शनिवार, 18 जुलाई 2020

लालच बुरी बलाय



(असमिया लोक-कथा)

आसाम के एक गाँव में तोराली नाम की लड़की रहती थी। गोरा रंग, माथे पर लाल बिंदिया व हाथों में चाँदी की चूडियाँ खनकाती तोराली सबको प्रिय थी। बिहुतली रंगमंच पर उसका नृत्य देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते।

एक दिन उसके पिता के पास अनंत फुकन आया। वह उसी गाँव में रहता था। उसने तोराली के पिता से कहा, 'मैं आपकी लड़की से विवाह करना चाहता हूँ।'

फुकन के पास धन-दौलत की कमी न थी। तोराली के पिता ने तुरंत हामी भर दी।

सुबाग धान (मंगल धान) कूटा जाने लगा। तोराली, अनंत की पत्नी बन गई। कुछ समय तो सुखपूर्वक बीता किंतु धीरे-धीरे अनंत को व्यवसाय में घाटा होने लगा। देखते ही देखते फुकन के घर में गरीबी छा गई।

तोराली को भी रोजी-रोटी की तलाश में घर से बाहर निकलना पड़ता था। इस बीच उसने पाँच बेटों को जन्म दिया। एक दिन पेड़ के नीचे दबने से फुकन की आँखें जाती रहीं। तोराली को पाँचों बेटों से बहुत उम्मीद थी। वह दिन-रात मेहनत-मजदूरी करती। गाँववालों के धान कूटती ताकि सबका पेट भर सके।

तोराली भगवान से प्रार्थना करती कि उसके बेटे योग्य बनें किंतु पाँचों बेटे बहुत अधिक आलसी थे।

उन्हें केवल अपना पेट भरना आता था। माता-पिता के कष्टों से उनका कोई लेना-देना नहीं था।

तोराली ने मंदिर में ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे एक मेहनती व समझदार पुत्र पैदा हो। परंतु उसने बालक की जगह एक साँप को जन्म दिया। जन्म लेते ही साँप जंगल में चला गया। तोराली अपनी फूटी किस्मत पर रोती रही।
तोराली के पाँचों बेटे उसे ताना देते-
'तुम माँ हो या नागिन, एक साँप को जन्म दिया।'

फुकन के समझाने पर भी लड़कों के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आया। कोई-कोई दिन ऐसा भी आता जब घर में खाने को कुछ न होता। पाँचों बेटे तो माँग-मूँगकर खा आते। फुकन और तोराली अपने छठे साँप बेटे को याद करके रोते।

एक रात तोराली को सपने में वही साँप दिखाई दिया। उसने कहा, 'माँ, मेरी पूँछ सोने की है। मैं रोज घर आऊँगा। तुम मेरी पूँछ से एक इंच हिस्सा काट लिया करना। सोने को बेचकर घर का खर्च आराम से चलेगा।'

तोराली ने मुँह पर हाथ रखकर कहा, 'ना बेटा, अगर मैं तुम्हारी पूँछ काटूँगी तो तुम्हें पीड़ा होगी।'

“नहीं माँ, मुझे कोई दर्द नहीं होगा।' साँप ने आश्वासन दिया और लौट गया।

वही सपना तोराली को सात रातों तक आता रहा। आठवें दिन सचमुच साँप आ पहुँचा। तोराली ने कमरा भीतर से बंद कर लिया। डरते-डरते उसने चाकू से पूँछ पर वार किया। सचमुच उसके हाथ में सोने का टुकड़ा आ गया। साँप की पूँछ पर कोई घाव भी नहीं हुआ। माँ से दूध भरा कटोरा पीकर साँप लौट गया।

तोराली ने वह सोना बेचा और घर का जरूरी सामान ले आई। शाम को खाने में पीठा व लड्डू देखकर लड़के चौंके। तोराली ने झूठ बोल दिया कि उनके नाना ने पैसा दिया था।

इसी तरह साँप आता रहा और तोराली घर चलाती रही। उसका झूठ ज्यादा दिन चल नहीं सका। बेटों ने जोर डाला तो तोराली को पैसों का राज बताना ही पड़ा। बड़ा लड़का दुत्कारते हुए बोला, 'मूर्ख माँ, यदि हमारे साँप-भाई की पूरी पूँछ सोने की है तो ज्यादा सोना क्‍यों नहीं काटती?'

