गुरुवार, 5 अगस्त 2021

History_Of_Hindu_Chemistry

 #History_Of_Hindu_Chemistry के लेखक महान रसायनज्ञ, शिक्षक, उद्यमी और #संस्कृत प्रेमी डॉ. #प्रफुल्लचंद्र_राय का जन्म 2 अगस्त, 1861 ई. में #जैसोर ज़िले के #ररौली गांव में हुआ था। यह स्थान अब #बांग्लादेश में है तथा #खुल्ना ज़िले के नाम से जाना जाता है।


उनके पिता हरिश्चंद्र राय इस गाँव के प्रतिष्ठित ज़मींदार थे। वे प्रगतिशील तथा खुले दिमाग के व्यक्ति थे। आचार्य राय की माँ भुवनमोहिनी देवी भी एक प्रखर चेतना-सम्पन्न महिला थीं। जाहिर है, प्रफुल्ल पर इनका प्रभाव पड़ा था। आचार्य राय के पिता का अपना पुस्तकालय भी था। 


सन 1897 में #रसायनशास्त्र के ही एक विद्वान उनसे प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता में जब मिलने आये तो वो उनसे भारतीय रसायनशास्त्र पर किताब लिखवाना चाहते थे। अपने ही क्षेत्र के एक विद्वान् की अपील पर प्रोफेसर पी.सी.रे ने “#रसेन्द्र_सार_संग्रह” को आधार मानकर एक छोटी सी पुस्तिका 1898 में ही तैयार कर दी। अपनी इस किताब को पढ़कर प्रोफेसर पी.सी. रे की रूचि खुद ही हिन्दुओं के प्राचीन रसायनशास्त्र के ज्ञान को दुनिया के सामने लाने में जाग गई। अब उन्होंने हिन्दु रसायनशास्त्र के ज्ञान को वृहद् रूप में दुनिया के सामने लाने की ठानी।


अपने शोध के लिए उन्होंने कविभूषण श्री राम पंडित नवकांत की मदद ली और #चरक, #सुश्रुत जैसे आयुर्वेद और रसायन के ग्रंथों से जानकारी इकठ्ठा की। जैसे जैसे काम आगे बढ़ने लगा, वैसे वैसे प्रोफेसर रे को समझ में आने लगा कि ये कोई छोटा मोटा काम नहीं है। करीब चार साल की मेहनत के बाद किताब का पहला भाग तैयार हुआ। इससे पहले कि किताब का दूसरा भाग तैयार हो पाता, पहले भाग की सारी प्रतियाँ बिक चुकी थी। पहले भाग का दूसरा संस्करण 1904 में निकालना पड़ा। जब तक 1909 में दूसरा भाग तैयार होता किताब लिखने की प्रेरणा देने वाले एम. बेर्थेलॉट गुजर चुके थे। उनकी प्रेरणा को याद करते हुए किताब का दूसरा भाग भी उन्हीं को समर्पित है।


दूसरे भाग को तैयार करने में जब प्रोफेसर पी.सी.रे को अपनी जानकारी कम लगी तो उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज के प्रिंसिपल श्री ब्रजेन्द्र नाथ सील से भी मदद ली। दूसरे भाग में यांत्रिक और भौतिक रसायन से जुड़े हिन्दुओं के कई सिद्धांत उन्होंने लिखे हैं। इस किताब में उस दौर की ही भाषा का इस्तेमाल हुआ है जो पढने में थोड़ी कठिन लग सकती है। पुराने संस्करण होने के कारन फ्रांसीसी और ग्रीक भाषा के उद्धृत अंशों का अनुवाद भी नहीं है। उस दौर में रसायन के छात्रों को आम तौर पर बेर्थेलॉट, ब्लूमफील्ड, कोलब्रुक, गॉब्लेट जैसे कई लेखकों का लिखा और साथ ही विदेशी भाषाओं के हिस्से भी पढ़ने की आदत होती थी।


ब्रिटिश शासन में, उनकी ही नौकरी करते हुए भी लेखक ने किताब में कई कड़ी टिप्पणियाँ की हैं। उनकी रसायनशास्त्र की जानकारी पर सवाल नहीं उठाये जा सकते इसलिए टिप्पणियों को भी मान्य करना पड़ता है। वो कोवेल आर गौघ जैसे तथाकथित विद्वानों के गलत अनुवादों को चुनकर बता देते हैं। साथ ही उन्होंने यूल की किताब मार्काे पोलो से निकाल कर योगियों का वर्णन भी अपनी बात के समर्थन में प्रस्तुत कर दिया है। पाश्चात्य विद्वानों के तर्कों के खंडन का तरीका उन्होंने काफी पहले ही सिखा दिया था।


पिछले सौ सालों में हम कह सकते हैं कि हमारे विद्वान उसे बस भूलते-भुलाते रहे। उन्होंने हीरों के ज्वलन पर, सस्यका, गैरिका, कम्कुष्ट, वैक्रंता कई किस्म के अम्लों और क्षार, जेवर बनाने की प्रक्रिया में बंगाल में हो रही सोने की बर्बादी और हिन्दुओं और जापानियों के रस कपूर, मदिरा, और कज्जली बनाने की प्रक्रिया में होने वाले अंतर भी बताया है।


इतिहास की कम जानकारी और तारीखों का वैसा ही निर्धारण जैसा तात्कालिक विदेशियों ने किया था, ये उनकी किताब से स्पष्ट हो जाता है। उस समय तक प्राप्त जानकारी के आधार पर रसहृदय तंत्र ग्यारहवीं सदी की रचना थी और गोविन्द भगवत बौद्ध थे। ऐसे कई मिथक बाद के शोध ने तोड़ दिए हैं।


संस्कृत को पढ़ने में उन्हें होने वाली दिक्कतों की वजह से उन्हें कई दूसरे विद्वानों की मदद लेनी पड़ी थी। वो उद्देश्य (संक्षेप में मुद्दे को रखना), निर्देश (जिस मुद्दे को प्रस्तुत किया गया है, उसकी व्याख्या) और लक्षण (परिभाषा और सार) की प्रक्रिया को समझ नहीं पाते थे। चरक के आयुर्वेद के शास्त्रा से रसायनशास्त्र की जानकारी को अलग निकालने में उन्हें खासी मुश्किल हुई होगी।


अगर विषों और उपविषों का हिस्सा छोड़ दें तो हिन्दुओं के रसायन के सभी मुद्दों को प्रोफेसर पी.सी. रे ने छुआ है। आज ये किताब प्रिंट में जरा मुश्किल से मिलती है। शोध के छात्रों के लिए ये एक महत्वपूर्ण किताब है। प्रोफेसर पी.सी.रे का काम इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उनके काम की वजह से ही हिन्दुओं के रसायनशास्त्रा की कई पुस्तकें प्रकाश में आई। आम तौर पर बहुसंख्यक हिन्दुओं की रूचि धार्मिक विषयों पर भाव विभोर होने और आह वाह करने तक ही सीमित रही है। आज जैसे पी.सी.रे की खुद की किताब कम छपती है, वैसे ही शायद ये हिन्दुओं के रसायनशास्त्र तो गायब ही हो गए होते।


किताब के पहले भाग की शुरुआत वेदों में रसायनशास्त्र से होती है। शुरुआत में ही वेद से आयुर्वेद, फिर धीरे धीरे तंत्रा का उद्भव, बुद्ध से ठीक पहले के काल में रसायनशास्त्रा की जानकारी का अरब की ओर बढ़ना और फिर बुद्ध के शुरूआती समय में ही आणविक नियमों के बनने और तत्वों की जानकारी का जिक्र है। फिर ये किताब आयुर्वेद में कैसे चरक और सुश्रुत जैसे विद्वानों ने चिकित्सा के लिए आयुर्वेद का इस्तेमाल किया इस बारे में एक हिस्सा है। यहाँ आयुर्वेदिक काल में रसायन का जिक्र है। फिर आगे चलकर सिद्धयोग में वृन्द द्वारा और चक्रपाणी द्वारा सन 900-1000 के बीच रसायन का इस्तेमाल बताया गया है।


सन् 1100 से 1300 के काल को पी.सी. रे तांत्रिक काल कहते हैं। इस दौरान तांत्रिकों ने रसायनशास्त्र में काफी योगदान दिया। इसके बाद रसरत्न समुच्चय जैसी किताबें आई। धातुओं उनके निष्कासन विधियों पर, अम्ल और किस्म किस्म के क्षार, बारूद, कृत्रिम अम्ल ऐसे विषयों पर कई नोट किताब के अंत में दिए गए हैं।


कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि हिन्दुओं के विज्ञान और उसकी तरक्की का जो विदेशी शासन काल में दबाया गया, उसे दोबारा जीवन देने में इस किताब और लेखक का योगदान अभूतपूर्व है। इसकी ऑनलाइन प्रतियाँ भी उपलब्ध हैं। अगर विज्ञान में रूचि हो तो पुनर्जागरण करने वाली इस किताब को एक बार जरूर देखें। यह पुस्तक www.archieve.org से डाउनलोड की जा सकती है 


- आनंद कुमार, "भारतीय धरोहर" में प्रकाशित 

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आचार्य राय केवल आधुनिक रसायन शास्त्र के प्रथम भारतीय प्रवक्ता (प्रोफेसर) ही नहीं थे बल्कि उन्होंने ही इस देश में रसायन उद्योग की नींव भी डाली थी। 'सादा जीवन उच्च विचार' वाले उनके बहुआयामी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर #महात्मा_गांधी ने कहा था, "शुद्ध भारतीय परिधान पहने  इस सरल व्यक्ति को देखकर विश्वास ही नहीं होता कि वह एक महान वैज्ञानिक हो सकता है।" आचार्य की प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि उनकी आत्मकथा #Life_and_experiences_of_Bengali_Chemist "एक बंगाली रसायनज्ञ का जीवन एवं अनुभव" के प्रकाशित होने पर अतिप्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका #नेचर ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए लिखा था कि "लिपिबद्ध करने के लिए संभवत: प्रफुल्ल चन्द्र राय से अधिक विशिष्ट जीवन चरित्र किसी और का हो ही नहीं सकता।"


आचार्य राय एक समर्पित कर्मयोगी थे। उनके मन में विवाह का विचार भी नहीं आया और समस्त जीवन उन्होंने #प्रेसीडेंसी_कालेज के एक नाममात्र के फर्नीचर वाले कमरे में काट दिया। प्रेसीडेंसी कालेज में कार्य करते हुए उन्हें तत्कालीन महान #फ्रांसीसी_रसायनज्ञ_बर्थेलो की पुस्तक #द_ग्रीक_एल्केमी पढ़ने को मिली। तुरन्त उन्होंने बर्थेलो को पत्र लिखा कि भारत में भी अति प्राचीनकाल से रसायन की परम्परा रही है। बर्थेलो के आग्रह पर आचार्य ने मुख्यत: #नागार्जुन की पुस्तक #रसेन्द्रसारसंग्रह पर आधारित प्राचीन हिन्दू रसायन के विषय में एक लम्बा परिचयात्मक लेख लिखकर उन्हें भेजा। बर्थेलाट ने इसकी एक अत्यंत विद्वत्तापूर्ण समीक्षा #जर्नल_डे_सावंट में प्रकाशित की, जिसमें आचार्य राय के कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी। इससे उत्साहित होकर आचार्य ने अंतत: अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री" का प्रणयन किया जो विश्वविख्यात हुई और जिनके माध्यम से प्राचीन भारत के विशाल रसायन ज्ञान से समस्त संसार पहली बार परिचित होकर चमत्कृत हुआ। स्वयं बर्थेलाट ने इस पर समीक्षा लिखी जो "जर्नल डे सावंट" के १५ पृष्ठों में प्रकाशित हुई।


1912 में #इंग्लैण्ड के अपने दूसरे प्रवास के दौरान #डरहम_विश्वविद्यालय के कुलपति ने उन्हें अपने विश्वविद्यालय की मानद डी.एस.सी. उपाधि प्रदान की। रसायन के क्षेत्र में आचार्य ने १२० शोध-पत्र प्रकाशित किए। Mercurous Nitrate एवं Ammonium Nitrite नामक यौगिकों के First preparation से उन्हें अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई।


डाक्टर राय ने अपना अनुसंधान कार्य Mercury के यौगिकों से प्रारंभ किया तथा Mercurous Nitrate  नामक यौगिक संसार में सर्वप्रथम सन् 1896 में आपने ही तैयार किया जिससे आपकी अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्रारम्भ हुई। बाद में आपने इस यौगिक की सहायता से 80 नए यौगिक तैयार किए और कई महत्वपूर्ण एवं जटिल समस्याओं को सुलझाया। आपने Ammonium, Zinc, Cadmium, Calcium, Strontium, Barium, Magnesium इत्यादि के नाइट्राइटों के संबंध में भी महत्वपूर्ण गवेषणाएँ कीं तथा ऐमाइन नाइट्राइटों को विशुद्ध रूप में तैयार कर, उनके भौतिक और रासायनिक गुणों का पूरा विवरण दिया। आपने (organo-metallic) यौगिकों का भी विशेष रूप से अध्ययन कर कई उपयोगी तथ्यों का पता लगाया तथा #Mercury, #Sulfur और #Iodine का एक नया Compound  (I2Hg2S2), तैयार किया तथा दिखाया कि प्रकाश में रखने पर इसके क्रिस्टलों का वर्ण बदल जाता है और अँधेरे में रखने पर पुनः मूल रंग वापस आ जाता है। सन् 1904 में बंगाल सरकार ने आपको यूरोप की विभिन्न रसायनशालाओं के निरीक्षण के लिये भेजा। इस अवसर पर विदेश के विद्धानों तथा वैज्ञानिक संस्थाओं ने सम्मानपूर्वक आपका स्वागत किया। 

✍🏻साभार : आशुतोष श्रीवास्तव एवं आर.डी. अमरूते


रसायन : भारतीयों की अप्रतिम देन

कीमियागरी यानी कौतुकी विद्या। इसी तरह से भारतीय मनीषियों की जो मौलिक देन है, वह रसायन विद्या रही है। हम आज केमेस्‍ट्री पढ़कर सूत्रों को ही याद करके द्रव्‍यादि बनाने के विषय को रसायन कहते हैं मगर भारतीयों ने इसका पूरा शास्‍त्र विकसित किया था। यह आदमी का कायाकल्‍प करने के काम आता था। उम्रदराज होकर भी कोई व्‍यक्ति पुन: युवा हो जाता और अपनी उम्र को छुपा लेता था।


पिछले दिनो भूलोकमल्‍ल चालुक्‍य राज सोमेश्‍वर के 'मानसोल्‍लास' के अनुवाद में लगने पर इस विद्या के संबंध में विशेष जानने का अवसर मिला। उनसे धातुवाद के साथ रसायन विद्या पर प्रकाश डाला है। बाद में, इसी विद्या पर आडिशा के राजा गजधर प्रतापरुद्रदेव ने 1520 में 'कौतुक चिंतामणि' लिखी वहीं ज्ञात-अज्ञात रचनाकारों ने काकचण्‍डीश्‍वर तंत्र, दत्‍तात्रेय तंत आदि कई पुस्‍तकों का सृजन किया जिनमें पुटपाक विधि से नाना प्रकार द्रव्‍य और धातुओं के निर्माण के संबंध में लिखा गया। 


मगर रसायन प्रकरण में कहा गया है कि रसायन क्रिया दो प्रकार की होती है-1 कुटी प्रवेश और 2 वात तप सहा रसायन। मानसोल्‍लास में शाल्‍मली कल्‍प गुटी, हस्तिकर्णी कल्‍प, गोरखमुण्‍डीकल्‍प, श्‍वेत पलाश कल्‍प, कुमारी कल्‍प आदि का रोचक वर्णन है, शायद ये उस समय तक उपयोग में रहे भी होगे, जिनके प्रयोग से व्‍यक्ति चिरायु होता, बुढापा नहीं सताता, सफेद बाल से मुक्‍त होता... जैसा कि सोमेश्‍वर ने कहा है - 

एवं रसायनं प्रोक्‍तमव्‍याधिकरणं नृणाम्। 

नृपाणां हितकामेन सोमेश्‍वर महीभुजा।। (मानसोल्‍लास, शिल्‍पशास्‍त्रे आयुर्वेद रसायन प्रकरणं 51)


ऐसा विवरण मेरे लिए ही आश्‍चर्यजनक नहीं थी, अपितु अलबीरूनी को भी चकित करने वाला था। कहा, ' कीमियागरी की तरह ही एक खास शास्‍त्र हिंदुओं की अपनी देन है जिसे वे रसायन कहते हैं। यह कला प्राय वनस्‍पतियों से औषधियां बनाने तक सीमित थी, रसायन सिद्धांत के अनुसार उससे असाध्‍य रोगी भी निरोग हो जाते थे, बुढापा नहीं आता,,, बीते दिन लौटाये जा सकते थे, मगर क्‍या कहा जाए कि इस विद्या से नकली धातु बनाने का काम भी हो रहा है। (अलबीरुनी, सचाऊ द्वारा संपादित संस्‍करण भाग पहला, पेज 188-189)


है न अविश्‍वसनीय मगर, विदेशी यात्री की मुहर लगा रसायन...।

✍🏻डॉ श्रीकृष्ण जुगनू

रविवार, 4 जुलाई 2021

सीख

 *🦚आज की कहानी🦚*सी



*नई सीख*🚗🧑🏻‍🏫




कार से उतरकर भागतें हुए हॉस्पिटल में पहुँचें नौजवान बिजनेस मैन ने पूछा..


