो तुम उठो तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।।
हिन्दी के शायर दुष्यंत कुमार का भी एक बहुत मशहूर शेर है
कैसे आसमान में सूराख हो नहीं सकता ।
तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारो ।।

यहां पर इस कॉलेज के तमाम स्टूडेंटस  को मैं यही अपील करना चाहूंगी कि चाहे आसमान में सूराख करना हो या किसी दीवार में खिड़की खुलवानी हो शायरी में बहुत सरल लगता है, मगर हकीकत में इस तरह की लाईने आपको ताकत देती है। आपकी धारणा को और मजबूत करती है। आपके टारगेट के प्रति आपको और संजीदा बनाते हैं कि यदि कड़ी मेहनत पक्का इरादा और सार्थक पहल करते हैं तो दुनियां की कोई भी परीक्षा कोई भी टारगेट इतना विकराल नहीं है जिसको पाया ना जा सके। जमाना बहुत ग्लैमर का है । चारो तरफ चकाचौंध आकर्षण है मगर यह दो चार साल आपकी जी जान से मंजिल पाने तक लगे रहने का समय है । जिसको नहीं खोना है। यही दो तीन साल है कि जो मेहनत करेगा वहीं अगले 30-35 साल तक मौज भी करेगा।

डा. ममता शऱण (लेक्चरर),

शनिवार, 29 जुलाई 2017

अजूबा-2

अजूबा-1



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दुनियां के 10 बड़े हवाई हादसे