छोटा बोला, 'हाँ, इस तरह तो हम कभी अमीर नहीं होंगे। रोज थोड़े-थोड़े सोने से तो घरखर्च ही पूरा पड़ता है।'

तोराली और फुकन चुपचाप बेटों की बातें सुनते रहे। बेटों ने माँ पर दबाव डाला कि वह कम-से-कम तीन इंच सोना अवश्य काटे ताकि बचा हुआ सोना उनके काम आ सके।

तोराली के मना करने पर उन्होंने उसकी जमकर पिटाई की। बेचारा अंधा फुकन चिल्लाता ही रहा। रोते-रोते तोराली ने मान लिया कि वह अगली बार ज्यादा सोना काटेगी। अगले दिन साँप बेटे ने दरवाजे पर हमेशा की तरह आवाज लगाई-

दरवाजा खोलो, मैं हूँ आया
तुम्हारे लिए सोना हूँ लाया
क्या तुमने खाना, भरपेट खाया?

सदा की तरह तोराली ने भीतर से ही उत्तर दिया-

मेरा बेटा जग से न्यारा
माँ के दुख, समझने वाला
क्या हुआ गर इसका है रंग काला

साँप भीतर आया, तोराली ने उसे एक कटोरा दूध पिलाया, बेटों की मार से उसका अंग-अंग दुख रहा था। उसने नजर दौड़ाई, पाँचों बेटे दरारों से भीतर झाँक-झाँककर उसे जल्दी करने को कह रहे थे।

तोराली ने चाकू लिया और पूँछ का तीन इंच लंबा टुकड़ा काट दिया। अचानक चाकू लगते ही पूँछ से खून की धार बह निकली। साँप बेटा तड़पने लगा और कुछ ही देर में दम तोड़ दिया। तोराली, बेटे की मौत का गम मनाती रही और बेटों को अपने लालच का फल मिल गया।
हाँ, वह तीन इंच टुकड़ा भी तीन घंटे बाद माँस का टुकड़ा बन गया।

(रचना भोला 'यामिनी')

अनमोल राय




 (असमिया लोक-कथा)

बहुत समय पहले की बात है, सिलचर के समीप एक गाँव में जयंत फुकन रहता था। उसके माता-पिता बहुत अमीर थे। अत: उसे पैसे की कोई कमी न थी।

एक दिन वह चाचा के पोते की शादी में दूर गाँव गया। विवाह के पश्चात्‌ वह वहीं रुक गया। अगले दिन वह हाट में गया। वहाँ की रौनक देखकर उसे बड़ा मजा आया।

शाम होते ही सभी दुकानदार लौटने लगे किंतु एक व्यक्ति चुपचाप दुकान लगाए बैठा था। जयंत ने हैरानी से पूछा, 'अरे भई, तुम घर नहीं जाओगे?!
वह दुकानदार मायूसी से बोला, 'मेरी सलाह नहीं बिकी, उसे बेचकर ही जाऊँगा।'
'कौन-सी सलाह, कैसी सलाह?'
'पहले कीमत तो चुकाओ।' दुकानदार ने हाथ नचाते हुए कहा।
'कितने पैसे लगेंगे?' जयंत ने लापरवाही से पूछा।
'एक सलाह का एक हजार रुपया लगेगा, मेरे पास दो ही हैं।'
दुकानदार ने व्यस्तभाव से कहा।

उसकी बात सुनकर जयंत को हँसी आ गई। भला सलाह भी खरीदी जाती है? परंतु जाने जयंत के मन में क्या आया, उसने दो हजार रुपए गिनकर उसके सामने रख दिए।
दुकानदार हिल-हिलकर बोला-

काँटेदार बाड़ न लगाना
घरवाली को राज न बताना
नहीं तो पीछे पड़ेगा पछताना।

जयंत ने उसकी सलाह याद कर ली! घर पहुँचा तो पत्नी दरवाजे पर खड़ी मिली। बाग का माली भी वहीं था। वह माली से दरवाजे के ऊपर बाड़ लगवा रही थी। जयंत को नई-नई सलाह याद थी। उसने पत्नी को वह बाड़ लगाने से मना किया। दो हजार रुपए वाली बात भी बताई। उसकी पत्नी खिलखिलाकर हँस दी।

'मान गए आपको, कोई भी घड़ी-भर में मूर्ख बना जाता है। अरे, इतने रुपए पानी में बहा आए। मेरे लिए जेवर बनवा देते।' जयंत चुपचाप भीतर आ गया। उसे अपनी गलती पर क्रोध आ रहा था। ठीक ही तो कहा पत्नी ने, दो हजार रुपए गँवा दिए।
उस रात जयंत को सोते-सोते विचार आया, 'क्यों न, इन सलाहों को आजमाया जाए।'