“डॉक्टर, अब कैसी हैं माँ?“ 


हाँफते हुए उसने पूछा।


अब ठीक हैं। माइनर सा स्ट्रोक था। ये बुजुर्ग लोग उन्हें सही समय पर लें आये, वरना कुछ बुरा भी हो सकता था ...।


डॉं ने पीछे बेंच पर बैठे दो बुजुर्गों की तरफ इशारा कर के जवाब दिया ....।


“रिसेप्शन से फॉर्म इत्यादि की फार्मैलिटी करनी है अब आपको।” डॉ ने जारी रखा।


थैंक यू डॉ. साहेब, वो सब काम मेरी सेक्रेटरी कर रही हैं“ अब वो रिलैक्स था।


फिर वो उन बुजुर्गों की तरफ मुड़ा.. 

“थैंक्स अंकल, पर मैनें आप दोनों को नहीं पहचाना।“


“सही कह रहे हो बेटा, तुम नहीं पहचानोगें क्योंकि हम तुम्हारी माँ के वाट्सअप फ्रेंड हैं ।” एक ने बोला।


“क्या, वाट्सअप फ्रेंड ?”



चिंता छोड़,  उसे अब, अचानक से अपनी माँ पर गुस्सा आया।


“60 + नॉम का  वाट्सप ग्रुप है हमारा...

सिक्सटी प्लस नाम के इस ग्रुप में साठ साल व इससे ज्यादा उम्र के लोग जुड़े हुए हैं। 


इससे जुड़े हर मेम्बर को उसमे रोज एक मेसेज भेज कर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी अनिवार्य होती है, साथ ही अपने आस पास के बुजुर्गों को इसमें जोड़ने की भी ज़िम्मेदारी दी जाती है।


“महीने में एक दिन हम सब किसी पार्क में मिलने का भी प्रोग्राम बनाते हैं।”


“जिस किसी दिन कोई भी मेम्बर मैसेज नहीं भेजता है तो उसी दिन उससे लिंक लोगों द्वारा, उसके घर पर, उसके हाल चाल का पता लगाया जाता है।”


आज सुबह तुम्हारी माँ का मैसेज न आने पर हम 2 लोग उनके घर पहुंच गए..।


वह गम्भीरता से सुन रहा था।


पर माँ ने तो कभी नहीं बताया। उसने धीरे से कहा।


“माँ से अंतिम बार तुमने कब बात की थी बेटा? क्या तुम्हें याद है ?”

 एक ने पूछा।


बिज़नेस में उलझा, तीस मिनट की दूरी पर बने माँ के घर जाने का समय निकालना कितना मुश्किल बना लिया था खुद उसने।



हाँ पिछली दीपावली को ही तो मिला था वह उनसे गिफ्ट देने के नाम पर।


बुजुर्ग बोले..

“बेटा, तुम सबकी दी हुई सुख सुविधाओं के बीच, अब कोई और माँ या बाप अकेले घर मे कंकाल न बन जाएं... बस यही सोच ये ग्रुप बनाया है हमने। वरना दीवारों से बात करने की तो हम सब की आदत पड़ चुकी है।”


उसके सर पर हाथ फेर कर दोनों बुज़ुर्ग अस्पताल से बाहर की ओर निकल पड़े। नवयुवक एकटक उनको जाते हुए देखता ही रह गया।


*💐शिक्षा-अपनो का समय समय पर ख्याल करते रहे और हाल चाल पूछते रहे,ताकि समय पर मदद की जा सके!!*



*


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

अपनी पहचानकी तलाश में आदिवासी समुदाय

 मन को मिलाते लोकपर्व  / डॉ. रामदीन त्यागी



मध्य प्रदेश की संस्कृति विविधवर्णीय है। यहां किसी एक भाषा—संस्कृति का परचम नहीं है अपितु मध्य प्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहां एक तरफ पांच लोक संस्कृतियों (निमाड़, मालवा, बुंदेलखंड़, बघेलखंड और ग्वालियर) का समावेशी संसार है तो दूसरी और अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृतियों का फलक पसरा हुआ है। वर्ष भर लगने वाले ये पर्व दिलों को जोडऩे का काम कर रहे हैं, प्रस्तुत है प्रमुख जनजातीय उत्सवों की जानकारी।


भगोरिया

मालवा क्षेत्र के भीलों का प्रिय उत्सव भगोरिया है। इसकी विशेष बात यह है कि इस पर्व में युवक—युवतियों को अपने जीवन साथी का चुनाव करने का अवसर मिलता है। भगोरिया हाट के दिन क्षेत्र भर से किसान, भील आदि सजधज कर तीन तलवारों से लेस होकर हाट वाले गांव में पहुंचते हैं। वहां मैदान में ये लोग डेरे लगाते हैं। हाट के दिन परिवार के बुजुर्ग डेरी में रहते हैं पर अविवाहित युवक—युवतियां हाथ में गुलाल लेकर निकलते हैं। कोई युवक जब अपनी पसन्द की युवती के माथे पर लगा देता है तो और लड़की उत्तर में गुलाल लड़के के माथे पर लगा देती है तो यह समझा जाता है कि दोनों एक दूसरे को जीवन साथी बनाना चाहते हैं। इस पूर्व स्वीकृति पर पक्की मोहर तब लग जाती है जब लड़की लड़के के हाथ से माजून (गुड और भांग) खा लेती है। यदि लड़की को रिश्ता मंजूर नहीं होता तो वह लड़के के माथे पर गुलाल नहीं लगाती ।

भगोरिया को केवल मानव ही नहीं, प्रकृति भी अपने संकेतों के साथ मनाती है। यह त्योहार उन्हीं लोगों के लिए है जो हड्डियों की मजबूती की परीक्षा प्रत्येक दिन श्रम करके लेते हैं। जिनके हृदय में कोमलता की एक धारा तो बहती है, लेकिन उस पर कठोर जीवनशैली का कवच भी होता है। इसे नारियल को प्रतीक बनाकर नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि नारियल की अंदरूनी धारा व ऊपर की कठोरता के बीच स्वाद की मोटी परत मौजूदगी रहती है। इसे भूमिगत जल की एक पतली धारा के माध्यम से समझा जाना चाहिए। इस पतली—सी गुमनाम अदृश्य धारा के ऊपर सैकड़ों फुट मोटी कोरी मिट्टी व ठोस चट्टानों का पहाड़ मौजूद रहता है। भगोरिया इस पतली—सी कोमल धारा को धरती फोड़कर छूता है।

इसमें पाने की जो खुशी होती है वह किसी मुराद, किसी दैविक प्रसाद से कम नहीं होती। भगोरिया में मिल प्रेम ठीक वैसा ही होता है जैसे भूमिगत जल को गंगा मैया का प्रसाद मानकर लोग घर—आंगन में विराजित कर लेते हैं। भगोरिया ढीठता का प्रतीक नहीं, बल्कि इसका प्रसाद या तो मन्नत करके पाया जाता है या पुरुषार्थ का परिचय देकर प्राप्त किया जाता है। हजारों लोगों की उन्माद जगाती भीड़ में अपनी चाहत पर हाथ रख देना स्वयं पर व अपनी चाहत के समर्पण पर, अपने पुरुषार्थ पर विश्वास की पराकाष्ठा के बिना संभव नहीं होता।