जिसने बदल दी एविएशन की दुनिया
10 Major Plane Crashes That Changed Aviation History :– आज हम आपको एविएशन इतिहास के उन 10 बड़े हादसों के बारे में बताएँगे , जिनसे सबक लेकर एविएशन में सुरक्षा के लिए बड़े सुधार किये जिसकी बदौलत आज हवाई सफ़र काफी हद तक सुरक्षित है। इन 10 बड़े हादसों में 8 बड़े प्लेन क्रैश और दो इमरजेंसी लैंडिंग हैं।1.टीडब्ल्यूए लॉकहीड सुपर और यूनाइटेड एयरलाइंस डगलस डीसी-7 हादसा :
10 Major Plane Crashes That Changed Aviation History, Hindi, Itihas, Information, Story, Kahani,
30 जून 1956 को टीडब्ल्यूए लॉकहीड सुपर और यूनाइटेड एयरलाइंस डगलस डीसी-7 आपस में टकराकर ग्रांड कैनयॉन में बिखर गए। टीडब्ल्यूए लॉकहीड सुपर में 6 क्रू मेंबर के साथ 64 यात्री थे और डगलस डीसी-7 में 5 क्रू सदस्यों के साथ 53 यात्री थे।
मृतक : 128
वजह : दोनों विमान इंस्ट्रूमेंट फ्लाइट रूल्स (आईएफआर) से नियंत्रित थे। दोनों के पायलटों ने पहले से तय रूट में बदलाव किया, क्योंकि एयरवेज सीधे कंट्रोलरूम से नियंत्रित नहीं थीं। उस समय के नियमों के अनुसार कई प्वाइंट्स तय थे। इनमें विभिन्न कंपनियों के रूट तय थे।
बदलाव : इस दुर्घटना की वजह से उस समय 250 मिलियन डॉलर की राशि खर्च करके एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम सुधारा गया।
परिणाम : एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम में सुधार के बाद अमेरिका में 47 साल तक विमानों के आपस में टकराने की कोई दुघर्टना नहीं हुई। इस हादसे के बाद 1958 में फेडरल एविशएन एजेंसी (अब एडमिनिस्ट्रेशन) की शुरुआत की गई। यह एयर सेफ्टी का दायित्व निभाती है।
2-यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 173 हादसा :
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28 दिसंबर 1978 को यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 173 ओरेगन के सब-अर्बन इलाके पोर्टलैंड में क्रैश हो गया। यह विमान पोर्टलैंड के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने वाला था। इमरजेंसी लैंडिंग की कोशिश में प्लेन एयरपोर्ट के दक्षिणपूर्वी हिस्से में क्रैश हो गया, लेकिन इसमें आग नहीं लगी। विमान में 185 यात्री और 8 क्रू मेंबर सवार थे।
मृतक : 8 क्रू मेंबर सहित 19 की मौत।
घायल : 21 यात्री।
वजह : एयरक्राफ्ट के फ्यूल को मॉनिटर करने में कैप्टन की विफलता। इससे दोनों इंजनों से तेल खाली हो गया।फ्यूल की आपूर्ति रुकने के कारण लैंडिंग गियर में गड़बड़ी आई और इमरजेंसी लैंडिंग की कोशिश नाकाम रही।
बदलाव :
-सभी क्रू मेंबर को कॉकपिट ट्रेनिंग देना शुरू किया गया।
-नया कॉकपिट रिसोर्स मैनेजमेंट (सीआरएम) अपनाया गया।
-विमान के अन्य सदस्यों के लिए भी यह तकनीकी प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया गया।
परिणाम : सुधारों के चलते 1989 में आयोवा के सिओक्स सिटी में डीसी-10 की क्रैश लैंडिंग को बचाने में क्रू मेंबर सफल रहे।
3-एयर कनाडा फ्लाइट 797 (मैकडोनेल डगलस डीसी-9-32) हादसा :
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2 जून 1983 को एयर कनाडा फ्लाइट 797 का एक मैकडोनेल डगलस डीसी-9-32 टेक्सास से मॉन्ट्रियल जा रहा था। क्रू मेंबर ने 33,00 फीट की ऊंचाई पर देखा कि प्लेन के पिछले हिस्से में बने शौचालय से धुआं निकल रहा है। पालयट ने सिनसिनाटी के एयरपोर्ट में लैंडिंग करवाई। तुरंत इमरजेंसी दरवाजा और अन्य गेट भी खोले गए, लेकिन लोग प्लेन से निकल पाते, इससे पहले ही आग से कैबिन में विस्फोट हुआ। विमान में  46 लोग सवार थे।
मृतक : 23
वजह : प्लेन के पिछले हिस्से में आग लगना। क्रू मेंबर ने आग की अनदेखी की, लेकिन क्यों लगी, इसका पता नहीं लगाया जा सका।
बदलाव :
– सभी विमानों के शौचालयों में स्मोक डिटेक्टर और ऑटोमैटिक आग बुझाने वाली मशीनें लगीं।
– जेटलाइनर्स की सीटों पर अग्नि प्रतिरोधी परत लगाई गई।
– प्लेन के फ्लोर में भी लाइटिंग की व्यवस्था की गई। इससे घने स्मोक यात्री को बाहर निकलने में परेशानी कम होगी।
परिणाम :
-1988 के बाद विमानों में अधिक से अधिक सुरक्षित और अग्नि प्रतिरोधी इंटीरियर तैयार किया जाने लगा।
4 हादसा – डेल्टा एयरलाइन फ्लाइट 191 (लॉकहीड एल-1011-385-1) :
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2 अगस्त 1985 को टेक्सास के डलास में दोपहर बाद का मौसम कुछ खराब था। तापमान अधिक था, लेकिन नमी भी थी। दोपहर बाद 4:03 बजे डेल्टा एयरलाइन की फ्लाइट 191 ने रनवे से उड़ान भरी ही थी। इस लॉकहीड एल-1011-385-1 में 167 यात्री सवार थे। 800 फीट की ऊंचाई पर कुछ विचित्र घटा। एक विस्फोट हुआ और कुछ ही सेकंड में विमान रनवे और हाईवे पर आ गिरा। इसकी चपेट में एक वाहन आ गया।
मृतक संख्या : 137
हादसे की वजह : वातावरण में आकाशीय बिजली बनने की परिस्थितियां निर्मित होना। यह एक कमजोर फ्रंटल सिस्टम की वजह से स्थिति बनी थी।
सुधार : हादसे के बाद नासा ने विंड-विंडशीयर डिटेक्टर रडार तैयार किए।
परिणाम : इस घटनाबाद से इस तरह की एक ही दुर्घटना दर्ज की गई है।
5- एयरोमेक्सिको फ्लाइट 498 हादसा :
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1956 में ग्रांड कैनयॉन में हवाई दुघर्टना के बाद एटीसी सिस्टम ने एयरलाइनों के अलग-अलग रूट बनाए गए थे। इससे हादसे रोकने में बड़ी मदद मिली थी। इसके बावजूद, लॉस एंजलिस में 31 अगस्त 1986 को एक निजी 4 सीटर पाइपर आर्चर विमान को कंट्रोल रूम का सिस्टम डिटेक्ट नहीं कर पाया। एयरोमैक्सिको डीसी-9 के पायलट ने बड़ी भूल कर दी और लैडिंग करने जा रहे यात्री विमान एलएएक्स से जा टकराया। दोनों प्लेन के टुकड़े रहवासी इलाके के 20 किमी के दायरे में बिखर गए।