उसने एक सूअर के बच्चे का सिर काटकर जंगल में छिपा दिया। फिर खून से सना चाकू, पत्नी को दिखाकर बोला, 'अरी, मुझसे एक आदमी का खून हो गया है, तू किसी से कहना मत, वरना आफत आ जाएगी।'

जयंत की पत्नी के पेट में बात पचना आसान न था। वह मटका लेकर पनघट पर जा पहुँची। वहाँ वह अपने पति की बहादुरी की डींगें हाँकने लगी। एक सखी ने ताना दिया, 'अरी सोनपाही, बहुत बड़ाइयाँ कर रही है। ऐसा कौनसा बड़ा काम कर दिया तेरे पति ने?'

जयंत की पत्नी सोनपाही ने पीछे हटना नहीं सीखा था। बात में नमक-मिर्च लगाकर, उसने शान से सबको बताया कि जयंत ने एक आदमी का खून करके उसकी लाश जंगल में छिपा दी है।

शाम होते-होते पूरे गाँव में यह खबर फैल गई। जयंत खेत से लौट रहा था। लोग उसे देखते और हाय राम! जान बचाओ। कहकर भाग खड़े होते।

जयंत कुछ समझ नहीं पाया। अगले दिन राजा का बुलावा आ पहुँचा। हड़बड़ाहट में जयंत घर से निकला। दरवाजे की कंटीली बाड़ में उसके सिर की पगड़ी गिर गई। जयंत उसे बिना पहने ही चल दिया।

राजा के दरबार में नंगे सिर जाने की सख्त मनाही थी। जयंत को देख, राजा गुस्से से भर उठा। तब जयंत को याद आई वह सलाह- 'काँटेदार बाड़ न लगाना!'
फिर राजा ने उससे गरजकर पूछा, 'तुमने एक आदमी का खून किया है?'
जयंत ने हकलाते हुए उत्तर दिया, 'जी मैं ... नहीं ... ।'
'क्या मैं ... मैं लगा रखी है। स्वयं तुम्हारी पत्नी, उस खून की गवाह है।'
जयंत के कानों में गूँजने लगा।

“घरवाली को राज न बताना।
नहीं तो पीछे पड़ेगा पछताना।'

वह खिलखिलाकर हँस दिया। उसने धीरे-धीरे राजा को समझाया कि किस तरह उसने सलाहों की परीक्षा लेनी चाही। राजा से आज्ञा लेकर वह जंगल में से सूअर का कटा हुआ सिर ले आया। राजा ने सारी बात सुनी तो वह भी हँसते-हँसते लोटपोट हो गया।

जयंत को ढेरों ईनाम देकर विदा किया गया। सोनपाही कुछ नहीं जान पाई, परंतु जयंत ने उन सलाहों को सारी उम्र अमल में लाने का निश्चय कर लिया।

(रचना भोला 'यामिनी')

99 का चक्कर



: असमिया लोक-कथा

प्राचीनकाल की बात है । असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर खाता था, उसी से संतुष्ट था ।

वह दिन भर में ढेरों में बर्तन बनाता, जिन पर उसकी लागत सात-आठ रुपये आती थी । अगले दिन वह उन बर्तनों को बाजार में बेच आता था । जिस पर उसे डेढ़ या दो रुपये बचते थे । इतनी कमाई से ही उसकी रोटी का गुजारा हो जाता था, इस कारण वह मस्त रहता था ।

रोज शाम को तीरथ अपनी बांसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों से बजाता रहता । इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे । धीरे-धीरे एक दिन आया कि उसका विवाह भी हो गया । उसकी पत्नी का नाम कल्याणी था ।

कल्याणी एक अत्यंत सुघड़ और सुशील लड़की थी । वह पति के साथ पति के काम में खूब हाथ बंटाने लगी । वह घर का काम भी खूब मन लगाकर करती थी । अब तीरथ की कमाई पहले से बढ़ गई । इस कारण दो लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था ।

तीरथ और कल्याणी के पड़ोसी यह देखकर जलते थे कि वे दोनों इतने खुश रहते थे । दोनों दिन भर मिलकर काम करते थे । तीरथ पहले की तरह शाम को बांसुरी बजाता रहता था । कल्याणी घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी ।

एक दिन कल्याणी तीरथ से बोली कि तुम जितना भी कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है । हमें अपनी कमाई से कुछ न कुछ बचाना अवश्य है ।

इस पर तीरथ बोला - "हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं । चाहे छोटी ही सही, हमारा अपना घर है । दोनों वक्त हम पेट भर कर खाते हैं, और हमें क्या चाहिए ?"