भगोरिया केवल एक अवसर भर नहीं होता है लूट—खसोट कर लेने का, बल्कि यह एक जीवन की शुरूआत होता है, जिसका आधार प्रेम की वह बूंद होती है जो सदियों से बहा करती है। सुविधाओं की चाहत के बिना पूरी जिंदगी अभावों के हाथों सहर्ष सौंप देना। उफ्—आह—त्रास को नकार कर उस आनंद के एक क्षण में पूरा जीवन समेट देना भगोरिया है। इतनी जीवंतता होती है भगोरिया में कि सूरज ने कब अपना सफर पूरा कर लिया, पता ही नहीं चलता। लोकगीत ऐसे कि शब्द रचना समझ में न आए, तब भी कान उनसे जुड़े रहें। चेहरों के भाव ऐसे कि कैमरे को राहत का अवसर ही न मिले। श्रृंगार ऐसा कि उसमें प्राकृतिक सौंदर्य की विशेषता खोजने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़े।

एक सप्ताह के इस आयोजन में पूरी जिंदगी की शर्ते, रिश्ते समेट लिए जाते हैं। हर रोज होने वाले भगोरिए में पूरे सप्ताह फिर उसी का इंतजार किया जाता रहता है। दिन उसे देखने में तो रातें नाचने—गाने में गुजर जाती हैं। होली की मस्ती से ठीक एक सप्ताह पहले शुरू होने वाला, भील संस्कृति को एक पहचान देने वाला भगोरिया दो भागों में बंटा होता है। एक भगोरिया मेला तो दूसरा भगोरिया त्योहार। एक का मूल स्वर अगर प्रेम पाने का प्रयास है तो दूसरे का स्वर आध्यात्मिकता में रच-बस जाने का है। दोनों साथ—साथ शुरू होते हैं। त्योहार तो उसी माह समाप्त हो जाते हैं लेकिन इन मेलों को जिसने आत्मसात कर लिया, वह फिर जन्म—जन्म तक उनसे बंधा रह जाता है। भगोरिया त्योहार प्राय:प्रौढ़ पुरुषों के नायकत्व का हिस्सा है। इसमें स्त्री की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती। वहीं भगोरिया मेला बिना नायिका के पूरा नहीं होता। एक अगर वैराग्य का स्वांग है तो दूसरा प्यार की अधीरता को अर्पित है। भगोरिए को त्योहार के रूप में मनाने वाले इन दिनों में अपने बदन को हल्दी से लेप कर रखते हैं। बदन का ऊपरी हिस्सा खुला रहता है। सिर पर साफा बांधा जाता है। हाथ में नारियल व कांच रहता है। भोजन एक समय करते हैं, वह भी हाथ से बनाकर। जीवन संगिनी से दूर रहकर कुछ आवश्यक साधना पूरी करते हैं। होली के बाद ये लोग गल देवता की विधि—विधान से पूजा करते हैं, मन्नत उतारते हैं। इस समय गांव के विशिष्ट लोग उपस्थित रहते हैं। गल देवता के मेले जुटते हैं।

मन्नतधारी व्यक्ति को गल देवता के ऊपर चढ़ाकर उसे हवा में गोल—गोल घुमाया जाता है। मन्नतें भी केवल व्यक्तिगत ही नहीं होतीं, बल्कि सामाजिक भी होती हैं, जैसे पानी अच्छा गिरे, फसलें अच्छी हों, परिवार के बीमार लोग ठीक हो जाएं, कर्जा समाप्त हो जाए आदि। इसके दौरान शराब व मांस दोनों का सेवन वर्जित होता है। मन्नतधारी व्यक्ति जमीन पर सोता है। जबकि मेले में शामिल होते हैं हजारों लोग। एक सप्ताह पहले से खुशबूदार साबुन, पावडर, जैसी सौन्दर्य सामग्री खरीदने का क्रम शुरू हो जाता है। नए कपड़ों की खरीददारी की जाती है। फिर निगाहें खोजती हैं किसी अपने को। लोकगीतों की धुनों व पंरपरागत वाद्यों, खासकर बांसुरियों की धुन पर थिरकते लोगों की टोलियां जब पारम्परिक पोशाकों के साथ मेले में आती हैं तो मन होली की मस्ती से झूमने लगता है।


गंगा दशमी

सरगुजा जिले में आदिवासियों और गैर आदिवासियों द्वारा खाने, पीने और मौज करने के लिए मनाया जाने वाला यह उत्सव जेठ (मई—जून) माह की दसवीं तिथि को पड़ता है। इसका नाम गंगा दशमी होने का एक कारण है कि हिन्दुओं में यह विश्वास है कि उस दिन पृथ्वी पर गंगा का अवतरण हुआ था। यह पर्व कर्मकांड से सीधा संबंध नहीं रखता। लोग इस दिन अपनी अपनी पत्नी के साथ नदी किनारे खाते—पीते नाचत—गाते और तरह—तरह के खेल खेलते हैं। इस प्रकार यह त्योहार जनजातीय समाज के देश के सनातन परंपरा से जुड़ाव का भी प्रतीक है। आमतौर पर आदिवासियों को सनातन वैदिक परंपरा से कटा दिखाने की कोशिशें होती हैं, परंतु यह त्योहार स्थापित करता है कि आदिवासी वास्तव में सनातनी ही हैं।


हर्यागोधा

किसानों के लिए इस पर्व का विशेष महत्व है। वे इस दिन अपने कृषि उपयोग में आने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। श्रावण माह की अमावस्या को यह पर्व मनाया जाता है। मंडला जिले यह इसी माह की पूर्णिमा को तथा मालवा क्षेत्र में अषाढ़ के महीने में मनाया जाता है। मालवा में इसे हर्यागोधा कहते हैं। स्त्रियां इस दिन व्रत रखती हैं।


मेघनाद

फाल्गुन के पहले पक्ष में यह पर्व गोंड आदिवासी मनाते हैं। इसकी कोई निर्धारित तिथि नही है। मेघनाद गोंडों के सर्वोच्च देवता हैं चार खंबों पर एक तख्त रखा जाता है जिसमें एक छेद कर पुन:एक खंभा लगाया जाता है और इस खंबे पर एक बल्ली आड़ी लगाई जाती है। यह बल्ली गोलाई में घूमती है। इस घूमती बल्ली पर आदिवासी रोमांचक करतब दिखाते हैं। नीचे बैठे लोग मंत्रोच्चारण या अन्य विधि से पूजा कर वातावरण बनाकर अनुष्ठान करते हैं। कुछ जिलों में इसे खंडेरा या खट्टा नाम से भी पुकारते हैं।


सोहराय

संतालों का प्रमुख पर्व सोहराय धान फसल के तैयार होने पर मनाया जाता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस पर्व में प्रथम दिन सभी लोग नायके गोइटाँडी (बथान) में एकत्रित होते हैं। जोहरा ऐरा की पूजा कर मुर्गे की बलि दी जाती है। चावल—महुआ निर्मित हडिय़ा (एक प्रकार की शराब) चढ़ाया जाता है एवं माँझी के आदेश से उपस्थित जन समुदाय नाच—गान करते हैं। दूसरे दिन गोहाल पूजा और तीसरे दिन सुटाउ होता है। इसमें बैलों को सजाकर मध्य में बाँधकर उसके इर्द—गिर्द नाच—गान करते हैं। इस प्रकार यह त्योहार भी आदिवासियों के सनातन परंपरा से जुड़े होने का एक प्रबल प्रमाण है।

चौथे दिन लोग जाले में अपने—अपने घरों से खाद्यान्न लाकर एकत्रित करते हैं। सामूहिक भोज की तैयारी होती है। यह सब मोद—मंगल, नाच—गान माँझी की देखरेख में होता है। सोहराय के बाद साकरात आता है जिसमें समूह में शिकार किया जाता है। शिकार किये गए पशु—पक्षियों के मांस को उनके देवता मरांग बुरू को समर्पित करके सहभोज होता है। वर्षाकाल में बीज बोने का पर्व एरोक, खेतों की हरियाली के लिए हरियाड़ और अच्छी फसल के लिए जापाड़ नामक त्योगार मनाए जाते हैं। सभी पर्वों में बलि प्रदान एवं हडिय़ा अर्पित कर समूह नृत्य का आयोजन होता है। हो जनजाति होली, दीवाली, दशहरा आदि त्योहार भी मनाते हैं। देवताओं के महादेव की पूजा करते हैं। कृषि की उन्नति एवं प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए माघी, वाहा, होरो, कोलोम, बेतौली इत्यादि पर्व भी स्थान विशेष पर मनाए जाते हैं।