मृतक : 82
कारण : कंट्रोल रूम का सिस्टम एयरपोर्ट एरिया में आए छोटे विमान को डिटेक्ट नहीं कर पाया।
बदलाव :
– छोटे विमानों को नियंत्रित एरिया में प्रवेश देने के लिए ट्रांसपोंडर्स का प्रयोग किया जाने लगा। यह इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस विमान की स्थिति और उसकी उड़ान की ऊंचाई का पूरा विवरण देती है।
– विमान कंपनियों को टीसीएस-2  भिड़ंत से बचाने वाला सिस्टम लगाना जरूरी कर दिया गया।
– ऐसी स्थितियों से ट्रांसपोंडर पायलट को विमान बचाने के लिए सही निर्देश देते हैं।
परिणाम : अमेरिका में इस प्रणाली को अपने के बाद कोई भी छोटा प्लेन किसी एयरलाइनर से नहीं टकराया।
6- अलोहा एयरलाइंस, फ्लाइट 243, (बोइंग 737-200, एन 73711) हादसा :
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28 अप्रैल 1988 को अलोहा एयरलाइंस की फ्लाइट 243 का बोइंग 737 विमान के ढांचे की बड़ी खामी उजागर हुई। हिलो से हवाई के होनोलुलु के लिए उड़ान भरने वाले इस विमान में 24, 000 फीट की ऊंचाई हादसा हुआ। कैबिन का दरवाजा और यात्रियों के ऊपर की छत निकलकर अलग हो गए। प्लेन में 89 यात्री और 6 क्रू मेंबर सवार थे।मावी द्वीप के कहुलुई एयरपोर्ट पर विमान की इमरजेंसी लैंडिंग
करवाई गई।
मृतक : कोई नहीं
घायल : 7 यात्री और एक विमान सहायक को गंभीर चोटें
वजह : पर्याप्त मैंटेनेंस नहीं होना।
बदलाव : एयर कैरियर मैंटेनेंस प्रोग्राम और निगरानी कार्यक्रम शुरू किए गए।  इंजीनियरिंग डिजाइन के प्रमाणीकरण और गुणवत्ता के लिए नए मानदंड तय किए गए।
7- यूएस एयर फ्लाइट 427, (बोइंग 727) हादसा:
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8 सितंबर 1987 को अमेरिकी एयर फ्लाइट 427 का बोइंग 727 पिट्सबर्ग इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास पहुंचा। यह 6,000 फीट की ऊंचाई पर था, तभी अचानक रडार लेफ्ट साइड में खिसक गया। प्लेन गोता खाने लगा। क्रू ने इसे नियंत्रित करने की काफी कोशिश की, लेकिन इसे रोका नहीं जा सका। विमान में 132 लोग सवार थे।
मृतक : 132
वजह : रडार के लेफ्ट की ओर जाने से पायलट का विमान पर नियंत्रण हटना। पांच साल की जांच के बाद एनटीएसबी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि एक वाल्व जाम होने की वजह से रडार सिस्टम अपनी जगह से हट गया। इससे यह हादसा हुआ।
विवाद : यूएस एयर ने बोइंग को दोष दिया और कंपनी ने क्रू मेंबर को दोषी बताया।
बदलाव : बोइंग ने 500 मिलियन डॉलर खर्च करके 28,00 जेट विमानों में पुराने रडार के पुर्जे बदलकर
नए लगाए।
परिणाम :  विमान हादसे में मारे गए यात्रियों के परिवारों की मदद के लिए एविएशन डिजास्टर फैमिली असिस्टेंस एक्ट पारित किया गया।
8-  एस03ई06 वालू जेट फ्लाइट 572 हादसा :
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11 मई 1996 को वालू जेट फ्लाइट 572 को फ्लोरिडा स्टेट की मियामी सिटी के इंटरनेशनल एयरपोर्ट से 110 लोगों को लेकर अटलांटा के लिए उड़ान भरी थी। इसके कार्गो कंपार्टमेंट में आग लगने से एवरग्लेड्स में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह विमान तकनीकी कारणों से 1 घंटा 4 मिनट की देरी से उड़ान भर सका था। दरअसल, यह 27 साल पुराना प्लेन था। पहली बार इसने 18 अप्रैल 1969 को उड़ान भरी थी। दो सालों से विमान में लगतार खराबी की शिकायतें आ रही थीं।
मृतक : 110
वजह : विमान में आग लगने से इलेक्ट्रिक आपूर्ति में गड़बड़ी आई और पायलट ने नियंत्रण खो दिया।
– यह आग केमिकल ऑक्सीजन जनरेटर्स की वजह से लगी थी। इन्हें गैर कानूनी तरीके एयरलाइंस मैंटेनेंस की ठेकेदार कंपनी ने विमान में रखा था।
– पायलट प्लेन को सही समय पर लैंड नहीं करवा सका।
बदलाव : सभी एयरलाइनर के लिए कार्गो कैबिन में आग बुझाने वाले ऑटोमैटिक उपकरण लगाना अनिवार्य किया।
-विमानों में ज्वलनशील पदार्थों को ले जाने पर कड़ाई से रोक लगा दी गई।
परिणाम: ऐसे कारणों वाले हादसे फिर देखने को नहीं मिले।
9- टीडब्ल्यूए फ्लाइट 800- बोइंग 747 हादसा :
Flight 800 disaster
17 जुलाई 1996 को जेएफके इंटरनेशनल एयरपोर्ट से पेरिस के लिए उड़ान भरी थी, लेकिन यह अटलांटिक सागर में डूब गया। विमान में 230 लोग सवार थे।
मृतक:  230
कारण : विमान के मलबे को खोजा नहीं जा सका।
विवाद :  मीडिया में अफवाहें थीं कि आतंकी संगठन ने हमला किया या मिसाइल हमले में विमान को गिराया गया। जांच एजेंसियों ने इससे इनकार किया। चार साल की जांच के बाद फ्यूल टैंक में आग लगने की आशंका जताई ।
बदलाव : विमानों में वायरिंग में स्पार्किंग की संभावनाओं को कम किया गया। बोइंग ने एक फ्यूल- इंटरिंग सिस्टम तैयार किया। यह फ्यूल टैंक में नाइट्रोजन गैस पहुंचाता है, जिससे विस्फोट की संभावनाएं कम हो जाती हैं।
परिणाम : फ्यूल टैंक में आग लगने की संभावना काफी कम हो गई।
10- स्विसएयर फ्लाइट 111 हादसा :
Flight 111 disaster
स्विसएयर की फ्लाइट 111 (मैकडोनेल डगल एमडी 11) न्यूयॉर्क से जिनेवा जा रही थी। कॉकपिट से धुआं निकला और चार मिनट बाद पायलट ने हालिफैक्स की ओर विमान को नीचे किया। यह नोवा स्कोटिया से 65 किमी दूर अटलांटिक सागर में जा गिरा। विमान में 229 यात्री सवार थे।
मृतक : 229
कारण : कॉकपिट में आग लगना। यह  प्लेन की एंटरटेनमेंट नेटवर्क में स्पार्किंग होने लगी थी।
बदलाव : मेयलर इंसुलेशन कंपनी ने 700 मैकडोनेल डगलस जेट की नई वायरिंग लगाई। इसे अग्निरोधी सामग्री के साथ लगाया गया।
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रामलीला रामनगर, वाराणसी