इस पर कल्याणी बोली - "मैं जानती हूं कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमें खूब खुश भी हूं । परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए ।"

तीरथ को कल्याणी की बात ठीक लगी और दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे । कल्याणी सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती । तीरथ भी रात देर तक काम करता रहता । लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत न कर पाते । अत: दोनों ने फैसला किया कि इस तरह अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है और वे पहले की तरह मस्त रहने लगे ।

एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था । शाम ढल चुकी थी । वह थके पैरों खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह एक लाल मखमली थैली पर गई । उसने उसे उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । थैली में चांदी के सिक्के भरे थे ।

तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी थैली हो उसी को दे देनी चाहिए । उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया । उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उस थैली को उठा लिया और घर ले आया ।
घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया । कल्याणी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया ।
तीरथ बोला - "तुम कहती थीं कि हमें आड़े समय के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए । सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है ।"
"ऐसा ही लगता है ।" कल्याणी बोली - "हमें गिनकर देखना चाहिए कि ये चांदी के रुपये कितने हैं ।"

दोनों बैठकर रुपये गिनने लगे । पूरे निन्यानवे रुपये थे । दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे । कल्याणी बोली - "इन्हें हमें आड़े समय के लिए उठा कर रख देना चाहिए, फिर कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे ।"
तीरथ बोला - "पर निन्यानवे की गिनती गलत है, हमें सौ पूरा करना होगा, फिर हम इन्हें बचा कर रखेंगे ।"

कल्याणी ने हां में हां मिलाई । दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है, परंतु फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि इसे पूरा करके ही रहेंगे । अब तीरथ और कल्याणी ने दुगुनी-चौगुनी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया । तीरथ भी बर्तन बेचने सुबह ही निकल जाता, फिर देर रात तक घर लौटता ।

इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते थे । अब तीरथ थका होने के कारण बांसुरी नहीं बजाता था, न ही कल्याणी खुशी के गीत गाती गुनगुनाती थी । उसे गुनगुनाने की फुरसत ही नहीं थी। न ही वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं जा पाती थी ।

दिन-रात एक करके दोनों लोग एक-एक पैसा जोड़ रहे थे । इसके लिए उन्होंने दो वक्त के स्थान पर एक भक्त भोजन करना शुरू कर दिया, लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे नहीं हो रहे थे ।

यूं ही तीन महीने बीत गए । तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहां जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं ।

किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए । अब तक तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था । दोनों सोचने लगे कि एक सौ से क्या भला होगा । हमें सौ और जोड़ने चाहिए । अगर सौ रुपये और जुड़ गए तो हम कोई व्यापार शुरू कर देंगे और फिर हमारे दिन सुख से बीतेंगे ।

उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी । इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी । एक दिन पड़ोस की रम्मो ने फैसला किया कि वह कल्याणी की परेशानी का कारण जानकर ही रहेगी । वह दोपहर को कल्याणी के घर जा पहुंची । कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी ।

रम्मो ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कल्याणी से पूछ ही लिया - "बहन ! पहले जो तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाती थीं, आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता ।"

कल्याणी ने 'यूं ही' कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही । परंतु रम्मो कब मानने वाली थी । वह बात को घुमाकर बोली - "आजकल बहुत थक जाती हो न ? कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं ।"

कल्याणी थकी तो थी ही, प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई और बोली - "हां बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूं, पर क्या करूं हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं ।"

"क्या मतलब ?" रम्मो बोली तो कल्याणी ने पूरा किस्सा कह सुनाया । रम्मो बोली - "बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो, तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था । यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता ।"

कल्याणी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा - "तुम किस चक्कर की बात कर रही हो ? मैं कुछ समझी नहीं ।"
"अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर ।" रम्मो का जवाब था ।

(रुचि मिश्रा मिन्की)

गुरुभक्ति


"गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास "

एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए !
भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो !

जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो !

भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !

यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !

नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ?

यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !

मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !
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यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !
😷😷😷😪😪😪
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !😌☝
✨नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है ! ✨
गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !

गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा "स्वयं गुरु" भी नहीं कर सकते

इन नामो के बारे में भी जाने


क्या आप जानते हैं कि हमारे देश, गाँव व शहरों के असली नाम क्या थे ?
१. हिन्दुस्तान, इंडिया या भारत का असली नाम - आर्यावर्त्त !
२. कानपुर का असली नाम - कान्हापुर !
३. दिल्ली का असली नाम - इन्द्रप्रस्थ !
४. हैदराबाद का असली नाम - भाग्यनगर !
५. इलाहाबाद का असली नाम - प्रयाग !
६. औरंगाबाद का असली नाम - संभाजी नगर !
७. भोपाल का असली नाम - भोजपाल !
८. लखनऊ का असली नाम - लक्ष्मणपुरी !
९. अहमदाबाद का असली नाम - कर्णावती !
१०. फैजाबाद का असली नाम - अवध !
११. अलीगढ़ का असली नाम - हरिगढ़ !
१२. मिराज का असली नाम - शिव प्रदेश !
१३. मुजफ्फरनगर का असली नाम - लक्ष्मी नगर !
१४. शामली का असली नाम - श्यामली !
१५. रोहतक का असली नाम - रोहितासपुर !
१६. पोरबंदर का असली नाम - सुदामापुरी !
१७. पटना का असली नाम - पाटलीपुत्र !
१८. नांदेड का असली नाम - नंदीग्राम !
१९. आजमगढ का असली नाम - आर्यगढ़ !
२०. अजमेर का असली नाम - अजयमेरु !
२१. उज्जैन का असली नाम - अवंतिका !
२२. जमशेदपुर का असली नाम काली माटी !
२३. विशाखापट्टनम का असली नाम - विजात्रापश्म !
२४. गुवाहटी का असली नाम - गौहाटी !
२५. सुल्तानगँज का असली नाम - चम्पानगरी !
२६. बुरहानपुर का असली नाम - ब्रह्मपुर !
२७. इंदौर का असली नाम - इंदुर !
२८. नशरुलागंज का असली नाम - भीरुंदा !
२९. सोनीपत का असली नाम - स्वर्णप्रस्थ !
३०. पानीपत का असली नाम - पर्णप्रस्थ !
३१.बागपत का असली नाम - बागप्रस्थ !
३२. उसामानाबाद का असली नाम - धाराशिव (महाराष्ट्र में) !
३३. देवरिया का असली नाम - देवपुरी ! (उत्तर प्रदेश में)
३४. सुल्तानपुर का असली नाम - कुशभवनपुर
३५. लखीमपुर का असली नाम - लक्ष्मीपुर ! (उत्तर प्रदेश में)
ये सभी नाम मुगलों, अंग्रेजों, राजाओं और आज तक की सरकारों ने बदले हैं ।               ....जय हिन्द,,!!

राजा वीर विक्रमादित्य कथा




कौन थे राजा वीर विक्रमादित्य..... ????


बड़े ही शर्म की बात है कि महाराज विक्रमदित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है, जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था, और स्वर्णिम काल लाया था

उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य...

बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली ,

आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमदित्य के कारण अस्तित्व में है,

अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था ।

भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और जैन हो गए थे ।
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रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया।

विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया
विक्रमदित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा, जिसमे भारत का इतिहास है ।

अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे

हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे,

उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए , राज अपने छोटे भाई विक्रमदित्य को दे दिया ,

वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है ।
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महाराज विक्रमदित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया
उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है ।
विक्रमदित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे ।
भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमदित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे , आप गूगल इमेज कर विक्रमदित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।
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हिन्दू कैलंडर भी विक्रमदित्य का स्थापित किया हुआ है
आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे ।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे ,
विक्रमदित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे, न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था
विक्रमदित्य का काल राम राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनि और धर्म पर चलने वाली थी
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बुधवार, 15 जुलाई 2020

चंगेज़ खान के बारे में



*#चंगेज_खान - 1162 - 1227*

*बहुत से लोगो को इतिहास की अनभिज्ञता के कारण लगता है की चंगेज खान मुस्लिम था । जबकि ऐसा नही है, चंगेज खान मुस्लिम नही था, बल्कि इस्लाम के महान शत्रुओ में उनका नाम शुमार होता है ।। पिछले 1500 वर्षों में अगर किसी एक राजा ने सबसे बड़ी भूमि जीती हो, तो वह चंगेज खान ही है।*

*चंगेज खान मंगोल जाति से थे, मंगोलों का सम्बन्ध मंगोलिया से है, जो संस्कृत के मङ्गल नाम का अपभ्रंस है । मंगोलों ओर भारतीयों की संस्कृति में भी काफी समानता है, अपने ध्वज को वे स्वयम्भू (सायंबू )कहते है, इसमें भू स्वर संस्कृत का है । मंगोलिया के एक भूतपूर्व राष्ट्रपति का नाम शंभु था।*