करमा

उराँव जनजातियों में फागू, सोहराय, माघे, करमा इत्यादि प्रसिद्ध पर्व हैं। खद्दी, चांडी, जतारा आदि पर्व भी उराँव लोग मनाते हैं। सभी पर्व सामूहिक रूप से सरना स्थलों पर मनाए जाते हैं। माघ पूर्णिमा के अवसर पर होने चांड़ी पूजा में स्त्रियाँ भाग नहीं लेती हैं। चांड़ीथान में बलि प्रदान किया जाता है। जतरा पर्व अगहन जतरा, देवथान, जतरा, जेठ जतरा के नाम से समय—समय पर मनाया जाता है। संताल परगना में रहने वाली पहाडिय़ा आदिम जनजाति गाँगी आडय़ा, पनु आइया, ओसरा आइया क्रमश:मकई, बाजरा एवं घघरा फसलों के होने पर मनाते हैं। इन पर्व के अतिरिक्त हिन्दू पर्व-त्योहारों को भी पहाडिय़ा मनाने लगे हैं। इनके पर्व-त्योहारों में भी नाच-गान के बाद बलि देने की प्रथा है। पहाडिय़ा जनजाति के अन्य भाग माल एवं कुमार भाग के लोग भी इन्हीं पर्वों को कुछ फेर-बदल के साथ मानते हैं। मुंडा जनजाति सरहूल, सोहराय, बुरू, माफे, करम, फागू इत्यादि पर्व मनाते हैं। सरहूल मुंडाओं को बंसतोत्सव है। सखुआ वृक्ष के निकट लुटकुम बुढी एवं आनंद के साथ इस पर्व को मनाते हैं।

करमा मुंडाओं का प्रसिद्ध पर्व है। भादों माह में मनाया जाने वाला यह पर्व राज करम और देश करम के नाम से प्रसिद्ध है। पाहन के द्वारा सरना स्थल अखाड़ा पर पूजा के बाद नाच—गाना एवं सामूहिक भोज का आयोजन होता है। बुरूपर्व पहाड़ के पूजने का पर्व है। शिक्षा के बढ़ते प्रभाव एवं आवागमन के साधनों के चलते झारखण्ड की जनजातियों सरहूल करमा, सोहराय टूसु इत्यादि पर्व एक साथ मनाने लगी हैं। पर्वों—त्यौहारों पर आधुनिक बाजार एवं शहरी प्रभाव होने के बाद में जनजातियों द्वारा पर्व के मूल भाव को बचाने को प्रयास भी  हो रहा है।

✍🏻साभार भारतीय धरोहर


आली - आई लिगांग


असम के मूल जनजातियों मे से एक जनजाति है मीरी.... इन्हें मिशिंग भी कहा जाता है.... धार्मिक रूप से मिशिंग समुदाय प्रकृतिपूजक है ...लेकिन खुद को हिंदू धर्मावलम्बी के रूप में अपना परिचय देते हुए  वैष्णव धर्म को मानते हैं..... 


ये लोग दिव्य शक्तियों और प्राकृतिक शक्तियों के प्रति  श्रद्धा रखते हैं और पूजा अर्चना करते हैं... पहाड़ों में रहने वाले ये लोग अनेक देव - देवी तथा भूत - प्रेतों के प्रति आस्था रखते हैं..... 


आली आई लिगांग इनका सबसे प्रमुख त्योहार है.... यह त्योहार फाल्गुन मास के प्रथम बुधवार को मनाया जाता है...... यह एक कृषि उत्सव है.... इस उत्सव में खाद्य सामग्री और चाइमद(मदिरा) तैयार किया जाता है ...... खान -पान व नृत्य - गीत के साथ पूरे उत्साह से मनाया जाता है....


 इस उत्सव में चेदी मेली और दोन्यी- पोलो( sun - moon)आदि देवताओं की पूजा की जाती है...... इनका विश्वास है कि दोन्यी- पोलो सभी गति विधियों पर नजर रखता है.... सभी अच्छे बुरे कर्मों का निरीक्षण करता है.. हमारे दिशा निर्देशन करता है और दुष्ट शक्तियों से रक्षा करता है..... 


ये लोग आबो तानी अथवा पिता तानी को अपना पूर्वज मानते हैं..... मान्यता है कि तानी अलौकिक शक्ति युक्त महापुरुष थे.... वे पथप्रदर्शक और तेजसम्पन्न गुरु थे...


असम का मुख्य पर्व बोहाग बिहू .बोहाग वैशाख महीने का असमिया शब्द है ..इस बिहू को रोंगाली बिहू भी कहते हैं.


परंपरा है कि हम पर्व की शुरुआत गौ पूजन से करते हैं.बिहू का पहला दिन "गोरु बिहू " के नाम से जाना जाता है.गाय को हम गोरु कहते हैं.


आज के दिन हम सुबह में हम गाय को नदी या पुखुरी (तालाब) पर ले जाकर नहलाते हैं.यहाँ पर पूरा गांव अपनी अपनी गायों के साथ इकट्ठा होता है. बच्चे बूढ़े मा हल्दी के लेप से नहाते हैं.साबुन का इस्तेमाल नही होता. एक दिन पहले ही पतली पतली लचकदार लकड़ियों में लौकी(लाऊ), बेजोना(बैगन) , खुकरी आदि के छोटे छोटे टुकड़े माला की तरह गूंथ लिए जाते हैं.और गाय को नहलाकर बच्चो के साथ क्रीड़ा करते हुए गाते हैं- 


"लाऊ खा बेजोना खा दिने दिने बारही जा.

मा रे होरु बापी रे होरु तोय होबी बोर गोरु"


मतलब , हमारे बच्चों ! लौकी खाके बैगन खाके दिन दिन बढ़ते रहो....मा छोटी है, पिता छोटा है लेकिन तुम बड़ी गाय के जैसा विशाल बनो.


फिर नदी से गाय को घर ले जाते हैं ..उसके लिए पीथा(एक प्रकार का पकवान) तैयार करते हैं .शाम में गाय को पीथा खिलाने के बाद एक नए बंधन से, जिसे हम 'पोघा' कहते हैं, से गुहाली में बांध देते  हैं.गुहाली मतलब गाय का घर.इसके बाद 'जाक' जलाते हैं.जिससे गाय के पास माखी( मख्खी) , मच्छर आदि न आ सकें.साथ में गाते हैं - 


"दिघोलोटी दिघोल पात 

माखी मारू जात जात !"


आज के दिन की एक खास बात और होती है. आज हम लोग जो सब्जी बनाते हैं वो 101 प्रकार की सब्जियों का मिक्स होती हैं.ऐसा माना जाता है कि ये स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है और हमे निरोग काया प्रदान करती है.


गाय पूजन के बाद घर मे जो सब्जी बनती है वो सौ सब्जियों का मिश्रण होती है. यही परम्परा है. लेकिन वो जमाना और था जब सौ सब्जियां पाना आसान था ..आप जंगल मे गए और तोड़ लाये सौ सब्जियां ..और पका लिया.


लेकिन अब ऐसा नही है....अब मुश्किल से तीस से चालीस सब्जियां मिल पाती हैं.आज मैंने करीब बड़ी मुश्किल से पैतीस चालीस प्रकार की सब्जियों की व्यवस्था की है


लेकिन परम्परा तो सौ प्रकार की सब्जियों को मिक्स करके पकाने की है..


ऐसे में क्या करें.तो हमारे यहां ( शायद पूरे भारत मे ) एक पीले रंग का चींटी (ant) होता है . इसे Aamloi Purua बोलते हैं .जो सामान्यतः पेड़ो पर पाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि ये सब कुछ खाता है तो उसका इस्तेमाल करते हैं.


इसे सब्जी में नही डाला जाता बल्कि खाते वक्त हल्का सा परम्परा को निभाने के लिए इसे होठ से टच करके औपचारिकता पूरी की जाती है.हालांकि जिन्हें पसंद है वे खाते भी हैं.


नार्थईस्ट प्रेम को बहुत अच्छे से सेलिब्रेट करता है..वैसे भी यहाँ कोई प्रेम करने को लेकर कोई बहुत बड़ी बंदिशें नही हैं.दो लोग जब भी प्रेम करते है तो कुछ दिन बाद ही पूरे समाज और परिवार को पता चल जाता है...नही तो खुद ही बता देते हैं.इसके बाद लोग ये मान लेते हैं की इन दोनों की शादी फिक्स है.और वे जोड़े के रूप में देखे जाने लगते है.