प्रस्तुति- अमरेश सिन्हा


रामनगर
—  city  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला वाराणसी
जनसंख्या 39,941 (2001 तक )
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)

• 64 मीटर (210 फी॰)
निर्देशांक: 25.28°N 83.03°E रामनगर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी जिला का एक तहसील है। रामनगर में एक किला है जिसे रामनगर किला कहते हैं और ये यहां के राजा काशी नरेश का आधिकारिक और पैतृक आवास है। काशी नरेश (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं।[1] रामनगर किला]] में यहां के राजाओं का एक संग्रहालय भी है। ये राजाओं का १८वीं शताब्दी से आवास है।[2]

अनुक्रम

रामनगर की रामलीला

यहां दशहरा त्यौहार खूब रौनक और तमाशों से भरा होता है। इस अवसर पर रेशमी और ज़री के ब्रोकेड आदि से सुसज्जित भूषा में काशी नरेश की हाथी पर सवारी निकलती है और पीछे-पीछे लंबा जलूस होता है।[1] फिर नरेश एक माह लंबे चलने वाले रामनगर, वाराणसी की रामलीला का उद्घाटन करते हैं।[1] रामलीला में रामचरितमानस के अनुसार भगवान श्रीराम के जीवन की लीला का मंचन होता है।[1] ये मंचन काशी नरेश द्वारा प्रायोजित होता है अर पूरे ३१ दिन तक प्रत्येक शाम को रामनगर में आयोजित होता है।[1] अंतिम दिन इसमें भगवान राम रावण का मर्दन कर युद्ध समाप्त करते हैं और अयोध्या लौटते हैं।[1] महाराजा उदित नारायण सिंह ने रामनगर में इस रामलीला का आरंभ १९वीं शताब्दी के मध्य से किया था।[1]

सरस्वती भवन

रामनगर किले में स्थित सरस्वती भवन में मनुस्मृतियों, पांडुलिपियों, विशेषकर धार्मिक ग्रन्थों का दुर्लभ संग्रह सुरक्षित है। यहां गोस्वामी तुलसीदास की एक पांडुलिपि की मूल प्रति भी रखी है।[1] यहां मुगल मिनियेचर शैली में बहुत सी पुस्तकें रखी हैं, जिनके सुंदर आवरण पृष्ठ हैं।[1]
व्यास मंदिर, रामनगर प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार जब वेद व्यास जी को नगर में कहीं दान-दक्षिणा नहीं मिल पायी, तो उन्होंने पूरे नगर को श्राप देने लगे।[1] उसके तुरंत बाद ही भगवान शिव एवं माता पार्वतीएक द पति रूप में एक घर से निकले और उन्हें भरपूर दान दक्षिणा दी। इससे ऋषि महोदय अतीव प्रसन्न हुए और श्राप की बात भूल ही गये।[1] इसके बाद शिवजी ने व्यासजी को काशी नगरी में प्रवेश निषेध कर दिया।[1] इस बात के समाधान रूप में व्यासजी ने गंगा के दूसरी ओर आवास किया, जहां रामनगर में उनका मंदिर अभी भी मिलता है।[1]

भूगोल

रामनगर 25.28°N 83.03°E पर स्थित है।[3] यहां की औसत ऊंचाई ६४ मीटर (२०९ फीट) है।

सन्दर्भ


  • मित्रा, स्वाति (२००२). गुड अर्थ वाराणसी सिटी गाइड. आयशर गुडार्थ लि.. प॰ २१६. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788187780045.

  • Mitra, Swati (2002). Good Earth Varanasi city guide. Eicher Goodearth Limited. प॰ 216. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788187780045.

  • बाहरी कड़ियाँ

    भारत-चीन की तनातनी के बीच भूटान क्यों?