*कुब्लेखान नाम के मंगोल ने चीन की विष्वविख्यात महाभित्ती के पश्चिमीद्वार पर उष्णीश विजयाधारणी नामक संस्कृत मंत्र लिखवायाः-*

*ॐ नमो भगवत्यै आर्य समन्त विमलोष्णीषविजयायै।*

*यह मंत्र सबसे ऊपर संस्कृत में, फिर तिब्बती में और फिर मंगोल और चीनी लिपियों में लिखा गया।*

*मंगोल देश के विहारों में स्थान-स्थान पर संस्कृत मंत्र लिखे रहते हैं। वे संस्कृत लिखने के लिये लांछा लिपि का प्रयोग करते हैं। भारत में बंगाल के पाल वंश में संस्कृत मंत्र लिखने के लिए जो सुन्दर अक्षर प्रयोग किये जिन्हें रंजना लिपि कहा जाता था, उसी रंजना लिपि को लांछा के रूप में मंगोलिया में प्रयोग किया जाता है। संस्कृत अक्षर सिखाने के लिये जो पुस्तक है उसे आलि, कालि, बीजहारम् कहते हैं। आलि अर्थात् अ, क इत्यादि स्वर व्यंजन। क्यांकि संस्कृत के अक्षर बीजमंत्र के रूप में भी प्रयोग में लाये जाते हैं।इस कारण अक्षर माला को बीजहारम् की संज्ञा दी गई।*

*मंगोल ओर भारत का इतना अटूट सम्बन्ध संस्कृत और संस्कृति दोनो से है, मंगोलिया के लोग शिखा भी रखते थे । इसी मंगोल वंश में हुआ था चंगेज खान, जिसका वास्तविक नाम Genghis खान उर्फ गांगेश खान था, गांगेश भी संस्कृत का ही नाम है, जैसे भीष्म पितामह को गांगेय कहा जाता था, यह गांगेश नाम भी उसी का समानार्थी नाम है, मंगोलियन लोग भी गंगा नदी को बहुत पवित्र मानते है , इस कारण वहां के किसी राजा का नाम गंगापुत्र के नाम पर हो, तो यह आश्चर्य की बात नही ।*

*चंगेज खान ने अपना मंत्रिमंडल ईरान भेजा था, इस्लामिक नीति के अनुसार ईरानी मुसलमानो ने चंगेज खान के मंत्रियों को मार डाला, चंगेज खान इस बात से इतना बिफर गया कि उसने ईरान और इराक की 70% आबादी को ही समाप्त कर दिया, बगदाद पहुंचकर उसने आसमानी ग्रन्थो को भी घोड़े की टॉप के नीचे मसल दिया था ।।*

*चंगेज खान इतना शक्तिशाली था, की इसने गजनी और पेशावर तक आकर वहां के शासक अल्लाउद्दीन मूहम्मद को खदेड़ कर मारा था, लेकिन उसके बाद भी चंगेज खान भारत की तरफ नही आया, जहां हिन्दू थे । पेशावर गजनी के सुल्तान अल्लाउदीन के बेटे जलालउद्दीन ने चंगेज खान से बचने के लिए उस समय के दिल्ली सल्तनत के बादशाह इल्तुतमिश से अपने ही अफगान भाई से मदद मांगी की वह उसे शरण दे, लेकिन चंगेज खान का तहलका इतना ज्यादा था, की उससे भयाक्रांत इल्तुतमिश ने जलालउद्दीन को शरण देने से मना कर दिया ।।।*

*आगे चलकर चेंगेज खान के वंशज इस्लाम के आगे ढेर हो गए, ओर भारत मे चलने वाला मुगल वंश उसी मंगोल राजवंश का एक छोटा सा टुकड़ा था ।।*

*खान शब्द इस्लाम के जन्म से बहुत पहले से भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रो की कई सभ्यताओं में प्रयोग होता रहा है। यह एक उपाधि की तरह भी प्रयोग की जाती थी ,  जो शासकों और अत्यंत शक्तिशाली सिपहसालारों को दी जाती थी - बाद में मंगोलों से ये उपाधि मंगोलों के गुलाम बने तुर्कों के बीच पहुँचा और वहाँ से भारत में तलवार के बल पर बनाये कई मुसलमानों ने इसे अपने नाम के साथ जोड़ लिया।


चंगेज़ खान के बारे में