रेयर केस में ऐसा भी होता है कि कई बार परिवार वाले अप्प्रुवल नही देते तो ऐसे में प्रेमी जोड़े चुपचाप  बिहू का इंतज़ार करते हैं.और बिहू आते ही भाग जाते हैं.


फिर परिवार द्वारा उन्हें बुलाया जाता है और लड़के की फॅमिली लड़की के घर तामुल पान का शगुन  लेकर जाती है...इस प्रकार शादी फिक्स हो ही जाती है.


बोहाग बिहू को इस वजह में मजाक में भाग बिहू भी कहते है.


बोहाग बिहू 14 अप्रैल से शुरू होता है.असल मे यही मुख्य बिहू है. ये एक महीने चलता है पूरा । हम लोगों की शादिया इसी दौरान होती है । जितने भी लोरा- सुवाली लव बर्ड्स होंगे.. सबके अपने अपने मामले पहले से सेट होंगे । बिहू शुरू होते ही जिनके माँ-देउता नहीं माने वे जोड़े मौका निकाल कर भाग जाते है। फिर दो तीन दिन बाद वापस आते है.. फिर उनके माँ देउता तामूल पान लेकर सुवाली के घर जाएंगे .. और फिर बिया दे देते है उन दोनों का.  


बिहू मे मिलने मिलाने के दौरान मेहमानों को गमोसा रुमाल आदि गिफ्ट किया जाता है । इस गमोंसे का सूत घर मे रेडी किया जाता है । घर मे हाल ( hand लूम ) पर इसे बनाया जाता है. 


पहले गमोंसे मे सिर्फ एक साइड मे ही फूल होता था .. नामघरों मे भगवान के लिए बनाए गए गमोंसे पर ही दो तरफ फूल होते थे. तो सुवालीजोनि अपने प्रेमी के लिए जो गमोसे बनाती थी उस पर दूसरे साइड मे कुछ स्पेशल डिजाइन क्रीऐट करके उसे थोड़ा स्पेशल बना देती है... ये प्रपोज़ल का भी तरीका है. 


अब आजकल दोनों साइड फूल के गमोसे कि मांग ज्यादा होती है. कहते है परंपरा भी मार्केट के हिसाब से up down होती है. और मार्केट चलता है demand - supply के नियम पर, तो आजकल दोनों साइड के फूल वाले गमोंसे चलन मे आ चुके है. 


इस बार हमारा स्टॉक भेजकर खाली हो गया है... बिहू आने वाला है और हमने घर मे कन्स्ट्रक्शन के कारण घर का हाल खोलकर रख दिया था। बिहू मे घर आए मेहमानों को गिफ्ट करने के लिए हमे और गमोसे कि दरकार होगी इसलिए अगले एक दो दिन मे ही शायद लगा देना पड़े. हम लोग एक बार मे हाल लगाने पर सौ डेढ़ सौ गमसे रेडी करने का सूत लगा लेते है। लेकिन इस बार उतना समय नहीं है क्योंकि एक दिन मे एक दो पीस ही बन पाता है. 


अच्छा एक और मजेदार बात ! नॉर्थ के एक मित्र ने कहा गमोसा कि लंबाई थोड़ी और होनी चाहिए.. गले मे मोड़कर पीछे नहीं ले पाते.. तो पहली बात ये कि पारंपरिक गमोसा तो इतना ही बड़ा  होता है. उसे गले मे दोनों तरफ से लटकाकर पहनते है. दूसरी बात गमोसा  बनाते समय हमारे दिमाग मे नॉर्थीस्ट के छोटे छोटे कम लंबाई के लोग होते है.. तो पहाड़ जैसे नॉर्थ के मित्रों को छोटा पड़ेगा ही । तुम लोग इतने लंबे चौड़े होते ही क्यों हो ..हमारी तरह छोटा छोटा आदमी होने मे क्या बुरा था  :-D . 


जिस तरह आप लोगों ने पसंद किया है.. उस हिसाब से कौन जानता है कि स्टंडर्ड आगे चलकर चेंज भी हो.... और भी बड़े बड़े बनने लगे. पर आप लोगों ने इस गमोंसे को खूबसूरत और अच्छा तो माना ही है. ये भी काफी है... बाकी नॉर्थ के मित्रों की हाईट से जलन है और रहेगी :-D


lets all be happy together ..सर्वे सन्तु निरामया.

✍🏻गिताली सैकिया

आप थे 'मुद्दु बाबू शेट्टी' उर्फ 'मुधू बलवंत शेट्टी' उर्फ 'एम बी शेट्टी

 फ़िल्मी दुनिया का ऐसा चेहरा जिसकी सिर्फ ख़ामोशी पर्दे पर दहशत पैदा कर देती थी।

वो थे 'मुद्दु बाबू शेट्टी' उर्फ 'मुधू बलवंत शेट्टी' उर्फ 'एम बी शेट्टी'। जिन्हें हम सब 'शेट्टी' के नाम से जानते हैं। इनका जन्म १९३८ में मैंगलोर में हुआ था। इनकी पहली पत्नी का नाम विनोदिनी और दूसरी का नाम रत्ना था।


इनकी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। जिस कारण इनके पिता ने इनको मुंबई भेज दिया, कि वहाँ कोई काम सीख कर रोजी रोटी कमा लेंगे। यहाँ आ कर कुछ समय इन्होंने वेटर का काम किया। इसके बाद इनकी दिलचस्पी बॉक्सिंग में हुई। जिसमें क़रीब ८ सालों तक जुड़े रहे और कई टूर्नामेंट जीते।


फिल्मों में इनकी शुरुआत फ़िल्म 'हीर' से हुई , जिसमे ये फाइट इंस्ट्रक्टर थे। वो वक्त जब फिल्मों में स्टंट पर काफी जोर दिया जाता था, लेकिन जितने जरूरी स्टंट होते थे उतने जरूरी ही विलेन भी..यानि अगर बिना विलेन के फिल्म और हीरो की कहानी अधूरी ही मानी जाती थी। उसी दौर में एक ऐसा एक्टर हुआ जिसने विलेन के किरदार निभाकर ऐसा कॉम्टीशन पैदा किया कि विलेन का रोल प्ले करने वाले बाकी एक्टर भी डर गए।


एम बी शेट्टी ७० के दशक में पॉपुलर विलेन रहे और आगे चलकर बॉलीवुड के मशहूर स्टंटमैन बने। एम बी शेट्टी ने अपने करियर की शुरुआत फाइट इंस्ट्रक्टर के तौर पर की। इसके बाद वो एक्शन डायरेक्टर बने और फिर एक्टर। एम बी शेट्टी ने १९५७ में एक्टिंग में अपने कदम रखे। उन्होंने 'द ग्रेट गैंबलर', 'त्रिशूल' 'डॉन', 'कसमें वादे' जैसी दर्जनों फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जौहर दिखाया।


एक्टिंग के अलावा एम बी शेट्टी ने कई फिल्मों में स्टंट कॉर्डिनेटर, फाइट कंपोजर, स्टंट कपोजर और स्टंट मास्टर के तौर पर काम किया। इन फिल्मों में 'जब प्यार किसी से होता है , 'कश्मीर की कली', 'सीता और गीता', 'डॉन' और 'द ग्रेट गैंबलर' जैसी फिल्में शामिल हैं।


एम बी शेट्टी जैसा एक्टर और स्टंट मास्टर ना तो कभी हुआ और ना ही कभी होगा, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की। एम बी शेट्टी को एक्शन और स्टंट से इस कदर लगाव था कि वो अपने घर में चारों तरफ दुनिया के मशहूर विलेन की फोटो लगाए रहते, लेकिन एक हादसा ऐसा हुआ जिसने एम बी शेट्टी को सभी से दूर कर दिया। कहा जाता है कि अपने ही घर में फिसलकर गिर गए जिससे उन्हें काफी चोट लगी। एक तो पहले से ही स्टंट करने के दौरान उन्हें टांगों में काफी चोट लग चुकी थी। साथ ही वो शराब भी खूब पीते थे और इस सबका उन पर बुरा असर हुआ कि जब वो घर में फिसलकर गिरे तो उबर नहीं पाए और (२३ जनवरी १९८२) को इस दुनिया से विदा हो गए।


उनके बाद उनके घर के हालात काफी ख़राब हो गए। ऐसे में उनकी वाइफ रत्ना शेट्टी को आगे आना पड़ा और उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया। 'अंत', 'यार-गद्दार' (१९९४) 'दरार'(१९९६), 'अफ़साना दिलवालों का'(२००१)