    प्रस्तुति- डा. ममता शऱण


    भारत-चीन की तनातनी पर भूटान ख़ामोश क्यों? By: दिलीप कुमार शर्मा - बीबीसी हिंदी के लिए Updated: Friday, July 21, 2017, 18:22 [IST] Subscribe to Oneindia Hindi पिछले एक महीने से डोकलाम सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के बीच ठनी हुई है. दोनों देशों के मीडिया में जहां तनाव वाली ख़बरें सामने आ रहीं हैं तो वहीं भूटान में इस मसले पर खामोशी दिख रही है. जबकि डोकलाम का यह विवादित मसला प्रत्यक्ष तौर पर चीन और भूटान के बीच है. Expand Expand भूटान Getty Images भूटान क्या भारत-चीन युद्ध के कगार पर खड़े हैं? भारत-चीन भिड़े तो नतीजे कितने ख़तरनाक? भारत के साथ भूटान की कुल 699 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा में असम के साथ भूटान का 267 किलोमीटर बॉर्डर है. असम से एक मात्र सामड्रुप जोंगखार शहर के ज़रिए ही भूटान के अंदर प्रवेश किया जा सकता है. भूटान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित सामड्रुप जोंगखार शहर में सालों से व्यापार कर रहे अधिकतर भारतीय नागरिकों का कहना है कि सीमा विवाद पर भारत-चीन के बीच तनाव से जुड़ी ख़बर पर यहां कोई चर्चा नहीं करता. इसलिए उन्हें ऐसा अहसास ही नहीं होता कि भारत और चीन के बीच कुछ चल रहा है. यहां कोई असर नहीं राजस्थान से आकर यहां बसे राकेश जालान ने बीबीसी से कहा, "भारत-चीन के बारे में हमें यहां कुछ अहसास ही नहीं होता. कई बार टीवी की ख़बरों से ज़रूर यह पता चलता है. लेकिन भारत और चीन विवाद को लेकर हमारे यहां किसी तरह की चर्चा नहीं हैं." "मेरे दादा जी करीब 50 साल पहले भूटान आए थे. उसके बाद पिताजी आए और हम यहीं बस गए. यहां का माहौल हमेशा से काफ़ी शांतिपूर्ण है. काफ़ी दोस्ताना स्वभाव के लोग हैं. ऐसे में हमें कभी यह अहसास ही नहीं होता कि हम भारत से बाहर किसी दूसरे देश में रह रहें हैं.' कपड़े की दुकान चलाने वाले राकेश कहते है कि भूटान सरकार यदि भारतीय व्यापारियों के लिए मौजूदा क़ानून में और परिवर्तन लाए तो आगे हमें यहां रहने में अधिक सुविधा मिलेगी. सामड्रुप जोंगखार शहर में भारतीय व्यापारियों की करीब 30 से 35 दुकाने हैं. इसके अलावा भूटान के सीमावर्ती फुन्त्शोलिंग, गेलेफू जैसे शहर में भी भारतीय लोग सालों से व्यापार कर रहें हैं. सुरेश अग्रवाल पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी शहर से हैं. वो कहते है, "यहां लाइफ अच्छी चल रही है. किसी तरह की कोई समस्या नहीं है. चीन के साथ विवाद को लेकर हमारे यहां किसी तरह का हल्ला नहीं है. न ही हमें कोई डर हैं. यहां से छोड़कर जाने का सवाल ही नहीं उठता. मेरा जन्म यहीं हुआ है और मरते दम तक हम यही रहेंगे." भूटान में शांति उत्तर प्रदेश के बलिया से तकरीबन 40 साल पहले यहां आकर बसे लल्लू प्रसाद गुप्ता ने बीबीसी से कहा, "भारत और चीन के बीच तनातनी या फिर युद्ध के ख़तरे जैसी किसी भी बात की हमें कोई ख़बर नहीं है. यहां इस तरह की कोई चर्चा भी नहीं है. ऐसी बात दिल में कभी नहीं आती, क्योंकि हमारे इलाक़े (भूटान) में काफ़ी शांति है और हम पूरी तरह सुरक्षित है." वह आगे कहते है, "यहां तो अब हमारी उम्र बीत चुकी है. जब मैं भूटान आया था उस समय मेरी उम्र 18 साल थी और आज मैं 58 साल का हूं. अब यही पर जीना-मरना है. हम चाहते हैं कि भूटान सरकार हमारे बारे में और थोड़ा सोचे. यहां के लोग बहुत अच्छे हैं और हम एक-दूसरे को काफ़ी सम्मान देते है." Expand भूटान Getty Images भूटान लल्लू प्रसाद गुप्ता के बड़े भाई करीब 55 साल पहले भूटान के सामड्रुप जोंगखार शहर आए थे. यहां जनरल स्टोर की दुकान चलाने वाले गुप्ता भूटान सरकार के मौजूदा क़ानून को थोड़ा कड़ा बताते हैं. वह यह भी कहते है कि भूटान में क़ानून सबके लिए बराबर है. इसलिए वे काफ़ी सोच समझ कर और क़ानून के दायरे में रहकर अपना व्यापार करते हैं. मालिकाना हक़ नहीं दरअसल भूटान में व्यापार कर रहें इन भारतीय लोगों को भले ही यहां बसे 50 साल से अधिक समय हो चुका हे लेकिन इनमें से किसी भी व्यापारी के पास घर या दुकान का मालिकाना अधिकार नहीं है. भूटान सरकार ने इन लोगों को दुकान और मकान दोनों ही एक साल के लिए लीज पर दे रखा है और एक साल बाद फिर से नया लीज बनाना पड़ता है. लीज के अनुसार कोई भी व्यापारी सरकार की अनुमति लिए बगैर किसी तरह का निर्माण कार्य नहीं कर सकता. इस संदर्भ में एक व्यापारी ने अपना नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि हमारा परिवार 1963 में यहां आया था. पहले यहां काफ़ी आजादी थी. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में भूटान सरकार ने नियमों को काफ़ी सख्त बना दिया हैं. पहले परिवार के सभी लोगों को एक साल के लिए पहचान पत्र दिया जाता था. लेकिन अब भूटान सरकार केवल व्यापार करने वाले यानी जिसके नाम पर दुकान होती है उसको और उसकी पत्नी को ही आई-कार्ड जारी करती है. ऐसे में व्यापारी के भाई-भतीजे या फिर अन्य रिश्तेदारों को आधिकारिक रूप से यहां रहने की अनुमति नहीं दी जाती. भूटान के इस इलाक़े में मीडिया की उपस्थिति कम ही देखने को मिली. हालांकि एक-दो दुकानों पर भुटान का राष्ट्रीय अखबार कुएनसेल ज़रूर दिखाई दिया परंतु उसके पहले पन्ने पर चीन के साथ सीमा विवाद से जुड़ी कोई ख़बर नहीं थी. भूटान अब एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन यहां आज भी राजतंत्र का प्रभाव ज़्यादा दिखता है. लिहाजा वहां के लोग अपने देश के बारे मीडिया से खुलकर बात नहीं करते. राजा की तस्वीर यहां हर दुकान के भीतर राजा की तस्वीर लगाना अनिवार्य है. वहीं शहर में जगह-जगह तैनात रॉयल भूटान पुलिस के सिपाही अपनी नीली रंग की वर्दी पर यहां के राजा की तस्वीर वाला बैज ज़रूर लगाते हैं. पूर्वोत्तर राज्य असम की सीमा से सटा भूटान का सामड्रुप जोंगखार ज़िला 2003 में उस वक़्त सुर्खियों में आया था जब असम के अलगाववादी संगठन उल्फा के खिलाफ रॉयल भूटान सेना ने 'ऑपरेशन आल क्लियर' अभियान चलाया था. इस सैन्य अभियान में रॉयल भूटान सेना ने उल्फा के सारे कैंप नष्ट कर दिए थे और सभी अलगाववादियों को देश से बाहर निकाल दिया था. उस समय उल्फा के केंद्रीय कमांडर का मुख्यालय, सामड्रुप जोंगखार के फुकापटोंग में हुआ करता था. BBC Hindi

    Read more at: http://hindi.oneindia.com/news/india/why-bhutan-is-silent-on-doklam-standoff-415925.html

    नाथूला दर्रा



    प्रस्तुति- डा. ममता शरण


    नाथूला हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम राज्य और दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी को जोड़ता है।[1] यह १४ हजार २०० फीट की ऊंचाई पर है। भारत और चीन के बीच १९६२ में हुए युद्ध के बाद इसे बंद कर दिया गया था। इसे वापस जूलाई ५, २००६ को व्यापार के लिए खोल दिया गया है। बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत और चीन के होनेवाले व्यापार का ८० प्रतिशत हिस्सा नाथू ला दर्रे के ज़रिए ही होता था। यह दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग की एक शाखा का भी हिस्सा रहा है।[2] 'ला' शब्द तिब्बती भाषा में 'दर्रे' का अर्थ रखता है।[3]
    नाथू ला
    Nathu La

    भारतीय तरफ़ से भारत-तिब्बत अंतरराष्ट्रीय सीमा तक जाती सीढ़ीयाँ
    ऊँचाई 4,310 m (14,140 ft)
    चक्रमण पुराने रेशम मार्ग की एक शाखा
    स्थिति
    स्थिति Flag of India.svg भारत (सिक्किम) – Flag of the People's Republic of China.svg चीन (तिब्बत स्वशासित प्रदेश)
    शृंखला हिमालय
    निर्देशांक 27°23′11″N 88°49′52″E / 27.386448°N 88.831190°E
    भारत की ओर से यह दर्रा सिक्किम की राजधानी गान्तोक शहर से तकरीबन 54 कि.मी. (34 मील) पूरब में स्थित है। केवल भारतीय नागरिक ही यहाँ जा सकते हैं और इसके लिए भी उन्हें गान्तोक से पारपत्र (पास) बनवाना होता है।
    नाथू ला दर्रा, चीन और भारत के बीच आपसी समझौतों द्वारा स्थापित तीन खुले व्यापार की चौकियों में से एक है, जबकि दो अन्य हैं - हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला और उत्तराखण्ड स्थित लिपु लेख।[4] 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद बंद कर दिए जाने के बाद, साल 2006 में कई द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के बाद नाथू ला को खोला गया। दर्रे कह खोला जाना हिन्दू और बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस क्षेत्र में मौजूद कई तीर्थ स्थलों की दूरी कम कर देता है, साथ ही इसके खुलने से भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार बढ़ने के कारण इस इलाके की अर्थव्यवस्था को गति मिलने की आशा की गयी थी हालाँकि, व्यापार कुछ ख़ास वस्तुओं तक ही सीमित है और सप्ताह के दिन भी सीमित हैं जिन दिनों यह मार्ग व्यापार हेतु खोला जाता है।

    भारतीय ओर से नाथू ला से देखने पर भूटान के सुदूर पर्वत, तिब्बत की ओर का हिस्सा, अंतर्राष्ट्रीय सीमा की बाड़
    यह भारतीय और चीनी सेना के मध्य आपसी समझौते द्वारा स्थापित उन चार स्थलों में से एक भी है जहाँ दोनों सेनाओं के लोग आपसी गतिरोध दूर करने के लिए मिल सकते हैं। ये चार सीमा-बिंदु हैं: चुशुल (लद्दाख), नाथू ला, बुम ला दर्रा (तवांग जिला, अरुणाचल प्रदेश) और लिपुलेख दर्रा (उत्तराखण्ड)।[5]