यहाँ आपको बताते चलें घर के हालात को देखते हुए एम बी शेट्टी और रत्ना शेट्टी के बेटे 'रोहित शेट्टी' ने १५ वर्ष की उम्र से फिल्मों में संघर्ष शुरू कर दिया। आज उनकी गिनती फ़िल्म जगत के सफलतम व मंहगे निर्देशकों में होती है।


जानकारी स्त्रोत : गूगल

फिल्मो की पहली सुपर स्टार नसीम बनो

आज 4 जुलाई को *फिल्मी दुनिया की पहली मलिका ए हु सुपर स्टार,मरहूम नसीम बानो (सायरा बानो की अम्मा),साहिबा* के जन्मदिन पर सादर नमन है।

   उनके फिल्मी जीवन पर एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है।


*मलिका ए हुस्न-नसीम बानो*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


1)- *नाम-रोशन आरा बेग़म- फिल्मी नाम नसीम बानो*

2)- *जन्म-4 जुलाई,1916, लाहौर,ब्रिटिश इंडिया*

3)- *मृत्यु-18 जून 2003,मुम्बई, महाराष्ट्र*

4)- *पिता-नवाब अब्दुल वहीद खान,हसनपुर रियासत के*

5)- *माँ-शमशाद बेगम-ख्याति प्राप्त गायिका,अच्छी खासी आमदानी*

6)- *पढ़ाई क्वीन्स मेरी हायस्कूल दिल्ली में दाखिला के समय रोशन आरा से नसीम बानो बनी*

7)- *माँ नसीम को डॉक्टर बनाना चाहती थी,मगर इनका रुझान फिल्मो की तरफ था*

8)- *बम्बई में शूटिंग देखते समय निर्माता निर्देशक सोहराब मोदी साहब की नज़र पड़ी तो हैमलेट में रोल offer हुआ*

9)- *फिल्मी जीवन 1934-35 से 1966*

10)- *प्रथम फ़िल्म-खून का खून 1935*

11)- *अंतिम फ़िल्म-नौ शेरवान ए आदिल 1957*

12)- *पति-एहसान उल हक-माने हुए आर्किटेक्ट*

13)- *पति के साथ मिलकर ताजमहल पिक्चर्स बैनर बनाया, पति निर्माता,निर्देशक बने*

14)- *पुत्र-सुल्तान अहमद*

15)- *पुत्री-सायरा बानो*

16)- *नातिन-साएशा (सुल्तान अहमद की पुत्री*

17)- *प्रमुख फिल्मे* ...


१)- *खून का खून में ophelia-1935*

२)- *खान बहादुर-1937*

३)- *मीठा जहर-1938*

४)- *तलाक़ 1938 में रूपा*

५)- *वासन्ती 1939 में वासन्ती*

६)- *पुकार 1940 में नुरजहाँ*

७)- *मैं हारी 1942 में नसीम*

८)- *उजाला-1944 में गायिका भी ख़ुद*

९)- *चल चल रे नौजवान 1944 में सुमित्रा*

१०)- *बेग़म-1946*

११)- *जीवन स्वप्न-1946 में गायन भी ख़ुद*

१२)- *दूर चले-1947*

१३)- *मुलाक़ात-1948 में सईदा बनी व गायिका ख़ुद ही*

१४)- *अनोखी अदा-1949 में कामिनी बनी*

१५)- *चाँदनी रात-1950*

१६)- *शीशमहल-1951 में रंजना*

१७)- *शबिस्तान-1952*

१८)- *अजीब लड़की-1952*

१९)- *बेताब-1952*

२०)- *सिंदबाद जहाजी-1953*

२१)- *बागी-1957*

२२)- *नौ शेरवान ए आदिल-1957 में मलिका ए ईरान बनी*

*टिप-१) इसके अलावा एक पंजाबी फिल्म-चड्डियां दी डोली*

*२)- पूरब और पश्चिम फ़िल्म में कस्टम डिजायनर थी*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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18)- *प्रमुख बैनर* ...

१)- *मिनर्वा मूवीटोन (सोहराब मोदी साहब) के अधीन अत्यंत यादगार,सुपरहिट फिल्में की*

२)- *circo*

३)- *फिल्मिस्तान*

४)- *पति के साथ खुद का ताजमहल पिक्चर्स*

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19)- *साथी कलाकार* ...


१)- *सोहराब मोदी*

२)- *पृथ्वीराज कपूर*

३)- *अशोक कुमार*

४)- *श्याम जो शबिस्तान फ़िल्म की शूटिंग के समय घुड़सवारी करते समय गिरे व मृत्यु हुई*

५)- *सुरेंद्र*

६)- *प्रेम अदीब*

७)- *रहमान*

८)- *नवीन याग्निक*

९)- *चंद्रमोहन*

१०)- *गजानन जागीरदार*

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20)- *सुलोचना रूबी मेयर्स से काफी प्रभावित,उनकी सबसे बड़ी फैन,व यही आकर्षण फ़िल्म की ओर ले आया*

21)- *प्रमुख नग़मे एकल व युगल जो ख़ुद गाये*


१)- *जिंदगी का साज भी क्या साज है-फ़िल्म पुकार 1939 का एकल सुपरहिट नग़मा*

२)- *ईद की सौगातें मुबारक़ हो-पुकार 1939 में साथ शीला*

३)- *मुझे मधुर लगता है उनसे मिलकर-चल चल रे नौजवान 1944 में साथ अशोक कुमार*

४)- *एक नया गीत सुनो सजनिया- चल चल रे नौजवान में साथ अशोक कुमार*

५)- *चमको चमको बिजलियां हाँ चमको-चल चल रे नौजवान में साथ अशोक कुमार*

६)- *भोर सुहानी आयी-उजाला 1942 में*

७)- *दुनिया नई बसाई मैंने-उजाला 1942*

८)- *हाये कैसा यहाँ बहार का मौसम-उजाला*

९)- *दिल किसलिए रोता है- मुलाक़ात 1948*

१०)- *अब याद न आ,भूलने वाले-मुलाक़ात 1948*

११)- *अल्लाहु अल्लाहु,जुल्म है जुल्म है,सुन ले फ़रियाद मेरी- मुलाक़ात 1948*

१२)- *जो दिल मे बस रहे थे- मुलाक़ात 1948*

१३)- *मेरे जुबना ने ली अँगड़ाई- रूम नम्बर 9 (1946)*

१४)- *मुझे दर दर ना भटकाओ- मुलाक़ात 1948*

१५)- *ओ चाँद ईद के,मेरा पयाम कह देना-मुलाक़ात 1948*

१६)- *फूलों की माला,अपने देवता को-मीठा जहर 1938*

१७)- *सखी मन की बात तोसे कहूँ-मीठा जहर 1938*

१८)- *दिल याद में किसी की रोता है-बेग़म 1945*

१९)- *बुझ रही है आंसुओ की आग-बेग़म 1945*

२०)- *आँखो से आँखो का इंतज़ार है-बेग़म 1945*

२१)- *जवानी पगली आयी रे-बेग़म 1945*

२२)- *सारे जहाँ में तुझ सा कोई नहीं है-बेग़म 1945*

२३)- *कोयलिया में कली है अनारकली-बेग़म 1945*

२४)- *रूप अनूप वही है सजना-वासन्ती 1938*

२५)- *अब किसलिए उठाये एहसान जिंदगी के-जीवन सुख 1973 में अंतिम नग़मा*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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22)- *पसंदीदा दामाद दिलीप कुमार जो सायरा को बचपन से पसंद थे व नसीम बानो को भी बहुत पसंद थे*

मंगलवार, 29 जून 2021

शंगरी ला घाटी का रहस्य*

 *क्या आप जानते हैं भारत की इस रहस्यमयी जगह के बारे में*?