    अनुक्रम

    अर्थव्यवस्थासंपादित करें

     
    नाथू ला में भारतीय और चीनी अफ़सर
    1962 तक, दर्रे के बंद किये जाने से पहले, कई तरह के सामान जैसे कि, पेन, घड़ियाँ, अनाज, सूती कपड़े, खाद्य तेल, साबुन, भवन निर्माण सामग्री, और टुकड़ों में खोल कर बाद में जोड़े जा सकने के लिए स्कूटर और चार-पहिया वाहन इस दर्रे से होकर खच्चरों की पीठ पर लाद कर तिब्बत भेजे जाते थे। दो सौ खच्चर, लगभग 80-किलोग्राम (180 पौंड) वजन का सामान लाद कर गान्तोक से ल्हासा जाते थे और इसमें तकरीबन 20–25 दिन लगा करते थे। लौटते समय रेशम, ऊन, कस्तूरी, औषधीय पौधे, स्थानीय शराब, कीमती पत्त्थर, सोना और चाँदी के बने सामान भारत आयात किये जाते थे।[6] उस दौर में ज्यादातर व्यापार मारवाड़ी समुदाय द्वारा संचालित किया जाता था जो 200 अधिकृत फर्म में से लगभग 95% के मालिक थे।[7]
    जुलाई 2006 से, सोमवार और गुरुवार को व्यापार खुला रहता है।[8] भारत से होने वाले निर्यात जिन्हें करमुक्त किया गया है, कृषि उपकरण, कम्बल, तांबे निर्मित वस्तुयें, कपड़े, साइकिल, कॉफ़ी, चाय, जौ, चावल, गेहूँ, आटा, मेवे, फल, सब्जियाँ, वनस्पति घी, तंबाकू, मसाले, जूते, मिट्टी का तेल, स्टेशनरी, बटुए, दुग्घ विनिर्मित उत्पाद, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, डाई (रंग), और स्थानीय जड़ी-बूटियाँ हैं। चीनी निर्यातों में बकरी का चमड़ा, भेड़ चर्म, ऊन, कच्चा रेशम, याक की पूँछ, याक के बाल, चीनी मिट्टी, बोराक्स, मक्खन, साधारण नमक, घोड़े, बकरियाँ और भेड़ों को व्यापार कर (ड्यूटी) से मुक्त रखा गया है।[4][9] व्यापारियों पर निर्बन्ध लगाए गए हैं और केवल उन्हीं को अनुमति प्राप्त है जो 1975 में भारत में विलय से पूर्व सिक्किम के नागरिक थे।
     
    नाथू ला- तिब्बत अभियान के दौरान 1938 में खिले हुये बुरांस के फूलों के बीच
    भारतीय व्यापारियों को यह भय था कि तिब्बत में भारतीय वस्तुओं को सीमित बाजार मिलेगा जबकि चीन की पहुँच पहले से मौजूद सिक्किम और पश्चिम बंगाल के बाजार तक हो जायेगी।[10] इस दर्रे के दुबारा खोले जाने से यह आशा की गयी थी कि इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और भारत-चीन सम्बन्ध प्रगाढ़ होंगे, हालाँकि यह हुआ नहीं। तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्रीय वाणिज्य ब्यूरो के आंकड़े दिखाते हैं कि साल 2006 में 51 दिनों के व्यापार में, मात्र US$186,250 मूल्य की वस्तुओं का व्यापार नाथू ला द्वारा हो पाया।[11]
     
    तिब्बती तीर्थ यात्री बौद्ध धर्म के पवित्र मठों में से एक रुम्तेक मठ की यात्रा करने इस दर्रे से आ सकते हैं।
    भारतीय ओर से, दर्रे तक बुधवार, गुरुवार, शनिवार, और रविवार को केवल भारतीय नागरिक ही जा सकते हैं[12] और इसके लिए उन्हें एक दिन पूर्व गान्तोक से अनुमति लेनी होती है।[13] यह दर्रा खासतौर पर उन तिब्बती तीर्थयात्रियों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो प्रसिद्ध और पवित्र माने जाने वाले बौद्ध मठों में से एक रुम्तेक मठ की यात्रा करना चाहते हों। हिन्दुओं के लिए, यह दर्रा मानसरोवर झील की यात्रा के समय को पन्द्रह दिनों से घटा का दो दिन की बना देता है।[14]
    भारतीय सरकार का एक प्रमुख चिंता का विषय यह है कि वन्यजीव उत्पादों, जैसे शेर और तेंदुए की खाल, हड्डियाँ, भालू का गाल ब्लैडर, ऊदबिलाव के फर और शाहतूश ऊन का अवैध व्यापार होगा और ये सामान नाथूला से होकर भारतीय बाजार में आने लगेंगे। भारत सरकार पुलिस और क़ानून प्रवर्तक एजेंसियों को इस व्यापार हेतु संवेदनशील बनाने के लिए प्रोग्राम चला रही है। अभी इस तरह का ज्यादातर अवैध व्यापार नेपाल के रास्ते होता है।[15]

    यातायातसंपादित करें

    तिब्बत की ओर के हिस्से में दो हाइवे — कंगमार से याडोंग और याडोंग से नाथू ला — वर्ष 2006 की निर्माण योजनाओं में प्रस्तावित हुए। अगले एक दशक में किंगहाई-तिब्बत रेलमार्ग को विस्तार देकर याडोंग तक पहुँचाने के कार्य भी प्रगति पर हैं।[16]
    वर्तमान में सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन, भारत की ओर न्यू जलपाईगुड़ी में और तिब्बत की ओर जियांगज़ी में हैं।
    चीनी सरकार रेलमार्ग को याडोंग तक लाना चाहती है जो नाथू ला से कुछ ही किलोमीटर (मील) की दूरी पर है।[17] इसके अलावा, भारतीय सरकार दार्जिलिंग जिले में स्थित सेवोके नामक स्थान से सिक्किम कि राजधानी गान्तोक तक रेल मार्ग विस्तार बनाना चाहती है, गान्तोक की दूरी नाथू ला से 38-मील (61 कि.मी.) है।[18]

    इन्हें भी देखेंसंपादित करें

    सन्दर्भसंपादित करें


  • China's Shadow Over Sikkim: The Politics of Intimidation, G. S. Bajpai, pp. 7, Lancer Publishers, 1999, ISBN 9781897829523, ... Since good roads have also been constructed by the Chinese leading to important Nathu La and Jelep La passes, this axis offers an easy route of thrust from the Chumbi Valley of Tibet to India ...

  • Chinese Tax Law and International Treaties, Lorenzo Riccardi, pp. 166, Springer, ISBN 9783319002750, ... In addition, on July 6, 2006, China and India reopened Nathula, an ancient trade route that was part of the Silk Road ...

  • प्रधान, केशव (6 जुलाई 2006). "In the good ol' days of Nathu-la" (अंग्रेजी में). टाइम्स ऑफ इण्डिया, मुम्बई (बेनेट कोलमैन & कं॰ लि॰): p. 10.

  • "Nathula reopens for trade after 44 years". "ज़ी न्यूज". 6 जुलाई 2006. http://www.zeenews.com/articles.asp?aid=307263&sid=NAT. अभिगमन तिथि: 6 जुलाई 2006.

  • "Indian soldiers prevent Chinese troops from constructing road in Arunacha –" (अंग्रेजी में). टाइम्स ऑफ इण्डिया. http://timesofindia.indiatimes.com/india/Indian-soldiers-prevent-Chinese-troops-from-constructing-road-in-Arunachal/articleshow/44953671.cms/.

  • रॉय, अम्बर सिंह (25 नवम्बर 2003). "Nathula 'Pass'port to better trade prospects with China". हिन्दू बिजनेस लाइन. दि हिन्दू. http://www.blonnet.com/2003/11/25/stories/2003112502160200.htm. अभिगमन तिथि: 6 जुलाई 2006.

  • सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; toi-2 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।

  • सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; bbc-1 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।

  • वाणिज्य एवम् उद्योग मन्त्रालय, भारत सरकार (23 अगस्त 2006). "Trade Between India And China Through Nathu La Pass [नाथू ला दर्रे से होकर भारत और चीन के बीच व्यापार]". प्रेस सूचना ब्यूरो: प्रेस रिलीज. NIC. http://pib.nic.in/release/release.asp?relid=20154. अभिगमन तिथि: 16 फ़रवरी 2007.

  • "Nathu-la shows the way: It opens a new route to amity". The Tribune. 8 अगस्त 2006. http://www.tribuneindia.com/2006/20060708/edit.htm#2. अभिगमन तिथि: 2 दिसम्बर 2006.

  • "Nathu La Pass on Sino-Indian border closes [चीन-भारत सीमा पर नाथू ला दर्रा]" (en में). चाइना डेली. 15 अक्टूबर 2006. http://www.chinadaily.com.cn/china/2006-10/15/content_708347.htm. अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी 2007.

  • सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; Soil नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।

  • एन्विस दल (4 जून 2006). "Ecodestination of India-Sikkim Chapter" (PDF). Eco-destinations of India. दि एनवायरमेंटल इनफार्मेशन सिस्टम (ENVIS), पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार. p. 45. Archived from the original on 19 जून 2007. https://web.archive.org/web/20070619234731/http://www.scstsenvis.nic.in/Sikkim%20chapter.pdf. अभिगमन तिथि: 1 दिसम्बर 2006.

  • विनायक, जी॰ (28 जुलाई 2004). "Nathu La: closed for review [नाथू ला पुनरीक्षण हेतु बंद]" (en में). दि रेडिफ स्पेशल (रीडिफ़.कॉम). http://www.rediff.com/news/2004/jul/28spec2.htm. अभिगमन तिथि: 26 नवम्बर 2006.

  • पेराप्प्दन, बिन्दु शाजन (23 जून 2006). "Doubts over traffickers using re-opened Nathula Pass [दुबारा खुले नाथूला दर्रे के तस्करों द्वारा प्रयोग का सन्देह]" (en में). द हिन्दू. http://www.hindu.com/2006/06/23/stories/2006062322050300.htm. अभिगमन तिथि: 6 जुलाई 2006.

  • "China to build three railways in Tibet [तीन रेलमार्ग बनाएगा तिब्बत में चीन]" (en में). चाइना डेली. 29 जून 2006. http://www.chinadaily.com.cn/bizchina/2006-06/29/content_629162.htm. अभिगमन तिथि: 22 मई 2008.

  • Asia Times Online :: South Asia news, business and economy from India and Pakistan

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