*प्रस्तुति -: कृष्ण मेहता*


आज हम एक ऐसी जगह के बारे में बात करेंगे जहाँ हर चीज गायब हो जाती है। वैसे तो दुनिया में कई ऐसे स्थान है जहाँ वायु शुन्य है मतलब हवा है ही नहीं हमारे देश में भी एक ऐसा स्थान है जहाँ न सिर्फ हवा शुन्य है बल्कि जो भू हीनता के प्रभाव क्षेत्र में आता है। 

यहाँ एक बात जान लेते हैं की भू हीनता के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले स्थान धरती के वायुमंडल के चौथे आयाम से प्रभावित होते हैं इसलिए ये इस तरह के स्थान बन जाते हैं जो की तीसरी आयाम वाली धरती की किसी भी वस्तु से संपर्क तोड़ देते हैं, यानी कोई भी इन्सान अगर किसी ऐसी जगह के संपर्क में जाता है तो वह पृथ्वी से गायब हो जाता है चौथे आयाम के बारे में आगे पढ़े।

शंगरीला घाटी ऐसी ही एक जगह है जहाँ कोई वस्तु उसके संपर्क में आने पर गायब हो जाती है। यह घाटी तिब्बत और अरुणांचल प्रदेश की सीमा पर स्थित है यदि आप इस स्थान को देखना चाहते हैं तो इसे आप बिना किसी तकनीक के नहीं देख सकते यह घाटी चौथे आयाम (Fourth dimension) से प्रभावित होने के कारण रहस्यमयी बनी हुई है।

बहुत से लोगो यह भी कहते हैं की इस जगह का संपर्क अंतरिक्ष में किसी दूसरी दुनिया से भी है यदि आप इस घाटी के बारे में और अधिक  जानना चाहते हैं तो आपको एक प्राचीन किताब काल विज्ञान पढनी होगी यह किताब आज भी तिब्बत के तवांग मठ के पुस्तकालय में मौजूद है और यह तिब्बती भाषा में लिखी गयी है। 


इस किताब में लिखा है कि इस तीन आयाम वाली (third dimension) की दुनिया की हर वस्तु देश, समय और नियति में बंधी हुई है यानी हर वस्तु एक निश्चित स्थान, समय और नियमो के हिसाब से काम करती है लेकिन शंगरी ला घाटी में समय नगण्य है यानी वहां समय ना के बराबर है हम इसे सरल शब्दों में ऐसे समझ सकते हैं की हमारे यहाँ के सैकड़ो साल और वह का एक second।

शंगरी ला घाटी में प्राण,मन और विचारो की शक्ति एक विशिष्ट सीमा तक बढ़ जाती है अगर इस धरती पर आध्यात्मिक नियंत्रण केंद्र है तो वह शंगरी ला घाटी ही है अगर इस शंगरी ला घाटी में कोई वस्तु या प्राणी अनजाने में चला जाता है तो third dimension वाले इस जगत की दृष्टि में उसकी सत्ता गायब हो जाती है। 

सरल शब्दों में कहे तो जब तक वह वहां से वापस आयेगा तब तक यहाँ न जाने कितनी सदियाँ बीत गयी होंगी लेकिन शंगरी ला घाटी मे उसका अस्तित्व बना रहता है और यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता की भविष्य में कब उसका अस्तित्व प्रकट हो या न हो यानी कि वहाँ जाने के बाद वह वापस आयेगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि जब तक वह वापस आयेगा तब तक यहाँ सदिया बीत चुकी होंगी।

शंगरी ला घाटी में जाने के बाद किसी इन्सान की आयु बहुत धीमी गति से बढती है मान लीजिये किसी इंसान ने इस घाटी में 20 साल की उम्र में प्रवेश किया तो उसका शरीर लम्बे समय तक जवान ही बना रहेगा शंगरी ला एक आम इंसान के लिए अनजान जगह हो सकती है।

 लेकिन उच्च स्तरीय अध्यात्मिक क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति इस जगह से अनजान नहीं रह सकता फिर वह व्यक्ति चाहे योग से या तंत्र से या किसी अन्य तरह के आध्यात्म क्षेत्र से जुड़ा हो, हाँ लेकिन उस इंसान की साधना उच्च अवश्य  होनी चाहिए।

शंगरी ला घाटी सिर्फ भारत का ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के आध्यात्म जगत का नियंत्रण और पथ प्रदर्शक क्षेत्र है साथ ही इसको आम इंसान की दृष्टि से देखा भी नहीं जा सकता जब तक वहां रहने वाले सिद्ध न चाहें  तब तक इस घाटी को न तो कोई देख सकता है और न ही वहां जा सकता है जो लोग इस घाटी से परिचित हैं।

 उनका कहना है कि प्रसिद्ध योगी श्यामाचरण लाहिड़ी के गुरु अवतारी बाबा, जिन्होंने आदि शंकराचार्य को भी दीक्षा दी थी शंगरी ला घाटी के किसी सिद्ध आश्रम में अभी भी निवास कर रहे हैं जो कभी आकाश मार्ग से चलकर अपने शिष्यों को दर्शन भी देते हैं ।

यहाँ पर तीन साधना के केंद्र प्रसिद्ध हैं।

ज्ञान गंज मठ, सिद्ध विज्ञान आश्रम, योग सिद्ध आश्रम।

इन तीनो साधना केंद्रों पर आपको ऐसे अनेक योगी मिल जायेंगे जो जन्म मृत्यु के अधीन नही है। ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं जो यह साबित करती हैं कि मरने के बाद सब कुछ समाप्त नहीं होता बल्कि किसी न किसी रूप में अस्तित्व बचा रहता है इसे योग की भाषा में सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। 

मृत्यु के पश्चात आत्मा सूक्ष्म शरीर में वास करती है सामान्यतः यह सूक्ष्म शरीर अल्प विकसित होते हैं व अधिक कुछ कर पाने में असमर्थ होते हैं।  

योगी लोग अपने जीवित रहते सूक्ष्म शरीर को विकसित कर लेते हैं जिससे यह बहुत कुछ करने में समर्थ हो जाते हैं। यहाँ की दुर्गम पर्वत श्रृंखला में ऐसी ही सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओ का निवास स्थान है जो अपने स्थूल शरीर को छोड़कर सूक्ष्म शरीर में विद्यमान हैं यह अपने सूक्ष्म शरीर से विचरण करते हैं लेकिन कभी कभी स्थूल शरीर भी धारण कर लेते हैं।

भारत की रहस्यमयी घटनाये योगी साधकों का क्या कहना है। शंगरी ला घाटी में प्रवेश करने वाले एक योगी साधक के अनुभव के अनुसार उस स्थान पर न तो सूरज  की रौशनी है और न चाँद की चांदनी वातावरण में एक दूधिया प्रकाश फैला हुआ है। 

कहा से आ रहा है इसका कुछ पता नहीं है। यह घाटी एक महान योगी की इच्छाशक्ति की वशीभूत है। इस घाटी के बारे में कहा जाता है की यहाँ कोई सामान्य साधक जा नहीं सकता और उच्च साधक भी अपनी इच्छा से इसे नहीं देख सकता।

समय समय पर कई पर्यटको, सैनिको, खोजकर्ताओं और लेखको ने अपने लेखों के द्वारा इस जगह के बारे में लिखा है। उन लोगो के अनुसार यह एक ऐसी दुनिया है जो रहस्य जादू और रोमांस से भरपूर है कई सारी किदवंतिया इस जगह के बारे में प्रचलित हैं। मगर इस जगह को पूरी तरह से समझने में हर इंसान नाकाम है।

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सोमवार, 28 जून 2021

दानवीर_भामाशाह_जैन (#ओसवाल)

दानवीर_भामाशाह_जैन

 (#ओसवाल२८जून१५४७)

 #४७४वीं_जयंती पर कोटि कोटि नमन🙏🙏


#वीर_भामाशाह #वीर_शिरोमणि_महाराणा_प्रताप के मित्र और प्रधान (#प्रधानमंत्री) थे..उनके पिता भारमल कावड़िया रणथंभौर के किलेदार थे..भामाशाह एक वीर योद्धा थे ..और उन्होंने अपने मित्र महाराणा प्रताप के साथ कई लड़ाइयाँ लड़ीं..उन्होंने मालवा.. मालपुरा और अन्य स्थानों जैसे मुगल क्षेत्रों में अभियानों का नेतृत्व किया.. अपनी खुद की बचत..चित्तौड़ के अतीत के छिपे हुए खजाने और मालवा की लूट से प्राप्त राशि से उन्होंने  महाराणा प्रताप को २५ लाख और २0,000 सोने के सिक्के भेंट किये.. चुलिया नामक जगह पर जिस से महाराणा प्रताप को आगे के मुगल साम्राज्य से लड़ने के संसाधन मिले...!!


जय राष्ट्रभक्त दानवीर भामाशाह जैन को कोटि कोटि नमन

                    साभार 

         Mahaveer S. Mewar

Rajputana-History & Culture